इश्क में जब आप आपा खोते हैं तो स्यापा होता है, जिसे 'इश्कियापा' कहते हैं. लेखक पंकज दुबे की दूसरी किताब का यही नाम है- 'इश्कियापा'. इस किताब को उन्होंने खुद ही अंग्रेजी और हिंदी में लिखा है. 23 सितंबर को नई दिल्ली के ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर में किताब का नेशनल लॉन्च है. इसकी ऑनलाइन प्रीबुकिंग शुरू हो गई है.
झारखंड के छोटे से शहर चाईबासा से आने वाले पंकज इससे पहले 'लूजर कहीं का' लिख चुके हैं जो बेस्टसेलर रही है. इस किताब पर उनकी फिल्म की भी तैयारी है. इसी सिलसिले में हमने उनसे बात की. उन्होंने अपने इश्कियापे के किस्से सुनाए, नॉवेल-राइटिंग की बारीकियों पर बात की और परेशान लड़कों के लिए टिप्स भी दिए. पढ़िए पूरी बातचीत:
सवाल: इश्कियापा के नाम से साफ है कि यह नए दौर की लव स्टोरी है. लेकिन थोड़ा डिटेल में बताएं, किताब का क्या बैकग्राउंड है?
पंकज: जब मैं नया दौर कहता हूं तो यह बिल्कुल नया दौर है. जब से इंटरनेट पर दुनिया बसने लगी. ऑरकुट आया, वह चिरकुट हो गया और फिर फेसबुक और ट्विटर आ गए. तो उस दौर की कहानी है.
ऐसा बिहार है जहां किडनैपिंग इंडस्ट्री फल-फूल रही है. पटना में एक हीरो है, एक हिरोइन है. हीरो का नाम है लल्लन झा. वह नए नए बिजनेस शुरू करता है, पर फेल होता रहता है. हिरोइन किडनैपिंग माफिया से विधायक और फिर मंत्री बने एक शख्स की बेटी है. नाम है स्वीटी पांडे. वह सोने के पिंजरे में है, लेकिन उसे आजादी चाहिए. उसके बड़े-बड़े मुंबई ड्रीम्स है. लड़के के परिवार का मोटर ड्राइविंग स्कूल का बिजनेस है, जो वह करना नहीं चाहता. एक दिन लड़की का ड्राइविंग सीखने का मन करता है. तो फोन जाता है शहर के सबसे अच्छे ड्राइविंग स्कूल में. तो फादर साहब लल्लन झा को भेज देते हैं कि जाओ मंत्री साहब की बिटिया को ड्राइविंग सिखाओ.
लल्लन को इसमें मौका दिखता है मिनिस्टर तक पहुंचने और उसे अपने बिजनेस आइडियाज बताने का. फिर क्लच पर पैर रखकर ब्रेक और एक्सीलेटर दबाकर शुरू हो जाता है इश्कियापा जो पटना से मुंबई तक चलता है. कहानी का बैकग्राउंड पूरी तरह काल्पनिक है, पर समझदार पाठक उसे सही जगह से जोड़ लेंगे.
सवाल: फिल्म 'लूजर कहीं का' का क्या स्टेटस है?
पंकज: अभी तो कास्टिंग चल रही है. कोशिश कर रहे हैं कि सर्दियों में शूट कर लें. नवंबर से फरवरी के बीच में. शूटिंग दिल्ली में ही करेंगे. राजकुमार राव को लीड रोल के लिए चाहता हूं. बाकी पिक्चर तो बननी ही है. जब तक तोड़ेंगे नहीं, छोड़ेंगे नहीं.

सवाल: अभी हिंदी दिवस होकर गया. हिंदी कैसे आगे बढ़ेगी इसे लेकर लोगों की अलग-अलग राय है. आप किस किस्म की हिंदी के पक्षधर हैं?
पंकज: तालाब वाली नहीं, नदी वाली हिंदी का पक्षधर हूं. किसी को संरक्षक बनने की जरूरत नहीं है. हिंदी नदी का जल है, जो अलग-अलग जमीन की संस्कृतियों को समाहित करते हुए बहता जाए, हमेशा रवानगी में रहे. कुछ लोग बेवजह लोकल गार्जियन बन जाते हैं. हिंदी बहुत बड़ी और समृद्ध है. मैं मानता हूं कि यह सुविधा और बातचीत की भाषा है. इसे मठाधीशों की गिरफ्त से बचाकर रखना है.
सवाल: काऊ बेल्ट इलाके के पाठक के पोटेंशियल को कैसे आंकते हैं?
पंकज: असीमित संभावनाएं हैं वहां. क्योंकि अब भी साहित्य और भाषा को लेकर बहुत सजगता है. अब भी उनका करप्ट होना बाकी है. महानगरीय और विदेशी चीजों को देखने का उनका मार्ग किताबों और मीडिया टूल्स से होकर गुजरता है. देश के जो छोटे शहर हैं, वे ज्यादा बड़े हैं. वहां उर्वरक रीडर बेस है. विविधता है. कई परतें हैं. आप दिल्ली और मुंबई के मॉल का क्लोज शॉट ले लीजिए, एक जैसा लगेगा. लेकिन लखनऊ और भोपाल को लोग सड़कों से पहचान लेते हैं. कमाल के हैं छोटे हैं शहर. मैं खुद छोटे शहर से आता हूं. मैं जमीन से जुड़ा हुआ नहीं, जमीन में गड़ा हुआ हूं. छोटे शहरों से ही हमें चारा मिलता है अपनी रचनाओं के लिए. छोटे शहरों में बड़ी ताकत है.
सवाल: मजेदार फिक्शन लिखने के लिए वन लाइनर्स आने कितने जरूरी हैं? आप उनका कैसा इस्तेमाल करते हैं?
पंकज: बहुत ज्यादा जरूरी हैं. दिलचस्प हों. बोरिंग न हों. लेखक के लिए चैलेंजिंग काम हैं. अगर आपकी बात दिलचस्प नहीं है तो पाठक के पास विकल्पों का अंबार है. आपने एक वाक्य में उसका दिमाग चाट लिया तो वह आपको नहीं पढ़ेगा. पर ख्याल यह रखना है कि वनलाइनर मीनिंगलेस न हो, उनके तार कहानी के प्लॉट से जुड़े हों. मसलन आप कहें कि वेदना में एक शक्ति है जो दृष्टि देती है. यह पाठक को समझ नहीं आएगा. उसको बताना होगा कि ब्रेकअप में एक शक्ति है. उसको पता है कि जब ब्रेकअप होता है तो दर्द होता है.
सवाल: आपने कितना इश्कियापा किया है?
पंकज: काफी किया है. जीवनशैली रही है. मैं सकारात्मक फ्लर्ट का भी पक्षधर हूं, क्योंकि वह आपके दिमाग को अलर्ट और क्रिएटिव रखता है. किसी लड़की को इंप्रेस करने में काफी मेहनत और सेंस ऑफ ह्यूमर की जरूरत होती है. वैसे भी लड़कियां बहुत चूजी हैं आजकल और उनकी उम्मीदें बहुत होती हैं. आपको उन पर खरा उतरना होगा. मुझे इससे रचनात्मक बने रहने में मदद मिलती है.
सवाल: आपके इश्कियापे के कुछ किस्से?
पंकज: हां एक किस्सा याद आता है. एक बस स्टॉप पर एक खूबसूरत लड़की दिखी. बिंदिया नाम था. उन्हीं के नाम को लूजर की नायिका बनाया मैंने. हां तो वो बस स्टॉप पर खड़ी थीं तो मैं उनके पास गया और बोला कि लगता है हम कहीं मिले हैं. तो वह पलटकर बोली, 'नहीं बेसिकली आपको मुझसे बात करने का मन था.' मेरी चोरी पकड़ी गई तो मैंने ईमानदारी का रास्ता लेते हुए बात मान ली.
थोड़ी बहुत बात हुई, मैंने पूछा कि कल मिलेंगे क्या? उसने कहा कि मेरा बॉयफ्रेंड है. मैंने कहा कि मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं, मैं खुले दिल का हूं. वो कुछ बोली नहीं, बस में बैठ गई. तभी डीडीएलजे आई थी. बस रवाना होते-होते मैंने कहा कि मैं इंतजार करूंगा कल. अगले दिन मैं इस्तरी किए हुए दोस्तों के कपड़े पहनकर बस स्टॉप पहुंच गया. देखता हूं कि वो खड़ी हुई है. मैंने पूछा तो कहने लगी, 'मैंने आईज क्लोज करके गणपति भगवान से पूछा कि क्या मैं जाऊं? तो उन्होंने कहा कि जाओ बेटा.' बस तब से गणेश जी मेरे भी फेवरेट भगवान हो गए.
सवाल: समकालीन लेखकों में पसंदीदा कौन हैं?
पंकज: पढ़ने का ज्यादा वक्त नहीं मिलता. प्रभावित होने का खतरा भी रहता है. ऐसा कोई पसंदीदा नहीं है. अच्छा बुरा किसी को कैसे बोल सकता हूं. हमें किसी की क्या दरकार. हमारे पास हमारी सरकार.
सवाल: पांच टिप्स उन लड़कों के लिए जिनकी गर्लफ्रेंड नहीं बनी है? क्या करें और क्या न करें?
पंकज: - सबसे पहले जरूरी है कि रेस्टोरेंट वगैरह में जाएं तो बिल लड़के पे करें. इसके लिए खुद आर्थिक रूप से संपन्न बनाएं. कैसे बनाएं मैं नहीं जानता.
- हो सके तो गिटार बजाना भी जरूर सीखें. लड़कियों को बहुत पसंद आता है
- फोटोग्राफी जानना भी जरूरी है. लड़कियों को फोटो खिंचाने का शौक होता है. अगर आप बढ़िया फोटो खींचते हैं तो गर्ल्स पास आएंगी. उनको परमानेंट फोटोग्राफर मिल जाएगा.
- लड़की के सामने मुंह मिय़ा मिट्ठू न बनें. धैर्य रखें. कल्याण होगा.
- अगर लड़की बहुत ही ज्यादा पसंद आ रही है कि उसे पटाना ही पटाना है तो उस पर ध्यान न देकर, उसकी सहेली पर ध्यान दीजिए. हर बार उसकी सहेली की तारीफ कीजिए. ये बड़ा कारगर तरीका है.