भारतीय संगीत के सबसे बड़े नामों में से एक एआर रहमान इन दिनों संगीत से ज्यादा अपने जुमलों के कारण सुर्खियों में हैं. वजह है उनका एक इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने अपनी ही संगीतबद्ध सुपरहिट फिल्म छावा को 'बांटने वाली फिल्म' घोषित कर दिया. यानी जिस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़े, जिसके दृश्यों को रहमान के संगीत ने जीवंत बनाया, और जिस फिल्म ने संभाजी महाराज की वीरता को परदे पर जीवित किया, वही फिल्म रहमान की नजर में समाज के लिए खतरा बन गई?
यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई शेफ कहे कि खाना मैंने ही बनाया था, लोग उसे खाकर खुश भी हुए, लेकिन अब मुझे लग रहा है कि मसाले समाज को बांट रहे थे. बात यहीं खत्म नहीं होती. रहमान साहब को अब याद आया है कि फिल्म में निगेटिव किरदारों द्वारा 'सुभानल्लाह' और 'अल्हम्दुलिल्लाह' कहना उन्हें 'क्रिंज' लगा. यानी समस्या अत्याचार से नहीं, अत्याचारी की भाषा से है. तलवार चले तो ऐतिहासिक यथार्थ, लेकिन अगर वही किरदार अपनी भाषा में अपने अल्लाह को याद करे तो… अरे नहीं, यह तो बेहूदा हो गया! हालांकि, यह भी बता दें कि जब फिल्म रिलीज हुई थी तब औरंगजेब को महान बताने वालों की भी कमी नहीं थी. हालांकि, रहमान ने इस पर कुछ नहीं कहा.
विरोधाभास: एक से बढ़कर एक
रहमान एक ही सांस में छावा को समाज में विभाजन से 'फ़ायदा उठाने वाली' फिल्म बताते हैं और अगली ही सांस में उसे मराठों की 'आत्मा और धड़कन' कहकर सम्मानित भी महसूस करते हैं. अब यह वही आत्मा है या कोई वैकल्पिक आत्मा, यह रहमान ही स्पष्ट कर सकते हैं.
अगर फिल्म की नीयत शुरू से संदिग्ध थी, तो सवाल उठता है कि क्या रिकॉर्डिंग स्टूडियो में इस नीयत का पता नहीं चलता? क्या ऑस्कर विजेता संगीतकार इतना असहाय होता है कि निर्देशक जब ये कहते कि 'मुझे सिर्फ रहमान चाहिए', नैतिकता कम्पास काम करना बंद कर देता है? या फिर यह नैतिकता रिलीज के बाद एक्टिव होती है, जब इंटरव्यू की लाइटें जलती हैं?
सेकुलर सिनेमा की सिलेक्टिज्म
रहमान की परेशानी दरअसल सिलेक्टिव लगती है. जोधा अकबर में सूफियाना कलाम बहे, रॉकस्टार में फकीरी रोमांस उड़े तो वहां कोई विभाजन नहीं दिखता. लेकिन जैसे ही किसी फिल्म में हिंदू नायक की वीरता और मुगल सत्ता की क्रूरता साथ-साथ आ जाए, अलार्म बज उठता है- 'डिवाइसिव!'
मतलब इतिहास स्वीकार्य है, बशर्ते वह प्रतीकात्मक हो, धुंधला हो, आध्यात्मिक हो. सल्तनत की कविता चलेगी, सत्ता की तलवार नहीं. किसी हिंदू का प्रतिरोध तो जुर्म है. जैसे ही कोई इतिहास बिना किसी पॉलिटिकल करेक्टनेस के खड़ा हो, वह असुविधाजनक हो जाता है.
नॉन-क्रिएटिव लोगों का 'राज', और विक्टिम कार्ड
रहमान कहते हैं कि जब से देश में नए विचार वाली सत्ता आई है, आजकल 'नॉन-क्रिएटिव' लोग ताकतवर हो गए हैं. यह सुनकर थोड़ा कन्फ्यूजन हो सकता है. क्योंकि उसी समय रहमान देश की सबसे बड़ी फिल्मों (रामायण जैसी) का हिस्सा भी हैं. यानी सत्ता में नॉन-क्रिएटिव लोग हैं, लेकिन बड़ी फिल्मों में काम के लिए पहला फोन आज भी रहमान को ही जाता है. इसे ही शायद 'क्रिएटिव विक्टिमहुड' कहा जा सकता है. जो काम मिलने के बावजूद महसूस होती है.
जनता समझदार है… लेकिन डरावनी भी
रहमान यह भी कहते हैं कि जनता समझदार है और फिल्मों से प्रभावित नहीं होती. बहुत अच्छी बात है. लेकिन अगर जनता इतनी ही समझदार है, तो फिर छावा के 'बांटने' की चिंता क्यों? अगर लोग खुद फैसला कर सकते हैं, तो कलाकार को इतिहास दिखाने से डर क्यों?
और दिलचस्प यह कि रहमान उन बहसों को लेकर चुप हो जाते हैं जहां औरंगजेब को महान बताने की कोशिशें होती हैं, या नागपुर में उपद्रव का जिक्र सिलेक्टिव तरीके से इग्नोर कर दिया जाता है. यानी, मेमोरी सिलेक्टिव है, और चिंता भी.
इतिहास 'क्रिंज' नहीं, यथार्थ
छावा कोई फिक्शन नहीं है. संभाजी के साथ औरंगजेब का सुलूक मराठा बखरों में तो है ही, वह फारसी इतिहास मासिर-ए-आलमगीरी और बाद की कॉलोनियल हिस्ट्री में भी दर्ज है. जब मुगल दरबार का कोई पात्र 'सुभानल्लाह' कहता है, तो वह स्क्रिप्ट की शरारत नहीं, ऐतिहासिक सत्य है. औरंगजेब के दौर के पात्र संस्कृत नहीं बोलेंगे. इसे सांप्रदायिक चश्मे से देखना इतिहास की नहीं, देखने वाले की समस्या है.
अगर छावा बंटवारा है, तो फिर मोहर्रम क्या है?
अगर छावा 'बांटती' है, तो मोहर्रम पर होने वाला सार्वजनिक मातम क्या कहलाएगा? जैसे संभाजी को औरंगजेब ने यातना देकर मारा, वैसे ही कर्बला में हजरत अली और उनके बेटों हसन और हुसैन की यातनापूर्ण शहादत हुई थी. जिसकी याद में निकले ताजिये, छाती पीटते लोग क्या समाज को विभाजित करते हैं? सऊदी अरब में इस पर रोक है, वहाबी-सलाफी विचारों वाले मुसलमान इसे बिद्दत (कुरान सम्मत नहीं) मानते हैं. तो क्या मातम भी अब 'डिवाइसिव परफॉर्मेंस' माना जाए?
यह सवाल असहज है, लेकिन जरूरी है. क्योंकि अतीत को अगर लगातार 'बांटने' के तराजू पर तौला गया, तो अंत में सिर्फ भूल ही बचेगी, जिसे शांति कहा जाएगा.
आखिर में एक बात और...
एआर रहमान एक महान कलाकार हैं. उनके इंटरव्यू से असहमत लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर उन्हें अपशब्द कहे जा रहे हैं. यह निंदनीय है. उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना भी कतई स्वीकार्य नहीं. ये वही रहमान हैं जो बिना किसी फतवे की परवाह किए 'मां तुझे सलाम' गाते हैं, वंदे मातरम् को आवाज देते हैं और पूरे देश को एक सुर में बांधते हैं. छावा ने भी वही किया. हां, अगर इससे कोई बंटवारा हुआ है, तो वह मजहबों के बीच नहीं, जुल्म और जुर्रत के बीच हुआ है. और इतिहास अक्सर यही बंटवारा करता है.