scorecardresearch
 

प्रकाश मनु की शख्सियत में गहरे डूबने की ललक

प्रकाश मनु का वैचारिक फलक और साहित्यिक अवदान बहुत भव्य और विराट है. साहित्य की शायद ही कोई विधा हो जो मनु जी के हाथों में आकर गौरव के साथ फली-फूली और गतिमान न हुई हो.

X
प्रकाश मनु और उन पर केंद्रित साहित्यिक पत्रिका प्रकाश मनु और उन पर केंद्रित साहित्यिक पत्रिका

प्रकाश मनु का वैचारिक फलक और साहित्यिक अवदान बहुत भव्य और विराट है. साहित्य की शायद ही कोई विधा हो जो मनु जी के हाथों में आकर गौरव के साथ फली-फूली और गतिमान न हुई हो. मनु की लेखनी परंपरागत ढर्रे से बिल्कुल अलग लीक बनाकर चलती है. इन्हें सादगी और सहजता जीवन में और लेखन में प्राणों सी प्रिय है. शांत, सौम्य, स्नेहिल, मृदुलभाषी मनु जी हर प्रकार के दिखावे-प्रदर्शन से दूर रहते हैं. यहां तक कि सभा, सेमिनार और गोष्ठियों के आयोजन से भी बचते हैं. अपने और दूसरों के किए कार्य का श्रेय कभी नहीं लेते. सम्मान लेने की अपेक्षा देने में विश्वास रखते हैं, इससे बढ़कर और बड़प्पन क्या हो सकता है.
प्रकाश मनु के हृदय में अपने अग्रजों और अनुजों के प्रति जो स्नेह, बड़प्पन और कृतज्ञता है, वह अद्भुत है. दुनियावी बौद्धिकता और दिखावा इन्हें छू भी नहीं पाया है. इनके हृदय की भीतरी तहों से निकला एक-एक शब्द इनके व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन के अनुरूप है. मनु सौभाग्यशाली हैं कि इन्हें देवेंद्र सत्यार्थी, शैलेश मटियानी, विष्णु खरे और रामदरश मिश्र जैसे महामानवों का सानिध्य मिला है. और हम भी कम सौभाग्यशाली नहीं हैं, क्योंकि हमें मनु मिले हैं. इनकी मृदुल वाणी, उदात्त भावना और पवित्र कर्म हर किसी को अपना बनाने का जादू रखते हैं. 
बाल साहित्य को लेकर जो काम मनु ने किया है, उससे इनका नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा. इन्होंने उपेक्षित और सहज माने जाने वाले बाल साहित्य को विमर्श की मुख्यधारा में शामिल ही नहीं करवाया, बल्कि उसमें भाव और शिल्प संबंधी नए-नए प्रयोग, नवाचार और विषय की विविधता से जोड़कर इसे बहुआयामी बनाया है. इसीलिए 'सोच-विचार' साहित्यिक और पारिवारिक मासिकी का एक अंक प्रकाश मनु पर केंद्रित होने के कारण बहुत विशेष हो गया. यह अंक जब मिला तब आंखों में चमक, हृदय में गुदगुदी और मन में तुरंत पढ़ने की उत्सुकता जागी. मुखपृष्ठ पर प्रकाश मनु का मंद-मंद मुस्कुराता और चिंतनशील चित्र मन को भा गया. संपादक-द्वय जितेंद्रनाथ मिश्र और नरेंद्रनाथ मिश्र तथा अतिथि संपादक वेदमित्र शुक्ल के प्रयासों से पत्रिका और मनु का कद और ऊंचा हुआ है. पत्रिका के अंतःलोक में जब हम उतरते हैं, तो जो पाते हैं, आइए उसकी चर्चा करते हैं. 
'मैंने किताबों से एक घर बनाया है' आत्मकथ्य में मनु ने एक तरह से अपनी जीवन-कथा कही है. मोटे तौर से कॉलेज के दिनों से शुरू करते हुए वे कुरुक्षेत्र तक पहुंचते हैं, जहां वे केवल शोध ही नहीं करते, बल्कि स्वयं को भी साधते हैं. वे साहित्य और समाज में अपना एक अलग मुकाम बनाते हैं और अपने अंदर के सर्जक को बाहर की दुनिया से रूबरू कराते हैं. 'नंदन' के संपादन काल में वे फरीदाबाद पहुंचते हैं. इसी बीच इनके अंदर और बाहर बहुत सारी चीजें, रचनाएं, संबंध और अनुभव सुगढ़ आकार पा चुके थे. अब वे चंद्रप्रकाश विग से प्रकाश मनु बन चुके थे. देखा जाए तो एम.एस-सी. पास करके एम. ए. हिंदी और साहित्य का दामन थामना बहुत बड़ा जोखिम भरा कार्य था. लेकिन मन के अंदर छिपे प्रकाश और ऊर्जा ने इन्हें उस मुकाम तक पहुंचाया, जिसके लिए ये बने थे.
संस्मरण खंड में पहला संस्मरण 'कुछ यादें खट्टी-मीठी' सुनीता जी का है. हालांकि सुनीता और मनु की प्रारंभिक कहानी किसी फिल्म जैसी रोमांचक है, पर यहां सूझ-बूझ है, विवेक है, गुण, स्वभाव और कार्य की साम्यता है. एक-दूसरे के प्रति सच्चा प्रेम, विश्वास और समर्पण है. इन खट्टी-मीठी यादों से ही उनका जीवन सार्थक और साकार बना है. सुनीता बहुत ही सहज भाव से जीवन में आए उतार-चढ़ाव को, संघर्षों को और सुखद स्मृतियों को सुंदर ढंग से साझा करती हैं. 
'आत्मीयता का स्पंदन' महसूस करते हुए रामदरश मिश्र ने मनु के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं से परिचय कराया है. जैसे गिरिजाकुमार माथुर सम्मान लेते समय ये बहुत हिचकिचाए थे, क्योंकि इन्हें लगता था मुझसे योग्य साहित्यकार और भी हैं, जिन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए. मनु पुरस्कार की राशि को घर नहीं ले गए, बल्कि उसे साहित्य के उत्थान में ही लगा देते हैं. इन्होंने देवेंद्र सत्यार्थी और शैलेश मटियानी जैसे श्रेष्ठ और विस्मृत साहित्यकारों की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया. इन्होंने बहुत गहराई से इनके ऊपर लिखा और दूसरों से भी खूब लिखवाया. इसके साथ ही मिश्र मनु को बहुत ही आत्मलीन और ईमानदार लेखक बताते हैं. वे अपनी और दूसरों की कमियों को छिपाते नहीं, बल्कि सहज बेबाकी से बता देते हैं.
'सतत बहता सोता: प्रकाश मनु' संस्मरण में सूर्यनाथ सिंह मनु को नए-नए लेखक सिरजने वाला साहित्यकार बताते हैं, जिन्होंने अपने प्रोत्साहन से अनेक लेखकों को लेखन के गुर सिखाए हैं. अच्छा करने पर नए लेखकों की प्रशंसा करते हैं. प्रकाश मनु धुन के पक्के हैं और डूबकर लिखने वाले लेखक हैं. एक बार जो ठान लेते हैं, बस दिन-रात उसी में लग जाते हैं. इसी क्रम में 'डॉ मनु जिन्हें मैं जानता हूं' (अनिल जायसवाल), 'मुलाकात पत्थरों के जंगल में एक शब्द-ऋषि से' (जयप्रकाश पांडेय), 'उनकी कलम में बड़ी शक्ति है' (प्रभात कुमार) और 'उनके भीतर पालथी मारे अधकू बैठा है' में देवेंद्र कुमार मनु को बहुत ही अलहदे और आत्मीय अंदाज में याद करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को रेखांकित करते हैं. 'नंदन' पत्रिका के वरिष्ठ सहयोगी देवेंद्र 1986 की पहली मुलाकात के साथ-साथ उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंगों को साझा करते हैं. सविता सिंह अपने संस्मरण में उन्हें ज्ञान, चेतना और प्रेरणा देने वाला बड़ा साहित्यकार बताती हैं. मनु के उपन्यासों से उन्हें बहुत बड़ा संबल मिलता है, विशेषकर 'पापा के जाने के बाद' उपन्यास से. 
'कहानी के लिए दीवानगी शुरू से ही थी!' साक्षात्कार में श्याम सुशील ने मनु से खुली बातचीत में विविध विषयों के संदर्भ में बहुत ही सार्थक और गंभीर प्रश्न उठाए हैं. कथा साहित्य, बाल साहित्य की सार्थकता, पहचान, विविध रचनाओं की सृजन-भूमि, रचनाधर्मिता और रचना-प्रक्रिया से जुड़े मनु के उतने ही सम्यक जवाबों से यह साक्षात्कार लाजवाब बन पड़ा है. एक प्रश्न के जवाब में मनु जी बहुत सुंदर बात कहते हैं, "मेरी कहानियां शुरू से ही औरों की कहानियों से कुछ अलग लीक पर चलती रही हैं...उन्हें एक तरह की आत्मकथात्मक कहानियां तो कह सकते हैं, पर आत्मकथा वे नहीं है." मनु की प्रतिनिधि कविताएं, बाल कविताएं, 'एक सुबह का महाभारत' (कहानी) और 'एक स्कूल मोरों वाला' (बाल कहानी) के प्रकाशन से पत्रिका की गरिमा और सौंदर्य में चार चांद लग गए हैं.
विमर्श के अंतर्गत पहला लेख उनके इतिहास पर केंद्रित है (हिंदी बाल साहित्य का प्रथम इतिहास- अशोक बैरागी). बाल साहित्य का इतिहास लिखकर मनु ने जो ऐतिहासिक कार्य किया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है. यह 'समुंद्र मंथन' जैसा विराट कार्य था. मनु जैसा मौलिक प्रतिभावान, धीर-गंभीर स्वाध्यायी और कुशल शिल्पी ही ऐसा कर सकता था. बाल साहित्य के क्षेत्र में यह इतिहास ग्रंथ इस सदी की महानतम उपलब्धि है. हिंदी साहित्य के इतिहास में जो स्थान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है, बाल साहित्य के इतिहास में वही स्थान मनु का है, क्योंकि इस दिशा में यह पहला और अकेला बड़ा काम है. गिरधर राठी का आलेख 'प्रकाश मनु: सदाशय पारदर्शिता' में वे मनु के संपूर्ण लेखन को ऐतिहासिक महत्त्व वाला बताते हुए कहते हैं कि, उनके कार्य की गुरुता और महत्त्व को भविष्य उत्तरोत्तर पहचानेगा. प्रियदर्शन मनु के काव्य संग्रह 'छूटता हुआ घर' की कविताओं को लेकर विचार-विमर्श करते हैं. उनमें छिपी रचनात्मक ऊर्जा, संवेदना और उनके मर्म को वे बड़ी संजीदगी से महसूस करते हैं.
'कथा कहने का निराला अंदाज' में चुकी भाटिया 'गोलू भागा घर से' उपन्यास की बहुत ही सारगर्भित और संतुलित समीक्षा प्रस्तुत करती हैं. वे उपन्यास में वर्णित बाल मनोविज्ञान को पकड़ने का प्रयास करती हैं. साथ ही गोलू के घर से भागने के कारणों की भी पड़ताल करती हैं. नमिता शुक्ल 'कुक्कू के प्रकाश मनु बनने की कहानी' की समीक्षा करती हैं और मनु के बचपन से जुड़े कोमल और भावपूर्ण प्रसंगों का स्मरण कराती हैं. 'रंग-बिरंगे खिलौनों जैसे हैं प्रकाश मनु के बाल नाटक' आलेख में पिंकी बिरला ने मनु के बाल नाटकों का तात्त्विक और मूल्यगत विश्लेषण किया है. लेख से स्पष्ट होता है कि ये नाटक सामाजिकता, नैतिकता, राष्ट्रीयता, हास्य-विनोद और पर्यावरण चेतना जैसे मूल्यों लबालब भरे हैं. साथ ही इनमें बाल मन की सी कल्पना शक्ति व सृजनात्मकता है. पिंकी ने बड़ी सुंदर बात कही है, "मनु जी के बाल नाटकों के केंद्र में स्वयं बच्चे हैं, जो लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं. इन नाटकों में हास्य-विनोद, खिलंदड़ापन, मनोरंजन व बालकों की समस्याएं, उलझनें हैं, तो उनका अबोध मन भी, जो इन सभी उलझनों से मुक्त होने के लिए छटपटाता है. ये बाल नाटक बच्चों को खेल-खेल में सीख भी देते हैं." नाटक आधारित इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मनु ने ऐतिहासिक, परंपरागत और नवाचारों पर आधारित नाटक लिखे हैं, जिनमें बच्चों की रचनात्मकता का कैनवस बहुत विस्तृत है. नाटकों के पात्र ठीक मनु के व्यक्तित्व की तरह अबोध, स्नेही और प्यार बांटने वाले हैं. ये गलत का विरोध भी कटुतापूर्वक नहीं करते, बल्कि विरोध का इनका अपना ही एक अलग अंदाज है. नाटकों की भाषा काव्य जैसी सरस और कलात्मक है. इनकी नाटकीयता और रोचकता विलक्षण है. 
'बच्चों के मानस के कथाकार प्रकाश मनु' लेख में प्रीति प्रसाद मनु के बाल उपन्यासों का गंभीर और सम्यक विश्लेषण करती हुई उनके पात्रों की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित करती हैं, तो दूसरी ओर मंजूरानी जैन मनु की कहानियों को 'जिंदगी को सही मायने देने वाली मर्मस्पर्शी कहानियां' बताती हैं. 'तुम याद आओगे लीलाराम' की अधिकांश कहानियां वंचित, असहाय और पीड़ित लोगों के दारुण कष्टों की कहानियां हैं. ये कहानियां मनु के संघर्ष भरे दिनों की झलक दिखलाती हैं. मंजुरानी इन कहानियों की तह में छिपे मर्म, संदेश और कौशल को पाठकों के सामने रखती हैं. 
'कविता के शिल्प वाला कथाकार' में राजेंद्र भट्ट भी विभिन्न कहानियों के प्रेरणास्रोत और मूल्यों पर बड़ी आत्मीयता से लिखते हैं. 'प्रकाश मनु: आइए पढ़ें खुली किताब' में शकुंतला कालरा मनु की आत्मकथा के माध्यम से उनके जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पक्षों और स्मृतियों को पाठकों के सामने रखती हैं. 'पंचनद सरीखा प्रकाश मनु का काव्य-संसार' में विनायक 'सृजन मूल्यांकन' में प्रकाशित मनु की कई महत्त्वपूर्ण कविताओं पर बहुत मूल्यवान और आत्मीयता से टिप्पणी करते हैं. 'गहन संवेदना से भरे प्रकाश मनु के उपन्यास' लेख में शिवरानी मनु के उपन्यासों की तह में सहेजे गए संवेदनात्मक मूल्यों को स्पष्ट करती हैं. और हां, विभिन्न लेखों के बीच में आए हँसी-खुशी, संवेदना और सरोकारों वाले हँसते-खिलखिलाते चित्र जहां पुरानी स्मृतियों को तरोताजा करते हैं, वहीं मनु जी के व्यक्तित्व और कृतित्व में और गहरे में डूबने की ललक पैदा करते हैं. 
'सोच-विचार' में संकलित मनु की प्रतिनिधि रचनाओं, आत्मकथ्य तथा विभिन्न साहित्यकारों के संस्मरण और विमर्श आधारित लेखों में मनु के व्यक्तित्व और कृतित्व का सूक्ष्म और सम्पूर्ण विश्लेषण पूरे मन से किया गया है. इसके लिए सभी लेखक बधाई के पात्र हैं. लेकिन मनु अपने आप में विचार और संस्कार के विशाल संस्थान हैं, जिसका कोई न कोई पक्ष अछूता रह भी सकता है. वैसे मेरे विचार से इस विशेषांक में देवेंद्र सत्यार्थी, शैलेश मटियानी, विष्णु खरे, रामविलास शर्मा और रामदरश मिश्र से जुड़े संस्मरण, साक्षात्कार या फिर संवाद करती हस्तलिखित चिट्ठी-पत्र शामिल किए जाने चाहिए थे. पर हो सकता है पृष्ठ संख्या को लेकर कोई सीमा रही हो.
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि 'सोच-विचार' का यह विशेषांक अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है.

# साहित्य आजतक के लिए यह लेख डॉ अशोक बैरागी ने लिखा है. संपर्कः डॉ अशोक बैरागी, हिंदी प्राध्यापक, राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, हाबड़ी, तहसील पुंडरी, जिला कैथल (हरियाणा), पिन-136026, मो- 9466549394

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें