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पुस्तक अंश: घटोत्कच के मायाजाल में, नमिता गोखले ने फिर रची फंतासी से भरी अद्भुत गाथा

महाभारत कथा के जिन पात्रों में आज भी लोगों की जिज्ञासा है, घटोत्कच उनमें प्रमुख है. साहित्य आजतक पर पढ़िए एक्शन और एडवेंचर से भरपूर, रेखाचित्रों से सजे नमिता गोखले के पूर्ण मनोरंजक उपन्यास 'घटोत्कच के मायाजाल में' का एक अंशः

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उपन्यास 'घटोत्कच के मायाजाल में' और नमिता गोखले उपन्यास 'घटोत्कच के मायाजाल में' और नमिता गोखले

महाभारत कथा के जिन पात्रों में आज भी लोगों की जिज्ञासा है, घटोत्कच उनमें प्रमुख है. शायद यही वजह है कि चर्चित लेखिका, प्रकाशक और फेस्टिवल डायरेक्टर नमिता गोखले ने चिंतामणि देव गुप्ता नामक तेरह वर्षीय किरदार के साथ महाभारत युग के इस अजेय किरदार घटोत्कच को केंद्र बनाकर किशोरों और कल्पनाशील बच्चों के लिए अंग्रेजी में एक किताब लिखी Last in Time: Ghatotkacha and the Game of Illusions. अब यह पुस्तक हिंदी में भी 'घटोत्कच के मायाजाल में' नाम से आई है.  नमिता की कथा और गैरकथा की अब तक अठारह पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं. उनका पहला उपन्यास 'Paro: Dreams of Passion' 1984 में प्रकाशित हुआ, जिसकी पहचान एक क्लासिक कृति की बनी. इसका सीक्वल भी 'Priya' के नाम से प्रकाशित हुआ, उसे भी खासी लोकप्रियता और पाठकों की सराहना मिली है. 

गोखले ने भारतीय पौराणिक कथाओं पर व्यापक रूप से काम किया है. वे भारतीय प्रकृति विशेषकर हिमालय के प्रति काफी अनुरक्त रही हैं. पहाड़, प्रकृति, बचपन और हिमालय उनकी रचनाओं में बहुधा उभरते हैं. फिर वे कथा दर कथा रचने में माहिर हैं. 'पफिन महाभारत' उनकी ऐसी ही पुस्तक है, जिसमें भारतीय महाकाव्य पुनर्पाठ सा प्रस्तुत कर दिया है. खास बात यह कि  'घटोत्कच के मायाजाल में' को पढ़ते हुए 'पफिन महाभारत' का जिक्र ऐसे आ जाता है कि पाठक उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा. इस तरह गोखले न केवल दो दुनियाओं को जोड़ने में माहिर हैं, बल्कि दो कथानकों को, दो पुस्तकों को भी बिना किसी संकेत या व्यतिक्रम के सफलता से जोड़ देती हैं. आपने  'Gods, Graves and Grandmother', 'A Himalayan Love Story', 'The Book of Shadows' और 'Shakuntala' नामक चर्चित उपन्यासों के अलावा आपके संपादित संकलन 'हिमालय' और 'द हिमालयन आर्क: ईस्ट ऑफ साउथ-ईस्ट', समूचे हिमालयीय क्षेत्र की संस्कृति और राजनीति पर मूल्यवान, ज्ञानपरक सामग्री उपलब्ध कराते हैं. गोखले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल और माउंटेन इकोज, भूटान लिटरेचर फेस्टिवल की संस्थापक और सह-निदेशक भी हैं, तथा अनुवाद के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान और विशेषज्ञता रखने वाले प्रकाशन गृह 'यात्रा बुक्स' की निदेशक हैं.

कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रकाशन, संपादन के उनके अनुभवों ने गोखले को अपनी रचनाओं में एक काल्पनिक दुनिया को सृजित करने की बेहतरीन शैली मुहैया कराई है. शब्द तो उनके पास हैं ही, जो पानी के प्रवाह सदृश बहते हैं. फिर 'घटोत्कच के मायाजाल में' का अनुवाद भी बेहद उम्दा हुआ है. हालांकि अच्छे से अच्छा अनुवाद भी न केवल शब्द, शब्द-विन्यास और कृति के स्वरूप को लिपी के स्तर पर बदलता है, बल्कि कई बार उसके मूल तत्व और भाव भी देसी यानी कि अनूदित भाषा में हो जाते हैं, जो कि कृति को समझने के लिए जरूरी हैं. अच्छी बात है कि गोखले का भाव-प्रवाह 'घटोत्कच के मायाजाल में' अनुवाद के बावजूद पूरी तरह नहीं बदलता. उद्धरण के लिए शब्द-विन्यास की बानगी देखिए- "मैं घटोत्कच हूं, मैं राक्षस घटोत्कच हूं. देव भीमसेन और देवी हिडिम्बी का बेटा. मैं इस पहाड़ और घाटी, जंगल और झरनों पर शासन करता हूं, इस जंगल की आत्मा और यहां रहने वालों की रक्षा करता हूं." जाहिर है इसे पढ़ते समय कहीं से यह आभास नहीं होता कि यह रचना अंग्रेजी में लिखी गई होगी. 

गोखले घटोत्कच की मुलाकात आज के अपने किरदार से वे कैसे कराती हैं, और फिर महाभारत काल को सीधे वर्तमान से कैसे जोड़ती हैं, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है. पर इसके लिए आपको उपन्यास पढ़ना होगा. यहां रखी उपन्यास की परिचयात्मक पंक्तियां निश्चय ही आपकी उत्सुकता को बढ़ाएंगी- "हुआ ऐसा कि कोई 14 साल के चिंटू पिंटू उर्फ़ चिंतामणि देव गुप्ता को सत ताल झील के पास एक बर्ड कैम्प में भेजा जाता है लेकिन अचानक वो जा पहुंचता है, महाभारत के समय में! वह टाइम ट्रैवल में फंसकर घटोत्कच और उसकी मां, हिडिम्बी से मिलता है. उससे मिलने वाला घटोत्कच भारी-भरकम राक्षस होते हुए भी बुरा नहीं. वो दिमाग चकरा देने वाली राक्षसी तकनीकों में माहिर होते हुए भी अपनी सुपर पावर का इस्तेमाल उतने ही अच्छे-से करता है जितने अच्छे-से वह जंगल और उसकी शक्तियों के सदियों पुराने रहस्यों को बताता है. फिर चिंटू पिंटू अपने इस समझदार दोस्त के साथ खुद को भारतीय महाकाव्य महाभारत की तेज़ी से घट रही घटनाओं के बीच में पाता है." कैसे उसकी मुलाकात देवी हिडिम्बी, पांचों पाण्डवों से होती है, किस तरह वह कुंती और द्रोपदी से मिलता है, कैसे वह द्वारका का वैभव देखता है और उससे अपने वर्तमान उपनगर दिल्ली के द्वारका को जोड़ने लगता है, घटोत्कच से हुई इस मुलाकात ने कैसे उसका समूचा जीवन ही बदल दिया, यह सब इतने बारीक, घने और प्रभावी ढंग से गोखले ने रचा है कि यह उपन्यास किशोरों के साथ ही बड़ों को भी लुभाता है.

साहित्य आजतक पर पढ़िए एक्शन और एडवेंचर से भरपूर, रेखाचित्रों से सजे इस पूर्ण मनोरंजक उपन्यास 'घटोत्कच के मायाजाल में' का यह अंशः
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मायाजाल का उस्ताद

मैं राक्षस घर में पेड़ के ऊपर एक आरामदायक घोंसलेनुमा कमरे में सो रहा था. नींद खुली तो देखा कि मेरे बदन पर स्विमिंग ट्रंक और वॉटर प्रूफ घड़ी की अजीब-ओ-गरीब पोशाक नहीं बल्कि मेरा पसंदीदा चेक वाला नाइट सूट है. 
सूरज की चमकीली किरणें पत्तों और लताओं से छनकर आ रही थीं. ये ख्वाब नहीं है, मैंने खुद से कहा. अगर होता तो इतनी देर तक टिकता नहीं. सुबह की रोशनी में मेरे आस-पास की दुनिया और वास्तविक लगने लगी थी. पेड़ों के तनों जैसी दीवारें, उलझी हुई लताओं पर चलता हुआ अपना रास्ता बनाता एक गुबरैला यानी लेडीबर्ड, हरे पेड़-पौधों से झांकता नीला आसमान. मैं अब धीरे-धीरे अपने आस-पास की इस अजीब दुनिया को समझने और अपने यहां होने की वजह जानने की कोशिश करने से हार मानने लगा था. 
मैं उतरने की कोशिश कर ही रहा था कि मेरी अनकही परेशानी के जवाब में रस्सी की एक सीढ़ी मेरे सामने लटकने लगी. घटोत्कच घर के बाहर खुली जगह पर खड़े होकर कुछ सोच रहा था. मैंने ध्यान दिया कि उसके कान बहुत बड़े, घुंघराले बाल अमेज़न के जंगलों की तरह घने और शरीर का रंग कांसे के सिक्के जैसा था. वह मुझे देख कर मुस्कुराया, लेकिन मुझे समझ में आ गया कि वह कुछ और सोच रहा है. वह अपनी लंबी उंगलियों पर कुछ गिन रहा था और किसी ऐसी भाषा में मुझसे बात कर रहा था जो मेरी समझ में नहीं आ रही थी, हालांकि वह जोर-जोर से कुछ गिन रहा था. मुझे लगा कि ऐसा इसलिए था क्योंकि वह खुद से बात कर रहा था, मुझसे नहीं. मेरी जिज्ञासा और बढ़ने लगी. 
और फिर वह मुझसे बात करने लगा. इस बार लगा कि जैसे हमारे बीच में ठीक वैसे ही बातचीत हो रही है जैसे कॉमिक की किताबों में दो किरदारों के बीच स्पीच बैलून के ज़रिए होती है. 
'क्या खाना चाहोगे?' उसने पूछा. 
इस बात ने मेरे मन को छू लिया, और मुझे बेहद प्रभावित किया. वह खुद अपनी किसी परेशानी को हल करने की कोशिश में था, और फिर भी उसे इस बात की फ़िक्र थी कि कहीं मुझे भूख तो नहीं लगी! 
मुझे नाश्ते में क्या खाना है? इससे पहले कि मैं ठीक से सोच भी पाता, फलों की एक थाल मेरे सामने पेड़ के तने से ऐसे चली आई, जैसे कोई अजीब-सी तितली मेरे सामने आ गई हो. केले और डुरियन जैसे रसीले फल मेरे सामने थे. ये डुरियन हमने पिछले साल सिंगापुर की यात्रा के दौरान अपने पूरे परिवार ने खाए थे. "परिवार" के साथ कुछ करने का ये मौका फिर बहुत दिनों तक नहीं आया. 
मैं अचानक सोचने लगा कि न जाने मेरे मम्मी-पापा इस वक्त क्या कर रहे थे, न जाने मेरी कितनी फ़िक्र होगी उनको. और फिर मेरे दिमाग में एक बात आई! अगर मैं मोबाइल फोन मांगू तो मेरी सारी इच्छाएं पूरी करने वाला टेलीपैथिक यंत्र ये इच्छा भी पूरी कर देगा! 
'मुझे एक फोन चाहिए!' मैं जोर से चिल्लाया. 'एक आईफोन?  . . . या फिर मेरा पूरा टूटे हुए स्क्रीन वाला सैमसंग भी चलेगा. बस मुझे एक अच्छा नेटवर्क चाहिए!'
घटोत्कच के चेहरे पर चिढ़ साफ दिखाई दे रही थी. बड़े-बड़े केले के आकार की उसकी तनी हुई भौंहें मेरे सामने प्रकट हो गईं. 
'मैं तुम्हें फोन नहीं दिला सकता,' उसने जवाब दिया. उसका जवाब भाषा और मेरे बाएं मस्तिष्क की टेली प्रॉम्पटिंग के ज़रिए हमारे बीच स्थापित संवाद के बीच लटकता हुआ-सा महसूस हुआ. 
'लेकिन क्यों नहीं? अगर तुम मेरे लिए पोल्काडॉट वाले पेपर नैपकिन जैसी बकवास चीज का इंतज़ाम कर सकते हो तो आईफोन क्यों नहीं दिला सकते?' मैंने थोड़ा चिड़चिड़े लहजे में जवाब दिया. लेकिन वह विशालकाय राक्षस तो मुझे देखकर दांत दिखाकर हंस रहा था. मेरे जवाब ने उसको चिढ़ाया नहीं बल्कि हंसा दिया था. 
फिर वह अपनी पूरी लंबाई में मेरे सामने ऐसे खड़ा हो गया जैसे मेरे माथे पर कुतुब मीनार तन गया हो. 'मैं घटोत्कच हूं. मायाजाल का उस्ताद!' उसने दावा किया. 'राक्षस जातिभ्रम के स्वभाव को समझती है. हम रात को दिन और दिन को रात बनाना जानते हैं. यह एक ऐसा खेल है जो हम दिमाग की परछाइयों और तमाम मूलतत्वों की शक्तियों के साथ खेलते हैं.' 
उसके ऐसा कहते ही आकाश गहरा गया और मुझे अपने ऊपर तारों की रौशनी टिमटिमाती हुई दिखने लगी. 
'हम अनुभूतियों के साथ खेलना जानते हैं,' उसने बोलना जारी रखा. उसकी आवाज अंधेरे में और गंभीर लग रही थी. 'और जहां तक सत्य की बात है... तीनों लोकों में कोई नहीं जानता कि सत्य आखिर है क्या. लेकिन टेक्नोलॉजी,' और उसने इस शब्द का प्रयोग बहुत सावधानी के साथ किया, जैसे कि इसकी पड़ताल कर रहा हो, 'कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी एक अच्छी, सहयोगपूर्ण प्रक्रिया है. आप इससे अपनी दुनिया की बेहतर पड़ताल कर सकते हैं. मेरी परनानी त्रिकालिनी ने मुझे समय और युगों के पर्दे को तोड़ते हुए देख पाने की जिस शक्ति का वरदान दिया था, उसके ज़रिए मैं बहुत आगे तक देख सकता हूं. लेकिन अनुभूति के संपूर्णजाल को, न मैं तोड़ सकता हूं न मेरी मायावी शक्ति तोड़ सकती है...' 
आसमान में अब उतना अंधेरा नहीं था, और अचानक मेरे हाथ में एक फोन आ गया था, एक ऐप्पल आईफोन 5, लेकिन मुझे दिखाई दे रहा था कि यह महज़ एक खिलौना है. उसमें न कुछ लिखा हुआ था और न उसमें बैट्री ही थी. लेकिन मेरा सिर चकरा गया था. घटोत्कच सारी बातों को तर्कसंगत बना देता था, लेकिन ये चल क्या रहा था?
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पुस्तक: घटोत्कच के मायाजाल में
मूलः अंग्रेजी- Last in Time: Ghatotkacha and the Game of Illusions
लेखक: नमिता गोखले
अनुवादकः अनु सिंह चौधरी
भाषाः हिंदी
विधाः गल्प, बाल साहित्य
मूल्यः रुपए 199
पृष्ठ संख्याः 120
प्रकाशक: पेंगुइन, हिंद पॉकेट बुक्स

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