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कहानी | नौ सौ की लिप्सटिक | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद कमर सिद्दीक़ी

“जाओ... कल से चली जाऊंगी रिक्शा करके, कोई ज़रूरत नहीं मुझे ऑफ़िस ड्रॉप करने की” अंजली गुस्से से बोली, “वैसे भी तुम्हारा टुटपुंजिया स्कूटर देखकर हंसते हैं मेरे ऑफिस वाले” मैंने कहा, “हां-हां तो तुम तो शाही घोड़ागाड़ी वाले खानदान की हो न... लोकेश ने तंज़ कसा तो अंजली ज़हरबुझी आवाज़ में बोली, “ख़ानदान की धौंस न दो, सब पता है तुमाए दादा सपरौता गांव में किसकी भैंसे नहलाते थे” मेरी बीवी बुशरा ने अंजली को खींचकर कुर्सी पर बैठाया लेकिन लोकेश मेरा हाथ छुड़ाकर नथने फुलाता हुआ चिल्लाया, “हां, नहलाते थे तो? तुम्हारे पापा की तरह चिटफंड घपले में अंदर तो नहीं गए" “ऐ ज़बान संबाल कर” वो चिल्लाई “तुम अपनी ज़बान देखो” लोकेश चीखा, “कैंची की तरह चलती है अम्मा जैसी ही” वो बोली “अरे तुम अपनी अम्मा देखो” अंजली हथेली चलाते हुए बोली “महीना-महीना पड़ी रहती हैं जैसे सड़क पर सीवर वाले पाइप पड़े रहते हैं.. एक काम नहीं करना... अरे अंजली, ज़रा पानी गर्म कर। अरे अंजली पानी ठंडा दे दो पीने के लिए। गांव में घड़े का पानी पीने वाली औरत, यहां फऱर्माइशें नहीं ख़तम होती... ” तभी लोकेश से एक गलती हो गयी... उसने कहा, देखो ऐसा है मुंह न खुलवाओ, कूड़ेदान में महंगी-महंगी लिप्स्टिक के बिल हमने बहुत देखा है - सुनिए स्टोरीबॉक्स में कहानी 'नौ सौ की लिप्सटिक' जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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कहानी - नौ सौ की लिप्सटिक
जमशेद कमर सिद्दीक़ी

इतवार की सुबह थी… सर्दियों को मौसम और हमाए ऊपर थी रज़ाई... अब सोच लीजिए कि इससे अच्छा किसी के साथ और क्या हो सकता है। और चाहिए ही क्या किसी को ज़िंदगी से... हालांकि आंख खुल गयी थी... लेकिन हम अलसाए हुए इतरा-इतरा के करवटें बदल रहे थे। सर्दियों में रज़ाई में लेटने का जो सुख है भाई साहब उससे बढ़ कर कुछ और है ही नहीं। थोड़ी देर इधर लेटे, फिर थोड़ी देर उधर पहलू बदल लिया। थोड़ी थोड़ी देर में मुंह रज़ाई के अंदर कर लिया... फिर सांस रुकने लगी तो सिरहाने से थोड़ा सा उठा लिया... और पैतियाने के पास से... रज़ाई अपने पंजों से उठा कर मोड़ के अंदर की तरफ कर ली... और बीच की सतह में अपने पैर रख दिए... यही सब करते रहिए... सर्दियां कट जाती हैं। तो उस सुबह भी हम यही कर रहे थे... किचन से कुछ खटर पटर की आवाज़ें आ रही थीं, और आलू के पराठे की खुश्बू उठ रही थी जिसका मतलब ये था कि हमारी बेगम बुशरा थोड़ी देर में गर्मागर्म चाय और आलू के पराठे लेकर आने वाली थीं। (बाकी की कहानी नीचे पढ़ें। या इसी कहानी को ऑडियो पर सुनने के लिए ठीक नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें)

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हमने तो पूरे दिन का प्लैन कर लिया था... कि आराम पूरा दिन इसी बिस्तर से हिलेंगे नहीं। 1 बजे तक तो बिलकुल भी नहीं... हां फिर डेढ़ बजे के आसापास एक पैर रज़ाई से निकाल कर बाहर की आबोहवा का कुछ जाज़या लिया जाएगा... ठीक लगा तो रज़ाई से निकलेंगे... फिर दोपहर में कुछ बढ़िया खाने का ऑर्डर करेंगे... कोई बढ़िया फिल्म लगाएंगे... शाम को जाएंगे आलू टिक्की खाने, वापसी में शर्मा जी की चाय पी जाएगी और आत वक्त कुछ मीठे पान खाते हुए दिन को खत्म किया जाएगा। 
अरे भई बुशरा... चाय में आलू का पराठा जो है... उसके साथ कोई बढ़िया वाली चटनी भी पीस देना... मैंने कहा तो आवाज़ आई हम्म ठीक है... अरे लेकिन आप ब्रश तो कर लीजिए... 
मैंने रज़ाई में लेटे लेटे कहा, शेर कभी दांत मांजते बुशरा... तो किचन से मुझे हंसी की आवाज़ आई... 
और उस एक पल में लगा कि हमारी ज़िदगी जो है... कितनी खुशनुमा है। कितनी खूबसूरत है और उसे कितनी अच्छी तरह से मैंने कंट्रोल किया हुआ है। अरे भई ये मेरे तेज़ दिमाग़ और बात चीत करने की जो सलाहियत है... उसी का नतीजा तो है कि मेरे घर में कभी हम मियां बीवी में कोई आपसी तनाज़ कोई झगड़ा नहीं होता... इतने साल हो गए शादी के मगर हमारे बीच कभी तू तू मैं मैं नहीं हुई। कभी बदज़बानी नहीं हुई। इसकी वजह यही है कि मैं बहुत समझदारी के साथ चलता हूं। रिश्ते की जो बारिकियां है, उसे बहुत संभालना पड़ता है... और ये काम मेरा जैसा समझदार आदमी ही कर सकता है... 
देखिए... आदमी बिना वजह के यूं ही खुश हो रहा था.. कोई बात नहीं, कुछ नहीं... यूं हीं अपने आप पर रश्क कर रहा था कि क्या चीज़ हूं मैं भी। तभी अचानकर रसोई में बुशरा का फोन बजा... 
हां... हां हां... हैं.. हां हां... हां… हां हां... नहीं नहीं... नही... हां हां

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वो बात करते हुए बाहर आई तो चेहरे पर शिकन थी... फोन पर हाथ रखते हुए फुसफुसाकर बोली... अंजली का फोन है... 
मैंने कहा, तो क्या फिर से उनके यहां... 
उसने कहा हां... और कहते हुए उसने स्पीकर ऑन कर दिया। 
अरे भाई साहब... वो चीख पुकार मची थी घर में की पूछिए मत... लोकेश और अंजली जो कि हमारे कॉमन दोस्त थे... जिनकी लव मैरिज चार साल पहले हुई थी... वो महीने में कम से कम एक बार ऐसे ज़रूर लड़ते थे कि जब लगता था.. कि आज ये दोनों एक दूसरे को समाप्त कर देंगे... खत्म कर देंगे लड़ कर...  वही दिन आज था। 
फोन पर आवाज़ें गूंज रही थीं... बर्तन फेंकने की, सामान गिरने की... वगैरह वगरैह... ऐसा कोहराम मचा था कि लगा फौरन इनके घर नहीं पहुंचे तो पता नहीं क्या हो जाएगा। 
चलिए जल्दी चलिए.... अल्लाह पता नहीं ये लोग क्या कर के मानेंगे... उठिए ,... बुशरा ने कहा तो मेरे होठों पर लोकेश के लिए... कोई ऐसी बात बुदबुदाई जो मैं यहां बता नहीं सकता। मुझे अपना पूरे दिन का बना बनाया प्लैन याद आया... सब चूल्हे में चला गया। पर ख़ैर करते भी तो क्या... 
चलो भई... झगड़ा सुलझा कर आते हैं... कहते हुए मैं रज़ाई से निकला और हड़बड़ी में तैयार होकर बुशरा के साथ निकल गया। मैंने अपनी मोटर साइकल निकाली... बुशरा पीछे बैठी और हम तेज़ी से लोकेश अजली के घर की तरफ चल दिये... जब हम लोकेश और अंजली के घर पहुंचने वाले थे तो मैं थोड़ा सा लव गुरु सा महसूस कर रहा था। मैंने बाइक चलाते चलाते बुशरा से कहा, ये लोग पता नहीं कैसे हैं... एक रिलेशनशिप नहीं संभाल पाते... ये मुझसे कुछ क्यों नहीं सीखते... आखिर मैं लोकेश को इतनी टिप्स देता हूं... कुछ तो उसको मेरी बातों का फायदा उठाना चाहिए
मैंने ये कहा तो शीशे में बुशरा का चेहरा देखा... वो मेरी तरफ ऐसी निगाह की.. जैसे उसे मेरी बात पर सख्त ऐतराज़ था। पर वो चुप रही। ख़ैर हम दोनों थोड़ी देर बाद लोकेश और अजंलि के घर के बाहर खड़े थे। मैंने बेल बजाई और दरवाज़े से दो आवाज़ें बाहर आ रही थीं। अभी भी शोर मचा हुआ था। चीख पुकार चल रही थी... बर्तन खड़क रहे थे। 
दरवाज़ा खुला... तो अंदर का नज़ारा देखा। तकिया ज़मीन पर पड़ी हैं... लोकेश के कपड़े फटे हुए हैं... सर पर एक गुमड़ा भी निकला है शायद ओमलेट बनाने वाला पैन सीधे उसके माथे से आकर टकराया था... अंजली किचन से अब भी चीख रही थी। 
अरे ... अरे क्या हुआ यार... तुम... एक सेकेंड... अब हम आ गए हैं... अब सब ठीक हो जाएगा... सुनो दोनों लोग.. अब फैसला हम करेगे... 
मैंने ऐसे कहा जैसे मैं कोई चौधरी हूं। 
“जाओ... कल से चली जाऊंगी रिक्शा करके, कोई ज़रूरत नहीं मुझे ऑफ़िस ड्रॉप करने की” अंजली बोली, “वैसे भी तुम्हारा टुटपुंजिया स्कूटर देखकर हसते हैं मेरे ऑफिस वाले”
- “हां-हां तो तुम तो शाही घोड़ागाड़ी वाले खानदान की हो न... लोकेश ने तंज़ कसा तो अंजली ज़हरबुझी आवाज़ में बोली, “ख़ानदान की धौंस न दो, सब पता है तुमाए दादा सपरौता गांव में किसकी भैंसे नहलाते थे” 
मेरी बीवी बुशरा ने अंजली को खींचकर कुर्सी पर बैठाया लेकिन लोकेश मेरा हाथ छुड़ाकर नथने फुलाता हुआ चिल्लाया, “हां, नहलाते थे तो? तुम्हारे पापा की तरह चिटफंड घपले में अंदर तो नहीं गए”
- “ऐ ज़बान संबाल कर”
- “तुम अपनी ज़बान देखो” लोकेश चीखा, “कैंची की तरह चलती है अम्मा जैसी ही”
- “अरे तुम अपनी अम्मा देखो” अंजली हथेली चलाते हुए बोली “महीना-महीना पड़ी रहती हैं जैसे सड़क पर सीवर वाले पाइप पड़े रहते हैं।.. एक काम नहीं करना... अरे अंजली, ज़रा पानी गर्म कर। अरे अंजली पानी ठंडा दे दो पीने के लिए। गांव में घड़े का पानी पीने वाली औरत, यहां फऱर्माइशें नहीं ख़तम होती... ”
बुशरा ने इशारा किया कि मैं लोकेश को खींच कर ले जाऊं। मैंने उसकी बाज़ू पकड़कर खींचते हुए कोशिश की “अरे यार, तुम लोग क्या बच्चों जैसे लड़ रहे हो, बाहर आवाज़ जा रही है। मियां-बीवी को एक-दूसरे की इज़्ज़त करना चाहिए। हम दोनों में भी मसले होंते हैं, लेकिन हम बैठकर बातचीत से...”
“अरे रुको यार” लोकेश मेरा हाथ झटककर बोला “हमाई अम्मा सीवर का पाइप हैं? और अपनी अम्मा को देखो, मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ तब भी मोबाइल न छूटता हाथ से। काला चश्मा लगाए पूरी रात मोबाइल पर विंडो-शॉपिंग करती हैं। अरे हमारे अकाउंट से अपना पेटीकोट आर्डर कर दिया। बताओ, ग़लत बात है कि नहीं, तुम बताओ..”
लोकेश ने सहमति जुटाने के लिए मेरी तरफ देखा तो मैंने किसी सरपंच की तरह गहरी संजीदगी से कहा, “हां.. मतलब... ये तो ख़ैर ग़लत है ही, लेकिन... अम्मा हैं यार। अब देखो, बुशरा खुद पूरी-पूरी रात मोबाइल लिए लेटी रहती हैं, तो क्या करें। समझदारी से काम लेना चाहिए... तुम दोनों तो पढ़े-लिखे...”
कहते-कहते मेरी नज़र बुशरा पर पड़ी तो उसकी आंखों में शोले उमड़ रहे थे। वो, अंजली को छोड़कर मेरी तरफ़ बढ़ी, “मैं... मैं मोबाइल चलाती रहती हूं.. और जो खुद तीन-तीन बजे तक रज़ाई के अंदर मीम देख-दखकर खी-खी करते हो, वो?”
- “अरे मेरा मतलब वो नहीं था, मैं तो” पड़ोस की आग बुझाते-बुझाते मेरे घर में पानी भर गया था।
- वो गुस्से में बोली “आजतक तुमने कभी मुस्कुराकर पूछा है कि बुशरा, कुछ चाहिए तो नहीं? अब डिस्काउंट देखकर मैं खुद के लिए सस्ती-मद्दी चीज़ें खरीदूं तो उसमें भी दिक्कत....”
-  “बुशरा यार, नौ सौ की लिप्स्टिक सस्ती-मद्दी नहीं...होती...” 
- “क्या.. कहा... तो तुम जासूसी करते हो मेरी...”
- “जासूसी क्या। रसीद प़ड़ी थी डस्टबिन में, नज़र पड़ गयी।
- नज़र पड़ गयी... ऐसे तो कपड़े सामने पड़े रहते हैं... तो अलमारी में रखे नहीं जाते... वो दिखाई नहीं देते हैं.... किचन में बर्तन धुलने के बाद स्टैंड पर सजाए नहीं जाते... मियां जी बना के चले आते हैं ये भी नहीं दिखता कि बर्तन उल्टे सीधे पड़े हैं... एक आध शर्म से सीधे करके स्टैंड में लगा दें... तीन हफ्ते से बालकनी के पौधे सूख के अधमरे हो गए हैं... मियां जी बालकनी पर खड़े हो कर कश सुलगा के चले आएंगे इतनी ज़हमत न होगी कि एक आध पौधे को पानी दे दें... लेकिन डस्टबिन के अंदर... जो पर्ची मुड़ी पड़ी हैं... उसको खोल के देख लेंगे... तब आंखों की रौशनी बराबर हो जाती है... शर्म कर लो कुछ
-    देखो ... तुम बात को बेकार बढ़ा रही हो... मैने कहा तो लोकेश और अंजली भी बुशरा से बोले, 
-    अरे बुशरा... खत्म करो... क्या ही फायदा है बात बढ़ाने से.... 
लोकेश अपने सर अंडे की तरह उभरा हुआ गुमड़ा सहलाते हुए बोले, हां, और क्या... फालतू बात बढ़ाने से क्या फायदा... बातचीत बैठ के शरीफों की तरह होनी चाहिए... 

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लेकिन मुझे गुस्सा आ गया... मैंने कहा.... अरे क्या तुम दोनों इनको छोड़ो – छोड़ो लगाए हो... हैं... अरे देखो भई... बात या तो बराबर से होगी... या नहीं होगी... इनसे पूछो कि आज तक पानी पीने के बाद कभी घर में एक भी बोतल भरी है इन्होंने... पूछो... खा लें अपने अब्बा की कसम... मुझे एक घूंट पानी पीना होता है तो तीन बोतल पहले से खाली रखी होती हैं स्लैब पर... यहां उम्र गुज़री जा रही है पानी भरते भरते... 
-    अच्छा.... वाह वाह वाह... बुशरा ये कहते हुए आगे आई... तो मैं थोड़ा पीछे हटा... वो बोले... आए हाय... देख लो ज़रा ... इन पर कितना ज़ुल्म हो रहा... ज़िंदगी गुज़री जा रही है पानी भरने में... वाह भई वाह... वरना तो ये बड़े रजवाड़े हैं न... हाथी घोड़े चलते हैं इनके तो... मुंह मत खुलवाओ... गांव में दिनभर चक्की पर आटा पीसते थे.... सफेद भूत बने खड़े रहते थे... शादी के लिए जब हमारे अब्बा देखने गए थे.. तो तुम नहाए तक नही... पलकों पर आटा चिपका था.. .पलकों पर... अब्बा इन्हीं से कह रहे हैं ... आप का बेटा कहां है.. .ये कह रहे  हैं हमी हैं लड़के... ये तो तमीज़ है इनकी... 
-    मुझे बुशरा की बात पर गुस्सा तो बहुत आया और मैं जवाब देने भी वाला था... लेकिन मेरी नज़र अजंली और लोकेश पर पड़ी... 

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To be continued.. 

 

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