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असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का प्रस्ताव और कांग्रेस-शिवसेना में हलचल

शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में बीजेपी के खिलाफ बाकी पार्टियों से एकसाथ आने की अपील की गई थी. सवाल उठता है कि अगर ऐसा गठजोड़ बनाना है तो क्या शिवसेना AIMIM के इस प्रस्ताव को स्वीकारेगी? जब सिर्फ BJP को सत्ता से दूर रखने के लिए शिवसेना ने महाराष्ट्र में कांग्रेस से हाथ मिला लिया तो AIMIM से परहेज क्यों?

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ओवैसी के ऑफर पर हलचल ओवैसी के ऑफर पर हलचल

जब 2019 में उद्धव ठाकरे की महाविकास अघाड़ी सरकार (MVA) ने विश्वास मत का प्रस्ताव विधानसभा में पेश किया तो सिर्फ दो पार्टियों ने तटस्थ रहना पसंद किया. एक थी असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और दूसरी राज ठाकरे की MNS. हिंदुत्ववादी शिवसेना के साथ गठबंधन का विरोध कर ओवैसी ने सरकार को समर्थन से इनकार किया था. भले ही इससे BJP सत्ता से दूर हो रही थी, लेकिन अब ओवैसी की पार्टी AIMIM ने महाराष्ट्र में सत्ताधारी महाविकास अघाडी की दिक्कतें बढ़ा दी हैं. 

AIMIM पार्टी के महाराष्ट्र के औरंगाबाद से सांसद इम्तियाज जलील ने अचानक महाविकास अघाड़ी को प्रस्ताव दिया कि BJP को हराने के लिए वो कांग्रेस, NCP और शिवसेना के इस गठबंधन में आने को तैयार हैं. जैसे ही प्रस्ताव आया मानो राजनीतिक भूचाल आ गया. अपेक्षा के अनुरूप शिवसेना सांसद संजय राउत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और प्रस्ताव को न सिर्फ ठुकराया लेकिन AIMIM पर BJP की B टीम होने का आरोप लगाते हुए मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ गठबंधन को सिरे से खारिज कर दिया. कांग्रेस भी इस प्रस्ताव की खास पक्षधर नहीं दिखी लेकिन NCP ने काफी संभलकर बात की. 

एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले. -फाइल फोटो

सुप्रिया सुले ने प्रस्ताव पर विचार करने की सिफारिश की थी

NCP सांसद सुप्रिया सुले ने प्रस्ताव पर विचार करने की सिफारिश की, वहीं उनके पिता और महाविकास अघाड़ी के पितामह शरद पवार ने प्रस्ताव को ये कहकर खत्म कर दिया कि ऐसे अचानक कोई फैसला नहीं लिया जा सकता और महा विकास अघाड़ी के सारे घटकों में एक राय जरूरी है. BJP ये जानने के लिए बेताब है कि सिर्फ BJP का विरोध करने के लिए शिवसेना AIMIM से गठबंधन करती है या नहीं. 

महाविकास अघाड़ी का हिस्सा बनने के बाद शिवसेना को दोहरी कसरत करनी पड़ रही है. एक तरफ BJP का हमला है जिसमें वो बार-बार कह रही है कि शिवसेना ने अपनी हिंदुत्ववादी इमेज को भुलाकर ‘सेक्युलर’ पार्टियों से हाथ मिला लिया है और अब महाराष्ट्र में असली और अकेली हिंदुत्ववादी पार्टी बीजेपी ही है. दूसरी तरफ कांग्रेस का रवैया शिवसेना को अपने अल्पसंख्यक विरोधी छवि बदलने पर मजबूर कर रहा है. पार्टी का कैडर हिंदुत्ववाद और धर्मवादी राजनीति पर तैयार हुआ है इसलिए शिवसेना के नेताओं को यह कहना पड़ रहा है कि वो अब भी हिंदुत्ववादी है और शिवसेना का हिंदुत्व BJP की तरह किसी समाज से द्वेष पर आधारित नहीं है. लेकिन फिर भी AIMIN को साथ में लेना शिवसेना को लगता है कि उसे काफी भारी पड़ जाएगा. 

AIMIM को साथ में लेने पर बीजेपी के टारगेट पर आ जाएगी शिवसेना!

देश में असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी की पहचान मुसलमानों की हिमायत करने वाले नेता और पार्टी की है. कई मुद्दों पर AIMIM और ओवैसी ने खुलकर स्टैंड लिया है जो सेक्युलर होने का दावा करने वाली पार्टियां नहीं ले पाईं. फिर चाहे वो राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हो या कॉलेज में हिजाब पहनने को लेकर कर्नाटक में हुआ बवाल हो. शिवसेना को पहले ही अपनी हिंदुत्ववादी छवि खो देने का डर है. ऐसे में AIMIM को साथ में लेना यानी BJP को शिवसेना को टारगेट करने का एक और मौका देने के बराबर है.

AIMIM के प्रस्ताव के पीछे क्या है गेम?

हैदराबाद की पार्टी मानी जाने वाली AIMIM ने महाराष्ट्र में शिरकत की 2013 में. एक जमाने में हैदराबाद के निजाम के हैदराबाद स्टेट का हिस्सा रहे महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के उन हिस्सों में जहां मुस्लिम समुदाय का कई जिलों में दबदबा है. वहीं, AIMIM ने अपनी दावेदारी करना शुरू कर दिया. अब तक कांग्रेस और NCP के साथ खड़े रहे मुस्लिम मतदाताओं के लिए AIMIM एक नए विकल्प के रूप में सामने आई. 

महाराष्ट्र के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के दबदबे वाले नांदेड के नगर निगम चुनाव में AIMIM ने अपनी ताकत पहली बार दिखाई. नांदेड़ के नतीजे कांग्रेस के लिये एक इशारा था. मुस्लिम बहुल इलाकों में अल्पसंख्यक वोटों में फूट यानी शिवसेना-BJP गठबंधन को सीधा फायदा यह समीकरण समझना मुश्किल नहीं था. 2014 के विधानसभा चुनाव महाराष्ट्र में सभी पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा. AIMIM ने सिर्फ 24 सीटें लड़ीं जिनमें 2 सीटें जीतीं. 8 सीटों पर वो दूसरे या तीसरे नंबर पर रही. 

असदुद्दीन ओवैसी. -फाइल फोटो

2019 तक AIMIM का वोट प्रतिशत भी बढकर 0.9% से 1.4% तक पहुंच गया. इसी तरह धीरे-धीरे AIMIM ने बिहार में भी पांव जमाए लेकिन वहां पर AIMIM की जीत की वजह से विपक्ष RJD और कांग्रेस सत्ता के पास पहुंचकर भी उसे हासिल नहीं कर सकी. इसके बाद ओवैसी ने मिशन बंगाल और बाद में मिशन UP भी करने की कोशिश की लेकिन बिहार से सबक लेकर विपक्षी पार्टियों ने पहले ही AIMIM मतलब BJP की B टीम का नारा लगाना शुरू किया.

ओवैसी और बीजेपी पर वोटों के ध्रुवीकरण का लगाया आरोप

विपक्षी पार्टियों ने खुलेआम कहा कि ओवैसी और BJP जान-बूझकर ऐसी राजनीति करती हैं ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो. इसका नुकसान BJP के खिलाफ लड़ रही विपक्षी पार्टियों को उठाना पड़ता है. जैसे बिहार में तेजस्वी यादव के साथ हुआ वो बंगाल में ममता बनर्जी के साथ न हो सका इसके पीछे ये B टीम वाला प्रचार काम आया ऐसा कहा जाता है. यूपी में मामला थोड़ा अलग दिखा. यहां अखिलेश ही BJP को ममता जैसे टक्कर नहीं दे पाए. 

अब AIMIM विपक्ष के उस दावे को झूठा साबित करना चाहती है कि AIMIM की वजह से BJP को फायदा होता है. BJP की B टीम वाला टैग AIMIM को नुकसान पहुंचा रहा है. महाविकास अघाड़ी में शामिल होने का प्रस्ताव ठुकराने जाने के बाद AIMIM को यह प्रचार करने की आजादी है कि BJP को हराने के लिये वो साथ आने के लिए तैयार थी लेकिन गठबंधन ही इसके लिए तैयार नहीं हुआ. ऐसे में AIMIM के पास अलग चुनाव लड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था.

कांग्रेस की अपनी मुश्किल

AIMIM को साथ ना लेने की कांग्रेस की भी अपनी वजहें हैं. अब तक कई चुनाव ये साबित कर चुके हैं कि कम से कम महाराष्ट्र में AIMIM ताकतवर हुई तो कांग्रेस का अपना वोट कम होगा. यूपी के चुनाव के बाद AIMIM कोशिश करेगी यह बताने की कि यह प्रचार गलत है कि उसे दिए वोट से BJP जीतती है. ऐसे में सिर्फ वोट के लिए अल्पसंख्यकों की बात करने वाली कांग्रेस से AIMIM बेहतर है. इसीलिए AIMIM की ताकत बढ़ना या AIMIM को महाराष्ट्र में साथ लेना दोनों ही तरीके से कांग्रेस के लिए खतरा बढ़ेगा. 

कांग्रेस की कोशिश यही रहेगी कि वह दिखाये कि महाविकास अघाड़ी ही बीजेपी को सत्ता से दूर रख सकती है. फिलहाल तो AIMIM का प्रस्ताव शरद पवार ने टाल दिया है लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में AIMIM ने इतनी जगह तो बना ली है कि उसे टाल कर या नजरअंदाज कर राजनीति करना महाविकास अघाड़ी के लिए आसान नहीं होगा.

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