scorecardresearch
 

मणिपुर में भूकंप आज नहीं आया, उसकी धरती 80 दिन से कांप रही है, हम अपनी ही कयामत के वीडियो देख रहे हैं

दो रोज पहले मणिपुर एक हसीन तस्वीर था. हरे-भरे मैदान, पहाड़ और नीलम-रंगी झरनों से भरा. यहां लड़ाई तो चल रही थी, लेकिन देश पर उसका असर इतना ही था, जितना चांद पर आए तूफान का धरती पर. अब मामला अलग है. अगले कई सालों तक जब भी इस सूबे का नाम आएगा, सड़क पर परेड करती दो नग्न औरतें और भेड़-बकरी की तरह उन्हें हकालते पुरुष सामने होंगे.

Advertisement
X
मणिपुर के वायरल वीडियो ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
मणिपुर के वायरल वीडियो ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

मणिपुर का वीडियो सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. लोग हिंदी-अंग्रेजी में लानतें भेज रहे हैं. देसी-विदेशी कविताओं के साथ कीचड़ उछाला जा रहा है.  इनके बीच कुछ और तस्वीरें भी हैं. शहर-चेहरे अलग, लेकिन मिजाज वही- नग्न औरतों को घेरे हुए पुरुष. ये काउंटर-अटैक है, यानी हमले के बदले हमला. 

पूर्वोत्तर ही नहीं, ये तो बंगाल में भी हुआ- छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी. 
तुम्हारी ही नहीं, हमारी औरतें भी नग्न की जा रही हैं. 
तुम्हारे राज्य ही नहीं, हमारे पड़ोस में भी रेप हो रहे हैं. 
हमारी सरकार ही क्यों, तुम्हारे वजीरे-आजम के दौर में भी ये सब हुआ. 

नफरत को काटने के लिए नफरत का चाकू फिराया जा रहा है. लेकिन इन सबके बीच औरतें ही गायब हैं. वे जंग का हिस्सा नहीं. वे आंदोलनकारियों की बीवियां हैं. या बहन-बेटियां. या फिर वो जमीन, जिसे युद्ध में काम आना होता है. 

बारिश में होने वाले सर्दी-जुकाम जितना ही कॉमन है, लड़ाई में औरतों का इस्तेमाल. 

दो पड़ोसियों के बीच लड़ाई हो, या फिर दो मुल्कों में- लहूलुहान हरदम औरतें ही होंगी. रेप होगा. छेड़छाड़ होगी. या ये भी न हो सका तो उसकी नहाती-धोती तस्वीर वायरल कर दी जाएगी. लो भई, हो गया काम!

Advertisement

दुश्मन की गर्दन काटने में वो लज्जत कहां, जो उसकी औरत की नग्न नुमाइश में है.

manipur women video being paraded naked by mob why women are victims of conflict
यूएन के मुताबिक महिलाओं के साथ हुए वॉर क्राइम सबसे कम रिपोर्ट हुए. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

जंग में मिट्टी के बाद जिसे सबसे ज्यादा रौंदा-कुचला गया, वो है औरत!

“साल 1971 की गर्मियां थीं, जब पाकिस्तानी सैनिकों के बूटों की आवाज पद्मा नदी से होते हुए मेरे घर तक आ पहुंची. मुझे, मेरी पड़ोसिनों को उठा-उठाकर ट्रक में फेंक दिया गया. पहले से भरी इन गाड़ियों में अनजान लड़कियां थीं. 

सैनिक थोड़ी-थोड़ी देर बाद रुकते. और पहले से भरे ट्रक में और लड़कियां ठूंस दी जातीं. हम भेड़-बकरियां थीं, जो जिबह के लिए ले जाई जा रही थीं. 

गांव पार करके गाड़ी रफ्तार से भागने लगी. सूरजमुखी के खेत गायब हुए और सूखे मैदान दिखने लगे. ट्रक जब रुका तो हम सैनिकों के बीच थे. इसके बाद कितने दिन, कितने महीने बीते- मुझे नहीं पता. मैं टेंट के एक कोने में लेटी रहती. एक के बाद एक सैनिक आकर मेरा रेप करते, जब तक मैं बेहोश न हो जाऊं. 

मैं प्रेग्नेंट हुई. मेरा बच्चा गिरा. दोबारा प्रेग्नेंट हुई. दोबारा बच्चा गिरा. एक रोज कुछ सैनिक मुझे उठाकर सड़क किनारे गड्ढे में फेंक गए. काफी वक्त बाद गांव लौटी तो पता लगा कि मेरी उम्र की ज्यादातर पड़ोसिनें पेट से थीं. उनके भीतर नफरत की औलादें पल रही थीं.” 

Advertisement

यूनाइटेड नेशन्स में शमीमा बेगम के इस बयान ने कोई तहलका नहीं मचाया. लड़ाई का इतिहास खोलें तो हर पन्ना औरतों-बच्चियों से रेप का दस्तावेज दिखाई पड़ेगा.  

manipur women video being paraded naked by mob why women are victims of conflict
महिलाओं के खिलाफ युद्ध के दौरान होने वाली हिंसा सिस्टमेटिक होती है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

साल 1971 में बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों का फोकस एकदम साफ था. बांग्लादेश की मांग करने वालों का घमंड तोड़ना. इसके लिए जंग का मैदान काफी नहीं था. औरतों की देह पर लड़ाइयां लड़ी जाने लगीं. दिसंबर 1971 में जब जंग रुकी, लगभग 4 लाख औरतों का बलात्कार हो चुका था. 

इंटरनेशनल संस्थाएं इसे सिस्टमेटिक रेप कहती हैं. यानी वो एक्शन, जो बहुत सोच-समझकर लिया जाए. 

‘बियॉन्ड ड्यूटी…’ वॉल्टर जेपोटॉज्नी की वो किताब है, जो बताती है कि लड़ाइयों में बॉर्डर पर तैनात सैनिकों से ज्यादा, देश के भीतर रहती औरतें खत्म होती हैं. 

साल 1945 में हिटलर की हार के साथ ही एक साथ तीन देशों की सेनाएं जर्मनी में घुस आईं. वे हार चुके देश को घुटनों पर ला देना चाहती थीं. इसके लिए औरतों से अच्छा कोई जरिया नहीं था. 

रेप होने लगे. गुलगुले गालों वाली बच्ची से लेकर ऑर्थराइटिस से कराहती बुढ़िया तक में फर्क खत्म हो गया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक उस साल के अप्रैल-मई रेप का महीना बन गए. 1 लाख से ज्यादा रिपोर्टेड रेप थे, जिनकी पीड़िताएं अस्पताल पहुंची. वे बच्चा गिराना चाहती थीं ताकि पति अपनाने से इनकार न कर दे. हजारों औरतें यौन संक्रमण से जूझते हुए खत्म हो गईं. बहुत सी नग्न औरतों की तस्वीरें अखबारों में छपीं, जिन्हें रेड आर्मी ने रेप के बाद पकड़ा हुआ था. ये दस्तावेज थीं. दुश्मन की हार का.

Advertisement

जर्मनी वाकई घुटनों पर आ चुका था. 

manipur women video being paraded naked by mob why women are victims of conflict
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भी ऐसी खबरें आती रही हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

आज दोबारा वही हालात हैं. रूस-यूक्रेन में. सूडान में और कुछ हद तक हमारे अपने मणिपुर में भी. 

कुछ दिन या महीने बाद जंग थम जाएगी. कुकी-मैतेई भाई-भाई कहलाएंगे. गलबहियों वाली तस्वीरें आएंगी. सोशल मीडिया प्यार का तराना गुनगुनाएगा. बस, थमी रहेंगी तो औरतें. 

वही दो औरतें, जिनके कपड़े उतारकर नोंचते-खसोटते गांव में घुमाया गया. वो औरत, जिसका खेत में ले जाकर बलात्कार हुआ. और वे तमाम औरतें, जिनकी कहानियां वायरल होते-होते रह गईं. 

चेहरे चाहे जितना ब्लर कर दीजिए, मणिपुर समेत उन सारी औरतें के जख्म हरे ही रहेंगे. इंसाफ नाम का मरहम भी अब उन घावों को भर नहीं सकेगा.

Advertisement
Advertisement