मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने जेलों में बंद कैदियों के जातिगत आंकड़ों के आधार पर सरकार और न्यायपालिका से हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने कहा कि गरीबी और कानूनी जटिलताओं के कारण बड़ी संख्या में आदिवासी और दलित बिना दोष सिद्ध हुए जेलों में सड़ रहे हैं.
सिंघार ने एक बयान में कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में 1.53 करोड़ से ज्यादा आदिवासी रहते हैं, जो राज्य की आबादी का 21.08 प्रतिशत है, जो भारतीय राज्यों में सबसे ज़्यादा है.
जेलों में भारी भीड़भाड़ पर चिंता जताते हुए उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश की 132 जेलों में 45 हजार 543 कैदी बंद हैं, जो बिहार और उत्तर प्रदेश के बाद देश में तीसरा सबसे ज्यादा है, जबकि जेलों की कुल क्षमता लगभग 30 हजार है.
कांग्रेस के आदिवासी चेहरे सिंघार ने कहा, "कुल कैदियों में से 22 हजार 946 कैदी, लगभग 50 प्रतिशत, अंडरट्रायल हैं, और इनमें से 21 प्रतिशत आदिवासी समुदायों के हैं, जो देश में सबसे ज्यादा है." उन्होंने आगे कहा कि दलित 19 प्रतिशत हैं, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) अंडरट्रायल आबादी का 40 प्रतिशत हैं.
सिंघार ने कहा कि डेटा से पता चलता है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रियाओं से असमान रूप से प्रभावित हुए हैं और गरीबी और जमानत न दे पाने के कारण कई लोग लंबे समय तक जेल में रहे हैं.
उन्होंने अंडरट्रायल कैदियों को लंबे समय तक जेल में रखने पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों का जिक्र किया और कहा कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है.
कांग्रेस नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि अंडरट्रायल, खासकर गरीब तबके के लोग, अक्सर सालों तक जेल में रहते हैं क्योंकि वे जमानत का इंतजाम नहीं कर पाते. उन्होंने आगे कहा कि मध्य प्रदेश में लगभग 22 हजार दोषी कैदी हैं, जिनमें से लगभग 50 प्रतिशत आदिवासी और दलित समुदायों के हैं.
सिंघार ने कहा कि अंडरट्रायल मामलों की सुनवाई में तेजी लाने, जमानत प्रक्रियाओं को आसान बनाने और व्यापक जेल सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सरकार और न्यायपालिका द्वारा समन्वित कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है.
अधिकारियों के अनुसार, राज्य सरकार ने आदिवासी कल्याण के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसमें उन मामलों में अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले वापस लेना भी शामिल है, जहां जमीन पर हुए कब्जे हटा दिए गए हैं.
3 मार्च 2009 तक सरकार ने अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ 87 हजार 549 रजिस्टर्ड वन अपराध के मामले वापस ले लिए थे. उन्होंने बताया कि पिछले 10 सालों में रजिस्टर्ड 35 हजार 807 मामलों में से 28 हजार 645 मामले सुलझा लिए गए हैं, जबकि 4 हजार 396 मामले अभी भी अदालतों में पेंडिंग हैं.
उधर, सरकार के अधिकारियों का दावा है कि 15 नवंबर यानी आदिवासी गौरव दिवस पर 32 कैदियों को रिहा किया, जिसमें नौ आदिवासी समुदायों के थे.