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अरे 'रामभक्त रंगबाज' का फसाना तो हकीकत जैसा है

राकेश कायस्थ 'आरामगंज' के बहाने 'रामभक्त रंगबाज' में आज के दौर के क्रूर माहौल, मासूम आस्था और शातिर सियासत पर सवाल खड़े करते हैं.

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राकेश कायस्थ के रामभक्त रंगबाज आवरण चित्र राकेश कायस्थ के रामभक्त रंगबाज आवरण चित्र

है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद...
लिखने वाले अल्लामा इक़बाल हों
या  
मैं राम पर लिखूं मेरी हिम्मत नहीं है कुछ
तुलसी ने बाल्मीकि ने छोड़ा नहीं है कुछ
फिर ऐसा कोई ख़ास कलम वर नहीं हूं मैं
लेकिन वतन की ख़ाक से बाहर नहीं हूं मैं... लिखने वाले शम्स मीनाई, राम सदियों से सभी के लिए भक्ति और आस्था के अवलंबन रहे हैं. भक्त शिरोमणि कवि तुलसी दास की तो बात ही निराली है. उनका समस्त जीवन ही अपने आराध्य श्री राम को समर्पित था. अपनी सगुण भक्ति के चलते उन्होंने श्रीरामचरित मानस सहित अनेकों ग्रंथ रचे और आजीवन अपने स्तुत्य के शरणागत रहे. तुलसी के श्री राम केवल अनाथों के नाथ भर नहीं, बल्कि आधारक, उद्धारक, भक्त वत्सल, मर्यादा पुरुषोत्तम और तीनों त्रैलोक्य के स्वामी हैं. ऐसा स्वामी जो प्रजा पालक है, आदर्श है. वह जितना नागर है, उतना ही वनवासी भी. वह किसी का हाथ नहीं छोड़ता, साथ नहीं छोड़ता. कभी कर्तव्य और मर्यादा से च्युत नहीं होता. जिनके स्मरण मात्र से, नाम जप से ही जीव; जगत से उद्धार पा जाता है. तुलसी लिखते हैं-
निरगुन तै एहि भांति बड़, नाम प्रभाउ अपार
कहेउं नामु बड़ राम तै, निज विचार अनुसार...
आश्चर्य कि गोस्वामी जी की मान्यता और इस दोहे में भी राम 'केवल हिंदुओं' के भगवान नहीं दिखते. वह तो कण-कण में बसने वाले, हर हृदय में धड़कने वाले राम हैं. दूसरे संत कवि और निर्गुण ब्रह्म के उपासक कबीर दास की तो बात और भी निराली है. घट-घट वासी राम की सर्वव्यापकता को लेकर वह लिखते हैं-
एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा.
एक राम का सकल पसारा, एक राम त्रिभुवन से न्यारा.
तीन राम को सब कोई ध्यावे, चतुर्थ राम का मर्म न पावे.
चौथा छाड़ि जो पंचम ध्यावे, कहे कबीर सो हम पर आवे... सवाल उठता है कि फिर राम का नाम ऐसा कैसे हो गया कि वह लोगों के अहंकार तुष्टि, भेदभाव, वर्चस्व, हिंसा, घृणा और लोगों को चिढ़ाने की वजह बन गया? 'राम-राम' और 'जय-जय सियाराम' वाले समाज में 'जय श्रीराम' के भेद से उठे सवालों के जवाब ढूंढता है राकेश कायस्थ का नया उपन्यास 'रामभक्त रंगबाज'. यह उपन्यास बताता है कि जिस राम की आधारभूमि ही भक्ति, दयालुता, मनुष्यता, करुणा, संवेद्ना और सहयोग है; जो राम न जाने किस काल से हमारी कला, संस्कृति, साहित्य और सभ्यता के केंद्र में हैं, उन्हीं के नाम पर हमारा समाज बिखर क्यों रहा है, भाईचारे का धागा क्यों खुल रहा है? और अपने इस अवतार में राजनीति से विमुख रहने वाले तारणहार राम राजनीति के केंद्र में कैसे आ गए?
राकेश कायस्थ 'आरामगंज' के बहाने 'रामभक्त रंगबाज' में आज के दौर के क्रूर माहौल, मासूम आस्था और शातिर सियासत पर सवाल खड़े करते हैं. पूरा उत्तर भारत न भी कहें तो बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान का कोई भी बड़ा कस्बा इस उपन्यास का आरामगंज, या आरामगंज जैसा हो सकता है, जहां कदम रखते ही आप समकालीन इतिहास की उन पेंचदार गलियों में खो जाते हैं, जिसमें एक युवा मुस्लिम नायक राम का नाम लेते हुए न केवल जीता है, बल्कि मारा भी जाता है. इस उपन्यास में वह बताते हैं कि आरामगंज के सामाजिक तानेबाने में मासूम आस्था की हवा में शातिर सियासत इस तरह घुसपैठ करती है कि सांप्रदायिकता ही इसके आसमान को लाल और धरती को न केवल लहुलुहान करती है, बल्कि कभी न टूटने वाले नेह के बंधन को भी झुलसा देती है. यह और बात है कि हमेशा के लिए नहीं.
उपन्यास के नायक आशिक मियां की कुर्बानी आरामगंज में राम को रोके रहती है. पर यहां तक कि यात्रा कितनी विभाजनकारी और भयावह है कि उसमें हमारी आज की सियासत एक बदरंग चेहरे जैसी दिखती है, जिसमें 'रामभक्त रंगबाज़' में अतंरगी किरदारों की दुनिया के साथ आप कभी हंसते हैं, तो कभी रोते हैं और एक ही बैठक में यह अफसाना कैसे गुजर जाता है यह पता ही नहीं चलता. व्यंग्य-संग्रह 'कोस-कोस शब्दकोश' और फैंटेसी नॉवेल 'प्रजातंत्र के पकौड़े' के बाद 'रामभक्त रंगबाज' राकेश कायस्थ की नई कृति है, जो शिल्प और कथ्य के मामले में उनकी पिछली रचनाओं से एकदम अलग है. इसकी कहानी में गहराई है लेकिन लहजे में गजब की किस्सागोई है. बोलती-बतियाती भाषा में बड़ी कहानी कहने का हुनर राकेश कायस्थ को मौजूदा दौर के लोकप्रिय लेखकों की कतार में शामिल करता है. मुख्यधारा की पत्रकारिता में लंबा समय बिता चुके राकेश ठेठ देहाती दुनिया से लेकर चकाचौंध भरी महानगरीय जिंदगी तक पूरे और परिवेश को समग्रता में समझते हैं. यह उपन्यास जब मेरे हाथ में आया, तो पहली नजर में नाम के चलते मुझे एक मारक व्यंग्य सा लगा, पर पढ़ना शुरू करने के साथ ही इसने अपने कथ्य की गंभीरता, प्रवाहमय शिल्प और तेजी से बदलती रसमय सहज भाषा के चलते बांध लिया.
'रामभक्त रंगबाज' हमारे समाज की उदारता, भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, मिश्रित रिहाइश और समरसता के बीच सांप्रदायिकता, कट्टरता और पोंगापंथ के घुलते जाने की कहानी है. यह उस माहौल को उजागर करती है कि कैसे बड़ी-बड़ी बातों को भुला देने वाला हमारा समाज आज छोटी-छोटी बातों पर मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं, कि हममें अब किसी की बात को बरदाश्त करने की क्षमता नहीं है. आज का हमारे समाज का हिंदु-मुस्लिम, दलित-ब्राह्मण-बनिया का विभाजन कोई एक दिन में नहीं बना है. कायस्थ 'रामभक्त रंगबाज' के बहाने आज के सियासी खेल और समाज में पनप रही नफरत, हिकारत और दिन-ब-दिन बढ़ रही खाई को उजागर करने में कामयाब रहे हैं. 'रामभक्त रंगबाज' किसी गुंडे या दबंग का नाम नहीं, बल्कि रात दिन राम के ही आसरे जीने वाले आशिक मियां की कहानी है.
आरामगंज के लोगों की मान्यता है कि भगवान राम ने वनगमन के लिए इस रास्ते का प्रयोग किया था. हालांकि उस क्षेत्र का किसी भी रूप में कोई भी भौगोलिक ताल्लुक अयोध्या, चित्रकूट या रामवनगमन पथ से नहीं है. पर कायस्थ लिखते हैं कि मान्यताएं किसी प्रमाण का मुहताज नहीं होतीं. लोग मानते हैं कि भगवान राम यहां से गुजरे थे, तो गुजरे थे. कटाक्ष का एक मारक प्रयोग जैसे कायस्थ की विशेषता है. नायक आशिक मियां एक दर्जी हैं. वो अपने कस्बे के फैशनेबल लोगों के बीच बहुत ही लोकप्रिय हैं. टू-इन-वन टेलर की उनकी दुकान खासी चलती है. एक में वह महिलाओं के कपड़े सिलते हैं तो दूसरा पुरुषों के कपड़े बनाने के लिए. दोनों दुकानों पर शीशे का दरवाजा है. खास बात यह कि एक सामान्य दर्जी होने के बावजूद अपने व्यवहार के चलते परुषों की अपेक्षा वे महिलाओं में ज्यादा लोकप्रिय होने के चलते वे कस्बे के शोहदों के बीच ईर्ष्या के पात्र हैं. किसी को वे अनिल कपूर तो किसी को जैकी श्रॉफ लगते हैं. पर आशिक मियां की असली ताकत रामभक्ति है. मुस्लिम होकर भी उन्हें संस्कृत और हिंदी की धार्मिक कथाएं, कलमा की तरह रटी हुई हैं. वजह बचपन में वह ब्राह्मण परिवार में पलते-बढ़ते और पढ़ते हैं. संस्कृत, हिंदी की उनकी स्वाध्याय शिक्षा उर्दू, फारसी से आगे है. वे हर बात में राम जी की इच्छा को महत्त्व देते हैं. शायद इसीलिए कायस्थ ने उपन्यास की शुरुआत तुलसी दास के इस दोहे से होती है-
होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा.
अस कहि लगे जपन हरिनामा, गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा.
कहानी की शुरुआत 20 सितंबर, 1990 के आरामगंज कस्बे से शुरू होती है, जब तब के हिंदू हृदय सम्राट लालकृष्ण आडवाणी ने श्री रामजन्म भूमि की मुक्ति का संकल्प ले कर रथ यात्रा शुरू की थी. उस यात्रा ने किस तरह हमारे सामाजिक तानेबाने में परिवर्तन किया, किस तरह मंडल से कमंडल का टकराव हुआ, किस तरह इस यात्रा ने उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों की पूरी सियासत बदल दी आरामगंज उसकी बानगी है. रामभक्त रंगबाज़ को मुस्लिम मोहल्ले में काफिर माना जाता है और हिंदुओं के लिए तो वह तुर्क और म्लेच्छ है ही. आरामगंज की इस बदलती आबोहवा में आशिक और उस जैसे दूसरे लोग किस तरह अलग-थलग पड़, अपने मजहब और सोच के बीच फंसकर हतोत्साहित होने लगते हैं और अंततः अकेलेपन का शिकार होने लगते हैं इसका बड़ा जीवंत चित्रण कायस्थ ने किया है.
इसी दौरान उपन्यास में एक कहानी चलती है जो कि दलित और सवर्ण टकराव से जुड़ी है. दलित हो या मुसलमान दोनों ही जगह विश्वास, भरोसा और सामाजिक तानाबाना दरक रहा है. वे लोग जिनका बचपन अलग बर्तन में पानी पीकर भी कभी भेदभाव का शिकार नहीं हुआ वे आज बराबरी के तमाम दावों के बावजूद किस तरह अपने को एकाकी पा रहे हैं. जो मुस्लिम नायक मोहर्रम के जलसे से अधिक दशहरे के जुलूस में उत्साह से भाग लेता है, उसका अंत इतना दुखद कैसे होता है. इस पुस्तक में लेखक यह कहता है कि राम जी का पथ बहुत कठिन है. प्रभु राम जिसे अपना भक्त बनाते है, उसकी बहुत परीक्षा लेते हैं. पर यह परीक्षा किसी की घृणा का शिकार कैसे हो जाती है, कि एक मंद बुद्धि, नादान बैजू, जिसे धर्म, मजहब, राम और अल्लाह तो दूर खुद अपने होने का पता नहीं वही करतब दिखाते आशिक पर पेट्रोल छिड़क देता है और 'रामभक्त रंगबाज' जलकर मर जाता है. पर उपन्यास यहीं खत्म नहीं होता.
उस दिन 20 अक्तूबर, 1990 को चौक पर उठी आग की उस लपट ने आशिक मियां को ही नहीं रैयतों की टोली को भी झुलसाया था, पर अरसे या यों कहें लगभग तीस साल बाद 2020 में उसका बेटा शमी न्यूजीलैंड परमानेंट शिफ्ट होने से पहले आरामगंज आता है. अपने पिता की लोकप्रियता के किस्से और उस घटना की तह को जानने की कोशिश में, जिसमें 'अली और बजरंगबली से ज्यादा पॉवरफुल है स्पाइडरमैन' समझाने वाले उसके पिता चले गए थे. राकेश कायस्थ का यह उपन्यास हर संवेदनशील के मन को झकझोरने की क्षमता रखता है और यह मंथन करने पर मजबूर कर देता है कि वाकई धर्म का लक्ष्य और प्राप्ति क्या है. कथानक, पृष्ठभूमि, कथावस्तु और शिल्प के लिहाज से उपन्यास बहुत उम्दा है. यह एक अनोखी पठनीय कृति है, जो हिंदी साहित्य में अपना एक अलग मुकाम बना सकती है.
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पुस्तकः रामभक्त रंगबाज
लेखकः राकेश कायस्थ
विधाः उपन्यास
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः हिन्द युग्म
मूल्य: 199 रुपए
पृष्ठ संख्याः 240

 

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