मॉब यानी कि भीड़. लैटिन भाषा के जिस शब्द से मॉब बना है वो है Mobile Vulgus. इस लैटिन वाक्यांश में मॉब का मतलब क्राउड या भीड़ नहीं होता है. बल्कि वल्गस (Vulgus) का मतलब भीड़ है. 'Mob' का अर्थ है गतिशील, परिवर्तनशील अथवा चंचल. मानिए कि भीड़ में कुछ असभ्यता या कहें कि अश्लीलता होती है, खासकर तब, जब वह अपने शरीर अथवा दिल की सुनने लगती है. ये अचानक आने वाली बाढ़ का इंसानी रुपांतरण है. केवल इतना अंतर है कि इसमें पानी के स्थान पर संदिग्ध निर्णय क्षमता की बाढ़ होती है इसमें और पर्सनल स्पेस और एजेंसी का स्पष्ट अभाव होता है.
खुशकिस्मती के दिन
गुरुवार की रात को दिल्ली मेट्रो के एक स्टेशन पर अचानक भारी भीड़ देखी गई. शब-ए-बारात "मना रहे" लोगों ने वहां सीन ही क्रिएट कर दिया. शब-ए-बारात को पवित्र प्रार्थनाओं की रात माना जाता है, लेकिन जब आस्था "मोबाइल वल्गस" से मिलती है, तो चीजें असभ्य मोड़ ले लेती हैं. सोशल मीडिया पर हलचल के अलावा उस रात कुछ भी अनहोनी नहीं हुई. लेकिन दो रात बाद दिल्ली उस रोज जैसी भाग्यशाली नहीं रही. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आखिर एक त्रासदी ने दस्तक दी.
बदकिस्मती के दिन
कुंभ स्नान की सदिच्छा में 'इंसानों का समंदर' प्रयागराज जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहा था. प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा ने उस 'समंदर' में सुनामी ला दी. आस्था, भाग्य और बहुत सारे उन्मत्त लोगों की टांगें. अठारह लोग मारे गए और कई घायल हो गए. मानवता, "मोबाइल वल्गस" के खुरों के नीचे कराहती हुई दबती रही.
मधुबनी, आरा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और बिहार की दूसरी जगहों पर आस्था के प्रवाह से सराबोर और संख्याबल में मजबूत लोगों ने तय किया कि ट्रेनों में तोड़फोड़ और यात्रियों पर हमला अपने आध्यात्मिक जोश को व्यक्त करने का एक बिल्कुल उचित तरीका है.
"माफ कीजिए, क्या यह मोक्ष की सीधी ट्रेन है? हां-हां, यही है, हट जाओ, नश्वर प्राणी!" हजारों लोग स्टेशनों पर उतर आए, साथी यात्रियों को खौफजदा करते हुए, ट्रेन की खिड़कियां तोड़ते हुए और टिकट लेकर यात्रा कर रहे लोगों को कोने में धकेलते हुए.
जमघट और खटपट
दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश होने के कारण भारत भीड़-भाड़ वाला देश है. जब भी आप सरकार की एजेंसियों द्वारा भीड़ को तमीज सिखाने वाली तरीके लागू करते हुए देखते हैं तो भगवान पर आपका भरोसा फिर से जाग उठता है. बेस्ट होने के बावजूद ये तरीके बुनियादी हैं. हालांकि ब्यूरोक्रेट के ये कामचलाऊ इंतजाम बताते हैं कि उनका भरोसा पूरी तरह से ऊपर वाले पर है. और साथ-साथ किस्मत की एक तगड़ी खुराक पर भी.
'क्राउड' और 'मॉब' के बीच अंतर हलचल का है. जब ये हलचल सिर्फ शरीर में होती है तो आपको प्रयागराज में पिछले महीने जो हुआ था और हर 12 बरस बाद होने वाले कुंभ की शुरुआत के बाद से प्रयागराज जाने वाली ट्रेनों में जो हो रहा है, वही मिलता है.
जब शरीर की गति भावनात्मक गति से जुड़ जाती है, तो आपको मॉब लिंचिंग, भगदड़, जातीय जंगे और सांप्रदायिक दंगे मिलते हैं. एक भीड़ में, थॉमस फुलर के शब्दों में, एक भीड़ में कई सिर होते हैं लेकिन एक भी दिमाग नहीं होता. बस नकलची गति में चलते पैर, जो अपने रास्ते में आने वाले सभी चीजों को कुचल देते हैं.
अंग्रेजी शब्द "juggernaut" भगवान जगन्नाथ के रथ से आया है. जब juggernaut गतिमान होता है, तो उसे रोका नहीं जा सकता. भगवान जगन्नाथ आपकी रक्षा करें क्योंकि सरकारी तंत्र आपकी रक्षा नहीं करेगा. वह ऐसा कर ही नहीं सकता.
उन्मादी कॉकटेल
जमघटों वाले इस देश ने अपने लोगों को भीड़ प्रबंधन में प्रशिक्षित करने के लिए कदम नहीं उठाए हैं, यहां तक कि उन हालात के लिए भी नहीं जहां कुछ अनिष्ट की भयानक आशंका होती है. जो फोर्स भीड़ प्रबंधन में प्रशिक्षित नहीं है, वह उपद्रवी भीड़ को नियंत्रित करने की कल्पना भी मुश्किल से कर सकती है. यह एक अप्रशिक्षित प्रशासन और अशिष्ट लोगों का खतरनाक मिश्रण है.
भारत में कतार बनाना एक अनजाना सिद्धांत है. अंग्रेजी शब्द "क्यू" (queue) हिंदी शब्द "क्यूं" (why) से अजीब तरह से मिलता-जुलता है. कतार? क्यूं?. इसमें मौजूद "ueue" उतना ही अनावश्यक है. व्यक्तिगत रूप से, हम अनुशासन में महान हैं, लेकिन एक साथ मिलकर हम मूलभूत नियमों का पालन करने में असमर्थ हैं. हमें नियमों का पालन करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए, ऐसा न करने पर हमें दंडित किया जाना चाहिए.
नाकामी, नाकामी!
प्रशासन इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है. फिर भी, वे केवल तभी जागेंगे जब एक त्रासदी घटित हो जाएगी, जब वे घटना को छोटा बताने में विफल हो जाएंगे- जो अब हर हाथ में एक कैमरा होने के कारण यह असंभव हो गया है. इसके बाद, सरकार एक जांच का आदेश देगी. अधिकारियों की कोई जवाबदेही नहीं होगी और मर चुके लोगों के लिए मुआवजे की घोषणा.
संख्याबल में शक्ति
एनोक्लोफोबिया भीड़ का एक तर्कहीन डर है. भारत में यह डर तर्कहीन नहीं है. देखिए कैसे कांवड़ियों की यात्रा हर साल सुर्खियां बटोरती है. रंगों के त्योहार को देखिए. इसी तरह के अन्य अवसरों के बारे में सोचिए, सीन कुछ अलग नहीं है. व्यक्ति उस उग्र छोटे समूह का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि पहले वाले सिर्फ व्यक्ति हैं, भले ही वे हजारों में हों. कानून लागू करने वाली एजेंसियां इसकी अनदेखी करती हैं, क्योंकि वे समझती हैं कि यह कुछ घंटों या दिनों की बात है. कामना कीजिए कि सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से गुजर जाए. विश्वास रखिए. प्रार्थना कीजिए.
स्टेट स्पॉन्सरशिप
राज्य स्वयं अनजाने में इस उपद्रवी मानसिकता को बढ़ावा देता है. संविधान समानता का समर्थन करता है, लेकिन व्यवहार में व्यक्तिगत अधिकार अक्सर पीछे छूट जाते हैं. कल्पना कीजिए कि यूरोप या अमेरिका में कोई व्यक्ति सार्वजनिक चौक पर किसी पवित्र पुस्तक को जलाने की घोषणा करता है. हो सकता है कि एक उपद्रवी भीड़ वहां जमा हो जाए, लेकिन राज्य की ताकत, उस विचार की निंदा करते हुए उस भीड़ और उस व्यक्ति के बीच खड़ी होगी जो ऐसी घृणित मूर्खता करने का अधिकार रखता है. भारत में ऐसा करने की कोशिश कीजिए.उन कानूनों को भूल जाइए जो आहत भावनाओं की तुलना सचमुच के चोट से करते हैं. यहां यह विचार ही हास्यास्पद है.
मकसद पश्चिम की तरह बनना नहीं है; लेकिन उस पुस्तक जलाने की घटना को सार्वजनिक नैतिकता के अलिखित नियमों के किसी भी उल्लंघन से बदल दीजिए, और आप जानते हैं कि आगे क्या होगा: राज्य दूसरी ओर देखेगा.
हमलोग बनाम हमलोगों में से कुछ
समूह हत्या तक कर बच निकलते हैं, कभी-कभी वास्तविकता में भी. एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को एक समूह की भूख मिटाने के लिए निलंबित किया जा सकता है. ऐसा तभी होता है जब वो ग्रुप इतना ताकतवर हो कि राज्य सत्ता को भी मजबूर कर दे. हां, लोकतंत्र बहुमत का शासन है, लेकिन यह सरकार की संरचना की बात करता है, न कि संख्या के दम पर उपद्रव करने वालों की जो व्यक्तियों को धमकाता है.
तीर्थयात्रियों का एक बड़ा समूह एक रेल डिब्बे में घुसकर भर गया सभी के लिए यात्रा को नर्क बना दिया, पुलिस ने इसे होने दिया. हजारों लोगों को एक प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा होने दिया गया, जिससे यह भगदड़ अपरिहार्य सी हो गई थी.
कोई समूह किसी किताब पर प्रतिबंध की मांग करता है? राज्य झुक जाता है. कोई उपद्रवी भीड़ किसी की हत्या कर देती है? राज्य इस मुद्दे पर सावधानी से कदम रखता है. ज्यादातर हिट-एंड-रन मामले? भीड़ के न्याय का डर. एक स्टैंड-अप कॉमेडियन और एक यूट्यूबर को ऑनलाइन भीड़ उसके धंधे को बंद कर देती है. इसके बाद उन्हें ऑफलाइन मौत की धमकियां मिलती हैं. राज्य न केवल इससे राजी होता है, बल्कि उन पर मुकदमा भी चलाता है.
यह ग्रुपों के लिए एक मिसाल कायम करता है, जो ऑल इंडिया ये, ऑल इंडिया वो के तर्ज पर बने होते हैं. या फिर अचानक बनने वाले समूह, जो किसी के भी नेतृत्व में उपद्रवी भीड़ बन जाते हैं. अगर भीड़ के पास कोई शिकायत है, तो उसकी ताकत और भी बढ़ जाती है, शिकायत को विचारधारा के साथ मिला दीजिए, तो यह एक नशीला मिश्रण बन जाता है.
व्यापक, व्यापक
ऐसे विषैले मिश्रण से उन्मत्त भीड़ ट्रेनों को आग लगा सकती है, जो बदले में शहरों को आग के हवाले कर देती है. हमने इसे इतनी बार देखा है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन हम भूल जाते हैं और बिना यह सोचे आगे बढ़ जाते हैं कि अगली बार इसे कैसे रोका जाए.
बिहार के उपद्रवियों को पता था कि अगर वे स्टेशन को राख कर दें, तब भी उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा. पचास लोग एक जायज मांग के लिए सड़क जाम कर सकते हैं और हजारों लोगों को परेशान कर सकते हैं. राज्य हजारों व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों का बलिदान कर देगा ताकि दर्जन भर लोगों के लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को बनाए रख सके.
अगर संरचना के लिहाज से देखें तो लोकतंत्र और सड़कों पर भीड़तंत्र के बीच एक मोटी रेखा है. राज्य ने उस रेखा के प्रति अपनी आंखें बंद कर ली है. संविधान व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन राज्य समूहों के कथित अधिकारों के बारे में अधिक चिंतित है. बेशक, यह सब लोकतंत्र के नाम पर हो रहा है.
आखिरी हंसी
भारत में भीड़ समस्या है. हमारे राजनेता नए भारत के निर्माण के 75 साल बाद भी बुनियादी व्यवहार परिवर्तन लाने के लिए गंभीर नहीं हैं. भारत में भीड़ इकट्ठा करना सबसे आसान काम है. भीड़ इकट्ठा करने की यह आसानी, यह सुलभता भारत की राजनीति को शक्ति देती है. हमारे पास नियमों की बहुलता है, लेकिन उनका पालन करने की इच्छा में कमी है. रईस अपनी-अपनी वजहों से बच निकलते हैं, बाकी बचे लोग अवहेलना करते हुए.
जब चीजों की छूट होती है तो सब कोई हाथ आजमाते हैं, ताकतवर महसूस करते हैं. हालांकि यह अभी तक भी पूर्ण अराजकता नहीं है, लेकिन यह एक तरह की नियंत्रित अराजकता है. कभी-कभी, नियंत्रण छोड़ दिया जाता है, या चीजें नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं. जांच के आदेश दिए जाते हैं. अक्सर, भीड़ के अपराध को मज़ाक बना दिया जाता है और एक व्यक्ति के मज़ाक को अपराध मान लिया जाता है. और Mobile Vulgus हमेशा आखिरी हंसी हंसता है.
यह लेख कमलेश सिंह द्वारा अंग्रेजी में लिखित लेख का हिंदी अनुवाद है.
कमलेश सिंह स्तंभकार और व्यंग्यकार हैं, और इंडिया टुडे, डिजिटल के पूर्व न्यूज डायरेक्टर हैं.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं)