इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में अब एक चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है. जिस बीजेपी पार्षद पर पानी की शिकायतों को नजरअंदाज करने के आरोप हैं, उसी पार्षद को कुछ महीने पहले इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सार्वजनिक मंच से बेस्ट पार्षद का अवॉर्ड और अच्छा काम करने का सर्टिफिकेट दिया था.
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से लोगों की मौतों के बाद सिस्टम और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. अब इस पूरे मामले में एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने प्रशासन और नगर सरकार के दावों की पोल खोल दी है.
यह वीडियो करीब सात से आठ महीने पुराना बताया जा रहा है. वीडियो में इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव सार्वजनिक मंच से भागीरथपुरा के बीजेपी पार्षद कमल वाघेला की जमकर तारीफ करते नजर आ रहे हैं और उन्हें बेस्ट पार्षद का अवॉर्ड देते हुए अच्छा काम करने का सर्टिफिकेट सौंप रहे हैं.
वीडियो में मेयर पुष्यमित्र भार्गव कहते सुनाई देते हैं, यह हैं कमल वाघेला. इनके नाम में कमल भी है मतलब कोमल हैं और वाघ भी है मतलब ज्यादा कोई परेशान करता है तो शेर हो जाते हैं. जो परेशान करने वाले हैं, वो जरा ठीक से समझ लो. कमल संगठन के आदमी हैं, महामंत्री रहे हैं. इन्होंने वार्ड में 24 सड़कें बनवा दी हैं. पहले ड्रेनेज लाइन डली, फिर पानी की लाइन डली. एक सड़क का खर्च कम से कम 10 लाख मानें तो 24 सड़कें यानी करीब 2 करोड़ 40 लाख. मतलब एक पार्षद ने तीन साल में 10 करोड़ के काम करवा दिए.
इसके बाद मेयर ने मंच से कहा, अच्छा काम करने का सर्टिफिकेट मैं मेयर होने के नाते इन्हें देता हूं और बधाई देता हूं. बाकी सभी पार्षदों से कहूंगा कि जिनके क्षेत्र में बस्तियां हैं, वे भागीरथपुरा आकर देखें कि कैसे काम हुआ है. यह हमेशा आपके काम के लिए मुझे फॉलो करते रहते हैं. परेशान करते रहते हैं. चिंतित करते रहते हैं लेकिन मैंने आजतक इनका कोई काम नहीं रोका.
हैरानी की बात यह है कि यही भागीरथपुरा इलाका अब दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर सुर्खियों में है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि सीवेज और पानी की लाइनों में लीकेज की शिकायतें लंबे समय से की जा रही थीं, लेकिन पार्षद और प्रशासन ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया.
इस वायरल वीडियो के सामने आने के बाद मेयर पुष्यमित्र भार्गव के बयान पर भी सवाल उठ रहे हैं. भागीरथपुरा में मौतों के बाद मेयर ने कहा था कि अफसर उनकी नहीं सुनते, लेकिन सवाल यह है कि जब मंच से विकास और काम का सर्टिफिकेट दिया जा रहा था, तब हालात की सच्चाई क्या थी.
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब कागज़ों में 2.40 करोड़ रुपये की ड्रेनेज लाइन और 2.40 करोड़ रुपये की पानी की पाइपलाइन डाली जा चुकी थी तो फिर लोगों ने दूषित पानी क्यों और कैसे पिया. अगर काम हुआ था तो सीवेज पानी सप्लाई में कैसे मिला और मौतें कैसे हुईं. वायरल वीडियो ने विकास के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर दिया है.