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पुस्तक अंशः उसने गांधी को क्यों मारा; सनातनी हिन्दू जब हुए थे महात्मा से नाराज

30 जनवरी, 1948 की शाम को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भौतिक शरीर की हत्या नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन में नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर कर दी गई थी. पर क्या वह उनके विचारों, सपनों को खरोंच भी पहुंचा सकी. पढ़िए महात्मा के जीवन की एक घटना

उसने गांधी को क्यों मारा पुस्तक का आवरण चित्र उसने गांधी को क्यों मारा पुस्तक का आवरण चित्र

महात्मा गांधी जिंदा हैं, हमेशा रहेंगे. लोगों के दिलों में, सत्य में, अहिंसा में, सत्याग्रह में, भाई-चारे में. दुनिया भर में जब भी मानवता, बराबरी और इंसानी अधिकारों की बात होगी, या कहीं भी होगा अपने हक के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन, गांधी जी उठेंगे. किसी आतताई सिरफिरे की गोली महात्मा गांधी को, उनके विचारों को, उनके सपनों को छू भी नहीं सकेगी. यह और बात है कि 30 जनवरी, 1948 की शाम को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भौतिक शरीर की हत्या नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन में नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर कर दी गई थी.

बापू की इस 73वीं पुण्यतिथि पर हम आपके साथ साझा कर रहे हैं, लेखक अशोक कुमार पांडेय की 2020 में प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक 'उसने गांधी क्यों मारा' के अंश. इस पुस्तक के छपने के चंद दिनों के भीतर इसके दूसरे संस्करण का प्रकाशन जनजन में महात्मा की लोकप्रियता बताने के लिए पर्याप्त है.

पुस्तक अंशः उसने गांधी को क्यों मारा

तीस के दशक में डांडी मार्च से शुरू हुए असहयोग आन्दोलन के बाद से ही उन्होंने अस्पृश्यता विरोधी आन्दोलन तेज़ कर दिया था. गांधी अस्पृश्यता को हिन्दू धर्म के अहिंसा के भाव के विरुद्ध मानते थे और कहते थे कि इसे ख़त्म न किया गया तो हिन्दू धर्म समाप्त हो जाएगा. लेकिन यह रोचक है कि इस बिन्दु पर एक तरफ़ सनातनी हिन्दू उनसे नाराज़ रहे तो दूसरी तरफ़ डॉ अम्बेडकर की भी उनसे गहरी असहमति रही. अम्बेडकर की असहमति के मूल में वे स्थितियां थीं जिनमें पूना समझौता हुआ.
17 अगस्त, 1932 को ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने कम्यूनल अवार्ड की घोषणा की जिसके तहत दलित जातियों को सिखों, मुसलमानों, बौद्धों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो इंडियन समुदाय की तरह एक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया गया और इस तरह पृथक निर्वाचन की सुविधा. अम्बेडकर इसे एक बड़ी जीत मानते थे जो दलितों को हिन्दू पक्ष से अलग एक स्वतंत्र अस्मिता का दर्जा दे रहा था और जिसके तहत दलितों को अपना नेतृत्व चुनने का मौक़ा मिल रहा था. उन दिनों पूना की येरवडा जेल में बन्द गांधी ने इसका इस आधार पर विरोध किया कि दलित हिन्दू समाज का हिस्सा हैं और उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देना हिन्दुओं को बांटने की साजिश है. वह गोलमेज़ सम्मेलन में अपना पक्ष पहले ही स्पष्ट कर चुके थे. उन्होंने प्रधानमंत्री को ख़त लिखा कि अगर यह अवार्ड वापस नहीं लिया गया तो 20 सितम्बर की दोपहर से वह आमरण अनशन पर चले जाएंगे, प्रधानमंत्री से हुए पत्र व्यवहार में जब कोई आश्वासन नहीं मिला तो गांधी तय तिथि से अनशन पर चले गए. पेन लिखते हैं कि गांधी ने इस उपवास को अस्पृश्यता विरोध के लिए जनता को झकझोरने के लिए इस्तेमाल किया.
जेल में गांधी के उपवास शुरू होने से एक दिन पहले इलाहाबाद के बारह मंदिरों ने पहली बार अपने दरवाज़े दलितों के लिए खोल दिए. जिस दिन उपवास शुरू हुआ उस दिन कई बड़े और पवित्र मंदिरों ने उनका अनुकरण किया. जवाहरलाल नेहरू की बेहद रूढ़िवादी माँ स्वरूपरानी नेहरू ने, जिन्होंने उम्र भर पति और बेटे की प्रगतिशीलता से अपने चौके-चूल्हे को बचाए रखा था, दलितों के हाथ का खाना खाया. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति और अनेक ब्राह्मणों ने दलितों के साथ सहभोज का आयोजन किया. गांवों-कस्बों में सहभोज आयोजित किए गए. कह पाना मुश्किल है कि इसमें कितने जेश्चर कॉस्मेटिक थे और कितनों का वास्तविक हृदय परिवर्तन हुआ लेकिन इसने देश भर में अस्पृश्यता विरोध की जिस बहस को जन्म दिया और जिस तरह का उसे समर्थन मिला वह उस दौर में सनातनियों को नाराज़ करने के लिए काफ़ी था. इस असर को चिह्नित करते हुए फिशर समाहार करते हैं-
यह अनशन अस्पृश्यता के तीन हज़ार वर्षों से अधिक के शाप को नहीं मिटा पाया. मंदिर में घुसना किसी बेहतर नौकरी में जाना नहीं है. हरिजन भारतीय समाज की तलछट पर ही रह गए. जब गांधी ने संतरे का जूस पीया तो वह बंटवारा समाप्त नहीं हो गया. लेकिन इस अनशन के बाद अस्पृश्यता को जो सामाजिक स्वीकृति मिली हुई थी वह ख़त्म हो गई. इसमें जो भरोसा था वह नष्ट हुआ. इसे नाजायज़ माना जाने लगा...सामाजिक रूप से दलितों से सम्पर्क रखना अनुचित माना जाता था, अब कई जगहों पर सामाजिक रूप से उनसे दूरी बनाना ग़लत माना जाने लगा. अस्पृश्यता का व्यवहार करने वाले को कट्टर और प्रतिक्रियावादी माना जाता था.
इधर अनशन ख़त्म कराने के लिए लगातार फ़ॉर्मूले निकालने की कोशिश शुरू हुई और जेल प्रांगण में ही कई बैठकें हुईं. गांधी तब तिरसठ के हो चुके थे और उनका स्वास्थ्य ऐसा नहीं था कि बहुत लम्बा अनशन झेल पाते. पेन लिखते हैं कि चुनावों के सन्दर्भ में अम्बेडकर जितनी मांग कर रहे थे गांधी से उससे अधिक का प्रस्ताव दिया था लेकिन अम्बेडकर अपने फ़ॉर्मूलों पर अड़े हुए थे. ज़ाहिर है वह कम्यूनल अवार्ड खोने के बाद दलितों के राजनैतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व के लिए अधिक से अधिक सम्मानजनक शर्तें चाहते थे. अस्पृश्यता-निवारण का एक प्रतीकात्मक अर्थ हो सकता था लेकिन वह राजनैतिक प्रतिनिधित्व का विकल्प नहीं हो सकती थी. सैकड़ों वर्षों की ग़ुलामी के चलते दलित वर्ग जिन हालात में पहुंचा था उससे निकालने के लिए वह किसी की सदाशयता पर निर्भर नहीं रह सकते थे.
अन्ततः जो समझौता हुआ उसमें पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था तो ख़त्म कर दी गई लेकिन प्रान्तीय विधानमंडलों में आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 147 और केन्द्रीय विधानमंडल में 18 प्रतिशत कर दी गई तथा संयुक्त निर्वाचन की प्रक्रिया तथा प्रान्तीय विधानमंडल में प्रतिनिधियों को निर्वाचित करने की व्यवस्था को मान्यता दी गई, साथ ही दलित वर्ग को सार्वजनिक सेवाओं तथा स्थानीय संस्थाओं में उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई. ध्यान देने योग्य बात है कि गांधी ने दलितों को उनकी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व की बात की थी और यह अवार्ड में दी गई सीटों से अधिक संख्या थी. इस समझौते पर दस्तख़त के तुरन्त बाद अम्बेडकर ने कहा कि वो गांधी और अपने बीच 'बहुत कुछ समान' पाकर चकित थे; बुरी तरह चकित. अगर आप ख़ुद को पूरी तरह दलित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर देते हैं, अम्बेडकर ने गांधी से कहा, आप हमारे नायक बन जाएंगे. कोई बारह साल बाद 1945 के अपने निबन्ध 'व्हॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स' में कई जगह अम्बेडकर दावा करते हैं कि उनके लिए पूना पैक्ट एक विजय थी. वह आगे लिखते हैं कि "जब उपवास विफल हुआ और गांधी पैक्ट पर हस्ताक्षर करने को बाध्य हुए- जिसे पूना पैक्ट कहा जाता है और जो अछूतों की राजनीतिक मांगों को स्वीकार करता था"- 'उन्होंने (गांधी ने) कांग्रेस को इन राजनीतिक अधिकारों को हासिल करना मुश्किल बनाने के लिए गलत चुनावी कार्यनीति अपनाने की छूट देकर अपना बदला ले लिया.' ज़ाहिर है इस लेख में वह पूना समझौते की शर्तों की आलोचना नहीं कर रहे, बल्कि उसे लागू किए जाने में जो दिक़्क़तें हुईं उनकी बात कर रहे हैं. इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ़ साइन्स के प्रोफ़ेसर उदय बालकृष्णन 14 अप्रैल, 2020 को 'द हिन्दू' लिखे एक लेख में कहते हैं—
पेरी एंडरसन और अरुंधती रॉय का तर्क है कि गांधी ने अपने उपवास से अम्बेडकर पर दबाव बनाया कि वह पूना समझौता करें, हालांकि अम्बेडकर ऐसे आदमी नहीं थे जो किसी की इच्छा के सामने घुटने टेक दें. इस घटना के एक साल बाद ही वह बेहद स्पष्ट थे और उन्होंने कहा कि वह ऐसे किसी आदमी को बर्दाश्त नहीं करेंगे जिसकी इच्छा और सहमति पर कोई समझौता आधारित हो... एक व्यावहारिक व्यक्ति के रूप में अम्बेडकर किसी परिपूर्ण समाधान की उम्मीद नहीं कर रहे थे. जैसा कि उन्होंने 1943 में गोविन्द महादेव रानाडे के सौवें जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा, 'वह किसी तरह का एक बन्दोबस्त चाहते थे और वह किसी आदर्श बन्दोबस्त के लिए प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं थे.' इसी भाव से उन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
राजमोहन गांधी कहते हैं-
अम्बेडकर के 1945 के उस लेख का सन्दर्भ क्या था जो उन्होंने नई दिल्ली के अपने पृथ्वीराज रोड स्थित सरकारी आवास पर लिखा था? इस वक़्त वो वाइसराय की एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य थे. युद्ध लगभग ख़त्म होने वाला था और भारत छोड़ो आन्दोलन की वजह से, जिसने भारत के बड़े हिस्से में उथल-पुथल मचा दी थी, तीन साल जेल में रहने के बाद कांग्रेस नेतृत्व रिहा किया जाने वाला था. ब्रिटिश सरकार भारत के लिए एक नई राजनीतिक योजना लाने के कगार पर थी और पूरे देश में नए चुनाव आने वाले थे. एक प्रबुद्ध चिन्तक और एक सदस्य (दरअसल मंत्री) के रूप में 1945 का यह लेख लिखते हुए वह किसी भी नई ब्रिटिश योजना को प्रभावित करना चाहते थे. साथ ही, वह एक राजनीतिक नेता भी थे जो 1937 चुनावों के परिणाम भूल नहीं सकते थे जो कि विश्वयुद्ध के कारण इन चुनावों के पहले हुआ आख़िरी चुनाव था. अब 1945-46 में वे बेहतर परिणामों की उम्मीद रखते थे. अपने 1945 के निबन्ध के मार्फ़त, 1937 के चुनाव परिणामों से बेचैन अम्बेडकर, ब्रिटिश नेताओं के सामने अपना पक्ष रख रहे थे और साथ ही भारतीय मतदाताओं के सामने भी. हालाँकि 1945 के चुनावों ने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय मतदाताओं में, जिसमें भारी तादाद में दलित भी शामिल थे, कांग्रेस को लेकर ज़बरदस्त आकर्षण था. उच्च जाति हिन्दुओं के साथ-साथ दलित वोट भी हासिल करते
हुए कांग्रेस ने 1937 की तुलना में कहीं ज़्यादा संख्या में दलित सीटें जीतीं.
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पुस्तक:  उसने गांधी क्यों मारा
लेखक: अशोक कुमार पांडेय
विधाः इतिहास
भाषा: हिंदी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्य हार्डबाउंड: ₹899/-
मूल्य पेपरबैक: ₹299/-
पृष्ठ: 280

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