scorecardresearch
 

नमिता गोखले की 'राग पहाड़ी' में दर्ज सितंबर 1880 का वह भीषण भूस्खलन, जब नैनीताल पर आकाश फट पड़ा

नैनीताल की स्मृति और चेतना में सितंबर 1880 की भयानक बरसात और भीषण भूस्खलन आज भी बना हुआ है. प्रख्यात लेखिका और साहित्य अकादेमी से सम्मानित कथाकार नमिता गोखले ने अपनी पुस्तक 'राग पहाड़ी' में उस वाकिए को दर्ज किया है

Advertisement
X
Things to Leave Behind, लेखिका नमिता गोखले और राग पहाड़ी
Things to Leave Behind, लेखिका नमिता गोखले और राग पहाड़ी

नैनीताल की स्मृति और चेतना में सितंबर 1880 की भयानक बरसात और भीषण भूस्खलन आज भी बना हुआ है. प्रख्यात लेखिका और साहित्य अकादेमी से सम्मानित कथाकार नमिता गोखले ने अपनी पुस्तक 'राग पहाड़ी' में उस वाकिए को दर्ज किया है. 
'राग पहाड़ी' का अंश
---
16 सितंबर, 1880, बुधवार के दिन नैनीताल पर आकाश फट पड़ा. लगातार चार दिन चार रात बारिश होती रही. आकाश में इतना अंधेरा था मानो रात हो. लगातार बादल गरज रहे थे और बिजली चमक रही थी. इस कदर कि नैनीताल वासियों को इनकी आदत सी पड़ गई और इसी कारण जब धरती और आकाश ज़रा शान्त हुए तो उन्हें इनकी कमी खटकने लगी. 
तल्लीताल के बड़ा बाज़ार वाले मकान में सरकारी वकील देवीदत्त पंत बिस्तर पर बीमार पड़े थे. खिड़की के लकड़ी के कपाट बारिश को बाहर रखने के लिए लगभग हफ्ते भर से बन्द कर दिए गए थे. कुछ वैसे ही जब बद्रीदत्त उप्रेती को फाँसी पर लटकाए जाने के बाद उन्हें हफ्ताभर बन्द रखा गया था. उनका शरीर बुखार से तप रहा था, और उनका दिमाग इधर-उधर भटक रहा था. वह वर्तमान-अतीत और कभी-कभी भविष्य को भी गड्ड-मड्ड करते हुए अस्फुट बड़बड़ा रहे थे. वह अपनी बहन दुर्गा देवी को सपनों में देख रहे थे जो ताल में डूब गई थी और उसकी लड़की तिलोत्तमा और उस बच्ची देवकी को जिसे उन्होंने कभी अपनी गोद में नहीं उठाया था. उनके होशोहवास धीरे-धीरे थके शरीर से बिछुड़ रहे थे. तिल्ली के बारे में कुछ अजीब सा दिख रहा था. वह एक हरी झील के किनारे एक मर्दाना कोट पहने बैठी थी.
उसके पुरोहित ने तूफान का सामना करते हुए बड़ा बाज़ार वाले घर तक आने का साहस दिखलाया जहां उसने कई शुभ कार्यों में पूजा-पाठ सम्पन्न कराया था. उसने पंचांग टटोले, और तिथियों का विस्तार से अध्ययन करने के बाद नक्षत्रों की ग्रहदशा बैठाई. महीना भाद्रपद का था और विक्रम संवत 1936. 
''ग्रहदशा तो यही बतला रही है कि इनकी आयु पूरी हो चुकी है, इनका समय आ गया है", बड़े दुख के साथ उसने घोषणा की, और यह भी कहा, ''हरि इच्छा बलवान."
बाहर तूफान के थपेड़े जारी थे. 
19 सितंबर, शनिवार के दिन, पहला भूस्खलन हुआ. तब तक 33 इंच वर्षा दर्ज हो चुकी थी. चीना पहाड़ी के सामने वाले हिस्से से पुराने देवदार के पेड़ और एक मकान की आकार की चट्टानें खिसककर झील की तरफ लुढ़ककर आने लगीं. ऐसे ही किसी आपदा का सामना करने के लिए कमिश्नर हेनरी रामजे ने उन घरों को खाली करवा लिया था जो इस दिशा में थे. 
विक्टोरिया होटल का मलबा अपने साथ बहाकर ले गया और असेम्बली हॉल के सामने वाले इलाके में 151 लोगों ने अपनी जान गंवाई. इसके बाद फिर एक बार बादल कड़के और बिजली लगातार चमकती रही. लोगों ने अपनी याददाश्त में बिजली का ऐसा कड़कना और चमकना नहीं देखा था. झील पहाड़ों को बुला रही थी, इस बार बैल्स डिपार्टमेंटल स्टोर पत्थरों और चट्टानों की तबाह करने वाली ताकतों का शिकार बना. जो लोग राहत कार्य में लगे थे वे खुद फंस गए. मकानों का मलबा, कपड़े के थान, उनके फलों के बोल, टाइयाँ, रेशमी गावतकिए सब इनके साथ-साथ ताल की तलहट पर पहुंच गए मानो अगली जि़न्दगी को आरामदेह बनाने के लिए. 
नैनीताल की यादों में अब भी जीवंत हैं सितंबर 1880 के वे भयावह दिन
मल्लीताल में झील के किनारे घोड़ों के अस्तबल के पास झुर्रीदार चेहरे वाली एक बूढ़ी पत्थरों की छोटी सी कुटिया में अकेले रहती थी. वह घोड़ों की रखवाली करने वाले सईसों को चाय और समोसे बेचकर गुज़र-बसर करती थी. किसी को यह पता नहीं था कि वह हिन्दू है या मुसलमान. कुछ लोगों को उसके जीता-जागता इनसान होने में भी शक था. वह अपने नाती के साथ वहां रहती थी जिससे उसे बड़ी उम्मीदें थीं. बारिश जाने कब से हो रही थी पर उसने छोटी सी एक पेटी में कोयले दहका रखे थे, ज़रूरत पडऩे पर कुछ भी ढूंढऩे को. वह लपटों को भड़काने के लिए फुकनी से हवा कर रही थी- बीच में रुककर अपना सर ज़रा मोड़कर कुछ सुनने की कोशिश करती.
उसके नाती ने पूछा, ''दादी, पहाड़ क्या कह रहे हैं? उसका मानना था कि उसकी दादी सब कुछ जानती है. दादी ने देर तक उसे बहुत प्यार से और कोमलता से देखा. फिर बोली, ''मेरे बेटा, वे यह कह रहे हैं कि अब तुम्हें मुझे छोड़कर भागते हुए तल्लीताल जाना चाहिए जहां तुम्हारे चाचा रहते हैं. बारिश की परवाह करने की ज़रूरत नहीं और न ही कीचड़ की, न अंधेरे से डरने की. चमकती बिजली तुम्हें रास्ता दिखलाएगी और बादलों की गडग़ड़ाहट तुम्हें खतरों से आगाह करेगी.
बिना कुछ सवाल पूछे वह चल पड़ा. तभी ज़मीन कांपी जैसे वह खुशी में झूल रही हो. पुराने पेड़, मकानों से बड़ी चट्टानें लुढ़कती हुई आने लगीं. वे पेड़ जिन्हें अत्रि, पुलश और पुलस्त्य ऋषियों ने हज़ार साल पहले लगाया था. जब मानसरोवर झील का जल वे अपने तपोबल से गंधमादन पर्वत से यहां ले आए थे. चट्टानें शोर के साथ झील की तरफ गरम कीचड़ और मिट्टी को लेकर बढ़ रही थीं अपने मार्ग में आने वाली हर चीज़ के साथ. बुढिय़ा की लकड़ी वाली झोंपड़ी में आग बुझा दी गई. अंधेरे में वह घोड़ों का भयभीत होकर हिनहनाना और पैर पटकना सुन रही थी. नैनीताल का भूगोल रातोंरात बदल गया. नैना देवी का मन्दिर, जहां सती की आँखें तब गिरी थीं जब विष्णु ने शिव के कन्धे पर लदे उसके शव को अपने चक्र से काटा था, ताल में डूब गया, पत्थरों-चट्टानों, मलबे, पेड़ों और मानव शरीर के लोथड़ों के साथ. 17 घोड़े मलबे में फंसे थे और जिस बूढ़ी औरत ने पहाड़ों को बोलते सुना था वह हमेशा के लिए चुप हो गई थी.
***
याद रहे कि नमिता गोखले को अपनी कृति 'Things To Leave Behind' के लिए ही साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. यही कृति हिंदी में 'राग पहाड़ी' नाम से प्रकाशित हुई. 'राग पहाड़ी' का देशकाल, उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर बीसवीं सदी से पहले का कुमाऊं है. कहानी शुरू होती है लाल-काले कपड़े पहने ताल के चक्कर काटती छह रहस्यमय महिलाओं की छवि से जो किसी भयंकर दुर्भाग्य का पूर्वाभास कराती हैं. इन प्रेतात्माओं ने यह तय कर रखा है कि वह नैनीताल के पवित्र ताल को फिरंगी अंग्रेजों के प्रदूषण से मुक्त कराने की चेतावनी दे रही हैं. 
इसी नैनीताल में अनाथ तिलोत्तमा उप्रेती नामक बच्ची बड़ी हो रही है. जिसके चाचा को 1857 वाली आज़ादी की लड़ाई में एक बाग़ी के रूप में फांसी पर लटका दिया गया था. कथानक तिलोत्तमा के परिवार के अन्य सदस्यों के साथ-साथ देशी-विदेशी पात्रों के इर्द-गिर्द भी घूमता है जिसमें अमेरिकी चित्रकार विलियम डैम्पस्टर भी शामिल है जो भारत की तलाश करने निकला है. तिलोत्तमा गवाह है उस बदलाव की जो कभी दबे पाँव तो कभी अचानक नाटकीय ढंग से अल्मोड़ा समेत दुर्गम क़स्बों, छावनियों और बस्तियों को बदल रहा है, यानी एक तरह से पूरे भारत को प्रभावित कर रहा है. 
परम्परा और आधुनिकता का टकराव और इससे प्रभावित कभी लाचार तो कभी कर्मठ पात्रों की जि़न्दगियों का चित्रण बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से इस उपन्यास में किया गया है जिसका स्वरूप 'राग पहाड़ी' के स्वरों जैसा है. चित्रकारी के रंग और संगीत के स्वर एक अद्भुत संसार की रचना करते हैं जहां मिथक-पौराणिक, ऐतिहासिक-वास्तविक और काल्पनिक तथा फंतासी में अन्तर करना असम्भव हो जाता है. यह कहानी है शाश्वत प्रेम की, मिलन और विछोह की, अदम्य जिजीविषा की.
***
पुस्तकः राग पहाड़ी ( मूल पुस्तक:  Things To Leave Behind)
लेखक: नमिता गोखले
अनुवादक: पुष्पेश पंत
भाषा: हिंदी
विधा: उपन्यास 
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्य: ₹199.00

 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement