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कांग्रेस कथा: दर्द है, दवा भी है... फिर क्यों दिल नहीं है?

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उन्होंने खुद इसकी जानकारी एक ट्वीट के जरिए दी. वहीं, कांग्रेस ने भी बताया कि प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के ऑफर को ठुकरा दिया है और वो पार्टी में नहीं शामिल हो रहे हैं.

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प्रशांत किशोर कांग्रेस में नहीं होंगे शामिल प्रशांत किशोर कांग्रेस में नहीं होंगे शामिल

मरीज-ए-इश्क पर रहमत खुदा की, मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की.... एक मशहूर शायर कह गए और तब से पुश्तें भुगत रही हैं. यही हालत है 140 साल से कुछ कम उम्र वाली कांग्रेस पार्टी की. पार्टी का मुस्तकबिल कई सालों से दो जरूरतों पर टिका है. एक इस इल्म पर कि मर्ज क्या है, और दूसरा दवा क्या होगी? 

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर काफी वक्फे से कांग्रेस के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे. हाथ में उनके थी दवा और नसीहतों की फेहरिस्त. चाहत थी थोड़ी सी जमीन और कुछ करने का अरमान.

पार्टी ने कई बैठकों के दौर से इशारा किया कि वो प्रशांत किशोर को हम कदम बनाने की सोच सकती है. मगर आज प्रशांत किशोर ने ट्विटर के जरिए ये साफ कर दिया कि कांग्रेस के न्योते में वो दस्तखवान परोसना शामिल नहीं था, जिसकी उन्हें उम्मीद थी या जो कांग्रेस को बेहतरी के रास्ते ले जा सकता है.

उन्होंने कांग्रेस के "Empowered Action Group" में शामिल होने को थैंक्यू बोल दिया. कहा “मैंने कांग्रेस के न्योते को मना कर दिया, जिसमें पार्टी के किसी ग्रुप को ज्वाइन कर चुनाव की जिम्मेदारी लेना शामिल था. मुझसे ज्यादा कांग्रेस को जरूरत है कि वो नेतृत्व और आत्मशक्ति को ढूंढे और पार्टी के ढांचे में रिफॉर्म के जरिए बदलाव करे."

भले प्रशांत किशोर आज बोले हों लेकिन इशारे मिल रहे थे कि सोनिया गांधी की सीधी दखल के बावजूद नई शुरुआत नहीं होगी और बातचीत का अंत कांग्रेस के दीवानों के लिए बुरी खबर ही है.

ये तय था कि प्रशांत किशोर सरीखे नीतिकार को कांग्रेस में लैटरल एंट्री बमुश्किल मिलेगी. पुराने जमींदार और कांग्रेस का शाही परिवार पीछे खिसक के उनके लिए जमीन आसानी से नहीं बनाएंगे. इशारे कई थे.

ये सोचिए जब कांग्रेस में पुनर्जीवन का मंथन चल रहा हो, उस वक्त कांग्रेस के प्रथम परिवार के सदस्य और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को कहां होना चाहिए था जिनकी हर अहम फैसले पर मुहर जरूरी है. कांग्रेस के कार्यकर्ता आतुर थे. दफ्तर के बाहर से रिपोर्टर अंदर खाने की खबरों का खुलासा कर रहे थे. राजनीतिक पंडित कह रहे थे- यही बड़ा मौका है.

मगर राहुल गांधी सात दिन पहले से विदेश दौरे पर थे. खबर ये थी कि राहुल PK को लेकर सशंकित हैं. फैसला राहुल की मुहर के बिना होना नहीं था और राहुल का इस प्रस्ताव पर ट्रस्ट लेवल कम था. राहुल गांधी किसी बाहरी को पार्टी के टॉप लेवल पर बड़ी जगह देने के हक में नहीं थे. 

पिछले कुछ सालों में राहुल गांधी की टीम की हैसियत में गजब इजाफा हुआ है और उनके लिए भी PK का अंदर आना जमीन दरकने का सबब होता. उन्होंने भी अपना ऊहापोह राहुल गांधी के शक से जोड़ दिया था.

मामला यहीं अटका. प्रशांत किशोर को कांग्रेस में शामिल करने की मुहिम राहुल की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा चला रही थीं. आज जब प्रियंका विदेश दौरे पर निकल गईं तो साफ हो गया कि कांग्रेस के PK मस्तूल से हवा निकल चुकी थी.

एक कांग्रेसी नेता ने कहा, ''ये कैसा प्लान था जिसने कांग्रेस को जगाने की उम्मीद दी, जिसके कारण विदेश दौरे नहीं टाले जा सके. जो कांग्रेस को 2004 में 206 सीट से 2019 में 52 के झटके से उबारने की बात करता था.'' 

करार ना होने पर राहुल गांधी के शक का दूसरा कारण था प्रशांत किशोर का राजनीतिक सलाहकारी तंत्र. उनकी कंपनी Ipac ने तेलंगाना में TRS से चुनावी करार किया. कांग्रेस की तेलंगाना इकाई ने दो टूक कह दिया- ''प्रशांत किशोर और Ipac को अलग नहीं देखा जा सकता. अगर प्रशांत कांग्रेस में आते और इधर TRS से करार रखते तो कांग्रेस को नुकसान होता.''

मोदी सरकार के खिलाफ ताकतों के जुड़ने में और भी अड़चन थी. PK के साथ करार भले ही दिल्ली में होता मगर उसका क्रियान्वयन राज्यों में होना था. कांग्रेस की राज्यों में परेशानियां कई हैं. एक ये कि कुछ राज्यों में कांग्रेस बुलंद है मगर उसी के नेता पार्टी पर भारी हैं, जैसे राजस्थान. दूसरा वो राज्य जहां सहयोगी कांग्रेस पर भारी हैं. तीसरे वहां, जहां कांग्रेस लचर है. ऐसे में कांग्रेस का दिल्ली में जन्मा प्लान राज्यों में चमक जाए, मुश्किल का सबब है. 

एक छत्र राज वाली पार्टियों में ऐसे फॉर्मूला चलाना आसान है. जैसे TMC, YSRCP, TRS या शिवसेना. सलाह का अमल तुरंत होता है. नेता को सलाह मिली, नेता का हुक्म हुआ और कार्यकर्ताओं ने जान लगा दी.

कांग्रेस की परेशानी बढ़ी 2019 में. चुनाव हारे तो राहुल गांधी ने पुराने दिग्गजों के खिलाफ मुहिम छेड़ी. नेता पीछे ना हटे तो उन्होंने जुलाई 2019 में पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. तूफान तब का थमा नहीं. अमरिंदर सिंह पार्टी से निकाले गए, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया साथ छोड़ गए, फिर G-23 ने बगावत छेड़ दी.

परेशानी ये थी कि जो राहुल गांधी के साथ थे या विरोध में थे, दोनों को PK का plan नागवार था. क्योंकि वो पुरानी व्यवस्था के खिलाफ था. उदाहरण के तौर पर 20 अप्रैल को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सोनिया गांधी से मिलने दिल्ली आए. पीके पर बोले- ''PK ब्रांड बन गए हैं. उनका नाम बड़ा है.'' लेकिन ये लाइन भी दे दी ''बुजुर्ग खिलाड़ियों से परामर्श कर चलना होगा.''

मगर आज सुबह उनके सिपहसलार और मंत्री सुभाष गर्ग ने तीर छोड़ा. ट्विटर पर उतरे और कहा, ''सिर्फ नेता और कार्यकर्ता संगठन मजबूत कर सकते हैं. सलाहकार और व्यापारी नहीं, संगठन को चाणक्य की जरूरत है.''

गर्ग कोई बड़े नेता नहीं. भरतपुर से आरएलडी के टिकट पर उन्हें गहलोत ने लड़वाया और मंत्री बना दिया. राजस्थान कांग्रेस के एक नेता ने कहा, ''सोनिया गांधी परामर्श कर रही हों तो गर्ग की कोई हैसियत नहीं. ये बयान उनका नहीं. वो अपने सीनियर की लाइन बोल रहे हैं.'' 

उधर, कांग्रेस के बागी G-23, नेता भी PK प्लान के पक्षधर नहीं थे. उनको लग रहा था कि पूरी कवायद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव की मांग को दबाने को मुहिम थी. एक नेता ने कहा, ''हमने मार्च में कह दिया था कि राहुल गांधी के नेतृत्व में विश्वास नहीं. हम बदलाव चाहते थे. Revival प्लान की बात चल रही थी मगर Revival नेतृत्व बदले बिना कैसे होता? पुरानी सत्ता व्यवस्था टूटती, इसीलिए ये प्रपंच रचा गया. जब किसी और की सत्ता में भागीदारी परिवार के अलावा नहीं हो सकती तो ये कवायद क्यों?'' 

दूसरे G-23 के सदस्य ने कहा, ''ये शगल था. पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू को तुरुप का पत्ता बताया गया. वो ध्वस्त हुआ. यूपी में लड़की हूं, लड़ सकती हूं... का जुमला चलाया गया. जमीनी हकीकत और पार्टी के हित से परे था, पिट गया. McKinsey जैसी कंपनी को हायर तब करो जब बदलने का मन हो, तभी मुनाफा बढ़ेगा.'' 

महाराष्ट्र के एक कांग्रेस नेता ने कहा, ''PK का प्लान कहता है कि नए सहयोगी पकड़ो, पुरानी मंडली तोड़ो, मोदी सरकार और कांग्रेस के बीच अनबन का परसेप्शन बदलो. आइडिया बढ़िया हैं मगर बदलने की नीयत नहीं.'' 

कुछ नेताओं का मानना है कि PK जैसे सलाहकारों का मशविरा कांग्रेस के लिए मुश्किल था. उनका मानना है कि मोदी सरकार कांग्रेस की फर्स्ट फैमिली के सख्त खिलाफ है. चूंकि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष या उसके परिवार के खिलाफ तेजी से जाना सरकार के लिए आसान ना होगा. इसलिए गांधी परिवार पार्टी की बागडोर हाथ में रखना चाहेगा और इस कारण से प्रशांत किशोर जैसे व्यक्ति और उनकी सलाह के लिए दरवाजे खोलना कांग्रेस के लिए मुश्किल था.  

कई दौर की बैठकों, महीनों चली कवायद के बाद कांग्रेस फिर उसी मकाम पर है जहां उसे दवा की जरूरत है मगर डॉक्टर पर विश्वास नहीं. दवा देने का तंत्र तैयार नहीं...यानी ढाक के तीन पात...


 

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