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विवादों के बीच आशीष कौल दिद्दा के हिंदी संस्करण के साथ सामने आए

कल्हण की राजतरंगिणी से अबतक के उपलब्ध हर साहित्य ने दिद्दा की नकारात्मक छवि ही उकेरी थी. हीरोइन कंगना राणावत को कानूनी नोटिस भेजने के बाद लेखक आशीष कौल 'दिद्दाः कश्मीर की योद्धा रानी' के साथ हिंदी में आए हैं.

दिद्दाः कश्मीर की योद्धा रानी का आवरण दिद्दाः कश्मीर की योद्धा रानी का आवरण

कश्मीर की योद्धा रानी एक बार फिर चर्चा में है. हीरोइन कंगना राणावत को 'दिद्दा- द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' पर कानूनी नोटिस भेजने के बाद इस पुस्तक के अंग्रेजी लेखक आशीष कौल ने इसके हिंदी प्रकाशन की घोषणा की है. प्रभात प्रकाशन द्वारा उसका कवर भी रिलीज किया गया है और कौल ने लोगों से उसे खरीदने की अपील की है.

खास बात यह कि कौल का माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर हीरोइन कंगना राणावत की इस घोषणा से कि वह दिद्दा पर फिल्म बना रही हैं, पर उन्हें एक कानूनी नोटिस भेज चुके हैं. कौल का तर्क है कि कल्हण की राजतरंगिणी से अबतक के उपलब्ध हर साहित्य ने दिद्दा की नकारात्मक छवि ही उकेरी थी, उनकी पुस्तक वह पहली लिखित किताब है, जिसने दिद्दा को कश्मीर की एक ऐतिहासिक योद्धा रानी के रूप में दुनिया के सामने रखा.

साहित्य आजतक को भेजे संदेश में आशीष कौल ने  लिखा है, "मुझे यह साझा करने पर गर्व है कि 2017 में शुरू की गई यात्रा में आज एक और उपलब्धि हासिल हुई है. दुनिया भर में 'दिद्दाः द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' की अद्भुत सफलता के बाद, मैं प्रभात प्रकाशन द्वारा कश्मीर की योद्धा रानी दिद्दा के हिंदी प्रकाशन की घोषणा करता हूं!

दिद्दा की तारीफ के साथ ही उन पर फिल्म बनाने की घोषणा करने वालों पर कटाक्ष करते हुए कौल ने लिखा है कि, "मेरी कामना है कि दुनिया की हर स्त्री दिद्दा जैसी हो ऐसी मेरी कामना है ताकि दुनिया सुरक्षित रहे; आतंक से, भय से और सफेदपोश कॉपीराइट चोरों से!

"पढ़िए कि कैसे एक अपंग लड़की को उसके माँ बाप ने त्याग दिया, कैसे उस लड़की को एक नौकरानी ने अपनी बेटी की तरह पालपोस के बड़ा किया, कैसे समाज ने, दुनिया ने उस लड़की को लंगड़ी रानी और कश्यप ऋषि ने दिद्दा का नाम दिया!!!

ग्यारह सौ साल इतिहास में दफ़न वह कहानी जिसे हर इतिहासकार और अब तक की छपी हर किताब में एक चरित्रहीन, नीच, कुलघातिनी, अपने पुत्र और पौत्रों की निर्मम हत्यारिन, सत्ता की भूखी और कामवासना में लिप्त स्त्री के रूप में याद किया- उस दिद्दा को सिर्फ़ मैंने, मेरे कुल और मेरी नानी के पूर्वजों ने दुनिया की सर्वश्रेष्ठ रानी, योद्धा और एक ऐसे राजनीतिज्ञ के रूप में ज़िंदा रखा, जिसने वैदिक भारत के मस्तक को कभी आक्रांताओ के सामने झुकने नहीं दिया.

कौल का दावा है कि दिद्दा की कहानी मेरे कुल की गाथा है, जो मुझे विरासत में मिली और मैंने 6 साल के अथक रिसर्च ने उसे दुनिया के सामने रखा. 'कश्मीर की रानी दिद्दा' ही वो एक मात्र किताब है जिसमें दिद्दा का पूरा जीवन काल और उसका राष्ट्र निर्माण में योगदान, उसकी वीरता के किस्से और उसका का चरित्रवान होना दर्शाया गया है.

कौल का यह दावा भी है कि दिद्दा ने महमूद गज़नवी को एक नहीं दो-दो बार हराया और यह तथ्य भी सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की किताब में विस्तार से दर्ज है. याद रहे की आजतक.इन ने मार्च 2019 में ही अंग्रेजी में 'दिद्दा -द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' की समीक्षा प्रकाशित की थी.

उस समीक्षा के अनुसार, लोहार राजवंश (आज का हरियाणा, पंजाब, पुंछ राजोरी जिसका भाग था) में जन्मी एक खूबसूरत नन्हीं बच्ची को उसके माँ बाप सिर्फ इसलिए त्याग देते हैं कि वो अपंग पैदा हुई. नौकरानी का दूध पीकर पली बढ़ी वो लड़की अपने अपंग होने को बाधा न मानते हुए युद्ध कला में पारंगत हुई और तरह-तरह के खेलों में निपुणता हासिल की. एक दिन आखेट के दौरान कश्मीर के राजा क्षेमगुप्त ने जब उस खूबसूरत राजकुमारी दिद्दा को देखा तो पहली ही नज़र में दिल दे बैठा.

राजा क्षेमगुप्त एक भला राजा था. यह जान लेने के बाद भी कि दिद्दा लंगड़ी है उसने उससे ब्याह रचाया और दिद्दा की किस्मत एक तरह से पलटी खा गयी. उसे पति का प्यार, मान-सम्मान, पुत्र रत्न तो मिला ही, साथ ही उसने क्षेमगुप्त के राज काज में भी भागीदारी निभानी शुरू कर दी. इस भागीदारी के सम्मान में अपनी पत्नी के नाम पर सिक्का जारी किया. वह ऐसा पहला राजा बना जो अपनी पत्नी के नाम से जाना गया.

'दिद्दा -द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' में उल्लिखित वर्णन के अनुसार जब सबकुछ ठीकठाक चल रहा था तभी एक दिन आखेट के दौरान क्षेमगुप्त की मृत्यु हो गई, बस फिर क्या था दिद्दा की ज़िंदगी एक दौराहे पर खड़ी हो गई. इस दोराहे में जहाँ एक तरफ पति की मृत्यु का दुःख और सती हो जाने की परंपरा थी, तो दूसरी तरफ एक नन्हे राजकुमार के राज-पाठ संभालने लायक होने तक उसके पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की ज़िम्मेदारी निभाने वाली माँ का दायित्व.

इसी द्वंद्व के दौरान मरते हुए राजा को राज्य के सुरक्षित हाथों में देने का प्रण उसे यकायक वो शक्ति दे जाता है, जिसके चलते वो सती होने से मना कर देती है. 'दिद्दा -द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' में यह पढ़ना दिलचस्प है कि कैसे समय-समय पर दिद्दा ने पुरुष सत्तात्मक समाज के बने-बनाए नियम तोड़े और अपने खुद के नियम बनाए. इसका नतीजा यह निकला कि मर्दवादी मानसिकता ने दिद्दा को डायन तक करार दिया. पुरूष समाज को यह समझना मुश्किल था कि आखिर बिना मायावी शक्तियों के कोई विकलांग लड़की चार दशक से भी अधिक समय तक समूचे कश्मीर और धरती के एक बड़े हिस्से पर राज्य कैसे कर सकती थी?

दिद्दा की कहानी एक ऐसी नायिका के जीवन यात्रा की कहानी है जो एक अनचाही अपंग कन्या से शुरू होकर, कश्मीर के राजा की बीवी बनने और फिर विधवा होने के बाद राज्य संभालने, कई युद्ध करने और युद्ध जीतने के लिए गुरिल्ला तकनीक ईजाद करने के प्रसंग से होती हुई उस दिलचस्प मोड़ से गुज़रती है, जहां संभवतः विश्व की प्रथम कमांडो सेना, एकांगी सेना के बनने का घटनाक्रम वर्णित है.

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