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बुक रिव्यू: दाम्पत्य जीवन की सतरंगी छटा बिखेरती कुछ लाजवाब कहानियां...

कुछ अहम रिश्तों पर आधारित नामचीन रचनाकारों की कहानियों का संग्रह राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

रिश्तों पर आधारित कहानियों का बेजोड़ संग्रह रिश्तों पर आधारित कहानियों का बेजोड़ संग्रह

किताब: दाम्पत्य: कहानियां रिश्तों की
संपादक: संजीव कुमार
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
कीमत: 150 रुपये (पेपरबैक)

हमारे समाज में रिश्तों को जितनी मजबूती और आत्मीयता हासिल है, वह एकदम अन्यतम है. यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर खुद को बेहतर तरीके से जानना-समझना हो, तो रिश्तों की पड़ताल करना बेहद जरूरी हो जाता है. इसी तरह किसी समाज या देश की कामयाबी का आंकलन करना हो, तो वहां रिश्तों की डोर की मजबूती जांचना एक जरूरी कदम हो जाता है. यानी अगर रिश्ते नहीं, तो कुछ भी नहीं.

कुछ अहम रिश्तों पर आधारित नामचीन रचनाकारों की कहानियों का संग्रह राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. वैसे तो हर अच्छी कहानी किसी न किसी इंसानी रिश्तों की बुनियाद पर ही रची जाती है. यहां ऐसी कहानियों के संकलन में किसी खास रिश्ते को आधार बनाया गया है, जैसे- दांपत्य, मां, पिता, सहोदर, दादा-दादी-नाना-नानी, दोस्त, परिवार आदि.

रिश्तों के सबसे चटख रंग ‘दांपत्य’ में भी दिल को छू लेने वाली ढेरों कहानियां हैं. जैनेन्द्र कुमार की कहानी ‘पत्नी’ भारतीय समाज की उस नारी के दर्शन कराती है, जो दिल में तमाम तकलीफें समेटकर भी पति को परमेश्वर का दर्जा देती है:

'सुनंदा के जी में ऐसा हुआ कि हाथ की बटलोई को खूब जोर से फेंक दे. किसी का गुस्सा सहने के लिए वह नहीं है. उसे तनिक भी सुध न रही कि अभी बैठे-बैठे इन्हीं अपने पति के बारे में कैसी प्रीति की और भलाई की बातें सोच रही थी. इस वक्त भीतर-ही-भीतर गुस्से से वह घुटकर रह गई.'

कुछ ही पलों में पतिदेव के लिए मन कैसा निर्मल हो जाता है:

'...पर वह रह-रहकर अपने को स्वयं अपमानित कर लेती हुई कहती है कि छि: छि: सुनंदा...तुझे तो खुश होना चाहिए कि उनके लिए एक रोज भूखे रहने का तुझे पुण्य मिला...'

रवींद्र कालिया की कहानी ‘नौ साल छोटी पत्नी’ में एक ऐसी जीवन संगिनी की झलक मिलती है, जो कम उम्र के अल्हड़पन में दिल किसी और से लगा बैठती है, जबकि बाद में उसकी शादी किसी और हो जाती है. अतीत के ख्वाबों पर दांपत्य का रिश्ता बीस बैठता है:

'तृप्ता, जो धीमे-धीमे सुबक रही थी, फफककर रोने लगी और उसकी हिचकी बंध गई...कुशल खाट के निकट पड़े ट्रंक पर बैठ गया और खुले ताले से खेलने लगा...उसे लग रहा था, तृप्ता का रोना बिलकुल जायज है.’

इसी तरह मोहन राकेश की कहानी ‘एक और जिंदगी’, मन्नू भंडारी की ‘तीसरा आदमी’, काशीनाथ सिंह की ‘आखिरी रात’, ज्ञानरंजन की रचना ‘दाम्पत्य’ हमारे समाज की नारी के विविध रूपों को बखूबी सामने रखती है. अन्य रचनाकारों की कहानियां भी इस रिश्ते की गर्माहट का एहसास कराते हैं.

कुल मिलाकर, कहानियों का यह संग्रह अपने-आप में बेजोड़ है. कीमत के लिहाज से भी यह बेहद किफायती है, जेब पर भारी गुजरने का सवाल ही नहीं है. अंतत: कहना होगा कि यह एक ऐसी किताब है, जो एक बार हाथ में आ जाने के बाद एक सांस में ही पूरा पढ़ डालने की तीव्र इच्छा जगाती है.

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