निर्मल वर्मा सही मायनों में विश्व लेखक थे. एक घुमक्कड़ और शब्द संधान के माहिर. गद्य की हर विधा में लिखा और खूब सराहे गए. उपन्यास, कहानियां, यात्रा-वृतांत, लेख, नाटक, संस्मरण, पत्र आदि. उनका जन्म 3 अप्रैल, 1929 को शिमला में हुआ. उनके लेखकीय कौशल को इसी से समझ सकते हैं कि उनकी दर्जनों किताबें उनके जीवनकाल में तो छपी हीं, अब भी छप रही हैं. वह साहित्य के सभी श्रेष्ठ सम्मानों से नवाजे गए. इनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता उल्लेखनीय हैं. भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से भी सम्मानित किया था. कहा जाता है कि भारत सरकार ने निर्मल वर्मा को औपचारिक रूप से नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया था.
आज उनकी जयंती पर हम 'साहित्य आजतक' के पाठकों के लिए वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनके निबंध संकलन 'शब्द और स्मृति' का एक अंश अपने पाठकों के लिए दे रहे हैं. इस संग्रह के बारे में खुद निर्मल वर्मा ने लिखा था- रोमन खंडहरों या पुराने मुस्लिम मकबरों के बीच घूमते हुए एक अजीब गहरी उदासी घिर आती है जैसे कोई हिचकी, कोई साँस, कोई चीख़ इनके बीच फंसी रह गयी हो... जो न अतीत से छुटकारा पा सकती हो, न वर्तमान में जज़्ब हो पाती हो... किन्तु यह उदासी उनके लिए नहीं है, जो एक ज-माने में जीवित थे और अब नहीं हैं...वह बहुत कुछ अपने लिए है, जो एक दिन खंडहरों को देखने के लिए नहीं बचेंगे... पुराने स्मारक और खंडहर हमें उस मृत्यु का बोध कराते हैं, जो हम अपने भीतर लेकर चलते हैं, बहता पानी उस जीवन का बोध कराता है, जो मृत्यु के बावजूद वर्तमान है, गतिशील है, अन्तहीन है... 'शब्द और स्मृति' में निर्मल वर्मा ने स्पष्ट कर दिया था कि प्रश्न 'भारतीय अनुभव' का नहीं, भारतीय 'स्मृति' का है और 'स्मृति' व्यक्ति और अतीत के बीच एक विशिष्ट जुड़ाव, एक सांस्कृतिक सम्बन्ध से जन्म लेती है', अतः स्मृति का प्रश्न इतिहास का नहीं, 'संस्कृति का प्रश्न' है.
प्रस्तुत है निर्मल वर्मा के 'शब्द और स्मृति' निबंध संग्रह का एक अध्याय
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'सृजन-प्रक्रिया और मूल्यांकन'
एक कलाकार-मेरे लिए हमेशा एक बोहेमियन और विदूषक रहा है, इसलिए जो लेखक अपने को बहुत गम्भीरता से लेते हैं, वे हमेशा मुझे कुछ हास्यास्पद-से जान पड़ते रहे हैं. दरअसल हर कला का कृतित्व एक व्यंग्य में निहित है- समाज के प्रति उतना ही, जितना अपने प्रति. एक बुद्धिजीवी आलोचक गम्भीर होता है कि अक्सर कला में खेल और व्यंग्य का तत्त्व हमेशा उसकी आँखों से ओझल हो जाता है.
शायद यही कारण है, जब कभी लेखक की सृजन-प्रक्रिया के सम्बन्ध में मुझे लिखने का अवसर मिला है, बराबर एक अजीब-सी निरर्थकता का बोध होता रहा है- अपने प्रति उतनी ही, जितनी अपने शब्दों के प्रति.
जाहिर है, इस छोटे-से लेख से मैं उस निरर्थकता को और आगे बढ़ा रहा हूँ, लेकिन उस दुःखद अहसास के बावजूद मैं इस प्रक्रिया के कुछ नये पहलुओं को देख पाने का लोभ सँवरण नहीं कर पाता.
मुश्किल यह है कि देखना- जैसे हम साधारणतया इस शब्द का प्रयोग करते हैं- सृजन-प्रक्रिया के लिए लगभग असम्भव है. एक पाठक या दर्शक की वास्तविक ज़िन्दगी किस सीमा पर, किस ख़ास बिन्दु पर लेखक की अनुभूत वास्तविकता को छू सकेगी, उसके मर्म को भेद सकेगी, यह निर्णय करना काफ़ी कठिन है. इसके सम्बन्ध में कोई आलोचक- चाहे वह कितना ही संवेदनशील क्यों न हो- किसी प्रकार का नियम निर्धारित नहीं कर सका है. कोई भी कलाकृति अपने अनुभव की प्रक्रिया में सम्पूर्ण है, वह अपनी ही शर्तों पर आधारित है. एक बार जन्म लेने के बाद अनुभूत वास्तविकता का उस वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, जिससे वह प्रेरणा प्राप्त करती है, लेकिन उस पर आधारित या जीवित नहीं रहती.
वास्तविकता का अनुभव हमेशा उससे अलग रहेगा, जो वास्तविक है. जो वास्तविक है, वह दैनिक क्रिया-कलापों का औसत जीवन है, वह अपने में कितना ही तीव्र क्यों न हो, एक साँस से आगे जाकर वह अनिवार्यतः टूट जाएगा. अलग-अलग औसत घटनाओं के बीच उस ज़िन्दगी को पकड़ पाना, जो दैनिक जीवन के विकृत समझौतों, उसके ठण्डे होते हुए निर्णयों के बाहर है (उसके बीच होते हुए भी). यह वही लेखक कर सकता है जो दैनिक यथार्थ का अतिक्रमण करने का साहस रखता है, वास्तविक यथार्थ के परदे पर अपनी अनुभूत वास्तविकता को प्रक्षेपित करने की क्षमता रखता है. मार्क्सवादी आलोचक जार्ज लुकाच का यह कथन अपने में बहुत महत्त्वपूर्ण है कि अन्ना कैरिनिना सही रूप में उसी क्षण जीवित हो पाती है, जहाँ वह आत्महत्या करने के लिए तत्पर होती है... क्योंकि उस क्षण, तोल्स्तोय उसे एक ऐसी चरम स्थिति में रख देते हैं, जहाँ अपने पतियों से असन्तुष्ट अन्य स्त्रियाँ केवल समझौता करके ही जी पाती हैं. हर महत्त्वपूर्ण लेखक का अनुभव चरम स्थिति का अनुभव है, जहाँ वह दैनिक जीवन के यथार्थ को पीछे छोड़ जाता है... पीछे छोड़ जाने की प्रक्रिया में ही वह उसके मर्म को औसत यथार्थ के अँधेरे से मुक्त कर देता है.
एक लेखक के लिए यह विकट स्थिति है-एक हद तक दुःखद भी. सृजन के लिए जो वास्तविक ज़िन्दगी आवश्यक है, वह हमेशा उससे बाहर रहता है, जी भरकर भोग नहीं सकता, क्योंकि भोगने की प्रक्रिया अपने में उन सब तत्वों के लिए संहारकारी है, जो सृजन के लिए अनिवार्य हैं. जिस तरह एक पाठक सृजन-प्रक्रिया के बाहर है, केवल उसके तैयार माल के सम्पर्क में आ पाता है, उसी तरह एक कलाकार वास्तविक ज़िन्दगी के बाहर है- या उस ज़िन्दगी के बाहर है, जिसे हम वास्तविक मानते हैं और वह आखिर तक इस पीड़ा-युक्त अन्तर्द्वन्द्व में फँसा रहता है कि बाहर रहकर वह कहीं उस असलियत को तो नहीं खो रहा जो सिर्फ़ भोगने पर ही अपनी हो पाती है. हम आलोचकों की इस ‘सूक्ष्म’ विवेचना को अलग रहने देंगे जहाँ वे कलाकार के ‘भोगने’ को एक साधारण व्यक्ति के ‘भोगने' के स्तर से अलग और ऊँचा बताते हैं... कम-से-कम कलाकार को अपने व्यक्तिगत जीवन में इससे कोई सान्त्वना नहीं मिल सकती. भोगना और अनुभव करना- ये दोनों बिलकुल अलग चीजें हैं- इसे जितना कोई कलाकार जानता है, उतना दूसरा व्यक्ति नहीं. एक ‘अकैडमिक', या अकादमी का 'लेखक' तो शायद कभी इस अन्तर को महसूस ही नहीं कर सकता... वह बाहर के जोखिम से मुक्त है.
कुछ दिन पहले वान गॉग के पत्रों को पढ़ते सहसा मेरी आँखें इन वाक्यों पर अटक गयी थीं. अपने भाई थियो को खत लिखते हुए वे सोचते हैं: मुझे हमेशा यह महसूस होता रहा है कि हर चीज की जड़ में साधारण लोगों की ज़िन्दगी है. कभी-कभी मुझे यह विचार काफ़ी दुख देता है कि हम वास्तविक ज़िन्दगी में नहीं हैं... मेरा मतलब है कि रंग और प्लास्टर में काम करने से कहीं ज़्यादा बेहतर है खून और हाड़-मांसवाला काम करना, तस्वीरें बनाने से कहीं अधिक सुखदायी है बच्चों को जन्म देना, या किसी व्यापार में लग जाना. लेकिन इसके बावजूद जब मैं यह सोचता हैं कि मेरी ही तरह मेरे कई दोस्त वास्तविक ज़िन्दगी के बाहर हैं तो मैं फिर से अपने को जीवित महसूस करने लगता हैं.
एक दृष्टि से देखें तो हम इस वास्तविक ज़िन्दगी के जब बाहर भी रहते हैं, तब भी अपने को अभिशप्त रूप में उससे जुड़ा पाते हैं. वह हमें अकेला करती है लेकिन अपने में अकेला नहीं रहने देती. भीड़ में अकेलापन बहुत लोग महसूस करते हैं... उसमें कोई अनोखी बात नहीं, लेकिन अपने अकेलेपन में भीड़ के दबाव को महसूस करना... उससे समझौता न करने पर भी अपने दरवाजे पर उसके नाखूनों की खरोंच सुन पाना- इससे मुक्ति केवल उस साहित्यकार को मिल सकती है, जो स्वयं घबराकर अपने को कलाकार की नियति से मुक्त कर ले.
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पुस्तकः शब्द और स्मृति
लेखकः निर्मल वर्मा
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्यः 395 रुपए, हार्ड बाउंड. 175 रुपए, पेपर बैक
पृष्ठ संख्याः 134