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मोहल्ले का मंकी मैन | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

मोहल्ले में आ गया है मंकी मैन. चश्मदीद बताते हैं कि उसकी आंखों की जगह लाल लाइट हैं और मुंह से धुआं निकलता है. वो छत के ऊपर से उड़ते हुए गुज़रता है और लोगों को काट लेता है. मोहल्ले के पार्षद जी बसेसर नाथ ने जनता से वादा किया है कि वो मंकी मैन से निपटने के लिए अपने घर की छत पर सोएंगे. क्या होगा पार्षद जी का - सुनिए 'स्टोरीबॉक्स' में नई कहानी 'मोहल्ले का मंकी मैन' जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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मोहल्ले का मंकी मैन
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

अरे भाई साब... वो इधर से आता है ... ऐसे.. आंखों में लाल लाल लाइट जलती रहती है... हमने देखा पैजामा पहिने रहता है... 
अबे काहे झूठ बोल रहे हो... लाइट नीली होती है आंखों में... कल देखा है शर्माइन किया अंटीने पे बैठा था... 
अबे वो बंदर था... मंकी मैन नहीं था... मंकी मैन लोहे का होता है... उड़ता है हमने देखा है

हर मे जिस तरफ देखिए बस यही चर्चा चल रही थी... मंकी मैन की खबर ने हर तरफ धूम मचा दी थी... जिसको देखिए वही अपने आप को पहला गवाह बता रहा था। मोहल्ले में रहने वाले चौधरी साहब जो कि वार्ड के निर्दलीय पार्षद भी थे वो तो ये दावा कर रहे थे कि मंकी मैन को उन्होंने देखा है.... टीवी चैनल वाले भी पहुंच गए थे - आप देख सकते हैं मेरे पीछे... ये वही मकान है ... जिसमें रहने वाले बससेर नाथ ने अपनी आंखों से मंकी मैन को देखा... बसेसर जी ने हमसे एक्सक्लूसिव बातचीत में बताया कि मंकी मैन उड़ते हुए इनकी छत पर आया और उसके कानों से धुआं निकल रहा था... इन्होंने बताया कि मंकी मैन से इनकी बातचीत हुई... वो रोबोट जैसा था... उसमें दो बटन भी लगे थे... जिसमें लिखा था हिंदी के लिए एक दबाएं अंग्रेज़ी के लिए दो... जब इन्होंने बटन दबाया तो इनकी उंगली में करंट लग गया... और मंकी मैन हंसने लगा... देखिए बसेसर जी आ रहे हैं...आप देख सकते हैं उनकी उंगली में पट्टी बंधी है... देखिए...  (इसी कहानी को ऑडियो में जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से सुनने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें या फिर बाकी की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें)

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(बाकी की कहानी यहां से पढ़ें) मीडिया पुलिस प्रशासन जनता – सब मंकी मैन के पीछे पड़े थे... हर कोई दावा कर रहा था कि उसने मंकी मैन को देखा है। सबको हिदायत दी जा रही थी कि रात को घर से बाहर न निकलें और छत पर बिल्कुल न जाएं... लेकिन उसी शहर में जहां एक तरफ मंकी मैन को लेकर शोर मचा था वहीं उसकी आढ़ में एक प्रेम कहानी सांस ले रही थी। हुआ ये था कि मंकी मैन की अफवाह की वजह से लोगों ने शहर में रात के वक्त बाहर निकलना बंद कर दिया था... लोग छत पर नहीं जाते थे और इसका फायदा उठाते थे दीपू और स्वीटी... दीपू और स्वीटी गली में अगल बगल के मकान में रहते थे... और रात के वक्त जब मंकी मैन के डर से कोई छत पर नहीं जाता था तब दीपू छत फांद कर स्वीटी की छत पर चला जाता और दोनों इश्क लड़ाते थे। मंकी मैन की अफवाह की वजह से दीपू और स्वीटी की मज़े में कट रही थी.. कि एक दिन इलाके के पार्षद साहब बसेसर जी ने ऐलान किया - देखिए भाइयों –बहनों, मैं आप सबका प्रतिनिधि हो इसलिए मैंने एक बार मंकी मैन को देखा भी है इसलिए मैंने तय किया है कि मैं अपनी जानपर खेलकर हर रोज़ छत पर सोऊंगा.. ताकि अगर मंकी मैन आए तो मैं उसको देख सकूं... 
- अरे यार .. .ई पार्षद जी को भी अभी हीरो बनना था... अब हम कैसे मिलेंगे... स्वीटी ने मैसेज किया दीपू को... दीपू ने कहा निकालते हैं इसका भी कोई रास्ता

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इश्क़ की दुकान बढ़िया चल रही थी लेकिन अब फिर लग गया ब्रेक... ख़ैर एक दिन जब दीपू पास की किराने वाली दुकान से कुछ सामान लेने गया तो देखा कि दुकान के मालिक सलमान अख़बार में डूबे हैं और उनका नौकर पप्पू चावल के बोरे पर बैठा मोबाइल में लगा है। 
“ज़रा दूध और पापे का पैकेट देना” दीपू ने कहा लेकिन बात अनसुनी हो गई। अख़बार से झांकते हुए लंगड़ भाई बोले, “ए पप्पू, ये घी का डिब्बा देख रहे हो... अभी यही फेंक कर मारूंगा यहां से... कस्टमर खड़ा है और तू मुबाइल चला रहा है... चटपट-चटपट.. उठ” पप्पू हड़बड़ाकर सामान निकलने लगा, मिनमिनाया “दुकान में नेटवर्क कहां आता है, अब आदमी पुराने मैसेज भी ना पढ़े, हुंह”
सलमान भाई अखबार दीपू की तरफ करके बोले, “ऐ दीपू, ये मंकीमैन, फिर कांड कर दिस। देखो, नौबस्ता में तीन लोग घायल कर गया” दीपू तो चाहता ही था कि अफवाह बनी रहे.. बोला... हां ये तो हई है... सुनते हैं बहुत खतरनाक है... आप भी बाहर मत सोया करो... अंदर सोया करो
ब्रेड दीपू को पकड़ाते हुए सलमान भाई बोले, “अरे नहीं यार, अपनी तो पुरानी आदत है...बाहर ही सोते हैं... और बाहर ही सोएंगे... आएगा आएगा मंकी मैन.. देखा जाएगा” 

दीपू जब दुकान से वापस आ रहा था तो उसके दिमाग में एक प्लैन चल रहा था... एक प्लैन जिसे सोचकर उसके चेहरे पर शैतानी मुस्कुराहट आ गयी थी। खैर, तो उस रात जब पार्षद जी छत पर लेटने पहुंचे, जनता से किये गए वायदे के मुताबिक... अपने साथ लोहे की एक रॉड भी रखते थे कि जस्ट इन केस कोई मंकी मैन आ ही जाए तो मुकाबला कर पाएं। ख़ैर बिस्तर बिछाते हुए बोले... “कुछ भी कहो यार... खुली हवा की बात ही अलग है... वाह... मच्छर हैं थोड़े लेकिन ठीक है... कम से कम जनता तो सोचेगी कि नेता जी कितने दिलेर हैं” थोड़ी देर बाद उन्होंने करवट ली और सो गए... अब वक्त था उस प्लैन का जो दीपू और स्वीटी ने पहले से बना रखा था। दीपू ने स्वीटी को मैसेज किया, अब हम जा रहे हैं ऊपर पार्षद जी को डराने... तुम थोड़ी देर में आवाज़ लगाना... स्वीटी ने थोड़ी देर वेट किया और फिर आवाज़ लगाई... 
अरे भागो... अरे मंकी मैन आ गया रे... अरे मंकी मैन... आया भागो हड़कंप मच गया... कुछ ही देर में पूरा मुहल्ला जमा हो गया। शोर होने लगा... स्वीटी ने मैसेज किया दीपू को... वाह क्या कमाल किया तुमने... बिलकुल ही डरा दिया... वो बोला... अरे हमने कुछ किया... हम... हम तो पार्षद जी की छत पर पहुंच ही नहीं पाए... कुर्ता एंटीना में फंस गया था हमारा
- हैं... तो ये शोर कैसा है फिर....
 

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दोनों ने अपनी अपनी खिड़की से बाहर झांका तो क्या देख रहे हैं कि सलमान भाई, वही किराना वाले जो कह रहे थे कि बाहर ही सोते हैं हम... वो ज़मीन पर पड़े हैं... उके खरोंचे आई हैं। अब तो दीपू और स्वीटी की भी सिट्टी-पिट्टी गुम थी। तो यानि मंकी मैन सच में था? स्वीटी ने साफ कह दिया कि अब वो छत पर दीपू से मिलने नहीं आएगी। दीपू और स्वीटी की मिलन की कहानी पर यहीं से ब्रेक लग गया। अगले कुछ दिनों तक पूरा मुहल्ला एक अजीब डर से थर-थर कांप रहा था। सबकी ज़ुबां पर मंकीमैन था। गली के नुक्कड़ पर बैठे लड़के बातें करते “बेट्टा सोते वक्त पानी रखा करो, पानी से डरता है मंकीमैन” दूसरा कहता “भक्क, तुम लोग को कुछ मालूमै नहीं, ये बोको हरम का आदमी है... मोबाइल में हमने न्यूज़ में देखा था" 

मंकी मैनकी खबरों से गली-नुक्कड़ गुलज़ार थे। कोई बता रहा था कि बुधवार-बुधवार आता है। कोई बता रहा था कि पटपड़गंज के किसी दिलजले आशिक ने प्यार में धोखा खाने के बाद उसे बनाया है। जितने लोग उतनी कहानियां। सब मौज में थे। लेकिन दीपू भाई के प्यार की दुकान पर ताला था। न जाने कितने दिन हो गए थे स्वीटी की ज़ुल्फों की खुश्बू महसूस किये। उसे करीब से देखे.. हाह। रात जब पूरी गहरा जाती, हवा सांय-सांय करके बहती और दूर कहीं कुत्ते की रोने की आवाज़ गूंजती तो दीपू चुपचाप छत पर पहुंचते। नहीं, नहीं, मंकी मैन ढूंढने नहीं, स्वीटी के साथ बिताए गए पुराने लम्हों को महसूस करने। हालांकि डर उनको भी लगता था। क्योंकि मुहल्ले में अफवाहों की कमी नहीं थी. गली से गुज़रते कोई यूं ही पेड़ की तरफ इशारा कर दे तो दर्जन भर लोग अलग-अलग रंग का मंकी मैन देखने का दावा कर देते थे। 
“हां-हां हमने देखा, पीली आंखे थी...”
- “अमा नहीं, गुलाबी आंखे थी, दांत आगे निकले थे.. और कान”
- “कान नहीं थे उसके, हेडफोन लगाए था” 
जितने लोग उतनी बातें। पूरा शहर मौज ले रहा था। एक दिन दीपू जब सलमान भाई के किराना स्टोर के पास से गुज़र रहा था तो देखा कि सलमान भाई का नौकर पप्पू किसी से मोबाइल पर चैटिंग कर रहा था... इत्तिफाक से सलमान भाई थे नहीं... 
ओए... पप्पू एक चिप्स का पैकेट और एक कोल्ड ड्रिंक... जल्दी दे दो... दीपू ने कहा तो पप्पू ने मोबाइल मेज़ पर रखा और कोल्ड ड्रिंक निकालने अंदर चला गया जहां फ्रिज रखी थी... न जाने क्या सूझा दीपू को... कि उसने यूं ही मज़े मज़े में वो मोबाइल फोन उठा लिया और मैसेज पढ़ने लगा। पता चला कि पप्पू अपनी गर्लफ्रैंड से बात कर रहा था.. लेकिन उसमें उसने गर्लफ्रैंड को बताया था कि कुछ दिन पहले जब उसके मालिक... यानि सलमान भाई पर मंकी मैन का अटैक हुआ था... वो अटैक किसी मंकी मैन ने नहीं... उसी ने किया था। 
पप्पू”, दीपू ने उसे बुलाया तो वो आया... अरे अरे आप ने मेरे मैसेज... कैसे पढ़ लिये... ऐ मुबाइल इधर दो... 
जैसे ही पप्पू ने कहा, दीपू ने उसकी गुद्दी पर चार भन्नाटेदार चमाट लगाए और पूरा मामला पूछा तो आंसू उसकी आंख और नाक दोनों जगह से निकलने लगे। रोते-रोते नाक से एक गुब्बारा भी फूलने लगा। बोला “हम, हम एक लड़की से प्यार करते हैं। लेकिन सलमान हमको दिनभर डांटता है कि मोबाइल क्यों चलाते हो... दो महीने से हमारा नाइट SMS पैक बेकार हुआ जा रहा था। गुस्से में हमी एक दिन मंकी मैन बन गए और सलमान भाई को खरोच दिया... भाई किसी को बोलना नहीं, प्लीज़” दीपू के लिए ईद और दीवाली एक साथ आ गईं थी। उसका चेहरा खिल गया। दो मिनट लगे उसने फौरन स्वीटी को फोन लगाकर सारी हकीकत बयां कर दी। पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ लेकिन फज़लू की गवाही के बाद वो भी खुशी से झूमने लगी। अब किस बात का डर था। रात के अंधेरे में, चांदनी रात में होने वाली मुलाकातों का दौर फिर से शुरु होने वाला था। आखिरकार दीपू की इंतज़ार की घड़ियां खत्म हुई। रात हुई तो वो छत पर पहुंचा। दूर तक सन्नाटा था। उसने मुश्किल से दीवार फांदीं, आदत जो चली गई थी। उधर पहुंचा तो सामने स्वीटी थी। वहीं दिलकश मुस्कुराहट, खूबसूरत बाल, ज़ुल्फों की खुश्बू और माथे पर बिंदी। दीपू ने आहिस्ता से स्वीटी का हाथ थामा तो उसने आंखे बंद कर ली। “बहुत इंतज़ार करवा दिया, इस मंकी मैन ने” स्वीटी ने कहा। तो दीपू ने स्वीटी को गले से लगा लिया। बहुत खूबसूरत मंज़र था वो। सैकड़ों खाली छतों के बीच में, चांदनी की रौशनी से झिलमिलाती एक छत पर, दो साए गले मिल रहे थे। लेकिन तभी एक आहट सी हुई... दोनों ने चौंक कर देखा। ऐसा लगा जैसे लोहे की कोई चीज़ उनकी तरफ चली आ रही है... दोनों ने घबराकर एक दूसरे को देखा... अरे ये मंकी मैन तो नहीं है... दीपू बोला तो स्वीटी ने कहा, क्या बात कर रहे हो... दोनों की कंपकपी छूटने लगी। दोनों वहीं पास में एक एंटीना के पास छिप गए... पर तभी क्या देखते हैं कि सामने वाले घर में रहने वाले पार्षद जी छत पर चले आ रहे हैं... हाथ में एक लोहे का डंडा पकड़े हुए... उसे ज़मीन पर रगड़ते हुए.. 
ओह ये तो पार्षद जी हैं... दीपू ने कहा... पर अब तो हम पकड़े जाएंगे... ये तो हमें साथ में देख लेगा... पूरे मोहल्ले में गा देगा... कुछ करो दीपू ... जल्दी करो... दीपू को कुछ समझ नहीं आ रहा था... हड़बड़ी में वो खड़ा हुआ और छत पर बंधी अरगनी से किसी का काला दुप्टटा खींचा और मुंह पर डाल कर हो-हो चिललाते हुए पार्षद जी पर कूद पड़ा। उसे उम्मीद थी कि पार्षद जी उसे देख कर भाग जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पार्षद जी निकले हिम्मत वाले... वही लोहे का डंडा... घुमा कर जो सो काल्ड मंकी मैन के पिछवाड़े पर चिपकाया तो मंकी मैन... तिरछा तिरछा वापस भागने लगा... घोड़े की ढाई चाल की तरह एक पैर से लंगड़ाते हुए... “ऐ.. रुक... रुक, आज तेरी रेलगाड़ी बनाता हूं, रुक तेरी मंकी मैन की ” पार्षद जी चिल्लाए। दीपू दीवार फांदने की कोशिश करने लगा। लेकिन इससे पहले की वो फांद पाता, पार्षद जी ने लोहे की नुकीले रॉड उसकी ऐसी जगह जड़ दी कि वो चार लोगों में उठने-बैठने के काबिल न रहा। 
शोर मचा तो मुहल्ले वाले जग गए, “किधर गया, किधर गया, अरे किसी ने देखा?” कि आवाज़ें गूंजने लगी। गले में मजमा जम गया। एक मोहल्ले वाले ने पान थूककर कहा, “अरे हमने देखा, पहले स्वीटी की छत पर था... फिर पार्षद जी की छत पर और फिर वहा से दीपू की छत पर कूदा, फिर ... फिर उसने अपनी अफवाह जोड़ दी और उसके बाद उड़ते हुए मुहल्ले से बाहर निकल गया।.. लाल पीली लाइट जल रही थी... अरे हमने देखा
पार्षद जी की जय-जय कार हो रही थी... बिल्कुल हीरो बन गए थे वो... चुनाव जीतना पक्का हो गया था। पर इस बीच एक अच्छी बात ये हुई थी कि मंकी मैन पर अब सब लोगों को भरोसा हो गया था... इसलिए सबने तय कर लिया था कि कोई रात को छत पर नहीं जाएगा... और ये स्वीटी और दीपू के लिए खुशखबरी थी। क्योंकि अब वो खुले आम छत पर इश्क की पींगे लड़ा सकते थे... पर स्वीटी ये भी जानती थी कि उससे पहले दीपू को अस्पताल जाना पड़ेगा... कूल्हे पर प्लास्टर बंधवाने के लिए.... 

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