मध्य प्रदेश के शहरों में सीवेज मिला और दूषित पीने का पानी सप्लाई होने को गंभीर खतरा बताते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच ने इस मामले की जांच के लिए 6 सदस्यों की एक हाई-लेवल कमेटी बनाई है. यह कदम राज्य की आर्थिक राजधानी इंदौर में दूषित पानी पीने से हुई कई मौतों के बाद उठाया गया है.
जस्टिस शिव कुमार सिंह (ज्यूडिशियल मेंबर) और ईश्वर सिंह (एक्सपर्ट मेंबर) की NGT बेंच ने ग्रीन एक्टिविस्ट कमल कुमार राठी की एक याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया और इस मामले में राज्य सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की.
एक न्यूज एजेंसी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने बताया कि भोपाल के तालाबों में फेकल कोलीफॉर्म (फेकल बैक्टीरिया) की मात्रा खतरनाक स्तर (1600 ml) पर है और सीवेज लाइनें पीने के पानी की लाइनों को दूषित कर रही हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 यानी नागरिकों के जीवन की सुरक्षा का अधिकार का सीधा उल्लंघन हैं.
मामले की गंभीरता को देखते हुए बेंच ने जमीनी हकीकत की जांच के लिए छह सदस्यों की एक हाई-लेवल कमेटी बनाई है, जो छह हफ्तों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. अगली सुनवाई 30 मार्च को होगी.
सीनियर एडवोकेट हरप्रीत सिंह गुप्ता ने बताया, गुप्ता ने कहा, "कमेटी में IIT इंदौर के डायरेक्टर की तरफ से नॉमिनेटेड एक एक्सपर्ट, सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि, राज्य के पर्यावरण विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, शहरी प्रशासन और विकास विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि और MP पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि नोडल एजेंसी के तौर पर शामिल हैं."
NGT ने विशेष रूप से आदेश दिया है कि इस आदेश की एक कॉपी मध्य प्रदेश के सभी जिलों के कलेक्टरों और नगर आयुक्तों को भेजी जाए ताकि इन निर्देशों का तुरंत पालन किया जा सके.
ग्रीन बेंच ने इंदौर शहर में नगर निगम द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पीने के पानी में प्रदूषण के कारण पैदा हुए गंभीर पब्लिक हेल्थ और पर्यावरणीय संकट और राज्य भर के अन्य शहरों में भी इसी तरह के सिस्टमैटिक जोखिमों पर भी प्रकाश डाला.
बता दें कि दिसंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में इंदौर के भागीरथपुरा इलाके के निवासी नगर निगम की पाइपलाइनों से सप्लाई किए गए गंभीर रूप से दूषित पीने के पानी के संपर्क में आए, जिसके परिणामस्वरूप पानी से होने वाली बीमारियों का बड़े पैमाने पर प्रकोप हुआ.
इस घटना के कारण प्रभावित निवासियों को बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, कई मरीजों को इंटेंसिव केयर की जरूरत पड़ी, और इसमें कई लोगों की मौत हो गई, जिनमें बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे.
कोर्ट ने पूरे राज्य में साफ पीने का पानी सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी किए हैं, जिसमें पानी की क्वालिटी रिपोर्ट, सप्लाई टाइमिंग और शिकायत निवारण के बारे में जानकारी देने के लिए एक मजबूत मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (MIS) और मोबाइल ऐप डेवलप करना शामिल है.
पूरे राज्य में पीने के पानी और सीवेज लाइनों की GIS-आधारित मैपिंग की जानी चाहिए ताकि उन जगहों की पहचान की जा सके जहां सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा है, जबकि पानी को साफ करने के लिए प्री-क्लोरीनेशन, पोस्ट-क्लोरीनेशन और एरेशन प्रक्रियाओं को अनिवार्य किया जाना चाहिए. सभी ओवरहेड टैंक और सम्प को हर समय चालू रखा जाना चाहिए और नियमित रूप से साफ और क्लोरीनेट किया जाना चाहिए.
लीकेज और ट्रांसमिशन नुकसान को रोकने के लिए पाइपलाइनों की मरम्मत युद्ध स्तर पर की जानी चाहिए और पानी के स्रोतों के आसपास के सभी अतिक्रमणों को तुरंत हटाया जाना चाहिए.
मार्च और जुलाई के बीच पानी की कमी को देखते हुए निर्माण कार्य रोक दिया जाना चाहिए और वार्ड-वार राशनिंग (एक दिन छोड़कर) लागू की जानी चाहिए.
इसमें कहा गया है कि सार्वजनिक कुओं और बावड़ियों को फिर से जीवित करने के लिए एक योजना लागू की जानी चाहिए और सरकारी और निजी इमारतों में बारिश के पानी को इकट्ठा करना अनिवार्य किया जाना चाहिए.
नियमों का पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए. नागरिकों को पानी के इस्तेमाल के बारे में 'क्या करें और क्या न करें' जारी किए जाने चाहिए.
शहर की सीमा के भीतर दो से ज़्यादा जानवरों वाली सभी डेयरियों को चार महीने के भीतर शहर से बाहर शिफ्ट कर दिया जाना चाहिए, जबकि किसी भी पीने के पानी के स्रो में मूर्तियों का विसर्जन पूरी तरह से बैन कर दिया जाना चाहिए.
इसमें कहा गया है, "सभी घरेलू और कमर्शियल पानी के कनेक्शन पर मीटर लगाए जाने चाहिए. पानी के संकट के दौरान टैंकरों से सप्लाई के लिए पहले से तय शर्तों के साथ एक योजना तैयार की जानी चाहिए."