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ज़ीरो पीरियडः अफवाह और इश्क दोनों जिसमें एक उम्र के बाद घुटने टेक देते हैं

युवा कथाकार अविनाश सिंह तोमर का कहानी संग्रह 'ज़ीरो पीरियड' की कहानियों ने छोटे शहर के आम आदमी के दैनिक क्रियाकलापों व गली-मोहल्लों के बीच जन्म लिया है.

अविनाश सिंह तोमर के कहानी संग्रह 'ज़ीरो पीरियड' का आवरण-चित्र अविनाश सिंह तोमर के कहानी संग्रह 'ज़ीरो पीरियड' का आवरण-चित्र

इनसान जब कुछ सीखना या कहें कि अपनों को पहचानना सीख रहा होता है, कहानियां तभी उसके जीवन में आ जाती हैं. मां-दादी से कहानियां सुनने की यह प्रवृत्ति जीवन भर उसका साथ देती हैं. मानव को कहानी काफी कुछ सिखाती है तो उसका मनोरंजन भी करती है. कहानियां सुनते हुए इनसान कल्पना की दुनिया में खो जाता है. युवा कथाकार अविनाश सिंह तोमर का कहानी संग्रह 'ज़ीरो पीरियड' इसी प्रकृति का है. 'ज़ीरो पीरियड' की कहानियों ने छोटे शहर के आम आदमी के दैनिक क्रियाकलापों व गली-मोहल्लों के बीच जन्म लिया है. लखनऊ में पले-बढ़े तोमर ने पुणे में उच्च शिक्षा ग्रहण की. प्रबंधन में स्नातक और स्नातकोत्तर किया, पर मन मार्केटिंग जॉब और मीटिंग से उकता गया तो एडवर्टाइजिंग कंपनी में जिंगल लिखने लगे और कॉपी राइटर बन गए. पर वहां भी बात उतनी नहीं बनी तो वे मुंबई जा पहुंचे. और वहां नेटफ्लिक्स और अमेज़ॉन की वेबसीरीज और फिल्मों के लिए कहानियां लिख रहे हैं.

'ज़ीरो पीरियड' की ज्यादातर कहानियों का केंद्र बिंदु एक स्कूली छात्र गोलू है, जो बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा होता है. कहानीकार ने जीवन में आते बदलाव के साथ उम्र में आ रहे परिवर्तनों को अपनी कहानियों में संजोने का सार्थक प्रयास किया है. इस संकलन के किरदार मोहल्लों की छोटी-छोटी गलियों से निकलते हैं. कहानीकार गोलू के माध्यम से पाठक को जिन्दगी के उस दौर में लेकर जाता है, जब वे जवानी के दिनों में होते हैं. अविनाश ने उन अफवाहों को भी शामिल किया है जो अंधविश्वास व भय के कारण फैलती हैं. जिन्दगी के खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ इस कहानी संग्रह की कुछ कहानियों के अंश पर नजर डालते हैं.

आलू, कचालू बेटा कहां गए थे ?
दिसंबर का महीना, बाहर गली में कोहरा और पाला अपने चरम पर था. हाथ को हाथ नहीं दिख रहा था. एक अजीब-सा ठहराव माहौल में, हर पेड़-पौधा, चींटी, कुत्ता, बिल्ली, चिड़ियां सब-के-सब ठिठुर से बैठे हुए. पूरी गली एक सफ़ेद चादर में लिपटी हुई. माहौल में एक डरावना सन्नाटा. एक हल्की-सी आवाज भी ख़ामोशी के कंधे पर चढ़कर बहुत दूर तक गूंजती है. इसी आवाज और ख़ामोशी के बीच अलसाते-अंगड़ाते न जाने कितने ही सपने, मसले, रोजमर्रा के लफड़े, हुज्जतें और भी जाने क्या-क्या. ये छोटा-सा मोहल्ला दुबक कर लेटा हुआ है समय की रजाई में. जिंदगी की रफ़्तार अभी घड़ी की सुई से थोड़ा धीरे है...

कहानीकार ने इस कहानी में सर्दी के दिनों में जलते अलाव और उसके आस-पास के दृश्य को बेहतरीन तरीके से चित्रण किया है. इस दृश्य की वजह से पाठक कथा से जुड़ता है. इस कहानी का मुख्य पात्र गोलू जो बोर्ड की परीक्षा दे रहा था. यह कहानी उसके ईर्द-गिर्द घूमती है. कहानी पढ़ते वक्त पाठक के समक्ष कहानी के दृश्य जीवंत हो जाते हैं और इसकी संवादशैली पाठक को बांधे रखती है.

आसमान से गिरा गुब्बारा
कोई नहीं जानता कि वह कौन है, किसी को नहीं पता. वह आया कहां से और कहां जाएगा. बस एक बात जो पत्थर की लकीर-सी सच है कि वह मार सकता है कहीं से, कभी भी, किसी को भी. घर बाहर, अंदर, बाथरूम में, गार्डन में, रेल के कूपों में, आंगन में, चाय के बागान में, मंदिर के अंदर, रजाई में, क़ब्रिस्तान में, नानी के यहां, अमेरीका में, कहीं भी. वह दीवार के अंदर भी आ जाता है, और कंबल मुंह तक ओढ़ लेने से भी उससे नहीं बचा जा सकता. उसकी एक-दो नहीं, करोड़ों आंखें हैं, जिनमें एक्स-रे हैं, जो दुनिया के हर इनसान को एक साथ देख रही हैं. वह नाश्ते में बच्चे खाता है, दिन के खाने में मेमने और रात में ज़िंदा इनसान का दिल...

अविनाश इस कहानी के माध्यम से समाज में अंधविश्वास के कारण फैलती अफवाहों, जिनसे लोग दहशत में रहने को मजबूर हो जाते हैं, की बानगी पेश करते हैं. यह कहानी चोटी कटवा और सिल टांकने वाले कीड़ा जैसी अफवाहों से उपजी है. पाठक को वर्तमान परिवेश में अंधविश्वास की अफवाहों की सच्चाई दिखाने का अविनाश का प्रयास सफल रहा है. लेकिन जिस शब्द का प्रयोग लेखक ने पाठक को बांधने के लिए किया है, उस शब्द से बचा जा सकता था. संवाद को मजेदार बनाने के लिए कई बोल्ड शब्दों से रोचकता तो आ सकती है, पर इससे पाठक को क्या संदेश देना चाहते हैं, यह जिम्मेदारी भी लेखक की होती है. लिखते समय शब्दों का चयन सही होना चाहिए. शब्द का छपने के बाद उसका और प्रभाव बढ़ जाता है.

रिश्तों के भी रूप बदलते हैं!
गोलू चुपचाप पापा के कमरे में घुसा, उनकी पंद्रह साल पुरानी शेविंग किट में से रेजर निकाली और सरपट दौड़ा बाथरूम में. इस शेविंग किट को वह तकरीबन दस साल से तो देख ही रहा था. देखा जाए तो घर में उस किट का ओहदा और रिश्ता गोलू से ऊंचा ही था! छोटा वाला शीशा जो वह छुपाकर बाथरूम में लाया था, खुद को उसमें देखकर उसे अपनी जिंदगी का सबसे अहम फैसला लेना था! गोलू के चेहरे पर अब मूंछ की रेखा आ चुकी थी, पर इतनी नहीं कि उन्हें साफ किया जाए, और इतनी भी नहीं कि इग्नोर किया जा सके...

कथाकार इस कहानी में शीर्षक के साथ न्याय करता है और किशोर उम्र में आने वाले परिवर्तनों को बखूबी से उकेरा है. स्कूल से कॉलेज तक के सफर में आते शारीरिक और मानसिक बदलाव के साथ रिश्तों में परिवर्तन को भी बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत करने में कथाकार सफल रहा है.

स्कूल के खट्टे-मीठे अनुभवों का भी इस संकलन की कहानियों में बड़ी खूबसूरती से चित्रण किया गया है. स्कूल के दृश्य जीवंत हैं. चर्चित कथाकार और नई वाली हिंदी का चर्चित नाम दिव्य प्रकाश दुबे लिखते हैं कि अविनाश की कहानियां पढ़ना अपनी खोई हुई स्लैमबुक को फिर से पा लेने जैसा है. यह कहानी संग्रह, पाठक को अपनी पुरानी यादों में खो जाने पर मजबूर कर देगा. संग्रह में कुल 12 कहानियां हैं. प्रकाशन हिंद युग्म, एका ने संयुक्त रूप से किया है. ज़ीरो पीरियड की पृष्ठ संख्या 152 है और कीमत 199 रुपए है.

#यह समीक्षा इंडिया टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट में ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा कर रहे छात्र और साहित्य तक/ साहित्य आजतक में प्रशिक्षु अक्षय दुबे ने लिखी है.

 

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