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'नॉर्थ ईस्ट में हिंदी साहित्य', विषय पर साहित्य आजतक में पूर्वोत्तर के इन रचनाकारों ने कही ये बात

Sahitya AajTak 2023: शब्द-सुरों का महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2023' का शुभारंभ शुक्रवार को दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में हुआ. आज (रविवार) कार्यक्रम का तीसरा दिन है. इसमें 'नॉर्थ ईस्ट में हिंदी साहित्य' शीर्षक पर असम की कवयित्री कविता कर्मकार, अरुणाचल प्रदेश की कवयित्री डॉ. जमुना बीनी, असम की लेखिका डॉ. रीता मोनी बैश्य और असम के कवि अमिताभ रंजन कानू ने अपने विचार व्यक्त किए.

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साहित्य आजतक के मंच पर मौजूद पूर्वोत्तर के रचनाकार.
साहित्य आजतक के मंच पर मौजूद पूर्वोत्तर के रचनाकार.

Sahitya AajTak 2023: शब्द-सुरों का महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2023' का शुभारंभ शुक्रवार को दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में हुआ. आज (रविवार) कार्यक्रम का तीसरा दिन है. इसमें 'नॉर्थ ईस्ट में हिंदी साहित्य' शीर्षक पर असम की कवयित्री कविता कर्मकार, अरुणाचल प्रदेश की कवयित्री डॉ. जमुना बीनी, असम की लेखिका डॉ. रीता मोनी बैश्य और असम के कवि अमिताभ रंजन कानू ने अपने विचार व्यक्त किए.

असम की लेखिका डॉ. रीता मोनी बैश्य ने कहा कि पूर्वोत्तर के आजतक के मंच पर हिंदी साहित्य को लेकर चर्चा हो रही है ये बहुत सुखद बात है. वैसे तो पूर्वोत्तर में बहुत देर में हिंदी का प्रचार और प्रसार हुआ है. संस्थागत रूप से देखें तो 1938 असम राष्ट्र भाषा प्रचार समिति की स्थापना हुई थी. हिंदी साहित्य में पूर्वोत्तर आया था सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय की रचनाओं में.

'पिछले कुछ सालों में हिंदी साहित्य में पूर्वोत्तर आया है'

1947 उनकी कविता थी कितनी शांति कितनी शांति. मेघालय को लेकर उनकी एक कहानी है. असम को लेकर दो कहानियां हैं. तीन यात्रावृत्तांत हैं. 1956 में उपन्यास ब्रह्मपुत्र में पूर्वोत्तर का परिचय कराया गया. पिछले कुछ सालों में हिंदी साहित्य में पूर्वोत्तर आया है. उसमें कई यात्रावृत्तांत हैं. बहुत सारी रचनाएं हैं, जिनमें हमें लगता है कि पूर्वोत्तर को सही नहीं दिखाया गया है. 

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'इस तरह से अब काफी लोग हिंदी में लिख रहे हैं'

जहां तक मेरी बात मैं हिंदी में लिखती हूं. पूर्वोत्तर में तीन तरह के लोग हिंदी साहित्य में लिखते हैं. इसमें पहले जो गैर पूर्वोत्तरी हैं. दूसरे वो जो वहां बसे हैं. तीसरे वो जो वहां के रहने वाले हैं. उनमें मिजोरम से, अरुणाचल से, मणिपुर के साहित्याकर हैं. इस तरह से अब काफी लोग हिंदी में लिख रहे हैं. 

'इस बात ने मुझे कचोटा, फिर हिंदी की ओर रुख किया'

वहीं, अरुणाचल प्रदेश की कवयित्री डॉ. जमुना बीनी ने कहा, मैं जब 10वीं की तैयारी कर रही थी तो अंग्रेजी के पेपर के बाद हिंदी के पेपर के समय मेरी सहेली ने कहा कि हिंदी के लिए तैयारी क्या करना. उसमें तो आराम से पासिंग मार्क मिल जाएंगे. मैंने कहा ऐसा क्यों. इस पर उसने जवाब दिया यहां से कॉपी चेक होने जाने के लिए दिल्ली जाती हैं और वहां पासिंग मार्क दे दिए जाते हैं. इस बात ने मुझे बहुत कचोटा. इसके बाद मैंने हिंदी साहित्य की ओर रुख किया. 

'आधुनिकता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है'

भारत और चीन युद्ध के समय हिंदी को स्थान मिला. हमारी पीढ़ी ने हिंदी पढ़ी और सीखी. मैंने लोककथाओं का संकलन भी किया. जब मैं किताबें लिख रही थी तब ये नहीं सोचा था कि इतना अच्छा रिस्पांस मिलेगा. आधुनिकता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. मगर हम लोग अपने बुजुर्गों के पास बैठकर बड़े हुए और उसने लोककथाएं सुनीं.

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'हिंदी पाठक हमारे घरों की संरचना नहीं जानते'

मगर मेरे बच्चे और ये पूरी जनरेशन डोरेमोन को जानती है पर जब ये बड़े होंगे तो अपनी रूट्स पूछेंगे तो क्या जवाब दूंगी. इसीलिए मैंने लोककथाओं का सृजन किया. हिंदी पाठक हमारे घरों की संरचना नहीं जानते. इसलिए अपनी लोककथाओं में ये चीज बताई हैं. मेरा मानना है कि पूरा पूर्वोत्तर हिडेन लैंड है. लोग यहां के बारे में बहुत कुछ जानना चाहते हैं. 

'इस यात्रा में बहुत सारी चुनौतियां और संघर्ष जुड़े हैं'

कवयित्री कविता कर्मकार ने कहा कि असमिया भाषा में लिखने के साथ ही हिंदी में लिखने की यात्रा बहुत कठिन थी. असम में हिंदी की क्या स्थिति और स्थान है, सबको पता है. मैंने 5वीं से 10वीं तक ही हिंदी सीखी है. मगर, पूरी जिम्मेदारी के साथ हिंदी सीखी है. इस यात्रा में बहुत सारी चुनौतियां और संघर्ष जुड़े हैं. असमिया भाषा को लेकर एक बात कही जाती है कालिकालगा. इसका अर्थ है जादुई. इस भाषा का अपना अलग ही जादू है. 

'वो पहचान नहीं मिल पाती जिसके वो हकदार हैं'

उसी लय को मैंने अपनी कविताओं और रचनाओं में लाने की कोशिश की है. हिंदी पट्टी के लोगों को ये नया लगा. यही वजह है कि लोगों ने पंसद किया. मगर दुख की बात ये भाषाई भिन्नता के कारण असमिया के कई साहित्यकारों को वो पहचान नहीं मिल पाती जिसके वो हकदार हैं.

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'इसमें सिनेमा और मीडिया का काफी योगदान है'

असम के कवि अमिताभ रंजन कानू ने कहा कि असम में हिंदी को समझने के लिए पास्ट में जाने पड़ेगा. असम में ब्रिटिश शासन काल से हिंदी बोली जाती रही है. वहां बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो यूपी बिहार व अन्य राज्यों से हमारे यहां आए और बस गए. मगर अपनी मातृ भाषा नहीं छूटती.

हिंदी का नॉर्थ ईस्ट में इतिहास देखें तो गांधी जी ने राघव दास को हिंदी के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी दी थी. हम लोग हिंदी पढ़ और बोल सकते हैं पर लिखने में दिक्कत होती है. हम लोग सुबह उठते हैं तो अपनी ही भाषा में बोलते हैं. बावजूद इसके हिंदी समझते हैं और काफी चलन है. इसमें सिनेमा और मीडिया का काफी योगदान है.

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