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बुक कैफे में 'शंख पर असंख्य क्रंदन' | डॉ सुनीता के कविता-संग्रह पर जय प्रकाश पाण्डेय

प्रेम, प्रकृति और स्त्री सुनीता की कविताओं का मूल स्वर है. जिनके बीच जीवन की आपाधापी, समय और स्थान इतनी सहजता से आते हैं कि पाठक विस्मित हो जाता है और कई बार स्तब्ध भी....साहित्य तक के बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' में सुनिए डॉ सुनीता के कविता-संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' पर वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय की राय

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साहित्य तक बुक कैफे में डॉ सुनीता के कविता-संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' की समीक्षा
साहित्य तक बुक कैफे में डॉ सुनीता के कविता-संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' की समीक्षा

घूम आती है अंतरिक्ष में
नापते हुए बादलों के रेशे
पोर-पोर दुखता है
फिर भी
मुस्कुराते हुए अनुभव करती है
हमारे अंदर भी एक भूमंडल है
जिसमें आकार पाते हैं भ्रूण
बाद में परिवर्तित हो जाते हैं
एक विशाल वृक्ष और भूगोल में... ये काव्य पंक्तियां हैं डॉ सुनीता की, कविता का शीर्षक है 'वह एक स्त्री' और संग्रह है 'शंख पर असंख्य क्रंदन'. कवयित्री संग्रह के मुखबंध में लिखती हैं- कविता कवि के हृदयगान की अभिव्यक्ति है. दुःख-सुख, योग-वियोग, प्रेम-विरह, युद्ध-शांति, संघर्ष, उत्थानपतन, सद्भावना, संवेदना और पक्ष-प्रतिपक्ष के सूक्ष्म व बिंबात्मक चित्रण का नाम ही जीवंत कविता है. कवि दृष्टि ही कविता की प्राणवायु है. कविता आलोचनात्मक, समालोचनात्मक और विवेचनात्मक दृष्टि को पल्लवित, पोषित और पुष्पित करती है... सुनीता की कविताएं उनकी बातों और जीवन की तरह से ही सभी कसौटियों पर खरी उतरती हैं. 
लेकिन अगर ध्यान से देखें तो प्रेम, प्रकृति और स्त्री सुनीता की कविताओं का मूल स्वर है. जिनके बीच जीवन की आपाधापी, समय और स्थान इतनी सहजता से आते हैं कि पाठक विस्मित हो जाता है और कई बार स्तब्ध भी. जीवन की इन सच्चाइयों को डॉ सुनीता 'उठने और गिरने के बीच' कविता में बहुत विस्तार से पिरोती हैं. बानगी देखें -
उठने और गिरने के बीच
एक महीन लकीर
लगभग दो-चार या डेढ़ इंच की
शायद पूरे खुले आस्मां
और धर्ती के बरअक्स...
उसे पकड़ने के लोभ में
लुट गए उसके अपने अस्तित्व और संघर्ष के स्वर
स्थान ले लिया चौंधियाती
चमक बिखेरती ट्राफ़ियों के डिब्बों ने... 
दरअसल साहित्य, समाज, राजनीति और वैश्विक दुनिया के मध्य कथा, कविता, लेख, निबंध, सृजनात्मक, आलोचना एवं सोलो ट्रैवलिंग के लिए ख्यात डॉ सुनीता मूलतः उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के उस नौगढ़ इलाके की हैं, जिसका वन-प्रांतर एक साथ आधुनिकता और नकसलवाद के बीच पीस कर कराह सा रहा है. कवयित्री की स्मृतियों में उसकी माटी का दुख 'जंगलों में घुला ज़हर' कविता में साफ झलकता है. वह सर्जती हैं- 
जब-जब नौगढ़ के घने जंगल
मेरी स्मृतियों में उगते हैं
अचानक सतपुड़ा के जंगलों की याद हो उठती है.
जहां ख़ुद को टहलते हुए पाती
और यह सोच रही होती कि-
बीहड़ की ख़ूबसूरती को किसकी नज़र लग गई...
ऐसा नहीं है कि कवयित्री की नज़र केवल उसके गांव पर है. बल्कि दिल्ली, जो आजकल उसका नगर है, उसके अतीत, इतिहास, सभ्यता और वर्तमान को भी वह अपने कवि मन से टटोलती हैं और 'सदियों से खड़ी मैं दिल्ली' शृंखला की कुल बीस कविताओं में 'मैं दिल्ली' शीर्षक से व्यक्त करती हैं. इस कड़ी की पहली कविता 'सदियों से 'सन त्जू' के बुक 'द आर्ट ऑफ़ वॉर' के आलोक में...' से शुरू होती है तो बीसवीं कविता की आखिरी पंक्तियां हैं- 'मैं दिल्ली अब खामोश खड़ी होती हूं'.
सुनीता शिक्षा, साहित्य, कला के विविध पक्षों के प्रति सजग हैं. स्त्री-शिक्षा के प्रचार-प्रसार में कटिबद्ध एवं संवेदनशील रहते हुए वे ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश लड़कियों की शिक्षा, सजगता व जागरूकता अभियान का हिस्सा रहीं हैं. उन्हें इन इलाकों की लड़कियों के जीवन संघर्षों का बखूबी भान है. तभी तो संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' का कृति-समर्पण उनके इस वाक्य से होता है- 'भूमंडल की स्त्रियों संग, वक़्त और संघर्ष को, जिसने उड़ान को ईंधन दिया.' केवल इतना ही नहीं संग्रह की पहली ही कविता में उनके इस समर्पण के पीछे छिपे भावों की बानगी दिख जाती है. 'दोपहर में कोरस' शीर्षक वाली कविता की पंक्तियां देखिए-
जब पहली बार रखा था घर से बाहर कदम
वह जून की तपती दोपहरी थी
ऊंचे पर्वत, नीला आकाश और लहराता सागर
बांह पसारे हरी-हरी वसुंधरा मनुहार करती विविध भाषा में
सपनों में नहीं साक्षात थे यह सब....
इस संग्रह से पहले जब डॉ सुनीता का कहानी संग्रह 'सियोल से सरयू' वाणिका प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया था, तब भी साहित्य तक के लिए उसकी चर्चा करते हुए इन पंक्तियों के लेखक ने लिखा था, "इन कहानियों की शैली अलग है और कथ्य भी अनूठा. प्रकृति यहां प्रेम में आकंठ डूबी है, आधुनिकता और मान्यताओं के तमाम अतिक्रमणों के बावजूद. 'सियोल से सरयू' संग्रह की कहानियां एक अलग तरह के पाठ की मांग करती हैं." उनके इस संग्रह को पढ़ते हुए भी यही लगता है. तभी तो 'कुछ ऐसा लिख' कविता में सुनीता सर्जती हैं -
समय जब लिख रहा हो
बंटवारे की चिट्ठी
उससे कह देना
करुणा के बजाय कहन का ख़याल रखे
कहना कि कुछ ऐसा लिखे
कि बस दुनिया बदल जाए...
दुःख और संघर्ष के तमाम अवयवों और दुश्वारियों के बीच जीते कवि की अपने समय के मनुष्यों को यह सीख देना ही शायद डॉ सुनीता को अपने समकालीनों से अलग करता है. कथा संग्रह 'सियोल से सरयू' में अपनी कहानियों को लेकर उनके भाव यों हैं- "फूलों की सफ़ेद पंखुड़ियां उसके कपोलों पर ऐसे डोलती हैं, जैसे किसी प्रेमी के पीठ पर प्रेमिका की अंगुलियां मकरंदी नृत्य करती हैं. मुझे उसका नाम अचानक से याद नहीं आ रहा है. वैश्विक देह दृष्टि के दौर में दर्द का विषय बनाया जाना वर्तमान की जरूरत, असमानता के बीच अस्मिता की मांग मुश्किल है, बावजूद यही श्रेयस्कर है. नागरिकता का सवाल निज दुख से अधिक पर दुख कातरता है. संघर्ष के पंख ख्वाहिशों के बन्दरगाह हैं, जो सिखाते हैं कि हालात जैसे भी हों उसे क़ुबूल करना कहानी की तक़दीर होती है..."
हिंदी सहित अन्य बोलियों और भाषाओं में शोधरत डॉ सुनीता सतत जिज्ञासु और शोधार्थी हैं. पूर्वांचल एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से नेट व पीएच.डी. धारी सुनीता की शोधात्मक पुस्तक 'शोषण में हिस्सेदारी' 2017 में ही प्रकाशित हुई थी. 
संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' की आखिरी कविता 'कला' पर इसी शीर्षक से है, जिसकी पंक्तियां हैं-
राजनीति को 'कला' की संज्ञा दी जानी चाहिए
कुछ लोग दोस्ती में राजनीति करते हैं 
तो कुछ राजनीति में दोस्ती.
दरअसल कला कोई भी हो
साधना की मांग करती है.
बात जब मनुष्य तोड़ने-जोड़ने की होती है
तब यह बग़ैर साधना संभव नहीं...
वाकई अगर इस संग्रह को अपने समय का एक जागरूक स्त्री की नज़र से देखा गया दस्तावेज कहें, तो कुछ गलत नहीं होगा. संग्रह में कविताओं के अनुक्रम से पहले इन पंक्तियों पर रुके बगैर नहीं रहा जा सकता- 
जब वे पैदा हुए, तब शंख असंख्य बजे
लेकिन जब वो पैदा हुई तब
चूल्हे पर रखे बटुआ के अदहन की आग बुझा दी गई
मुंडेर पर पंगत लगाए पक्षियों को हांक दिया गया
सच है कि बेघर इंसान महाकाव्य परिवर्तन नहीं करता
बावजूद बिन अवसर सत्ता की अंगीठी भी तो नहीं धधकती है...
वाकई कवयित्री डॉ सुनीता उम्दा रचनाओं के लिए बधाई की पात्र हैं. आप इस संग्रह को खरीद कर पढ़ें, उससे पहले 'शंख पर असंख्य क्रंदन' शीर्षक वाली यह कविता, जिस पर संग्रह का नाम भी है, की चंद पंक्तियां, जो पूरे संग्रह की बानगी देने के लिए पर्याप्त हैं, को भी पढ़ें, क्योंकि इनके मर्म को समझते हुए इन्हें यहां रखने का मोह मैं छोड़ नहीं पा रहा-
'यह कविता नहीं
बिम्ब, प्रतीक व वेदना की मुनादी
और नए पैरहन के नाम
मिथ के माथे पर लिखा इतिहास है...' 
वाकई ऐसा ही है. सुनिए बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय द्वारा डॉ. सुनीता के कविता-संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' पर की गयी टिप्पणी. अद्विक प्रकाशन से प्रकाशित इस कृति में कुल 51 कविताएं हैं. 156 पृष्ठों के इस संग्रह का मूल्य 240 रुपए है. 
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# डॉ. सुनीता के कविता-संग्रह 'शंख पर असंख्य क्रंदन' के प्रकाशक हैं अद्विक प्रकाशन. कुल 51 कविताओं और 156 पृष्ठों के इस संग्रह का मूल्य है 240 रुपए.

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