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शानी की जयंती पर पढ़ें उनकी चर्चित कहानीः मछलियां

हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कथाकार गुलशेर खान शानी की आज जयंती है. शानी की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़ें यह विशेष प्रस्तुति.

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चर्चित कथाकार गुलशेर खान शानीः एक मुद्रा
चर्चित कथाकार गुलशेर खान शानीः एक मुद्रा

हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कथाकार गुलशेर खान शानी की आज जयंती है. उनका जन्म 16 मई, 1933 को मध्य प्रदेश के जगदलपुर में हुआ था. उन्होंने साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य और कहानी जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन के साथ कहानी, उपन्यास, संस्मरण और निबंध विधा से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया. उनकी चर्चित कृतियों में उपन्यास- 'काला जल', 'कस्तूरी', 'पत्थरों में बंद आवाज', 'एक लड़की की डायरी', 'साँप और सीढ़ी', 'नदी और सीपियाँ'; कहानी संग्रह- 'बबूल की छाँव', 'छोटे घेरे का विद्रोह', 'एक से मकानों का नगर', 'एक नाव के यात्री', 'यु', 'शर्त का क्या हुआ', 'बिरादरी', 'सड़क पार करते हुए', 'जहाँपनाह जंगल'; संस्मरण- 'शाल वनों का द्वीप'; निबंध संग्रह- 'एक शहर में सपने बिकते हैं' शामिल है. 
शानी की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़ें यह विशेष प्रस्तुति.

कहानीः मछलियां
          * शानी

अंगीठी छोड़कर जैसे ही सत्येन्द्र और कैरोल उठकर खड़े हुए, सर्दी बढ़ गई.
सत्येन्द्र ने देखा कि आग की मद्धिम पड़ रही आंच में मासा के बाप का चेहरा कई छोटे-बड़े गड्ढों से भर गया है. और वह रोज़ की अपेक्षा अधिक दुर्बल और बीमार लग रहा है.
इसी समय जाने कैसे सामने की धुंधवाती आग जल गई और उसकी रोशनी ओलती तले बैठी मासा की बड़ी बहन रेको को एक बार फिर उजागर कर गई.  रेका के सामने कच्चे साजा पत्तों का ढेर था और बांस के तिनकों से जोड़-जोड़क रवह रात के खाने के लिए पत्तल-दोने तैयार कर रही थी.
मासा के यहां कैरोल और सत्येन्द्र घण्टे-भर से अधिक के लिए बैठ गए थे. कैरोल अब जिनियालाजी और बजट तैयार कर रहा है, इसलिए हर दिन गांव के किसी-न-किसी एक परिवार के साथ बैठे-बैठे शम से रात हो जाती है, पर फिर भी काम पूरा नहीं होता.
जब कैरोल मासा परिवार का बजट ले रहा था तो सत्येन्द्र सारे समय इन्हीं बातों को सुनता बैठा रहा कि मासा के पिता के कितने धान और पेंडा-दीपा (पहाड़ी पर कुटकी के खेत) हैं, कितने गाय-बैल, बकरे-बकरियाँ, मुर्गियां और सूअर आदि उसने पाल रखे हैं, पिछले साल उसने कितना कमाया और कितना खर्च किया आदि-आदि.
पहले-पहल सत्येन्द्र गांव आया था तो उत्सुकता थी. यह सब अच्छा लगता था. अब रात में किसी परिवार के साथ बैठकर देर तक शराब पीना और वही ढेर सारे पुराने सवाल पूछते जाना, अच्छा नहीं लगता. सत्येन्द्र इधर-उधर भटकता खाली बैठा रहा, लेकिन उस बीच क्षण-भर के लिए एहसास नहीं हुआ कि पास के ओलती तले अंधेरे में बैठी रेको पत्तल-दोने सी रही है.    
पिछले साल गांव में माता का प्रकोप हुआ, आधे गांव को भोगना पड़ा. सम्भवतः इस बात की याद शीतला माता रेको के चेहरे पर भी छोड़ गई है. यह विडम्बना है कि साल-भर पहले रेको गांव की सबसे सुन्दर युवती थी और घोटुल के सारे गीत और कहानियां अकेली वही कहती थी. अब उसने शीतला-दर्शन के बाद घोटुल जाना छोड़ दिया और किसी से अधिक मिलती-जुलती भी नहीं.
उस पर एक बार और फिसलती निगाह डालकर सत्येन्द्र कैरोल की ओर बढ़ गया. तभी डोडी' के नीचे से अचानक मासा निकला और उन लोगों को चलते देखकर कैरोल को सम्बोधित कर बोला, "जोहार-पेपी."
फ्लैश लाइट की रोशनी उधर फेंककर कैरोल ने नमस्ते का जवाब दिया और कहा, "मासा, आजकल घर क्यों नहीं आता?"
मासा के चेहरे पर अंधेरा था, अतः दिखा नहीं. जवाब नहीं आया लेकिन वह मुस्कराया जरूर होगा. सत्येन्द्र ने मन-ही-मन कल्पना की कि माता के दस बरस के भोले चेहरे पर हर बार की तरह इस बार भी उजली-सी मुस्कुराहट बहुत भली लग रही होगी.
फील्ड वर्क के लिए निकलने पर (विशेषकर उस परिवार के बच्चों के लिए जिससे जानकारी लेनी हो) कैरोल अपने साथ हमेशा कैंडी लेकर चलता था. यह दस्तूर-सा बन गया था कि घ पहुंचकर अदब-आदाब के बाद पहले बच्चों को कैंडी बंटती और उसके थोड़ी देर के बाद ही काम की बात शुरू होती. यही कैंडी का आकर्षण बहुत-से बच्चों को कैरोल के घर के आसपास काम न होने पर भी खींच लाता था. उन बच्चों के बीच मासा भी एक था, लेकिन धीरे-धीरे सिर्फ वही रह गया.
जब मिसेज कैरोल ओरछा में रहीं तो पड़ोस की एक ब्लिली-पुसाल-उनसे हिल गई थी. प्रायः रोज ही खाने के वक्त वह निकल आती और उस समय तक नहीं टलती, जब तक कि मिसेज कैरोल उसे गोद में ले, पुचकार-पुचकार कर मछली का गोश्त न खिलाए. धीरे-धीरे यह हुआ कि पुसाल इसी घर की होकर रह गई और अपने घर जाना बहुत कम कर दिया. इसी बीच मासा ने जाने क्या सोचकर पुसाल के लिए रोज ही नदी से मछलियाँ पकड़-पकड़कर लाना शुरू कर दिया और दसूरे बच्चों के कैंडी के अधिकार के जाते रहे.
मिसेज कैरोल के लखनऊ चले जाने के बाद भी पुसाल की मछलियों की जिम्मेदारी मासा पर ही रही. जाती-जाती वह मासा को कई बार समझा गई थीं कि उसे वह मासा के जिम्मे ही छोड़  रही हैं, सो बिला नागा वह उसका ख्याल किया करे. पुसाल मछलियों के बिना कौर नहीं उठाती- इसी किस्म की शिकायतें पहले रोज ही हंस-हंसकर मिसेज कैरोल करती थीं, अब वही बातें कैरोल दोहराता है.
दो-एक माह सब ठीक चला. मासा भी आता था और वक्त पर पुसाल की मछलियां भी. लेकिन इधर हफ्ते-भर से मासा ने आना बिल्कुल बन्द कर दिया था. इस हफ्ते-भर में पुसाल ने कभी ठीक से कुछ नहीं खाया. रोटी या दाल-भात तो वह सूंघकर ही हट जाती थी. अबूझमाड़ में दूध नहीं मिलता, तो कैरोल ने एक छोटा टिन पाउडर मिल्क  मंगवा लिया था. मछलियों के अभावा में वही पाउडर पानी में घोलकर पुसाल को दिया जाता लेकिन शायद वह कभी तृप्त नहीं हुई. दूध पीने के बाद भी वह म्याऊं-म्याऊं करती, कैरोल के इर्द-गिर्द मंडराया करती. दो-एक दिन यही चला, और जब पुसाल ने कोई प्रभाव पड़ता नहीं देखा, तो स्वयं भी कम आने लगी.
कैरोल बड़ी चिन्ता करता रहा. दो-तीन बार मासा को खबर भी भिजवाई, लेकिन उसे आता न देखकर, स्वयं ही मासा के यहां चला आया, यह सोचकर कि साथ-साथ बजट लेना भी हो जाएगा और मासा से बात भी.
फ्लैश लाइट बार-बार जलाते-बुझाते हुए कैरोल बड़ी देर तक पुसाल और मासा की शिकायत करता रहा. कई बार, मिसेज कैरोल की बात उसने मासा को याद दिलाई और उससे पक्का वचन लेकर जब पूरी तरह आश्वस्त हुआ तभी वहां से हटा. 
लौटते में सरसों के खेत के बीच की पगडण्डी में से होकर आना पड़ा. सरसों की फसल काटकर खेतों में ही सूखने के लिए ढेर कर दी गई है. जब फसल नहीं कटी होती तो इन खेतों के अलग-अलग टुकड़ों के पीले-पीले आंचल टंक जाते हैं. जब हवा चलती है तो कई छोटी-बड़ी लहरें हिचकोले खाती हुई दूर तक फिसलती चली जाती हैं और सरसों के फूलों की मादक गन्ध पलक नहीं खोलने देती. दिन होता तो प्रायः हर खेत के किसी छोर पर-सरसों के ढेर के पास-कोई माड़िया यूवती बैठी हुई अपने बच्चे को खिलाती-बहलाती मिल जाती लेकिन अभी केवल अंधेरा है.
आधी राह तक कैरोल कुछ नहीं बोला, बस सामने पगडण्डी पर रोशनी फेंकता चुपचाप चलता रहा. अंधेरा होने के बाद आठ बजते न बजते गांव सूना पड़ जाता है और आसपास की पहाड़ी तथा जंगल से उतरकर एक गहरा सन्नाटा गांव-भर को ढांपने लगता है. यहां से वहां तक बेतहाशा फैले अंधेरे में आंगन या डोडी के नीचे जलती अंगीठियाँ-भर उस कोने से लपलपा उठती हैं. किसी भी घर के बाजू वाली पगडण्डी पर आते ही आहट सुनकर दड़बों में सोये सूअर रिरियाते हैं या फिर बाड़ी के भीतर अचानक कुत्ते भौंकने लगते हैं.
केवल बात करने के लिए सत्येन्द्र ने कहा, "गेटिंग हंगरी?"
कैरोल बोला, "आइम स्टारविंग."
लेकिन खाने की मेज पर बैठ जाने के बाद भी दस बजे के पहले खाना नहीं हुआ. कैरोल बड़ी देर तक रम पीता बैठा रहा. सत्येन्द्र से बियर पीने का हठ करने लगा, लेकिन बियर से भी अच्छी उसे सलपी लगती है. दरख्त से ताजा उतारी गई हो तो उसका खट्टा-मीठा स्वाद थोड़ी देर बाद नशे के मुगालते में डाल देता है-और सत्येन्द्र को नशा नहीं, नशे का गुगालता ज्यादा अच्छा लगता है.
'प्रॉंस' का एक टिन खोलते हुए कैरोल ने कहा, "आई लव प्रॉंस! ड्रिंक के साथ इससे अच्छी मछली दूसरी नहीं!...यू....?"
मछलियों के बारे में सत्येन्द्र ने आज तक नहीं सोचा. बहुत-सी बातें होती हैं जिन्दें हम रोज करते हैं लेकिन उनके विषय में कभी सोचते नहीं.
उस सवाल को बिल्कुल तूल न देकर बात समाप्त करने के लिए सत्येन्द्र ने पूछा, "मिसेज कैरोल कब लौटेंगी? आप तो कह रहे थे कि वह लखनऊ से भी निराश हो गई?"
मिसेज कैरोल भी एंथ्रोपोलोजिस्ट हैं, लेकिन मानव समाज या उसके व्यवहारों में उन्हें कोई खास रुचि नहीं, वह लंगूरों का अध्ययन कर रही हैं, और इसी पर उनकी थीसिस तैयार होगी. ओरछा में कुछ माह अपने पति के साथ रहकर उन्होंने भी अपनी थीसिस पर काम किया, और बाद में पालतू लंगूरों के अध्ययन के लिए लखनऊ चली गर्ईं, लिहाजा पिछले दो माह से कैरोल अकेला है.
कैरोल बताने लगा कि खास लखनऊ से मिसेज कैरोल को कोई दिलचस्पी नहीं. शहर से दस मील पर एक गांव है, जहां उन्हें रोज बस से आना-जाना पड़ता है. उनका काम भी अब लगभग समाप्त हो गया है और एकाध माह में लौट आएंगी.
खाना शुरू किए थोड़ी ही देर हुई थी कि जाने कैसे आज पुसाल भी आ गई. कैरोल ने कांटा प्लेट में छोड़ दिया, तपाक से हाथ बढ़ाकर पुसाल को गोद में उठाया और प्यार से उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए शिकायत करने लगा  कि वह इतने दिनों कहां रही, क्यों नहीं आई, क्या उससे नाराज है आदि-आदि. फिर टिन में बची हुई सारी मछलियां उसके सामने उलटकर तृप्ति के साथ उसे खाती हुई देखने लगा. दूसरे दिन की सुबह बड़ी देर तक मासा की प्रतीक्षा की लेकिन वह नहीं आया. पहले मासा दोपहर में आ जाया करता था लेकिन जब से स्कूल खुला और उसने अपना नाम लिखवा लिया तब से समय भी बदल गया. मगर अब दोपहर के बदले पुसाल की मछलियाँ दस बजे तक ही आ जाती थीं.
कुछ तो इसी प्रतीक्षा में कैरोल ने सुबह कोई खास काम नहीं किया. नाश्ते और कॉफी के बाद, कुछ चिट्ठियां लिखीं और फिर पाइप जलाकर 'टाइम' का नया अंक पढ़ता हुआ धूप में बड़ी देर तक बैठा रहा.
कभी-कभी कैरोल यही कहता है. बिना बात किए पाइप के धुएं में घिरकर जब वह कई-कई घण्टे कविताएं पढ़ते या अपने पुराने चित्रों के अलबम देखते हुए गुजार दे तो सत्येन्द्र उसे नहीं छोड़ता. कैरोल को वह अच्छी तरह समझता है. यह या तो होम-सिकनेस है, मिसेज कैरोल की अनुपस्थिति का एहसास या फिर किसी पुराने घ्ज्ञाव की पपड़ी छिल जाने का दर्द...
ऐसे ही क्षणों में एक दिन कैरोल सत्येन्द्र के सामने अचानक सेण्टिमेण्टल हा गया और आवेग में आकर कुछ निजी बातें खोल डाली थीं उसने.
ब्याह के पहले कैरोल कुछ बरस तक आर्मी में रहा था और युद्ध स्थगित होने के बाद ही उसे कोरिया जाना पड़ा. वहां हालंकि वह चार माह से अधिक नहीं रहा लेकिन इस थोड़े समय के जीवन में भी ढेरों स्मृतियां अटकी पड़ी हैं-टोकिया की, सोल की, कोरियन किसानों की और अनेक फौजी तथा जापानी साथियों किी-अक्सर कल्पना में कैरोल वह जीवन जी लेता है.
"यू तो सत्येन्द्र! अमेरिका छोड़कर, किसी भी दूसरे देश में रहने का सवाल हो तो मैं सारी ज़िन्दगी खुशी-खुशी जापान में गुजार दूं. इतनी प्यारी जगह और कहीं नहीं. ऐसे लोग हर देश में नहीं होते. तुम नहीं जानते, पिछले महायुद्ध में अपने यहां के अनगिनत जवानों को खोने के बाद वहां की हर औरत कितनी भावुक, कातर और त्यागमयी हो गई है. शायद इसीलिए अधिकांश अमेरिकन जी, आईज ने जापानी औरतों से शादी कर ली है. आह, वहां की कलात्मक अभिरुचि, संस्कृति की कोमल पवित्रता और भीतर-बाहर की सजावट को क्या कहूं? सचमुच, जापान फूलों और संगीत का देश है...फूलों और संगीत का!"
बहुत भारी स्वर में यह सब कहने के बाद कैरोल का आंखें मूँदना और पाइप के गाढ़े धुएं से अपने चेहरे को ढक लेना-भर याद है, और कुछ याद नहीं आता.
'जाने वह कैसा देश होगा', सोचता हुआ सत्येन्द्र पिछले दरवाजे से होकर नदी की ओर निकल गया. जान-बूझकर उसने कैरोल से अपने साथ आने के लिए नहीं कहा. यों भले बारह बजे न बजते वह रोज नदी चलने की रट लगा दे, मगर आज वह दिन भर कहीं नहीं जाएगा-वह जानता था.
माड़िन नदी का आंचल अब सिमटने लगा है. रेतीले तट पर कई चट्टानें फोड़े की तहर उभरी पड़ी हैं, और चारों ओर बांस की पीली पड़ी घनी झाड़ियाँ रेत की सतह तक झुक आई हैं. पास के जंगल में बेहिसाब परिन्दों का समवेत स्वर उठ-उठकर आता है लेकिन उनमें सिवाय मैना के और कोई भी आवाज पहचानी नहीं लगती.
सुबह से बदली है. धूप रह-रहकर गायब हो जाती है. माड़िन पहाड़ी नदी है, और फिर किनारे के दरख्तों और झाड़-झंखाड़ों से उसका आधा हिस्सा साए में पड़ा रहता है-पानी ठण्डा होगा!
किनारे की रेत पर बैठकर सत्येन्द्र बादल के एक टूकड़े के सरक जाने और धूप निकलने की प्रतीक्षा करने लगा. बाई ओर कठिनाई से पचास फुट आगे बढ़कर माड़िन मुड़ गई है. उधर कैसी होगी, यह सत्येन्द्र नहीं जानता-कभी जाना नहीं हुआ उधर.    
मोड़ के पास एक विशाल घबड़ा पेड़ की सूखी टहनी पर कोई अपरिचित और भारी परिन्दा आज भी बैठा था. सत्येन्द्र जब-जब नदी आता है उस पेड़ की ओर अनजाने ही निगाह चली जाती. समझ में नहीं आता कि कैसे नदी किनारे खड़ा-खड़ा यह समूचा पेड़ सूख गया. यह और अजीब लगता है कि उस मरे हुए पेड़ से इस परिन्दे का ऐसा गहरा मोह है-उसमें तो अब एक पत्ती भी नहीं रही. घण्टे के घण्टे निकल आते हैं और वह एकाध बार कठिनाई से बोलकर उसी टहनी पर डैने डाले गुमसुम बैठा रहता है.
सत्येन्द्र और कैरोल ने साबुन के फेन से सने हुए घुटने-घुटने भर पानी में डूबकर कई बार उसकी बोली की नकल की है ताकि जवाब में वह भी बोले लेकिन अक्सर सारी कोशिशें बेकार हो जातीं. वैसे यह कौतुक अच्छा लगा है. बार-बार आग्रह करने पर साजा और शीशम के घने जंगल से घिरी पहाड़ी नदी के निर्जन तट पर उस पेड़ी की सबसे ऊंची टहनी से ऊंची और सीटी जैसी तेज आवाज उतरही है और सन्नाटे के आंचल को सहलाती हुई दूर-दूर के किनारे में डूब जाती है...
सत्येन्द्र ने अपने कपड़े उतार दिए और केवल अण्डरवियर पहने रेत पर लेट गया, हथेली का तकिया बनाकर सूरज के सामने से अळते हुए बादल के अन्तिम टुकड़े को देखन लगा-धूप खुलते ही, अलस-अलस सी उदासी घेरने लगेगी....
अचानक पानी में छप्प-छप्प की आवाज से सत्येन्द्र उठ बैठा. देखा, थोड़ी ही दूर पर मछली का हाथ-जाल लटकाए हुआ मासा धीरे-धीरे इधर ही बढ़ा आ रहा है. उसकी जगह कोई और होता तो सत्येन्द्र ने उसे डांटकर वहीं रोक दिया होता कि मछली पकड़ना हो तो कहीं और जाए और वहां नहाने का पानी गन्दा न करे लेकिन मासा को डांटने के विषय में उसने सोचा तक नहीं. रुककर उसके निकट आने की प्रतीक्षा की और जब कहने के लिए कुछ नहीं सूझा तो मुस्कुराकर प्रसन्नता प्रकट की.
निकट आने पर मासा स्वयं रुक गया. जाल छोड़ उसने सीधे खड़े होकर कमर सीधी की और विवशता-भरी हंसी हँसकर बताने लगा कि पिछले तीन घण्टों से झुके-झुके उसने आधे मील की नदी खंगाल डाली लेकिन और दिनों की तरह मछलियां नहीं मिलीं. आज शायद भाग्य भी अच्छा नहीं! उसके आने के पहले ही गांव का पटेल अपना बड़ा जाल डाल गया था-सारी मछलियां बिदक गई हैं.
जान-बूझकर भी सत्येन्द्र ने पूछा, "वे मछलिया क्या अपने लिए पकड़ रहा है?"
मासा हंसने लगा, "हम क्या करेंगे? थोड़ी कुटकी और जिर्रा का साग हो जाए-बहुत है! पुसाल के लिए हैरान हूं. ऐपी आज क्यों नहीं आए?"
हालंकि मासा का वह प्रश्न सत्येन्द्र ने टाल दिया लेकिन क्षणकाल के लिए यह बात उसे चुभे बिना न रही कि मासा उसे अधिक महत्त्व नहीं देता-कैरोल के सामने तो और भी नहीं! कैरोल डेढ़ बरस से ओरछा में रह रहा है. अपने लेन-देन, व्यवहार और प्रेम के कारण वह तमाम गांव वालों का प्रेमपात्र बन चुका है. लोग उसे गांव का ही एक व्यक्ति मानने लगे हैं और हर आदमी उसे पेपी कहकर पुकारता है. सत्येन्द्र चार महीने से कैरोल का इण्टरप्रेटर है. दोनों साथ रहते हैं. खाना-पीना एक किचन और मेज पर होता है, तो भी मासा जैसा आदिम लड़का तक दोनों के अन्तर को समझता है. जानता है कि जो कैरोल है, वह सत्येन्द्र नहीं.
मासा पानी से बाहर निकल आया था. उसने जाल रेत पर डाल दिया और पीठ के पीछे दोनों हथेलियों की टेक देकर अधलेटा-सा होकर सुस्ताने लगा. उसकी कमर के गिर्द दो इंच चौड़े और हाथ-भर लम्बे कपड़े के सिवाय और कुछ नहीं था. शरीर का जितना भाग पानी में डूबा हुआ था, उसके निशान रानों पर फुट-भर ऊंचे छूट गए थे. कुछ दिनों पहले कैरोल ने मासा को एक पुरानी टी-शर्ट दी थी; यद्यपि उसके शरीर पर वह ढीली है लेकिन मासा अक्सर उसी में नजर आता है. इस बार शायद पानी में भीग जाने की आशंका से उतार आया है.
जाल में चन्द छोटी-छोटी मछलियां जो थोड़ी देर पहले चित-पट हो रही थीं अब अपने बदन पर चांदी जैसी झिलमिलाहट लिए सारी की सारी निस्पन्द पड़ी थीं. जब मिसेज कैरोल पहले-पहल आई थीं तो यह जाल उनके तितलियां पकड़ने के लिए मंगवाया गया था लेकिन बाद में उनका यह शगल अधिक दिनों नहीं चला और यह मासा के अधिकार में आ गया.
सत्येन्द्र ने पूछा, "आज क्या स्कूल नहीं गया?"
"नहीं," मासा ने कहा, "चार दिन हुए, स्कूल मैंने छोड़ दिया है."
"क्यों, क्या अच्छा नहीं लगता?"
थोड़ी देर चुप रहकर मासा सोचने लगा, फिर बोला कि रेको दीदी का काम करने में अब बिल्कुल मन नहीं लगता. घण्टों चुप बैठी सोचती रहती है. जी मैं आया तो कर लिया, वर्ना खाना-वाना तक नहीं बनाती. पहले बाबा डांटता था लेकिन अब वह भी कुछ नहीं बोलता. मासा भी स्कूल चला गया तो घर पर काम कौन करेगा? बीमार बाप की देख-रेख भी तो चाहिए.
सम्भवतः गांव में सबसे गरीब परिवार मासा का है. अबूझमाड़ के गांव में रहकर भी उनके पास धान के खेत नहीं. पांच बरस पहले जब मासा की मां जिन्दा थी, तो पूर्व की पहाड़ी पर पेंडा का खेत था. पति-पत्नी और रेको-तीनों मिलकर किसी तरह कमा लेते थे लेकिन अब उससे कुछ पैदा करने की शक्ति मासा के पिता में नहीं. एक तो अकेला पड़ गया, दूसरे ढलती उम्र, तीसरे अक्सर बीमार बना रहता है, सो पिछले साल से वह भी छोड़ दिया और दूसरों के खेतों में काम करके पेट पालना शुरू कर दिया है. खेत का काम भी बारहों मास नहीं चलता, अतः बाकी समय में मासा का पिता बाँस की टोकनियां, सूप और चटाइयां बनाकर बेचने लगा.
"गए शुक्रवार को तो रेका दीदी बाजार भी नहीं गई. सारी टोकनी चटाइयां घर पर पड़ी हैं." मासा ने निहायत सादगी और दुख के साथ कहा, "बाबा से इतनी दूर चला नहीं जाता. अब अगले शुक्रवार से बाजार करने मैं ही जाऊँगा!"
सत्येन्द्र को मन-ही-मन कातर-सी हंसी आई. समूचे अबूझमाड़ के लिए हफ्ते में केवल एक दिन घौबड़इ में बाजार लगता है, और वह भी ओरछा से बीस मील से कम नहीं. इतनी सारी टोकरी-चटाई लेकर क्या सचमुच ही बीस मील चल सकेगा यह लड़का?
उजागर में केवल 'अच्छा' कहकर सत्येन्द्र मुस्कुराने लगा, "तेरे बाबा के कन्धे का जख्म कैसा है?"
"वैसा ही है." मासा ने कहा, "कोई फायदा नहीं होता. परसों से पक भी गया और रात-रात भर बाबा को नींद नहीं आती. आज मछली लेकर जाऊंगा तो पीपी से दूसरी दवा के लिए कहना होगा."
बदली कब की हट चुकी थी और बिना आड़ की तेज धूप सत्येन्द्र के नंगे शरीर पर तीखी लग रही थी. वह उठ खड़ा हुआ.
गांव में आग से जल जाने की दुर्घटना मासा के पिता के लिए कोई नई नहीं. ठण्ड में कपड़ों के अभाव के कारण हर आदमी अंगीठी से लगर सोता है और हर साल दो-चार लोग बुरी तरह जलते हैं.
सत्येन्द्र के पानी में उतरे ही, मासा भी जाल लेकर नदी में आ गया. साबुन के सफेद फेन से आकर्षित होकर ढेरों छोटी-छोटी मछलियां आसपास जमा हो गई थीं. जाल डुबोकर मासा आहिस्ता-आहिस्ता उधर बढ़ने लगा.
कुछ दिनों पहले कैरोल की नोटबुक में उसने एक कविता देखी थी:
झील में तैरती हुई रंगीन मछलियां
तन को ढांपती नहीं,    
गहरे जल में ठिठुरतीं,
कांपती नहीं
बस,
नंगी रहती हैं.
उन मछलियों को एकटक देखते-देखते सत्येन्द्र का मन अचानक ही करुणा से भर गया. वह उथले-से गहरे पानी में उतरने लगीं.
एक सप्ताह और बीत गया. लेकिन उस दिन के बाद न पुसाल की मछलियां आईं और न ही मासा परिवार का कोई समाचार ही मिला. इधर कैरोल का फील्ड वर्क भी करीब-करीब समाप्त हो गया था और वह अपने पिछड़े हुए नोट्स टाइप करने में लगा था सो उधर जाना ही न हो सका.
लेकिन बाजार-दिन वाली दोपहर को जब कैरोल अपने नोट्स में लगा हुआ था और सत्येन्द्र बाहर की धूप में बैठा ऊंघ रहा था, बाड़ी का फाटक धीरे-से खोलकर अचानक मासा आ गया-बदन पर आज भी टी-शर्ट नहीं, एक हाथ में जाल और दूसरे में ओवलटीन का खाली डिब्बा!
चौंककर सत्येन्द्र ने कहा, "अरे मासा! इतने दिन कहां रहा?"
बहुत-सी बातों का जवाब मासा नहीं देता, केवल संकोचपूर्वक गर्दन झुकाकर मुस्कराने लगता है.
"इस डिब्बे में क्या है?"
"मछलियां! पेपी हैं?"
सत्येन्द्र को पिछले दिन की सलपी पेड़ वाली बात याद आ गई. नदी-पार की टेकरी वाला सलपी का पेड़ तीस-पैंतीस बरस बाद पहली बार रस दे रहा है. नए रस के लोभ में शाम होते ही गांव के अधिकांश लोग वहां जमा हो जाते हें और अंधेरा हो जाने के बाद भी अंगीठी के गिर्द बड़ी भीड़ जुटी होती है. पिछली शाम सलपी के साथ खरगोश के मांस का भी उल्लास था अतः बहुत-सी बातें निकल गई. वहीं मासा के बाप की चर्चा के दौरान रेको के बारे में एक रहस्य खुल गया था.
वर्तमान में आकर सत्येन्द्र ने कहा, "वह तो काम में लगे हैं. मछलियां रख जा, उन्हें मिल जाएंगी."
और दिन होता तो मासा ने शायद वही किया होता लेकिन आज उस बात को बिल्कुल अनसुनी कर वह एक ओर चुपचाप बैठ गया.
जितनी देर तक मासा पास बैठ रहा, क्षण-भर के लिए भी सत्येन्द्र का मन दूसरे काम में नहीं लगा. रह-रहकर बस वह सलपी पेड़ वाली बात ही घेरने लगती.
एक दिन पहले की रात कैरोल ने दो खरगोश मारे थे और सारा मांस सलपी पेडत्र पहुंचवा दिया. अक्सर हफ्ते-डेढ़ हफ्ते में मोर, बनमुर्गी, पंडकी या खरगोश का शिकार लेकर कैरोल सलपी पेड़ पहुंच जाया करता था. इतने सारे लोक एक साथ इतनी रे के लिए गांव में और कहीं नहीं जुटते. हर आदमी खुले मन से बात करता है और बिना पूछे ही ढेरों बातें निकल आती हैं.
शाम हो या सुबह, सलपी के नीचे मोटे-मोटे लट्ठों की अंगीठी जलती है और लोग उसे घेरकर बैठ जाते हैं. सलपी के सफेद फेन से उफनती हुई हांडी लेकर एक आदमी बीच में आ जाता है, बारी-बारी से सबकी दोनियों में रस आता है और उसके साथ वही भुने हुए मांस की बराबर-बराबर बोटियां!
घोटुल के युवकों ने एक रहस्य की बात बताई कि रेको कुंआरी नहीं. दो साल पहले के काकसा में सारी रात गुमियाबेड़ा के एक युवक के साथ नाचने के बाद सुबह वह उसके गांव चली गई थी लेकिन वैधानिक रूप से पति-पत्नी बनने के लिए गांव के पुजारी ने जैसे ही दस्तूर करने चाहे, रेको वहां से भाग आई. अब वह न कुंआरी है और न ब्याही. जाने उस बीच की स्थिति की कुण्ठा कैसी होती होगी!
सत्येन्द्र उठकर जहां मासा बैठा था वहां तक चला गया और डिब्बे के अन्दर झांककर बोला, "आज तो मछलियों का ढेर कर दिया."
मासा मुस्कराया, "सूरज निकलने के पहले का गया-गया अभी आ रहा हूं."
क्षण-भर चुप रहकर सत्येन्द्र ने पूछा, "रेको क्या बिल्कुल काम नहीं करती?"
"करती है," मासा ने कहा, "अब करने लगी है, लेकिन बाबा और उसमें बातचीत नहीं होती. पता नहीं क्यों दोनों अलग-अलग राते हें और एक-दूसरे के सामने नहीं आते. इनते दिन हुए, दीदी बस कल से ही खुश है और वह भी इसलिए कि कुरमेर से दादा आ रहा है."
सत्येन्द्र को लगा कि सलपी पेड़ पर युवकों ने सारी बातें सच-सच कही थीं, पूछा, "दादा कौन, रेको का मन्दार?"
"हां."
सत्येन्द्र की आंखों के सामने सहसा रेको का चेहरा आ गया. लोग कहते हैं कि बीच की स्थिति से ऊपर रेको ने कुरमेर से अपने मंदार को बुलवा भेजा है और वह आया तो उसके साथ चली जाएगी. लेकिन उसके मन्दार का तो पहले ही ब्याह हो चुका, एक बच्चा भी है. रेको अपने पति के यहां क्यों नहीं चली जाती?
सत्येन्द्र ने मासा की ओर देखा. वह उकडूं बैठा हुआ था और उसका एक हाथ डिब्बे के मुंह पर था. भीतर कुछ मछलियां जिन्दा थीं और उछलकर बाहर आना चाह रही थीं. डिब्बा जाने कितना पुराना होगा. उस पर लेबर नहीं रह गया. यहां-वहां जंग के निशान हैं और पेंदे में शायद एक-दो सूराख पड़ गए हैं. जहां पर रखा गया था, उस जगह की जमीन गीली हो रही थी.
वह मासा से कुछ कहने ही जा रहा था कि दरवाजे पर परदा हटाती हुई हठात भीतर से मिसेज कैरोल निकल आईं. उन्हें अचानक अपने सामने देखकर मासा अकचकाकर उठ खड़ा हुआ. थोड़ी दरे मुंह खोलकर हैरान-सी आंखों से ताकता रहा फिर मुस्कराने लगा.
मिसेज कैरोल स्वयं उसकी हैरानगी को भांपकर मुस्कराती हुई बोली, "मैं कल आई. मासा, तू अच्छा रहा न? रेको कैसी है?"
मासा ने इस बीच अपने घर, पिता और रेको की सारी बातें निस्संकोच बातनी शुरू कर दीं. छोटी-सी-छोटी घटना की चर्चा की लेकिन रेको के मन्दार के आने का कहीं भी उल्लेख नहीं किया.
मिसेज कैरोल ने मासा के पीछे रखे हुए डिब्बे की ओर ध्यान नहीं दिया था. लखनऊ की चर्चा करते हुए बोलीं, "एक बात की तुझे छुट्टी मिली. अब पुसाल की मछलियों के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. देख तो, लखनऊ से मैं अपने साथ कितने तरह की डिब्बे में बन्द मछलियां लेती आई हूं."
मासा कुछ कहे, इसके पहले ही मिसेज कैरोल उसका हाथ पकड़कर स्नेह-पूर्वक खींचती हुई भीतर ले गईं और फूड केबिन से एक के बाद एक मछलियों के कई डिब्बे निकाल-निकालकर उसके सामने धर दिए-सारडिंग, पाम्फ्रेट, किपर्ड-हेयरिंग, सालमन और टूयूना... फिर सहज भाव से हंसकर बोलीं, "यह, कमबख्त पुसाल नदी की उन छोटी-छोटी मछलियों को पसन्द भी तो नहीं करती."
परदे और चौखट के बीच की खाली जगह से सत्येन्द्र ने देखा कि अपनी दोनों हथेलियों रानों और पेट के बीच दबाए हुए मासा उकडूं बैठा है. कुछ नहीं बोलता. बस, हतप्रभ और हैरत-भरी आँखों से उन गोल, लम्बे और चपटे डिब्बों पर लगी मछली की तस्वीर को बार-बार देख जाता है...
बड़ी देर बाद ज बवह अपने विचारों से बाहर आया तब भी सत्येन्द्र वहीं बैठा हुआ था लेकिन मासा ने उससे कुछ नहीं कहा. सत्येन्द्र से आंखें तक मिलाए बिना वह सीधे अपने डिब्बे की ओर बढ़ा जिसके पेंदे से पानी का एक पतला-सा रेला बहकर थोड़ी दूर पर सूख गया था.
जब मासा बाड़ी के फाटक तक पहुंच गया तो उसके ठण्डे कदम और टूटती चाल देखकर अनायास ही सत्येन्द्र को कुछ स्मरण हो आया. लपककर वह मासा के निकट जा पहुंचा और धीमे स्वर में बोला, "मासा, इसे क्या बेचने के लिए लाया था?"
मासा ने गर्दन झुका दी और डिब्बे के अन्दर देखने लगा. उसमें से अब बसायन्ध उठने लगी थी. सारा पानी चुपचाप बह गया था और किसी भी मछली में जान नहीं रही थी.
उसके हाथ से मछलियों का डिब्बा छुड़ाने की कोशिश करते हुए सत्येन्द्र ने हंसकर कहा, "पुसाल न सही, इसे मेरे लिए दे जा. देखूं तो इस नदी की मछलियों में कैसा स्वाद है?"
मासा ने आश्यर्च और अविश्वास के साथ सत्येन्द्र की ओर देखा, उसकी उंगलियों की पकड़ में दबे रुपये पर एक सहमती-सी नजर डाली, थोड़ी देर चुपचाप खड़ा रहा फिर गर्दन झुकाकर रोने लगा.
कई क्षणों बाद सत्येन्द्र ने देखा कि बाड़ी का फाटक खोलकर मासा बाहर किनल गया है और संकरी पगडण्डी पर सका अधनंगा शरीर धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है. वह उसे बड़ी देर तक देखता रहा. फरवरी के अन्तिम दिनों की दोपहर को हवा उदास हो जाती है और ढेरों पत्ते टूट-टूटकर गिरते हैं. बहुत आगे-नए महुए के पास एक छोटा-सा धूल और सूखे पत्तों का बवण्डर उठ रहा था. उससे आगे पगडण्डी जहां एक ओर मुड़ती थी, वहां पहुंचकर मासा रुका, डिब्बे की सारी मछलियाँ उसने पगडण्डी के एक किनारे उलट दीं और खाली टिन लेकर तेजी से मुड़ गया.
इतने लम्बे फासले से सत्येन्द्र ने और कुछ नहीं देखा लेकिन कल्पना की कि पगडण्डी पर पड़ी नंगी मछलियों पर धूल की परत अवश्य चढ़ गई होगी.
 

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