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मध्य प्रदेश के जबलपुर में रिसर्च के नाम पर 3.5 करोड़ का घोटाला, गोवा-कोलकाता में अफसरों के किया सैर-सपाटा

जबलपुर की नानाजी देशमुख वेटरनरी यूनिवर्सिटी में पंचगव्य और कैंसर रिसर्च के नाम पर मिले 3.5 करोड़ रुपये के दुरुपयोग का खुलासा हुआ है. जांच में पाया गया कि पैसा गाड़ियां, यात्राएं और सुविधाओं पर खर्च हुआ, जबकि न रिसर्च हुई न किसानों को प्रशिक्षण मिला. दस्तावेज गायब हैं और लैब खंडहर जैसी है. विश्वविद्यालय प्रशासन आरोपों से इनकार कर रहा है.

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नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय घोटाले को लेकर सुर्खियों में है. Photo ITG
नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय घोटाले को लेकर सुर्खियों में है. Photo ITG

जबलपुर से एक ऐसा घोटाला सामने आया है जिसने एमपी के विश्वविद्यालयों में चल रही धांधलियों का खुलासा किया है. आरोप है कि सरकारी रिसर्च और प्रशिक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन इसका फायदा शोध या किसानों तक नहीं पहुंचा. आरोप है कि करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये की राशि से जिम्मेदार अधिकारी ऐश करते रहे.

मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय इन दिनों एक बड़े घोटाले को लेकर सुर्खियों में है. गोबर-गौमूत्र से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों पर रिसर्च के नाम पर मिले 3.5 करोड़ रुपये में से बड़ा हिस्सा कथित तौर पर गलत कामों में खर्च कर दिया गया. जैसे ही इस मामले की जांच शुरू हुई, कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए. 

दरअसल, राष्ट्रीय कृषि विज्ञान योजना के तहत साल 2011 में जबलपुर की नानाजी देशमुख वेटरनरी विश्वविद्यालय ने पंचगव्य को बढ़ावा देने और गाय के गोबर, गौमूत्र व दूध से कैंसर जैसी बीमारियों पर रिसर्च के लिए सरकार से 8 करोड़ 74 लाख रुपये की मांग की थी. सरकार ने इसके लिए 3 करोड़ 50 लाख रुपये मंजूर किए इस राशि से रिसर्च, पंचगव्य का प्रचार और किसानों को प्रशिक्षण दिया जाना था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग निकली. न तो कोई ठोस रिसर्च हुई और न ही किसानों को अपेक्षित प्रशिक्षण मिला. 

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साढ़े तीन करोड़ रुपये से अधिक की राशि का दुरुपयोग
उल्टा, अधिकारियों द्वारा इस फंड के दुरुपयोग के आरोप सामने आए. जबलपुर एसडीएम रघुवीर सिंह मरावी ने बताया कि जांच में यह स्पष्ट हुआ कि 2011 से 2018 के बीच शासन से मिले साढ़े तीन करोड़ रुपये से अधिक की राशि का दुरुपयोग किया गया. रिसर्च फंड से महंगी गाड़ियां और यात्राएं की गईं, जबकि प्रोजेक्ट में इसका कोई प्रावधान नहीं था. कई महत्वपूर्ण दस्तावेज या तो नष्ट कर दिए गए या जानबूझकर जांच टीम को उपलब्ध नहीं कराए गए.

जांच के दौरान उस लैब का भी निरीक्षण किया गया, जहां पंचगव्य योजना के तहत मशीनें रखी गई थीं और गाय के गोबर से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जाने का दावा किया गया था. लेकिन लैब की हालत किसी खंडहर जैसी नजर आई. लाखों रुपये की महंगी मशीनों के नाम पर केवल गमले और दीए बनाने की कुछ साधारण मशीनें ही दिखाई दीं. 

कहां कितना पैसा हुआ खर्च?
जांच में सामने आया कि 1 करोड़ 92 लाख रुपये गोबर, गौमूत्र, गमले, कच्चे माल और मशीनों की खरीद में खर्च दिखाए गए. जबकि इन मशीनों की बाजार कीमत केवल 15 से 20 लाख रुपये बताई जा रही है. रिसर्च के नाम पर गोवा समेत अन्य शहरों की हवाई यात्राएं की गईं. करीब 7 लाख 38 हजार रुपये की एक कार भी खरीदी गई. साढ़े 2 लाख रुपये पेट्रोल, डीजल पर खर्च किए गए. वाहन मेंटेनेंस पर 2 लाख रुपए खर्च किए गए. ड्राइवरों की सैलरी पर 2 लाख 22 हजार रुपए खर्च कर दिए गए. 3 लाख 50 हजार रुपये मजदूरों के भुगतान के रूप में दर्शाए गए. लगभग 15 लाख रुपये के टेबल और इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदे गए.

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भ्रष्टाचार के आरोपों को खारिज कर रहा विश्वविद्यालय प्रशासन
हालांकि. जांच रिपोर्ट आने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है. जब कुलसचिव मनदीप शर्मा से रिपोर्ट को लेकर सवाल किए गए तो उन्होंने साफ कहा कि विश्वविद्यालय में किसी भी तरह की वित्तीय अनियमितता नहीं हुई है. जांच समिति ने जो रिकॉर्ड मांगे थे वो उन्हें उपलब्ध करा दिए गए हैं और फ़िलहाल शासन की रिपोर्ट का इंतज़ार है.

करोड़ों के दुरुपयोग के आरोप
जांच में करोड़ों के दुरुपयोग के आरोप, दस्तावेजों के गायब होने और जमीनी स्तर पर रिसर्च शून्य होने के बावजूद सवाल अब भी जस के तस हैं. जिन पैसों से किसानों को प्रशिक्षण और देश को नई रिसर्च मिलनी थी, वही पैसा अफसरों की गाड़ियों, यात्राओं और सुविधाओं पर खर्च होता रहा. अब देखने वाली बात ये होगी कि इस रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारों पर कब और कैसी कार्रवाई होती है, या फिर ये फाइल भी बाकी घोटालों की तरह दफ्तरों में धूल फांकती रह जाएगी.

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