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कहानी | हकीम साहब की बकरी | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

हकीम साहब की खूबसूरत बकरी बकरुन-निसाँ के पैर के ऊपर एक निशान था जो बिल्कुल वैसा ही था जैसा वली पीर साहब की मज़ार पर था। पैसे की तंगी ने हकीम साहब को एक आइडिया दिया। अगले ही दिन पूरे मोहल्ले में खबर हो गई बकरुन-निसां कोई मामूली बकरी नहीं है, वली पीर साहब का अक्स हैं। हकीम साहब के घर में लोग पहुंचे तो देखा कि बकरुन-निसां बड़े आराम से चारपाई पर बैठी पागुन कर रही हैं, हरे रंग का मेज़पोश काटकर गले से पहना दिया गया था, सींग में चच्ची की पुरानी चूड़ियां पहना दी गयी थीं और चारों पैरों में चटा-पटी वाले दुपट्टे का लचका-गोटा बंधा हुआ था। कुछ ज़ायरीन अगरबत्ती जला कर सर झुकाए बैठे थे और एक पूछ रहा था - "हमां सउदी का वीज़ा कब लगेगा बकरुन-निसां जी?" जिसके जवाब में वो मुंह चलाते हुए कहती - मेंsss फिर हकीम साहब उसका कान उठाकर फुसफुसाते और फिर अपना कान उसने मुंह पर लगाकर बड़े राज़दाराना तरीके से सुनते और फिर सवाल का जवाब देते" सुनिए कहानी - 'हकीम साहब की बकरी' - स्टोरीबॉक्स में

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हकीम साहब की बकरी जमशेद कमर सिद्दीक़ी 

 

रसूलपुर मोहल्ले की दो ही चीज़ें मशहूर थीं। एक तो पहलवान होटल जहां के कुल्चे-नहारी खाने के लिए लाइन लगती थी और दूसरे थे हकीम साहब। हकीमी दवाओं से पुरानी से पुरानी पेट की बीमारियों का इलाज करने का दावा करने वाले हकीम साहब का ये पेशा, पुश्तैनी था। हालांकि आमदनी नाम भर की ही थी। आलम ये था कि अक्सर इधर-उधर से उधार लेना पड़ जाता था। बेगम तो अक्सर ये काम छोड़कर कुछ और करने की नसीहत देतीं लेकिन हकीम साहब, हकीमी पेशे से उतनी ही मुहब्बत करते थे, जितनी अपनी प्यारी बकरी बकरुन-निसां से। 

बकरुन-निसां हकीम साहब की जान थी। शादी के वक्त ससुराल से तोहफे में मिली थी और हकीम साहब को वो उनकी बेगम के बराबर.. या शायद बेगम से ज़्यादा प्यारी थी।बकरुन-निसां... पत्ते खाओगी?”… हकीम साहब रात को गूलर के पत्ते लिए घर की सीढ़ियों से नीचे उतरकर आवाज़ लगाते, तो चबूतरे के किनारे पैर मोड़कर बैठी बकरुन-निसां फौरन खड़ी हो जातीं और बोलतीं – मेंSSSSS... 

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सफेद बालों वाली बकरुनिसां जिसके भूरे रंग के चकत्ते थे, अपने बड़े-बड़े कान हिलाते हुए पागुन करती तो हकीम साहब मुस्कुराकर देखते। जैसे कोई हसीन मोहतरा हकीम साहब का दिया पान चबा रही हो। वो जब पिछला पैर उठाकर खुर से गर्दन के पास खुजलाती तो उन्हें लगता, कोई शोख-हसीना अपने बालों की लटें कान के पीछे कर रही हो।  

दोपहर के वक्त मोहल्ले में इठलाते हुए इधर-उधर सीघें चलाने वाली बकरुन-निसां की तरफ कोई छिछोरा बकरा आंख उठा कर भी देख लेता तो हकीम साहब उसे ताड़ लेते। फिर सबकी नज़र बचाकर बकरे के पास जाते और कान उमेठ देते। हकीम साहब के पूरे खानदान की मोबाइल की फोटो गैलरी हकीम साहब की भेजी सेल्फ़ीज़ से भरी थी, जिनमें हकीम साहब बकरुननिसां के साथ पाउट कर रहे थे। 

अरे बेगम ज़रा पानी गरम कर दो, आज बकरुननिसां को नहला देते हैं।” वो कहते तो बेगम जो अपने भाई शमशाद की बरात में पहने के लिए रंग-बिंरगे कपड़ों के टुकड़े जोड़कर चटा-पटा का लंहगा तैयार करने में मसरूफ होतीं, गुस्से से बुदबुदातीं, “कोई अच्छा दिन देखकर उसी के साथ निकाह पढ़ लो

सफेद बालों वाली बकरुनिसां जिसके भूरे रंग के चकत्ते थे, अपने बड़े-बड़े कान हिलाते हुए पागुन करती तो हकीम साहब मुस्कुराकर देखते। जैसे कोई हसीन मोहतरा हकीम साहब का दिया पान चबा रही हो। वो जब पिछला पैर उठाकर खुर से गर्दन के पास खुजलाती तो उन्हें लगता, कोई शोख-हसीना अपने बालों की लटें कान के पीछे कर रही हो।  

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दोपहर के वक्त मोहल्ले में इठलाते हुए इधर-उधर सीघें चलाने वाली बकरुन-निसां की तरफ कोई छिछोरा बकरा आंख उठा कर भी देख लेता तो हकीम साहब उसे ताड़ लेते। फिर सबकी नज़र बचाकर बकरे के पास जाते और कान उमेठ देते। हकीम साहब के पूरे खानदान की मोबाइल की फोटो गैलरी हकीम साहब की भेजी सेल्फ़ीज़ से भरी थी, जिनमें हकीम साहब बकरुननिसां के साथ पाउट कर रहे थे। 

अरे बेगम ज़रा पानी गरम कर दो, आज बकरुननिसां को नहला देते हैं।” वो कहते तो बेगम जो अपने भाई शमशाद की बरात में पहने के लिए रंग-बिंरगे कपड़ों के टुकड़े जोड़कर चटा-पटा का लंहगा तैयार करने में मसरूफ होतीं, गुस्से से बुदबुदातीं, “कोई अच्छा दिन देखकर उसी के साथ निकाह पढ़ लो एक रोज़, जब हकीम साहब घर में बने अपने छोटे से मतब में हकीमी दवाओं के बीच बैठे कोई नुस्खा बना रहे थे, किसी ने आवाज़ दी – “अमां हकीम साहब। झांककर देखा तो किफ़ायत अली खड़े थे। हकीम साहब नीचे पहुंचे तो किफ़ायत अली ने उनकी तरफ कुछ शकरपारे बढ़ाते हुए कहा, ये तबर्रुख़ देने आए थे। वली पीर की मज़ार का है - “अरे वाह, लाओ भई लाओ... तुम कबसे मज़ारों पर जाने लगे हकीम साहब ने शकरपारा मुंह में रखते हुए पूछा तो वो बोला, हम नहीं गए। उस्मान भाई गए थे। आज कल हम उन्हीं के यहां नौकरी कर रहे हैं ना। उस्मान भाई का नाम सुनते ही हकीम साहब का चेहरा फक्क पड़ गया। किफायत अली ने आगे कहा, उस्मान भाई हर जुमेरात वली-पीर की मज़ार जाते हैं आजकल, अपनी शादी की दुआ मांगने। उन्होंने भिजवाया और हां, ये भी कहलाया है कि आप फौरन उनसे मिलने चले आइये वरना अंजाम बुरा होगा उस्मान भाई, जो कहने को तो मुहल्ले के सबसे बड़ी टेलर शॉप चलाते थे लेकिन साइड-बिज़नेस के तौर पर लोगों को ब्याज पर उधार देते थे। बड़े सख्त मिज़ाज आदमी थे। हकीम साहब पर उनका भी कुछ पुराना बकाया था। अचानक हकीम साहब को शकरपारे का ज़ायका कड़वा लगने लगा। 

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हकीम साहब को उस्मान भाई से हुई पिछली मुलाकात याद आ रही थी। जब उस्मान पैसों का तकाज़ा करने के लिए कुछ मुस्टंडों के साथ हकीम साहब के घर आए थे। हाथ में हॉकी स्टिक लिए उन लोगों ने हकीम साहब का गिरेबान थाम लिया था। अल्लाह-अल्लाह करके बड़ी मुश्किल से दो महीने का वक्त मिला था, जिसे खत्म हुए हफ़्ता गुज़र गया था। 

हकीम साब... वैसे जमुनापारी तो बड़ी शानदार है आपकी किफ़ायत अली ने कहा तो वो गुस्साए, अजीब बदतमीज़ आदमी हो। जमनापारी क्या होता है, बकरुन-निसां नाम है उसका”। किफ़ायत खिसियाए, नहीं मतलब ये जो इसके पिछले पैर के ऊपर ये जो अजीब सा निशान है... ये देखिएहां यार, एक मनचले बकरे ने सींघ मार दी थी क्योंक्या हुआउन्होंने कहा तो किफ़ायत बकरुननिसां के पास बैठते हुए बोले... “ये निशानबिल्कुल वैसा ही है जैसा वली-पीर की मज़ार पर बना है। देखिए, पंख फैलाए चिड़िया जैसा लग रहा है कि नहीं। बड़ा मुबारक निशान है। हकीम साहब ने ध्यान नहीं दिया, बोले, “हम्म होगा... यार हमें तो ये समझ नहीं आ रहा कि उस्मान को कैसे संभालें। फिर माथा रगड़ते हुए बोले, सोचना पड़ेगा कुछ। ख़ैर, जाओ तुम घर जाओअरे घर कहां, किफ़ायत शर्माकर बोले, अभी तो उस्मान भाई के साथ पहलवान मियां के घर के चक्कर लगाने जाना है।” 

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दरअसल उस्मान भाई पहलवान होटल के मालिक की बेटी ज़ैनब चटोरी से इकतरफ़ा इश्क़ करते थे। उस्मान भाई को ज़ैनब की हर अदा पसंद थी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें, गालों के गड्ढे, मैचिंग दुपट्टे लेकिन सबसे ज़्यादा उसकी एक अदा, जो बड़ी मुख़्तलिफ़ थी। ज़ैनब ज़बान की बड़ी चटोरी थी। गली से कोई फेरी वाला निकल जाए –वो इमली वाला हो, कैथे वाला हो, रसगुल्ले वाला हो, या कुल्फ़ी वाला। “भैय्या रुकना” ज़ैनब की आवाज़ हर बार आती। इसीलिए तो उस्मान भाई गली के मुहाने पर खड़े होकर फेरी वाले के निकलने का इंतज़ार करते। कोई फेरी वाला नहीं आता तो क़िफायत अली को भेजकर फर्ज़ी आवाज़ें लगवा देते।पानी के बताशे... दस के चार... पानी के बताशे या फिर इमली.. सात तरह का चूरन वाली इमली..” किफायत चिल्लाकर भाग जाते। ज़ैनब ज़ुल्फें लहराती हुई बाहर आती और हैरानी से कहतीं, अरे, कहां चला गया इमली वाला ज़ैनब का दीदार पाकर नुक्कड़ पर ख़ड़ी स्कूटर पर बैठे उस्मान भाई... खुशी के मारे स्कूटर का सीट कवर नोच डालते। 

किफ़ायत अली ने हकीम साहब से कहा, “हकीम साहब, बस ये समझ लीजिएकोई ऐसा गंडा-तावीज़ और बंगाली बाबा नहीं बचा जिससे उस्मान भाई ने दुआ के लिए ना कहा हो” फिर बकरी की तरफ देखकर बोले, मतलब, कल को अगर आप कह दीजिए कि बकरुन-निसां के पैर के ऊपर जो निशान है, वो इसलिए है क्योंकि ये कोई ऐसी वैसी बकरी नहीं वली-पीर साहब का अक्स है, तो बंदा सच मानकर आपके पैर पड़ जाएगा... उधार-वुधार सब भूल जाएगा, बस कहेगा दुआ करवा के मेरी शादी करवा दो। इतना कहकर किफ़ायत अली तो चले गए। लेकिन हकीम साहब वहीं खड़े बकरुननिसां के उस निशान को देखकर कुछ सोचते रहे। अंजाने में किफ़ायत अली उन्हें कितना किफ़ायती प्लैन बता गए थे उधारी माफ़ करवाने का। तभी बकरुनिसां ने गर्दन घुमाकर चमकती आंखों से देखा तो हकीम साहब के चेहरे पर शरारती मुस्कुराहट आ गई।  

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हकीम साहब के दिमाग में प्लैन तैयार था, लेकिन किफ़ायत अली की मदद के बग़ैर ये काम नामुमकिन था। लिहाज़ा अगली ही सुबह वो किफ़ायत अली के घर पहुंच गए।अरे हकीम साहब... आइये-आइये” किफ़ायत अली लूंगी की गांठ कसते हुए बोले। उन्हें बाहरी कमरे में बुलाकर बोले, “कैसे आना हुआ... अच्छा पहले बताइये चाय पियेंगे?” हकीम साहब ने हां में सर हिला दिया। क़िफायत अली ने गर्दन घुमाकर अंदर वाले कमरे में आवाज़ लगाई, “चाई-चाई, चाय बोलो चाय... अदरक-इलायची वाली चाय” हकीम साहब चौंक गए। किफ़ायत शर्माते हुए बोले, “अरे वो.. वो... आदत हो गयी है... क्या करें। ख़ैर बताइये” 

हकीम साहब फुसफुसाते हुए बोले, कल जो आप कह रहे थे... अगर वो सच में कर दिया जाए तो... - “मतलब?” किफ़ायत ने पूछा तो हकीम साहब ने कहा कि अगर उस्मान को बरगला दिया जाए कि बकरुन-निसां वली-पीर का अक्स है और उसकी दुआ से उस्मान की शादी ज़ैनब चटोरी से हो सकती है बस शर्त ये है कि उस्मान को लिखित में उधार माफ करना होगा। 

क़िफायत अली पहले तो उचक गए तौबा, तौबा हकीम साहब क्या गुनाह करवा रहे हो। लेकिन फिर जब हकीम साहब ने उन्हें कुछ रुपयों का लालच दिया तो ईमान ज़रा डगमगा गया।  

लेकिन हकीम साहब। ज़ैनब चटोरी से उस्मान की शादी होगी कैसे।” हकीम साहब बोले, “अऱे हो न हो.. मेरे ठेंगे से... एक बार उस्मान लिखकर देदे कि उधार माफ... फिर शादी हो चाहे न हो। कह देंगे दुआ करवाई थी, नहीं पूरी हुई। 

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जाल मज़बूत था और शिकार आसान। डील पक्की हो गयी।  

दोपहर होते-होते हकीम साहब के घर में तैयारी भी शुरु हो गयी। अब बकरुन निसां को इस तरह तैयार करना था कि लगे कोई ख़ास बकरी है। हकीम साहब ने बकरुन-निसां को नहला दिया।  

अरे-अरे, ये भीगी बकरी कमरे में कहां लिये चले आ रहे हो। बेगम गुस्से से चीखीं। ये मेरी मेरी चूड़ी इसकी सींग में क्यों फंसा रहे हो भई...अरे पागल हो गया ये आदमी... कोई पागलखाने फोन करो। हाय अल्लाह.. अभी ही पागल होना था इनको भी, शमशाद की बारात तक तो रुक जाते... मेरा चटी-पटी का लंहगा भी बेकार गया” 

हकीम साहब ने उन्हें किसी तरह बहलाया-फुसलाया और बकरुननिसां को वापस सजाने में जुट गए। बकरी की आंखों में बेगम का पुराना पड़ा काजल लगाया, उसकी सीघों में पुरानी रंगीन झालर लटकाईं। बकरुनिसां बेचारी हकीम साहब की चालाकियों से अनजान बरामदे में हैरान खड़ी सजती रही। “अरे-अरे, ये झालर चबानी नहीं है। मुंह से बाहर निकालो” हकीम साहब ने बकरुननिसां के दांतों से झालर खींचते हुए कहा। 

प्लैन की कामयाबी के लिए हकीम साहब ने मुहल्ले के कुछ खाली लोगों को भी अपने साथ मिला लिया था। जो घर में बकरुननिसां के मुरीद बन कर आने वाले थे। आखिरकार, घड़ी ने साढ़े पांच बजाए तो हकीम साहब ने छज्जे से नीचे झांका... क्या देखते हैं कि उस्मान भाई आगे-आगे और क़िफायत अली पीछे-पीछे चले आ रहे हैं। खेल शुरु करने का वक्त आ गया था। 

उस्मान भाई, किफ़ायत अली के साथ हकीम साहब की घर की सीढ़ियां चढ़े तो बारामदे का माहौल देखकर ठहर गए। वहां बीचो-बीच ढीली चारपाई पर बकरुन-निसां बैठी थी। हरे रंग के मेज़पोश को काटकर बकरी को गले से पहनाया गया था। उसकी सींघों पर रंगीन चूड़िया फसीं थी और चारों पैरों में सुनहरे रंग का लचका-गोटा बांधा गया था। बकरी के बगल में हकीम साहब बैठे बकरी को पंखा झल रहे थे और सामने कुछ मुरीद बैठे हुए थे। 

किफायत अली ने उस्मान को इशारे बकरी के पैर पर बने निशान की तरफ इशारा किया। उस्मान ने देखा और फिर बड़े अदब से वहां बैठे लोगों के पीछे बैठकर, सर पर रुमाल बांध लिया।हमे जे पता करना है कि इस साल हमा दुबई का वीजा लेगगा या नहीं.. लगेगा तो कब”... मुरीद बने एक लड़के ने पूछा। हकीम साहब ने ठीक हैं में सर हिलाया और फिर बकरी का कान उठाकर कहा, आदाब बकरुन निसां... ये सवाली आपकी इनायत चाहता है।” फिर लोगों को दो गूलर के पत्ते दिखाते हुए बोले, “देखिए साहिबान, यहां दो पत्ते हैं। बकरुनिसां ने अगर ये वाला पत्ता खाया तो इसका मतलब हां है, और ये वाला खाया तो मतलब ना” 

दोनों पत्ते सामने रख दिए। बकरी ने गर्दन हिलाई और हां वाला पत्ता चबा लिया। दर्शकों में उत्साह की लहर दौड़ गयी। फिर हकीम साहब ने अपना कान बकरी के होठों के करीब लगाया और बुदबुदाए “हम्म.. अच्छा.. ठीक है.. जैसा आप कहें बकरुन्निसां” फिर लड़के से बोले, “भई अपरैल की तेरहवीं तारीख को तुम्हारा वीज़ा लग जाएगा।”  

उस्मान ये सब हैरानी से देख रहे थे। दो-तीन और लोगों के इसी ड्रामे के बाद हकीम साब उनसे मुख़ातिब हुए। “अरे उस्मान भाई” हकीम साहब ने यूं कहा जैसे अभी देखा हो। उनके पास आए और हाथ जोड़कर बोले, भाईजान बहुत माज़रत चाहते हैं। आपका उधार नहीं दे पाये। लेकिन वादा करता हैं कि...  - “अरे हकीम साब कैसी बात कर रहे हैं...” उस्मान उनके हाथ पकड़ते हुए बोले...”आप वली-पीर के वसीले से लोगों की भलाई कर रहे हैं, ऐसे में हम आप से कौड़ी भर रुपयों का तकाज़ा करें... इतने गए गुज़रे नहीं हैं...  

हकीम साहब बोले, “हां लेकिन देनदारी तो है ही... बोझ रहता है दिल पर कि किसी की उधारी है। ज़िंदगी का क्या भरोसा... किसी वक्त ऊपर वाले ने बुला लिया तो... - “अरे नाउज़बिल्ला, मरे आपके दुश्मन... लीजिए अभी रफ़ा दफा किए देते हैं मामला” कहते हुए उस्मान भाई ने जेब से एक रसीद निकाली और उस पर कुछ लिखकर दस्तख्वत करके हकीम साहब की तरफ बढ़ाते हुए बोले, “ये लीजिए रसीद... आज से आपकी-हमारी कोई देनदारी नहीं। बस बकरुननिसां से कहकर हमारा भी एक काम करवा दीजिए.. तो...” 

वो कागज़ हाथ में आते ही हकीम साहब का चेहरा गुलाब सा खिल गया। पीछे बैठे किफ़ायत अली की तरफ चोर नज़रों से देखकर मुस्कुराए। प्लान तो कामयाब हो गया था लेकिन नाटक अभी जारी था। 

 

(पूरी कहानी सुनें स्टोरीबॉक्स में। आजतक रेडियो के अलावा Spotify, Apple podcast, Google podcast, Jio-Saavn समेत सभी ऑडियो मोबाइल ऐप्स पर। सुनने के लिए सर्च करें - स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी)

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