दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में साहित्य आजतक (Sahitya Aajtak 2024) का मंच सजा हुआ है. साहित्य के इस मेले में तमाम दिग्गज शामिल हुए. इसके तीसरे दिन 'ग्रैंड मुशायरा' का सेशन भी आयोजित किया गया, जिसमें शायर आलोक श्रीवास्तव, अजहर इकबाल, एम तुराज, शकील आजमी, नवाज देवंबदी, फ़रहत एहसास, वसीम बरेलवी, गौतम राजऋृषि जैसे दिग्गज शायर शामिल हुए और अपनी गजल और अपने शायराना कलाम से दर्शकों का दिल जीत लिया और रंग जमा दिया. आइए नजर डालें साहित्य आजतक 2024 में पढ़े गए उनकी कुछ रचनाओं पर.
आलोक श्रीवास्तव की रचनाएं
1. ज़रा सा तुमसे क्या आगे बढ़ा हूं,
तुम्हारी आँख में चुभने लगा हूँ
तुम्हारे क़द से क़द तो कम है मेरा,
तुम्हारी सोच से लेकिन बड़ा हूँ.
2.
जिन बातों को कहना मुश्किल होता है,
उन बातों को सहना मुश्किल होता है
इस दुनिया में रह कर हमने ये जाना,
इस दुनिया में रहना मुश्किल होता है
जिस धारा में बहना सबसे आसां हो,
उस धारा में बहना मुश्किल होता है
उसके साथ हमें आसानी है कितनी,
उससे ये भी कहना मुश्किल होता है
उसके ताने, उसके ताने होते हैं !
मुश्किल से भी सहना मुश्किल होता है
वो बातें जो कहने में आसान लगें,
उन बातों का कहना मुश्किल होता है
अजहर इकबाल के शेर
1. घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
सिगरेट बस यु पीता हूं कि तुम मना करो मुझको ' तुम समझाओ ,
तुम समझाती हुई अच्छी लगती हो मुझको
एम तुराज के शेर और गजल
1.खुशी हमदम अगर होती मुझे रोने को क्या होता
उसे गर पा लिया होता तो फिर खोने को क्या होता
वो मुझसे दूर ना होते मैं उनसे दूर ना होता
ये अनहोनी नही होती तो फिर होने को क्या होता
मैं जब जब थक के रुकता हूँ तो कांधे चीख उठते हैं
ये जीवन बोझ ना होता तो फिर ढोने को क्या होता
यूं हीं बंजर पड़े रहते तुम्हारे खेत सदियों तक
मैं मिट्टी में नही मिलता तो फिर बोने को क्या होता
2. बहुत मिस्टेक होती जा रही हैं, मोहब्बत फेक होती जा रही हैं
बुरे हो गए सोहरत में जिसकी, वो लड़की अब नेक होती जा रही हैं..
तुझे मुझसे जुदा करने के खातिर दुनिया एक होती जा रही है.
जन्मदिन तक सिमट आए हैं रिश्ते
मोहब्बत केक होती जा रही है
शकील आजमी के जानदार-शानदार शेर
1. मिरे हाथों में उसका हाथ कम है
अभी वो शख़्स मेरे साथ कम है
हवस का काम चल जाएगा लेकिन
मोहब्बत के लिए इक रात कम है
2. सुख़न में अब नया पहलू कहां से आएगा
तिरे बिना मुझे जादू कहां से आएगा
न दिल में इश्क़ न सांसों में हिज्रतों का धुआं
ग़ज़ल की आंख में आंसू कहां से आएगा
बादलों की तरह बारिश की कहानी में रहो
तुम मिरा ग़म हो मिरी आँख के पानी में रहो
मुझ को मा'लूम है तुम 'इश्क़ नहीं कर सकते
तो हवस बन के मिरे जिस्म के मा'नी में रहो
मैं ने फेंका नहीं टूटे हुए आईने को
ताकि तुम बिखरे हुए मेरी निशानी में रहो
दोस्ती तुम से दुबारा तो नहीं हो सकती
तुम मिरे साथ मिरे दुश्मन-ए-जानी में रहो
ये नई दिल्ली तुम्हें रास नहीं आएगी
लौट कर आओ मिरी जान पुरानी में रहो
नवाज देवंबदी की शेरो-शायरी
1. जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है
आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है
उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है
मोहब्बत के चिरागों को जो आंधी से डराते हैं,
उन्हें जा कर बता देना कि हम जुगनू बनाते हैं....
2. बादशाहों का इंतजार करें, इतनी फुर्सत कहां फकीरों को
जिन पर लुटा चुका था मैं दुनिया की दौलतें, उन वारिसों ने मुझे कफन नाप कर दिया
वो जो अनपढ़ हैं तो ठीक है, हम पढ़े-लिक्खों को तो इंसान होना चाहिए
हिन्दू, मुस्लिम चाहे जो लिक्खा हो माथे पर मगर, आपके सीने पर हिन्दुस्तान होना चाहिए
फ़रहत एहसास का गजल
1. तुम्हें उस से मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँ नहीं करते
किसी दिन उस के दर पे रक़्स-ए-वहशत क्यूँ नहीं करते
इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
तुम्हारे दिल पे अपना नाम लिक्खा हम ने देखा है
हमारी चीज़ फिर हम को इनायत क्यूँ नहीं करते
मिरी दिल की तबाही की शिकायत पर कहा उस ने
तुम अपने घर की चीज़ों की हिफ़ाज़त क्यूँ नहीं करते
बदन बैठा है कब से कासा-ए-उम्मीद की सूरत
सो दे कर वस्ल की ख़ैरात रुख़्सत क्यूँ नहीं करते
क़यामत देखने के शौक़ में हम मर मिटे तुम पर
क़यामत करने वालो अब क़यामत क्यूँ नहीं करते
वसीम बरेलवी के जानदार-शानदार शेर
1. ज़माना मुश्किलों में आ रहा है
हमें आसान समझा जा रहा है
जिधर जाने से दिल क़तरा रहा है
उसी जानिब को रस्ता जा रहा है
किसी का साथ पाने की ललक में
कोई हाथों से निकला जा रहा है
जिसे महसूस करना चाहिए था
उसे आंखों से देखा जा रहा है
2. बड़ी तो है गली कूचों की रौनक
मगर इंसान तन्हा हो गया है
जरा अपनायत से उसने देखा
तो क्या खुद पर भरोसा हो गया है
गौतम राजऋृषि के शेर
1. लम्हा गुज़र गया है कि अर्सा गुज़र गया
है कौन वो जो वक़्त की साज़िश ये कर गया
अब उम्र तो ये बीत चली सोचते तुम्हें
इतना हुआ है हाँ कि ज़रा मैं सँवर गया
सिमटा था जब तलक वो हथेली में ठीक था
पहुँचा लबों पे लम्स तो नस-नस बिखर गया
2. जो देखना हो मुझे तो ज़रा ठहर जाना,
मैं मंज़रों के बहुत बाद का नज़ारा हूं