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सर्द रात की थरथराहट में गर्म आहें! रूस-यूक्रेन युद्ध और नासिरा शर्मा का उपन्यास अजनबी जज़ीरा

एकाएक दरवाज़े पर दस्तक हुई तो वह सिहर उठी. उसकी आंखों में खौफ़ उभरा. उसने पहले शौहर की बन्द आंखों, फिर उन दस खुली आंखों की तरफ़ देखा जो गुलाबी डोरों के बीच भयभीत हिरनियों की सवालिया नज़रें थीं.

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युद्ध और त्रासदीः इस पीड़ा का अंत नहीं युद्ध और त्रासदीः इस पीड़ा का अंत नहीं

हमारी धरती का एक हिस्सा जंग से लहुलुहान है. रूस और यूक्रेन के बीच जंग में जो हमले हो रहे उसमें आदमजात मर रहा. निर्दोष और बेकुसूर. गोला-बारूद के धमाकों के बीच इनसान और मानवता किस तरह पीसती है, इसे वही समझ सकता है, जिन पर बीत रही हो. जवानों का मरना, बच्चों का अनाथ होना, औरतों, आबाल वृद्धों और मरीजों की बेबस होना केवल कथा भर नहीं है. युद्ध केवल बम, गोला, बारूद, मिसाइलों के चलने से किसी देश, राज्य, शहर, गांव या घरों के खंडहरों में बदल जाने की कहानी भर नहीं है... बल्कि उनके पीछे जो छूट जाता है, वह बेहद मार्मिक और कई बार इतना दुखद होता है कि उन्हें संजोने में कई पीढ़ियां मर-खप जाती हैं. इसीलिए दुनिया भर का संवेदनशील साहित्य हमेशा से युद्ध का विरोधी रहा है. कला मन कभी भी बारूद की गंध को अपनाता नहीं. यह यों ही नहीं है कि दुनिया भर के कलाकार, मानवता के पक्षधर आज भी सोशल मीडिया पर युद्ध विरोधी रचनाओं के साथ जुटे हैं.
हिंदी की वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा ने जंग और जंग से जुड़े फलसफों पर काफी काम किया है. उनके कथा साहित्य के सरोकार ग्लोबल हैं, और उनके लेखन की विशेषता है सभ्यता, संस्कृति और मानवीय नियति का आत्मबल. पर इन सबके बीच युद्ध की विभीषिका पर उनकी कलम बहुधा रुला देती है. उनके शब्द अपने साथ आपको उसी परिवेश में ले जाते हैं, जहां युद्ध के बाद या युद्ध काल का भयावह सन्नाटा, त्रासदी और पीड़ा फौजी बूटों तले, या क्रूर आक्रमणकारियों द्वारा कूचली जा रही होती है. वे अभिशप्त स्त्री-मन और प्रेम के अंतःसंघर्ष की चितेरी हैं. कथानकों का संवेदना-सम्पन्न चित्रण आपको सभ्य बनाता है. उनका कथाकार संतप्त और उत्पीड़ित मनुष्यता के पक्ष में पूरी शक्ति के साथ निरन्तर सक्रिय रहा है. ऐसे समय में रूस-यूक्रेन जंग के बीच उनके उपन्यास 'अजनबी जज़ीरा' की बरबस याद आनी स्वाभाविक थी. इस उपन्यास में युद्ध से तबाह इराक़ की बदहाली को वे समीरा और उसकी 5 बेटियों के माध्यम से बयान करती हैं. खास बात यह कि इसका कथानक इतना सटीक और मार्मिक है कि दुनिया में जहां कहीं भी युद्ध या युद्धोपरांत या युद्धपर्यंत जो परिदृश्य, दारुण स्थितियां बनती हैं, यह उपन्यास वहां का एक अक्स बन जाता है. छोटी-से-छोटी चीज़ को तरसते और उसे पाने के लिए अपनी विरासतों-धरोहरों-यादगारों को बाज़ार में बेचने को मजबूर होते लोग; ज़िन्दगी बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगाती औरतें और विदेशी आक्रमणकारियों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निगरानी में सांस लेते नागरिक- ऐसी अनेक स्थितियों-मनःस्थितियों को नासिरा शर्मा ने अपने इस उपन्यास के पृष्ठों पर साकार कर दिया है और इसे पढ़ते हुए आप देश और पात्रों से परे होकर उनके साथ जीने लगते हैं. 
समीरा अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं कर पाती, वह अपनी युवा होती बेटियों के वर्तमान और भविष्य को लेकर फ़िक्रमन्द है. बारूद, विध्वंस और विनाश के बीच समीरा ज़िन्दगी की रोशनी व खूशबू बचाने के लिए जूझ रही है. यह उपन्यास समीरा को चाहने वाले अंग्रेज़ फ़ौजी मार्क के पक्ष से क्षत-विक्षत इराक़ की एक मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करता है. समीरा और मार्क की प्रेम-कहानी अद्भुत है, जिसमें जिम्मेदारियों के हस्सास रंग शिद्दत से शामिल हैं. घृणा और प्रेम का सघन अन्तर्द्वन्द्व इस उपन्यास को अपूर्व बनाता है. नासिरा यह रेखांकित करती हैं कि ऐसे परिदृश्य में स्त्री-विमर्श के सारे निहतार्थ सिरे से बदल जाते हैं. 
सभ्य कहे जाने वाले आधुनिक विश्व में विध्वंस का यह यथार्थ स्तब्ध करता है. इराक हो या अफगानिस्तान, सीरिया हो फिलिस्तीन, ताईवान हो या भूटान, अमेरिका हो या रूस, इजराइल हो या यूक्रेन जंग और प्रभुता, अहंकार और ताकत क्या-क्या नष्ट करती है, इसे समझने के लिए नासिरा शर्मा के उपन्यास 'अजनबी जज़ीरा' को पढ़ना आवश्यक है. 'साहित्य आजतक' पर पढ़िए इस उपन्यास का एक मार्मिक अंश. 
***
पुस्तक अंशः अजनबी जज़ीरा
                    - नासिरा शर्मा

एक गली के मुहाने तक उसकी फ़रियाद बन्द दरवाज़ों से टकरा-टकराकर वापस उसके जिस्म को थपेड़े की तरह चोट पहुंचा रही थी. उम्मीद का टूटना क्या होता है सिर्फ वह जानती है. घुटनों के बल वह रोती-सी बैठी और फिर जैसे सिजदे में गिर गई.
 सर्द हवाएं उसकी काली चादर को किसी आवारा लड़की के दुपट्टे की तरह उड़ा रही थीं. आहिस्ता-आहिस्ता उसके उठते क़दम किसी बीमार औरत की तरह उसे मौत के दहाने की तरफ़ ले जा रहे थे. बदन कांप रहा था और आंसू थम नहीं रहे थे. 
सर्द हवाओं ने उसके चेहरे को आंसुओं की फुहारों की शक्ल में इधर-उधर उड़ाया मगर तसल्ली की एक भी थपकी न दी. उसके हाथ अपने चारों तरफ़ लपेटी चादर को इस तरह पकड़े थे जैसे उम्मीद की आख़िरी शमा को वह दिल में जलाए हुए है. उसके सामने हांफता चेहरा उभरा और उसने अपनी आंखों से बढ़ते अंधेरे को ताका और क़दम तेज़ कर दिए. 
आसमान से बूंदें टपकीं और उसने घबराकर सितारों भरे आसमान को ताका और दोनों हाथ ऊपर उठा दिए. तेज़ हवा के झोंके ने उसके सिर की चादर को उड़ाया और अंधेरे में गुम हो गई. उसके चेहरे पर उड़ती लटें थीं, जो गिरती बूंदों और बहते आंसुओं से धीरे-धीरे उसके चेहरे पर चिपक रही थीं. उसके दिल की इबारत को उठे हाथ बयान कर रहे थे. उसका पूरा वजूद हवा में हिलती घंटी की तरह दुआ भरी फ़रियाद में बदल गया...
खामोश फ़रियाद! 
सर्द रात की थरथराहट में गर्म आहें! 
घर के दरवाज़े उसके क़दमों की चाप सुनते ही खुल गए. सामने छोटी बेटी नेदा बेहाल-सी खड़ी थी. आंखों में वहशत थी, चेहरे पर हैरत मगर मां का हुलिया देख वह सहम उठी. मां दीवानावार घर में घुसी. गैलरी पार कर दौड़ती-सी कमरे में, जहां सब-कुछ ठहर गया था.
 चारों लड़कियां बाप के ज़ानू को पकड़े सिसक रही थीं और उसका शौहर हांफते-हांफते थककर राहत की सांस ले चुका था. फूलती सांसों पर क़ाबू पाकर वह किसी सहमी बिल्ली की तरह आगे बढ़ी.
 उसने नब्ज़ पर उंगली रखी, नाक के नीचे हथेली लगाई मगर वहां सब-कुछ साकित था, सब-कुछ. 
उसने प्यार से लबरेज़ आंखों से शौहर को ताका और बड़ी बेबसी से मुस्कुरा पड़ी.
'इस हालत में भी तुम दुनिया के सबसे हसीन मर्द लग रहे हो.' 
उसने शौहर का किताबी चेहरा छुआ. अधखुली इन्तज़ार में डूबी आंखों को ताका और दुलार में भर उसके माथे पर आई लट को हटाया और कांपते होंठों से उसकी पेशानी का चुम्बन लिया. 
बदन में हरारत बाक़ी थी.
उसने बेटियों की मदद से अपने लम्बे-चौड़े शौहर के मुर्दा जिस्म को सीधा लिटाया और कांपता हाथ उसकी अधखुली आंखों पर रखा और वहीं पड़ा रहने दिया!
उसे मेरा इन्तज़ार होगा.
दवा का भी जो उसे बचा सकती थी मगर...
वह फफककर रोना चाहती थी मगर पांच लड़कियों की मौजूदगी में वह टूटकर बिखरना नहीं चाहती थी.
उसकी आंखों की पुतली तो...
लेकिन उसका अक्स इन लड़कियों की आंखों में हमेशा रौशन रहेगा, हमेशा. वह चुपचाप शौहर के सिरहाने बैठ गई.
बमों का गिरना अब उसे साफ़ सुनाई पड़ रहा था. 
दूर कहीं भारी बमबारी हो रही थी.
एकाएक दरवाज़े पर दस्तक हुई तो वह सिहर उठी. उसकी आंखों में खौफ़ उभरा. उसने पहले शौहर की बन्द आंखों, फिर उन दस खुली आंखों की तरफ़ देखा जो गुलाबी डोरों के बीच भयभीत हिरनियों की सवालिया नज़रें थीं. उसने हौसला भरी नज़रों से उन्हें देखा और पलंग से उतरी. 
इस बार की दस्तक तवील थी. 
जब तक वह दरवाज़े तक पहुंचती तब तक घंटी बजानेवाले ने उंगली बटन पर रख हटाना मुनासिब नहीं समझा. उसने पट से दरवाज़ा खोला.
'इतनी देर में?' 
वह चुप रही.
'यह लो इन्हेलर, बहुत मुश्किल से मिला है.' आनेवाले के चेहरे पर खुशी की बारीक़ लकीर खिंची.
'अब इसकी ज़रूरत नहीं है.' 
'क्यों?'
'क्योंकि वह जन्नत की राह पर जा चुका है, और तुम...तुम भी यहां से दफ़ा हो.' 
इतना कह उसने तेज़ी से दरवाज़ा उसके मुस्कुराते चेहरे पर बन्द किया और कुछ लम्हे थरथराती-सी खड़ी रही फिर एकाएक कटी शाख़ की तरह बन्द दरवाज़े पर आन गिरी.
 फ़ौजी जूतों की भारी आवाज़ सन्नाटे में दूर जाती सुनाई पड़ी. वह फफककर रो पड़ी. 
कुछ मिनटों पहले अगर यह इन्हेलर आता तो शायद वह इनकार न करती. उसे अजीब-सा इतमीनान हुआ कि वह दूसरा क़दम उठाने पर हालात का शिकार नहीं हो पाई मगर किस क़ीमत पर?
मौत तब भी लाज़मी थी.
या वह मरता या मैं!
मुझे उसकी जि़न्दगी हर क़ीमत पर मंज़ूर थी.
उसने चेहरा हथेलियों से साफ़ किया और उलटे क़दमों कमरे की तरफ़ बढ़ी जहां उसका जवान मर्द हमेशा के लिए गहरी नींद सो चुका था.
मुल्क से जानेवाले बड़ी-बड़ी रिश्वतें दे विदेशों की तरफ़ उड़ान भर रहे थे. उसके पास ऐसी कोई क़ीमती चीज़ नहीं बची थी जिसको बेचकर वह सात वीज़े ख़रीद सकती. बाज़ार में कुछ भी बिक सकता है और इसी एक चीज़ ने उसके परिवार को भूख से बचाया मगर कब तक, कहां तक?
सोच में डूबी थकी आंखें मौत की कोख से कुछ तलाश कर रही थीं. उसके ज़हन में उस अफ़सर की परछाईं बार-बार उभर रही थी.
इन्हेलर का छोटा-सा पैकेट उसकी किस्मत का कितना बड़ा फैसला कर बैठा? 
अपने जहां के लुट जाने पर वह दोनों हाथों से सिर पकड़े जाने कब से बैठी थी कि अब आगे की जि़म्मेदारी कैसे पूरी करे और किसको मदद के लिए बुलाए. उस वक्त सबा ने मां के पास जाकर रूंधी आवाज़ से कहा, 'या उम्मी अबु ने किसी को भी इत्तला करने को मना किया है, जो करना है घर के पीछे हमें ही करना होगा.' 
यह सुनकर मां को सकता-सा हो गया.
जब मां की ख़ून में तर आंखें सबा के चेहरे की तरफ़ उठीं तो उसकी चीख़ गले में घुटकर रह गई. यह कैसी आंखें थीं जिससे ग़म और ग़ुस्सा ख़ून की तरह टपक रहा था. उसने घबराकर दोनों हाथों से अपनी आंखें छुपा लीं.
मां का ध्यान कहीं और था. 
उसने बेबसी से कमरे के चारों तरफ़ देखा और अजीब बेकसी से अपना चेहरा शौहर के बर्फ की तरह ठंडे पैरों पर रख दिया.
अब वह चीख़ भी नहीं सकती है, न दहाड़ें मारकर सियापा कर सकती है. जाते-जाते उसके वकील शौहर ने अपने आख़िरी पैगाम में वह सब कह दिया था जो उसे अंजाम देना था. फिर भी उसे कुछ लोगों को फोन पर इत्तला तो देनी होगी. उसने अपना सिर उठाया और अपने लम्बे-चौड़े हसीन शौहर को ऊपर से नीचे तक देखा, पता नहीं किस ख़्याल से वह सिहर उठी.
मोमबत्ती की लौ पिघलकर अब भड़कते-भड़कते बुझने-सी लगी थी. कमरे में कई साये मंडराए. कमरा अंधेरे में डूबने से पहले नई मोमबत्ती के रौशन होते ही पीली फीकी रौशनी में नहा गया.
बाहर सर्द हवाएं कुछ इस अन्दाज़ से घर के चारों तरफ़ गोल-गोल घूम रही थीं जैसे कोई किसी का पीछा कर रहा हो. मां ने घर का दरवाज़ा खोला और पत्थर की चिकनी सीढ़ियां उतर वह घर के पीछे जानेवाली गली में दाख़िल हुई जहां अंधेरे की सियाही कजलौटी बनकर बिखरी थी. दूर खड़े लैम्पपोस्ट की रौशनी को घने पेड़ की शाखाओं ने रोक रखा था तो भी एक-दो बारीक़ लकीरें किसी तरह छनकर ज़मीन पर चाकू की धार बना रही थीं. न पास में टॉर्च थी न ही मोबाइल फोन, न मोमबत्ती इस हवा का मुकाबला कर सकती थी. वह कांपती-सी खड़ी रही.
आंखें धीरे-धीरे अंधेरे की आदी हो रही थीं. ज़मीन ऊबड़-खाबड़ थी. खोदने के लिए न फावड़ा था न गैंती.
आसमान से टपकती शबनम की बूंदें शाखाओं से फिसलकर उसके खुले सिर पर गिर रही थीं. वह बेहिस सी खड़ी टकटकी लगाए ज़मीन को ताके जा रही थी!
क़ब्र खोदनी है तो यह काम रात के अंधेरे में ही मुमकिन है वरना...वह चौंकी किसी के पैरों की आहट से जो उसके पास आकर थम-सी गई थी.
'या उम्मी...अन्दर चलो अबु के पास, कल दोपहर तक हम सारा इन्तज़ाम कर लेंगे. लरज़ती सी आवाज़ उसके कानों से टकराई, उसने गहरी सांस ली और खुद से बोली- 'सही तो है अंधेरे में खड़ी मैं क्या ढूंढ़ रही हूं?' 
मां-बेटी एक-दूसरे का सहारा बनी उस कच्ची गली से बाहर निकल सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ीं.
'या मम्मी नाना को क़फ़न के लिए भी क्या फोन नहीं करोगी?' कमरे में पहुंच बेटी ने पूछा.
'करना चाहिए वरना खुद निकलूंगी.' उसने कांपती आवाज़ से कहा और शौहर के चेहरे को देखा जिस पर एक दिलकश मुस्कान थी. सारी तकलीफों के बाद चेहरे पर सुकून था. उसके होंठ लरज़कर रह गए.
सूजी जलती आंखें लिये लड़कियां बाप की पट्टी से लगी बैठी थीं और एकटक बाप को निहार रही थीं.
उसने अपना पर्स उठाया. पैसे गिने और फिक्र में डूब गई. वह नहीं चाहती थी कि शौहर की आख़िरी ख़्वाहिश के ख़िलाफ़ जाए वरना चचा को वह ज़रूर फोन करती. इस वक्त सब-कुछ आसानी से निपट जाता. उसको महसूस हुआ जैसे दो उक़ाब बड़े-बड़े डैने फैलाते जानें कहां से भारी बोझ बन उसके कन्धों पर आकर झूल गए हों.
कोहरे में लिपटी सर्द सुबह एक गर्म चाय की प्याली के साथ बर्दाश्त के क़ाबिल बनाई जा सकती है. बांह टूटे हारे बदन से वह उठी और किचन की तरफ़ बढ़ी जहां चाय का डिब्बा खाली था. उसने बेबसी से उसको ठोका मगर टिन के छोटे-से डिब्बे से चूरा नहीं झड़ा.
'बाज़ार में चीजें रहती हैं तो पैसे नहीं और पैसे रहते हैं तो दुकानों में सामान नहीं.' उसने बड़बड़ाते हुए गर्म पानी को प्याली में उंड़ेला और थोड़ी-सी शक्कर डाल चमचा चलाया.
'क्या होगा?' उसने कनपटी को उंगलियों से दबाया और गर्म घूंट भरा. चाय की तलब और गर्म घूंट आपस में गडड्मड्ड होकर उसे हौसला दे गए, लगा कन्धों पर बैठे उक़ाब जैसे उड़ना चाहते हों.
'मुझे बाहर जाना होगा.' वह आख़िरी घूंट पीकर बोली और किचन से उसने बड़ा चाकू और कबाब सेंकने की लोहे की सीख़ें उठाईं. इतनी सर्दी में भी उसकी पेशानी पर पसीने की बूंदें झिलमिला रही थीं.
बाहर धूप का गुलाबी ग़ुबार फैला था.
वह तेज़ी से सीढ़ियां उतरी और गली पार कर घर के पिछवाड़े पहुंची. चारों तरफ़ से पेड़ों से घिरा कभी वह एक छोटा-सा बग़ीचा होगा जो अब जंगली झाड़ियों से भरा था. उसे लगा कि एक तीली लगा देने से यह सारी सुनहरी कत्थई झाड़ियां घंटे भर में जलकर राख हो जाएंगी फिर...
अगर सुरक्षा पुलिस या फ़ौज का कोई सिपाही धुआं देखकर आ गया तो...उसका सारा बदन पसीने से सराबोर हो गया.
'तब क्या होगा? तब क्या होगा?' 
कह देगी, वह कह देगी कि हां वह इस बंजर ज़मीन में सब्ज़ी बोएगी, हां-हां, यही कहेगी वह...
उसने लगभग दौड़ते हुए गली पार की और किचन का दराज़ खोल सिगरेट के पुराने लाइटरों के बीच नया लाइटर तलाश करने लगी. जब उसे नहीं मिला तो वह झुंझलाई हुई बेडरूम की तरफ़ बढ़ी और लाइटर उठा तेज़ी से बाहर की तरफ़ निकली. 
किनारे खड़ी कुछ देर वह सूखी झाड़ियों के सुनहरे कत्थई रंग को गुलाबी रंगत में घुलता देखती रही फिर हाथ में पकड़ा लाइटर उसने जलाया एक बार, दो बार, तीन बार मगर हर बार अंगूठा फिसल जाता और शायद यह उसका डर ही था, जो निशाना हर बार ख़ता हो रहा था. वह घुटने के बल बैठ गई और अख़बार के उड़ते टुकड़ों को जमा कर आग के सुपुर्द करने की भरपूर कोशिश की.
इस बार पहले ही झटके में लाइटर से नीली लौ निकली और काग़ज़ के टुकड़े ने आग पकड़ ली. अपने काले वजूद को केंचुली की तरह छोड़ता अख़बार का वह टुकड़ा नन्हीं लपटों में तब्दील हो झाड़ियों से बग़लगीर हो उठा. चर-चर की आवाज़ करती नारंगी, पीली लपटों ने रफ्तार पकड़ ली. उसकी शल्ल पड़ती जांघों में गर्मी पहुंची और देखते-देखते वह पूरा बग़ीचा जलकर राख और अंगारों में बदल गया. उसे महसूस हुआ जैसे कोई देर तक रोने के बाद आख़िरी सुबकियां ले रहा हो.
उसने लम्बी सांस ली जिसमें सुकून का हलका अहसास था. वह जैसे ही पीछे मुड़ी तो धक से रह गई.
उसकी फटी आंखें सामने जमी थीं. बदन का ख़ून जम गया और दिमाग़ में एक साथ झुंझलाहट, ग़ुस्सा और खौफ़ के दायरे बनने-बिगड़ने लगे थे.
'यह सब क्या है?' सामने वही फ़ौजी दूसरे घर की मुंडेर पर चढ़ा उसे घूर रहा था. उसकी आंखों में जिज्ञासा और ताज्जुब था. चेहरे पर कुटिल मुस्कान.
'कुछ भी नहीं.' उसने ढिठाई से कहा और क़दम आगे बढ़ाया जैसे कहा हो, 'चल भाग यहां से लाल मूंहवाले बन्दर, हर पल हमारी जि़न्दगी में टांग अड़ाने चला आता है.'
'ठहरो!'
वह तंग गली में कूदा और जले हिस्से को गहरी नज़रों से देखता हुआ बोला, 'मैं कुछ पूछ रहा हूं.'
'सफ़ाई, गन्दगी थी.'
'कल रात तुम्हारा शौहर चल बसा और तुम यहां सफ़ाई में लगी हो, आर यू क्रेज़ी?' लहज़े में डपट थी. चेहरे पर ग़ुस्से का भाव.
'तो फिर मुझे क्या करना चाहिए?' उसने ज़हरीले लहज़े से शोला उगलती आंखें ऊपर उठा पूछा.
'यह तो तुम्हें पता होना चाहिए कि इस वक्त तुम्हें क्या करना चाहिए?' उसने सख़्त लहज़े से कहा.
कुछ पल खामोशी रही.
अफ़सर उसके क़रीब जाकर खड़ा हुआ और कन्धे पर पिस्टल की नोक चुभोकर बोला, 'मुंह में ज़बान है?'
'उसे यहां दफ़नाना है.' कहते-कहते उसकी इल्तजा से भरी आंखें उठीं मगर दूसरे पल उसकी गैरत को गहरी चोट लगी, किसी अजनबी शख़्स के सामने अपनी बेचारगी का दुखड़ा यूं बयान करते हुए. लाख ज़ब्त के बावजूद वह अपने आंसू रोक नहीं पाई. उसे अपने बेवक्त के रोने पर भी ग़ुस्सा आ रहा था. उसका बदन किसी तने की तरह सीधा होकर भी किसी नाज़ुक शाख़ की तरह लरज़ रहा था. 
'स्टाप क्राइंग,' उसने झुंझलाए लहज़े से कहा और स्थिति को समझने की कोशिश की. बात समझने के बाद वह आगे बढ़ा. उसका शाना हमदर्दी से थपथपाना चाहा मगर बीच में ही ठिठककर रह गया जैसे नंगे तार को छूने की हिमाकत करने जा रहा हो. कुछ पल यूं ही गुज़र गए.
मां ने अपने बिखरेपन को समेटा और नज़रें चाकू और सीख़ पर गाड़ दीं. अफ़सर की नज़रें भी उधर घूम गईं. उसने आंख सिकोड़ दोनों चीज़ों को गौर से देखा, फिर औरत के चेहरे को. वह हल्के से मुस्कुराया जिसमें कुछ ऐसा भाव था जैसे किसी बच्चे के बड़े हौसले पर प्यार आए.
'तुम सचमुच में पागल औरत हो. घर जाओ! इन्तज़ार करो.' पिस्टल कमर में खोंसते हुए उसकी आवाज़ गूंजी मगर वह उसी तरह जड़ बनी खड़ी रही.
'यह मेरा हुक्म है,' लहज़ा मुलायम होने के बावजूद फैसलाकुन था. 
उसने नज़रें उठाईं. उस अंग्रेज़ फ़ौजी को देखा और हज़ार शिकवे एक साथ ऊपरवाले से कर बैठी. 
'याद रहे!' चलते हुए वह रुका और इतना कहकर उसने मां की आंखों में झांका जहां उसे सिर्फ नीले साफ़ आसमान का अक्स दिखा, जहां कोई जज़्बा परिन्दा बन उड़ान नहीं भर रहा था.
लड़कियां सारी रात रोने के बाद अब जागी-सोई-सी पड़ी थीं. उसे यह सोगवार सुबह जाने क्यों नई जि़न्दगी की दस्तक की तरह लगी. उसने लड़कियों को जगाया नहीं, ऊंघने दिया. शौहर के चेहरे को देखा. जि़न्दगी भर एक-दूसरे की ख़्वाहिशों के लेहाज़ को ही अपनी दौलत समझी और अब जब एक-दूसरे से जुदा होने का वक्त आया तो घर में था क्या जो आख़िरी सफ़र की तैयारी करती और अब वह सरफिरा गोरा हर तरह की रोक लगाकर चला गया है. जाने उसके दिमाग़ में क्या चल रहा है. वह सिर घुटनों पर टिकाकर बैठ गई. 
वक्त को वह लम्हे लम्हे गुज़रता महसूस कर रही थी.
शौहर जितना भी प्यारा क्यों न हो, लाश तो दफ़नानी ही पड़ेगी...या खुदा, चलते हुए आसमानी किताब भी उठाना भूल गई थी. कम-से-कम मैं इस वक्त तलावत तो कर सकती...कैसी मजबूरी है.
'या उम्मी, इस तरह आप चुप क्यों हैं...बारह घंटों से ज़्यादा वक्त...' लैला ने मां की वीरान पड़ी आंखों में झांकते हुए कहा. 
मां ने जवाब नहीं दिया मगर एक आंसू ज़रूर आंख से लुढ़क लैला के हाथों पर गिरा मगर दूसरी आंख उसी तरह खुश्क रही. 
घर के दरवाज़े पर दस्तक के साथ कई क़दमों के एक साथ सीढ़ी चढ़ने की आवाज़ सुनाई पड़ी. वह चौंकी, तड़पी और थरथराते हुए खड़ी हो गई. उसका दिमाग़ जैसे सुन्न हो रहा था. आंखों के आगे अंधेरा.
लड़कियां सहमी खड़ी थीं. दूसरी दस्तक पर वह जैसे नीम-बेहोशी से जागी हों. लड़कियों को धक्का देकर उसने कमरे से निकाला और उन्हें ठेलती हुई हाल की तरफ़ ले गई, फिर उन्हें अन्दर ठूंसकर दरवाज़े पर कुंडी लगाई. उसके पैर कांप रहे थे. गला खुश्क था. कमज़ोरी के मारे चक्कर-से आ रहे थे. 
'या मुश्किलकुशा!' कहती हुई वह आगे बढ़ी और जि़न्दगी का आख़िरी दांव जीतने की तैयारी में उसने दरवाज़ा खोला.
जो सोचा था वह सामने नहीं था.
उसने फटी आंखों से सबके चेहरे देखे और सिर से गिरा स्कार्फ जल्दी से गर्दन से उठा माथे पर ठीक किया और धीरे से बोली, 'कहिए?'
'हम आख़िरी रसूमात के लिए आए हैं.' सामने खड़े सियाह लिबासवाले ने कहा और दूसरे साथियों ने हामी भरी.
'वह मेरे शौहर...' वह हकलाकर बोली और बदहवासी में सोच बैठी यह सब जैसे चचा के भेजे लोग हों.
'अगर आप इजाज़त दें तो हम घर में दाख़िल हो अपना फ़ज़र् पूरा करें.' उसे दरवाज़े के सामने खड़ा देख कोई बोला.
'जी, जी,' उसने गहरी सांस भरी और कमरे की तरफ़ इशारा किया.
अंधेरा खामोश घर एकाएक आवाज़ों से भर गया. क़ारी की आवाज़ के साथ अगरबत्ती का धुआं कमरे में बादल बन लहराने लगा. पानी के गिरने की छल-छल आवाज़ और दुआ पढ़ने की मद्धिम गुनगुनाहट घर में तैर रही थी और वह हाल के बन्द दरवाज़े के सामने काली चादर ओढ़े सोगवार बनी बैठी थी. कितना अजीब था कि वह इस वक्त अलबनाही के गाने की आवाज़ अपने कानों में ज़्यादा ऊंची आवाज़ से गूंजती महसूस कर रही थी, जब वह नहाने में मगन हो गाता था.
लाश को कफ़नाने के बाद वे सब बाहर निकले तो उसने झपटकर दरवाज़ा बन्द किया और लड़कियों को बाप के आख़िरी दीदार के लिए बाहर बुलाया. हसरत से उसने शौहर के चेहरे पर अलविदा की आख़िरी नज़र डाली. उसे छूने और प्यार करने की तमन्ना दिल में घुटकर रह गई.
जब उसने दरवाज़ा खोला तो घर के सामनेवाली चौड़ी सड़क पर उसे बुलेटप्रूफ काले शीशोंवाली जीप दिखी मगर उसके दिमाग़ में कुछ 
कौंधा नहीं. जनाज़ा घर की दहलीज़ पार कर काली लम्बी गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहा था. सड़क पर आते-जाते इक्का-दुक्का लोग ठहरे फिर सबने रफ्तार पकड़ ली. 
वह जाने क्या सोच एकाएक सीढ़ियां उतर जनाज़े के पीछे बिना सिर ढके नंगे पांव भागी. उसकी दीवानगी देख किसी एक ने पलटकर कहा, 'आपकी जि़म्मेदारी ख़त्म होती है.' 
उसके भागते पैर किसी पेड़ की तरह जम-से गए. 
दूसरे लम्हे वह मक़नातीसी खिंचाव के चलते घर की तरफ़ मुड़ी. सूखे पत्तों की चरमराहट का शोर उसके क़दमों से उठ रहा था. सीढ़ी पर बैठ जब आंसुओं से भीगी आंखों को उसने पोंछा और नज़रें उठा सामने देखा तो वहां कोई न था. सड़क खाली थी.
वह सीढ़ी से उठकर अन्दर आई.
घर में भी अब कौन था, मालिक तो विदा हो गया था. जहां से अभी गहवारा उठकर बाहर गया था, उसी जगह वह औंधी लेट गई.
उसके कांपते हाथ पक्के फ़र्श पर कुछ टटोल रहे थे. और आंखों के सोते उबल रहे थे. सोगवारी के चन्द माह वह किसी बेवा की तरह 'इद्दत' में न गुज़ार सकी. उसे पुरसा देने भी कोई न आया. फोन के तार शायद कट चुके थे. उसे सिर्फ एक ही बात सुकून दे जाती थी कि अलबनाही का आख़िरी सफ़र उसी तरह अंजाम पाया जैसे वह उस दुनिया में आया था. क़ब्र में वह अपने आमाल जाने फ़रिश्तों के सामने क्या कहना है मगर वह दर्द से आज़ाद हो गई कि उसने अपने शौहर को नए कफ़न की जगह पुराने कपड़ों में बिना रस्म व रिवाज के दफ़न कर दिया है.
छह माह कैसे पलक झपकते गुज़र गए, पता ही न चला. मगर वह अपने शौहर को एक दिन भी नहीं भूल पाई. अकेले बिस्तर पर तन्हा करवटें बदल न वह भूख से कुलबुलाती अंतड़ियों को आराम दे पाती थी, न उन यादों से छुटकारा ले पाती जो उसके शौहर की परछाइयां बन उसके चारों तरफ़ रक्स करती उसे महसूस होती थीं. उसे अजीब तरह की तलाझनी हरदम अपनी गिरफ्त में लिये रहती कि अब आगे क्या होनेवाला है. उसके पास जि़न्दगी की पहेली का कोई हल न था सिवाय तारीकी में तैरने के.
'यह पांच क़ीमती मोती हमेशा आबदार बने रहें.' हर रोज़ रात को हज़ारों बार दोहराई जानेवाली दुआ उसने दिल की गहराइयों से अदा की और आंखें बन्द कर लीं.
पास के कमरे से बेटियों की आवाज़ अब आना बन्द हो गई थी. उसने वक्त का अन्दाज़ा लगाया मगर समझ नहीं पाई कि रात आधी गुज़र चुकी है या.... घड़ी की टिकटिक से एक वहशत-सी दिल में घिरती थी. वक्त अपने गुज़रने का एलान कुछ इस तरह करता कि वे सब उसके आगे जवाबदेह हो उठतीं. इसलिए उसको वह बेच आई.
'अच्छा किया मैंने,' उसने सन्तोष की सांस ली और तकिए पर सिर रखा तो लगा अलबनाही की गर्म सांसें उसके चेहरे को दुलार रही हैं.

दो
बाज़ार में घुसते ही समीरा का सिर शोर सुन चकराने लगा. यह बदनज़मी पहले नहीं थी मगर अब हर इराक़ी अपने हालात का शिकार हो मौजूदा बहाव में बह रहा है. समीरा हसरत से हरी सब्जि़यों को देख रही थी जिसे ख़रीदने की उसमें हिम्मत न थी. महंगी सब्ज़ी को लेकर दुकानदार और ग्राहक में झड़पें चल रही थीं.
'नहीं जानती क्या हाल है?'
'जानती हूं ज़माने में आग लगी है मगर इतनी नहीं, जितना तुम हमें ठग रहे हो.'
'तौबा, इस ईमान पर जो अपने होकर भी...'
'चलो जाओ...जाओ यहां से जाओ...जगह खाली करो, कितनी मुश्किलों से हम लाते हैं पता है कुछ?'
'क्यों ख़ून जलाते हैं लोग बहस करके...'
समीरा ने गहरी सांस भरी और फलों की तरफ़ बढ़ी. तभी तेज़ शोर उठा और कुछ लोग लपके दौड़े...
'इसने मछली उठाई है.' दुकानदार की सांसें तेज़ और उससे तेज़ उसका लहज़ा.
'बाबा...कैसा इल्ज़ाम? मैं तो सिर्फ उठाकर देख रही थी कि ताज़ा है या...'
'इसका झोला उलटो!'
'लो, देख लो,' औरत की रुआंसी आवाज़ उभरी.
'इसमें तो मछली नहीं है.' किसी ने कहा.
'चोरी की है इसने, वह छोटी लड़की जो तुम्हारे साथ थी कहां है, बोलो?' दुकानदार अड़ गया.
'कौन छोटी लड़की?' औरत ने पूछा और झुककर सामान ज़मीन से उठा थैले में भरने लगी, साथ-ही-साथ कोस भी रही थी.
'मैंने इसको कई बार देखा है, लड़की को सामान थमा भगा देती है. इस बार मैं सीधे लड़की को पकड़ूंगा और उगलवाऊंगा कि वह चोरी का सामान ले जाती है या नहीं.' दूसरे दुकानदार ने कहा.
समीरा उस औरत की हालत पर तरस खा रही थी मगर पास जाकर हमदर्दी दिखाने का हौसला न जमा कर पाई.
अभी भीड़ छिटकी थी कि कुछ दूर पर शोर उठा.
किसी बूढ़ी औरत ने दो कुब्बे (रोटी) छुपा अपनी अबा में डाल लिये थे. बूढ़ी औरत पकड़े जाने पर थर-थर कांप रही थी. चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. और आंखों से बेतहाशा आंसू की लड़ियां गिर रही थीं.
'गुनाह है, बूढ़ी है, छोड़ दो.'
'किस-किस को छोड़ें? कोई निज़ाम है इस मुल्क में?'
समीरा से अब अपनी जगह खड़ा नहीं रहा गया. आगे बढ़ी और बूढ़ी औरत को तसल्ली देने के लिए उसका शाना थपका तो उसके सूखे होंठों से कुछ अल्फ़ाज़ निकले जो समीरा की समझ में नहीं आए. उसने दुकानदार से रोटी की क़ीमत पूछी और उसे अदा करते हुए कहा, 'यह मेरे साथ हैं, मैं माफी चाहती हूं.'
समीरा उस बूढ़ी औरत को भीड़ से निकाल एक खुली जगह पर लाई जहां कूड़ेदान और खाली दफ्ती के डिब्बे पड़े थे.
'कुछ और चाहिए मां?' समीरा ने पूछा.
वह फफककर रो पड़ी फिर धीरे से बोली, 'मेरे दो नवासे हैं, कल से भूखे हैं, चारा क्या था मेरे पास?'
'दिल छोटा न करें, कुछ शरबत...आप ठहरें मैं लाती हूं.' आगे बढ़कर उसने शरबत की बोतल का दाम पूछा तो सुनकर माथे पर पसीना छलक आया.
क्या करें अब? शरबत लेती हूं तो घर ले जाने के लिए कुछ ख़रीद नहीं पाऊंगी...या खुदा.
'कोई इससे छोटी बोतल या...' समीरा ने पूरे खोखे पर नज़र डाली.
'अच्छा...अच्छा, यह दो लालीपाप दे दीजिए.' समीरा ने लिफ़ाफ़ा पकड़ाते हुए राहत की सांस ली.
बूढ़ी सिर पर हाथ रखे उसी तरह बैठी थी. समीरा को आता देखा तो बड़ी मुश्किल से घुटनों पर हाथ रखकर उठी.
'आज तो हमारी मुश्किल...मुश्किलकुशा ने हल कर दी, कल हज़रत अब्बास आएंगे मदद को,' इतना कह वह हंसी और समीरा से पूछा, 'बेटी तुम ठीक-ठाक हो? हम क्या से क्या हो गए?' कहती हुई वह बिना जवाब सुने आगे बढ़ीं. उन्हें अब सिर्फ अपने नवासों की फ़िक्र लग रही थी. समीरा उन्हें कुछ पल जाते देखती रही फिर जाने किस ख़्याल के आते उसके सारे बदन में झुरझुरी-सी दौड़ गई.
उसके पास अब इतने पैसे बचे थे कि वह अंगूर का एक खोशा और चन्द रोटियां ख़रीद ले.
ज़मीन पर फैले कूड़े से अपने को बचाती हुई वह बाज़ार से बाहर निकली. अन्दर सीलन और गन्दगी के बावजूद जि़न्दगी थी. बाहर छिटकी धूप में वीरानी और मुर्दा इमारतें थीं.
जब वह सड़क पार कर आगे की गली में मुड़ी तो एक अलग ही मंज़र था. जो गलियां मोटर साइकिलों और कार से पटी पड़ी रहती थीं वह खाली थीं. घरों के जंगले और पल्ले गायब थे. 
इन शहरवासियों को क्या हो गया है?
उसके गले में कांटे चुभ रहे थे. प्यास के मारे बुरा हाल था. घर कोसों दूर था. उसने हसरत से बदरंग घरों को देखा, जाकर अपनी प्यास बुझा पल-दो पल थकन उतार लेती. दाहिनी एड़ी बुरी तरह से टीस रही थी. उसने अपने हाल पर नज़र डाली और सोचा कि पहले फ़क़ीर औरतों का यह पहनावा होता था. बिना एड़ी के चप्पल, काला गन्दा लिबास, चेहरा उजाड़, बाल बिखरे और होंठ सूखे.
ख़रीदारी करते हुए अगर मैं यह हुलिया न बनाऊं तो दुकानदार दाम सस्ता देगा ही नहीं. हालात ने हमें किस तरह की चालाकी सिखाई है!
अचानक उसे चक्कर-सा महसूस हुआ.
उसने पास की दीवार से टिक जाना ही मुनासिब समझा और कुछ पल आंखें बन्द कर खड़ी रही फिर बड़ी हिम्मत जमाकर उसने थैले से एक अंगूर का दाना निकाला और मुंह में डाला. उसे धीरे-धीरे ज़बान के ऊपर घुलाने लगी.
उसे बूढ़ी औरत याद आई. अगर कल को वह पुलिस के हत्थे चढ़ गई तो उसके दो छोटे नवासों का क्या होगा?
लालीपाप्स चूसते उसके दोनों नवासे उसकी आंखों के सामने घूम गए.
उसके चेहरे पर मन्द-सी मुस्कान उभरी.
उसने दूसरा अंगूर ज़बान पर रखा और उसे धीरे-धीरे घुलाने लगी.
चौड़ी सड़क पार करते हुए उसे याद आया पहले मश्क में शरबत भर भिश्ती इधर-उधर घूमते हर खास व आम की प्यास बुझाते थे! समाज की लय किस तरह टूटी है कि अपना शहर अजनबी लगने लगा है. लोग एक-दूसरे की जान के प्यासे हो उठे हैं.
सड़क पार कर वह दूसरी गली में दाख़िल हुई. वहां भी वही हाल था, अब किसी की बालकनी से गालीचे हवा व धूप में सूखते नज़र नहीं आ रहे थे. खिड़की के बाहर गमले सूखे और चिटखे दिख रहे थे. इन गलियों से वह पहले नहीं गुज़री थी तब कार सिर्फ चौड़ी सड़क पर दौड़ती और मॉल के आगे रुकती थी मगर अब यह गलियां घर का रास्ता छोटा बनाती हैं और खारजी कुत्तों की नज़र से बचाए रखती हैं. गली में सीली बदबू फैली थी. जगह-जगह कूड़े का ढेर था. शायद इन घरों में कोई मर्द ही न बचा हो और औरतें बाहर बहुत कम निकलती हों.
तभी एक औरत हड़बड़ाई-सी गली में दाख़िल हुई. वह कुछ बड़बड़ा रही थी. क़रीब से गुज़रते हुए वह ठिठकी फिर समीरा के चेहरे को गौर से ताकने लगी. हकलाती हुई बोली 'स...समीरा...समीरा हो न?'
'हां, तुम...तुम रुया हो, या खुदा?'
दोनों एक-दूसरे से इस तरह लिपटकर सिसक पड़ीं जैसे अपनों का पुरसा दे रही हों.
'तुम इधर से?' रुया ने आंसू पोंछ नाक सुड़कते हुए पूछा.
'यह रास्ता छोटा और ठंडा है...' इतना कह समीरा ठहर गई. 
'अलबनाही कैसा है, बच्चियां कैसी हैं?'
'अलबनाही हमें छोड़ गए. बच्चियां मामू के पास लन्दन में हैं...बस मैं अकेली जान...' झूठ कह समीरा ने लम्बी सांस खींची.
'सुनकर अफ़सोस हुआ...तभी तुम्हारा यह हाल है...मैं अपनी क्या कहूं जो अलबनाही पर गुज़री वही मेरे शौहर अल-बाक़र पर...बाक़र का जीना न जीना अब कोई मायने नहीं रखता. इलाज करवाऊं तो हाल सुधरे.... पैरालिसिस ने बिस्तर पर लिटा दिया है. हमने सब्र कर लिया कि सांस चलती रहे. चलो, घर चलो...अच्छा रहने दो...मेरा घर देख तुम्हें दुख होगा, बहुत दुख होगा, अब हम एक कमरे में रहते हैं. वह शान व शौकत चली गई...बाक़र अपने जाननेवालों से मुंह छुपाता है...हर उस शख़्स को गाली देता है जो ईमानदार है...तकलीफों ने उसकी अक्ल पर पत्थर गिरा दिए हैं...अब आगे क्या बोलूं...अपने से बोलते-बोलते थक जाती हूं तब कहीं जाकर आंख लगती है.'
'फ़रीबा और ज़ेबा कैसी हैं?'
'फ़रीबा और ज़ेबा...कैसी हैं? मुझे तो पता नहीं वह कहां हैं? खुद गईं या उठा ली गईं, सही-सही कुछ नहीं पता समीरा, कुछ नहीं पता, उन्हें कहां ढूंढूं?'
समीरा के सारे बदन पर लरज़ा तारी हो गया. पांचों के चेहरे नज़रों के सामने घूम गए. वह हड़बड़ा-सी गई.
'मैं अपना बदन नुचवाती हूं...अपने हम-शहरियों से...और क्या करूं, ईमान को लेकर चाटूं या इस्मत को लेकर नाचूं? देखो, अब मेरे पास इतने रियाल हैं कि मैं हफ्ता आराम से गुज़ार सकूं...अल-बाक़र मुझे गाली देता है, बदकार और बेवफ़ा कहता है, शहवतरानी का इल्ज़ाम देता है, फिर मेरे पैरों पर गिरकर फूट-फूटकर रोता है जब इन पैसों से उसके पेट की आग बुझाती हूं. उसके लिए पेनकिलर और मालिश का तेल ख़रीदती हूं, जि़न्दगी का इतना बदसूरत चेहरा देखने के हम हक़दार नहीं थे, जो हमने बोया नहीं वह हम क्यों काट रहे हैं?'
'एक कोई वजह हो तो कही जाए?' समीरा ने धीमे से कहा.
'तू अभी बहुत जवान लगती है, फांस ले किसी को, अब तो तू आज़ाद है...सच अल-बाक़र मेरी जान का अज़ाब न बना होता तो मैं दरबदर भटकने से बेहतर किसी के साथ हो लेती, इज़्ज़त से रहती, लेकिन हर बार...मुझे समीरा अपने से घिन आने लगी है. अपनी चमड़ी को खुरच डालना चाहती हूं और उस खुदा के सामने सिजदे से इनकार करना चाहती हूं, जो यह सब देख चुप है, चुप!' रुया ने ग़ुस्से में अपने दोनों हाथ अपनी रानों पर पटके और समीरा के कन्धे पर सिर रखकर बिलख उठी. 
ऊपर घर की खिड़की से किसी ने नीचे झांका.
'क्या हुआ...बहन क्या हुआ?'
'कुछ नहीं, बस हम पुरानी सहेलियां अरसे बाद मिली हैं.' समीरा ने फ़ौरन जवाब दिया तो उसने इशारे से कुछ इस तरह के संकेत दिए जो कह रहे थे कि यहां ज़्यादा देर ठहरने में ख़तरा है. पुलिस और आर्मी में काम करनेवालों के घर हैं जो दरअसल मुख़बिर हैं. इतना बता उसने खिड़की पर लगा पर्दा खींच दिया.
दोनों सहेलियों के चेहरे पर हवाइयां-सी उड़ीं फिर सेकंड भर बाद वे दोनों संभलीं और एक-दूसरे से गले मिल जल्दी-जल्दी चलती दो मुखालिफ़ दिशा की तरफ़ बढ़ गईं. समीरा का दिल खट्टा हो चुका था. हाथ में पकड़ी रोटी ठंडी और अंगूर का खोशा मुरझा चुका था.
गली से निकलते ही एक फुटपाथी बाज़ार मिला जहां छोटी-छोटी दुकानें लगाए मर्द उकड़ू बैठे थे. गर्दनें उनकी झुकी हुई थीं. उनके सामने उनके ही घर की चीज़ें सजी थीं जिन्हें मज़दूरनुमा लोग बड़े मोलभाव के साथ ख़रीद रहे थे.
समीरा चन्द पल वहां ठहरी. दुकानों पर रखी चीज़ों को देखकर वह बड़ी आसानी से अन्दाज़ा लगा सकती थी कि यह किस तबके से आई हैं और इसका मालिक किस तरह का काम करता है. वह धीरे-धीरे चलती हुई आगे बढ़ी और एकाएक उसके क़दम थम गए. सामने पुरानी किताबों के ढेर थे. उसने झुककर किताब उठाई और पन्ने पलटने लगी. वहां वे सारी किताबें मौजूद थीं जो कोई भी अपने किताबखाने में रखने में फख्र महसूस करता. एक-दो किताबें वह कब से ख़रीदना चाहती थी मगर दस्तयाब न थीं. उसने उनकी क़ीमत पूछी. जो सुना उससे बुरी तरह चौंक पड़ी फिर उदासी से हंसी.
'वक्त-वक्त की बात है!'
'मैं दाम कम कर सकता हूं.' उस मर्द ने लजाजत से कहा. 
वह जाते-जाते रुक गई. पर्स खाली था, चाहत पेंगें ले रही थी, खासकर इतनी महंगी किताब का इतना सस्ते में मिलना. उसने कुछ देर उन किताबों को देखा फिर धीरे से कहा, 'अभी नहीं, फिर कभी इधर से गुज़री तो ज़रूर लूंगी.' 
समीरा की बात सुन उसका मुंह लटक गया. पास खड़े लोकल गार्ड ने दोनों की बातें सुनीं और हंसा. हाथ का सामान दुकानदार के सामने फेंककर आगे बढ़ा और किताब-फरोश से बड़े दोस्ताना मगर फ़हश अन्दाज़ से बोला, 'वह आएगी ज़रूर यार. क्योंकि यह औरत सारे-सारे दिन सड़कों, कूचों में भटकती रहती है.'
समीरा ने अपने पूरे होश में यह कटाक्ष सुना मगर उसे दिल पर नहीं लगाया. थैले को मज़बूती से पकड़ा और तेज़ क़दम उठाती वह आगे बढ़ी और मन-ही-मन बोली- ताल्लुक़ात बनाने का यह अन्दाज़ रिवाज पकड़ता जा रहा है. हाथ पकड़ पहुंचा पकड़ने की यह कोशिश कई बार मैं झेल चुकी हूं. एक खामोशी में हज़ार बला टाली जा सकती है. वरना डराने-धमकाने में यह किसी बाहरीवालों से कम नहीं है.
वह सिर झुकाए चलती रही. आगे बमों से खंडहर हुई खानक़ाह इस दोपहर में भांय-भांय कर रही थी. उसी के गिरे मलबे पर वह जाकर बैठ गई ताकि टीसते पैर को कुछ राहत मिले.
'मीठे ठंडे तरबूज़ लोगी बीबी!' एकाएक सामने से गुज़रती गधा-गाड़ी के गाड़ीवान ने कहा और लगाम खींची.
'क्या भाव है?' उसने उसकी उम्मीद नहीं तोड़ी.
'बे-भाव है बीबी.' उसने लगाम खींची और सिर पर बांधा साफ़ा खोल उसे हवा में झटका और चिपके बालों में उंगलियां फंसा वह एकाएक शरारत से मुस्कुरा पड़ा तो समीरा की रीढ़ की हड्डी सनसना उठी.
'अभी भी नहीं पहचानीं आप मुझे मैम?' उसने अंग्रेज़ी में कहा तो समीरा चौंकी, उसके नथुने फड़फड़ाए और दिल से जज़्बात का रेला उठा.
'मुस्तफ़ा?' समीरा की आंखें भर आई थीं, पता नहीं अपनी फ़क़ीरी पर या उसकी बदनसीबी पर!
'शागिर्द अपने उस्ताद को कभी नहीं भूलता...दूर से आपका चेहरा मेरे ज़हन में ऐसा कौंधा कि पहचानते देर न लगी और सबूत के तौर पर मैम आपका यह तिल.' वह मासूमियत भरे लहज़े में बोला.
'मैं सबसे सुर्ख और मीठा दाना आपके लिए उठाता हूं.' यह कहकर वह गाड़ी से उतरा और पीछे पड़े तरबूज़ के ढेर से चुनकर एक दाना उठाया और चाकू से दो टुकड़े कर दिए. गर्दआलूद फिज़ा में तरावट भरी तरबूज़ की गन्ध फैल गई.
'इनकार न करिएगा...जी भरकर खाइए मैम ताकि मुझे...' इतना कहकर वह फफक पड़ा फिर आस्तीन से आंखें पोंछकर अचानक हंस पड़ा.
'मैम, शेक्सपीयर के किरदारों की तरह हमारे अन्दर बहुत-कुछ भरा है, हम ड्रामाई अन्दाज़ से बोलने, सोचने और रहने लगे हैं...मैम, यह टुकड़ा उठाएं.' मुस्तफा ने फांक काट उसके लाल हिस्से को इस नज़ाकत से छोटे टुकड़ों में काटा कि समीरा को उन्हें उठाने में सहूलियत हो. समीरा ने झिझककर पहले इनकार किया मगर उसका इसरार इनकार से ज़्यादा शदीद था.
मीठे रस से समीरा की खुश्क ज़बान और हलक़ तर हो गए थे. भूख और प्यास ने तकल्लुफ़ की कमज़ोर दीवार ढाह दी थी.
मुस्तफ़ा उस छोटे-से तरबूज़ की क़ाशें काट रहा था. चुपचाप, मुतमईन और खुश.
समीरा की आंखों के सामने अपनी अंग्रेज़ी भाषा साहित्य की बी.ए. क्लास उभर रही थी. वक्त ने कैसे-कैसे पैंतरे बदले थे, अतीत के अंधियारे तहखाने एकाएक रौशन हो उठे थे. उसमें मुस्तफ़ा का बचपन तैर गया.
'यह छोटा-सा तोहफ़ा है मैम, साथ ले जाइएगा, इनकार मत करिएगा.'
इतना कह उसने दो तरबूज़ थैले में डाल आगे बढ़ाए, 'बाबा के खेत के हैं.'
इतना कह वह आगे बढ़ा और गाड़ी पर बैठ उसने गधे की पीठ पर हलकी सांटी जमाई फिर अलविदाई नज़रों से समीरा को इस तरह देखा जैसे उसके गले में कुछ अटक गया हो और उससे निगला न जा रहा हो.
गधे के पैरों की बेतरतीब आवाज़ ईंटों और पत्थरों से बनी उस गली में काफी देर तक गूंजती रही और समीरा को अतीत की यादों से निकालने में किसी बैसाखी की तरह मददगार साबित हुई.
मलबे के बीच बची गुम्बद में बसेरा लिये कबूतर और फ़ाख़्ताओं की आवाज़ें जि़न्दगी की नब्ज़ बन धड़क रही थीं. वह उठी तो उसे अंगूर का ध्यान आया. उसने लिफ़ाफे को खोला. लिफ़ाफे में पड़े-पड़े अंगूर पिच से गए थे. उसने मुनासिब जगह देख अंगूर का खोशा और चन्द मरे अंगूर उलट दिए. पलक झपकते ही परिन्दे जाने कहां से झुंड में आए और सब-कुछ चट कर गए. उसका दिल हलका हुआ. वह मुस्कुराती हुई उठी और अंधेरी पड़ती सीली गली को पार करने लगी.
समीरा जब घर पहुंची तो बुरी तरह थक चुकी थी.
लड़कियां जो भूखी और गुस्सा थीं, मां के हाथों में दो तरबूज़ों को देखकर बिगड़ना-रूठना भूल गईं.
'आज मुस्तफ़ा मिला था...'
'सच?'
'घर क्यों नहीं लाईं उसे?'
'देखने में कैसा लग रहा था?'
'तुम लोग बेकार के सवाल कर रही हो, उम्मी इस कैदखाने में किसी को नहीं लानेवाली हैं.' सबा ने लैला के कान में कहा.
'वह अब गधा-गाड़ी पर तरबूज़ बेचता है और...'
'क्या?'
'सच कह रही हो उम्मी, मुस्तफ़ा और गधा गाड़ी?'
'उम्मी कभी-कभी हमें खुश देखने के लिए सच्ची-झूठी कहानी सुनाना चाहती है ताकि हम हंस सकें.' इतना कह सबा जोर से हंसी. 
उसकी हंसी में ऐसा कुछ था जो बाक़ी बहनें भी खिलखिलाकर हंस पड़ीं. बनावटी हंसी अब असली क़हक़हों में इस तरह बदली कि निदा को उच्छू हो गया और उनको अपनी हंसी पर रोक लगाना पड़ा.
भटकते ज़हन के साथ समीरा बिस्तर पर आंख बन्द किए लेटी थी. बार-बार उसके दिमाग़ में बाज़ार का दृश्य उभर रहा था. ज़ैतून की वह बड़ी दुकान ऊपर से नीचे तक हरे-काले ज़ैतूनों की बन्द बोतलों से भरी थी. उसे जै़तून के बागान याद आए, जैतूनों की महक उसके नथनों में गमकने लगी. उसकी आंखें मूंदने-सी लगीं और नींद में डूबने से पहले उसके ज़ेहन में एक पंक्ति थरथराकर गायब हो गई.
'कल हमारा क्या होगा?
***
पुस्तकः अजनबी जज़ीरा
लेखक: नासिरा शर्मा
भाषाः हिंदी 
विधाः उपन्यास/ आख्यान
प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः  ‎ 144
मूल्यः 255 रुपए हार्डबाउंड, 125 रुपए पेपरबैक
 
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