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पुस्तक समीक्षा- यूं ही साथ-साथ चलतेः कविताओं में दाम्पत्य, जीवन के साज पर सरगम-सी लय

इकतीस वर्ष के सुखद सान्निध्य में जहां कुछ लोगों के दाम्पत्य में दरारें पैदा होने लगती हैं, वहीं इस पूरे कालखंड को किसी साझा कविता संग्रह से उत्सवी बना दिया जाए, यह बहुधा कम कवियों के भाग्य में होता है.

कविता संकलन 'यूँ ही साथ-साथ चलते' का आवरण चित्र कविता संकलन 'यूँ ही साथ-साथ चलते' का आवरण चित्र

'स्वांत: सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबद्ध मति मंजुल मात्नोवति' कह कर तुलसी ने जिस स्वांत: सुखाय की बात रचना में की थी मुझे आज भी लगता है कि कवि दूसरों के सुख दुख की बात करता हुआ भी रचना में एक आत्मिक सुख प्राप्त करता है. अपनी रचनाओं में बहुधा वह चराचर जगत के सुख-दुख की बात करता हुआ भी निज को कहीं न कहीं प्रक्षेपित कर रहा होता है. उसके निज में ही दुनिया का बृहत्तर भूखंड समाया हुआ होता है क्योंकि वह यह मानता है, यह निज है और वह पराया, इसकी गणना लघुचेतस व्यक्तियों का काम है. कुछ ऐसी ही अनुभूति सच्चिदानंद जोशी और मालविका जोशी के समवेत संग्रह 'यूँ ही साथ-साथ चलते' को देख-पढ़ कर हुई. भरत तिवारी के सुघर आकल्पन का तो कहना ही क्या जब विभिन्नि जीवन मुद्राओं में मालविका और सच्चिदानंद को कैनवस पर उनकी कविताओं के साथ सजाया गया हो.

इकतीस वर्ष के सुखद सान्निध्य में जहां कुछ लोगों के दाम्पत्य में दरारें पैदा होने लगती हैं, वहीं इस पूरे कालखंड को किसी साझा कविता संग्रह से उत्सवी बना दिया जाए, यह बहुधा कम कवियों के भाग्य में होता है. 'यूँ ही साथ-साथ चलते' संग्रह निज के संबंधों का साक्षी होकर भी कविता में जिस दाम्पत्य राग की सृष्टि करता है वैसा एक अकेला उदाहरण जिस कवि में दिखाई पड़ता है वे हैं केदारनाथ अग्रवाल. अग्रवाल ने जिस तरह राग रस काम, गार्हस्‍थ्‍य और श्रृंगार में भीगी रचनाएं लिखी हैं कुछ कुछ उसी नक्शेकदम पर कवि सच्चिदानंद जोशी और मालविका चलते प्रतीत होते हैं यद्यपि इनकी रचनाओं में भाषा और शिल्प का संयम देखते ही बनता है.

मालविका मानती हैं कि दाम्पत्य के महाकाव्य में नौ रसों का परिपाक होता है. यानी पति-पत्नी के बीच जो भी मीठी टकराहटें होती हैं सबके मूल में इन नौ रसों की सुखद चासनी होती है. विवाह के भोज में जैसे नौ कड़ाह चढ़ कर भोज को सुस्वातदु बना देते हैं इन कविताओं के रचाव में भी किसी एक रस का नहीं बल्कि नौ रसों का परिपाक है. रंगमंच, नृत्य, संगीत और संस्कृति की साझा रुचियों के चलते निकट आए और फिर 'जो संबंध स्वयंवर का सिंदूर से/ मेरा और तुम्हारा वह संबंध है' इस भाव को जीने वाले मालविका और सच्चिदानंद जैसे एक दूसरे के प्रति-पूरक बनते जाते हैं और एक दूसरे का अहम् वयम् में पर्यवसित होने लगता है.

मूलत: और अंतत: अपने को रंगकर्मी मानने वाले सच्चिादानंद जोशी ने लगभग अपनी ही रुचियों की सरणि पर चलने वाली मालविका का हाथ थामते हुए यह नहीं सोचा होगा कि यह जोड़ी रंगकर्म के साथ-साथ कविता में भी एक खास रंग भरेगी, जिसकी तूलिका संवेदना की स्याही से अपने कवि-चित्त की भित्ति पर एक ऐसी अल्पना उकेरेगी जिसमें रागबद्ध जीवन की लय अनुस्यूत होगी. कविता की कॉफी टेबुलबुक सरीखी यह पुस्तक एक युग्म रचती है. इंद्रिय संवेद्य अनुभूतियों के रास्ते से गुजरती हुई इस लंबे सफर के अहसासात को न केवल अपनी तमाम मुद्राओं से चाक्षुष रंग देती है बल्कि कविता को निजता की परिधि से पार ले जाते हुए अनुरागी चित्त के भीतर से निस्सृत अनुभवन की छुवन से बांध लेती है. कभी एक गीत पढ़ा था संभवत: हिंदी कवियों के प्रेमगीत नामक चयन में- क्षेमचंद सुमन ने जिसका संपादन किया था. ''मत गूँथो मेरा हीरक मन अपनी कोमल बरजोरी से/ नयनों की रेशम डोरी से.'' कुछ ऐसा ही हीरक मन यहां कविद्वय का दिखता है तो ऐसी कोमल बरजोरियां भी जो जीवन के भूगर्भ में बहती जलाशयता का प्रमाण देती हैं. सारे कौल करार यहां मन के संवेगों को एक बार फिर से बहने का अवसर देते हैं. भारतभूषण के एक गीत का अंश है: ''साड़ी की सिकुड़न सिकुड़न में किसने लिख दी गंगा लहरी/ चितवन चितवन ने पूरी है रंगोली सी गहरी गहरी. अवतरित हो रहे नख शिख में सारे पावन सारे शोभन.'' कहना न होगा कि कविताएं मुक्त छंद में होती हुई भी ऐसे ही गीतात्ममक रचाव से भरी हैं.

इस संकलन की कविताएं केवल आध्यात्मिक और दार्शनिक सुख ही नहीं देतीं वे सांसारिकता के जीवन संगीत से भी जोड़ती हैं. यथार्थ के ऊबड-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए जीवन में हम जो कुछ नया नकोर बीन बटोर पाते हैं वही जिन्दगी की चरितार्थता होती है. ये कविताएं दोनों हाथों से बटोरी हुई सीपियां हैं, जिनमें एक श्वेत धूसर चमक है और सीपियां बटोरने जैसा सुखद अहसास भी. इनमें सांसों का संगीत है, धड़कते दिल के गीत हैं, धुले-धुले से मन हैं, मन की गठरी है, हसरतों की बारंबारता है, तुम से तुम तक तुक मिलाती तुकबंदियां हैं, आंखों की नम कोर है, जीवन के बिखरे पन्नों  को सलीके से पढ़ने की चाहत है, सपनों के कैनवस मे रंग भरने की ख्वाहिश है, असीमित आकाश और अविरल आकांक्षाएं हैं. एक पुरुष विवाह के बाद अपने घर में होता है पर स्त्री कालांतर में उस घर में जैसे खो जाती है. वह पूछती है:
वो घर तो तुम्हारा ही है
दिल के जिस कोने में
तुम रहते हो
लेकिन उस घर में मैं कहां खो गई  
क्या मुझे तुम बता सकते हो?' (मालविका जोशी, पृष्ठ 24)

इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे अचानक ठाकुर प्रसाद सिंह के 'वंशी और मादल' की याद हो आई. एक गीत में आदिवासी लड़की अपने प्रिय से कहती है: 'मुझे लौटा दो मेरा क्वांरापन/ मेरा जीवन धन.' अब इस शिकायत का भला क्या उत्तर हो सकता है. कौन लौटा पाया है या लौटा पाएगा एक स्त्री को उसका क्वारांपन. सच्चिदानंद एक कविता 'सामान''में कहते हैं-
मैं भी तो देखूं कैसे भेज सकोगी
ओस की बूँदें
आंसू के कतरे
हँसी ओठों की
और सांसों की थरथराहट
कैसे भेजोगी इन्हें. (सच्चिदानंद जोशी, पृष्ठ 29)

दाम्पत्य के अहसास को जीने वाली इन कविताओं में जीवन की भीनी-भीनी खुशूब आती है तो ऐसे अहसास भी जो जीवन को कुछ -कुछ बेरंग बेनाम चिट्ठियों जैसा भी बना देते हैं कि कवयित्री को कहना पड़ता  -

आज
एक सूखे पेड़ की तरह हँ मैं
जिस पर
कोई पत्ता नहीं सुख का
कोई फूल नहीं खुशी का
और ना ही फल उत्साह का है (मालविका, पृष्ठ 30)

प्राय: पुरुष अपने को सर्वज्ञ मानता है. पर जैसे धरती की थाह ले पाना कठिन है, स्त्री को पढ़ सकना भी. यहां तक कि उसकी आंखों की कोर पर अंटके आंसूँ सुख के हैं या दुख के, पहचान पाना कठिन है. तभी तो कवि कहता है:-  
समुद्र हो तुम अथाह समुद्र
जिसकी था पाना कठिन है.
कवयित्री जहां स्त्री होने के नाते कभी भी इतनी बड़ी नहीं होना चाहती कि उसके अंदर का सारा रोमांस सूख जाए वहीं कवि कहता है-
मैं फूल पलाश का बैठा हूँ इस आस/
कोई तो रंगों के बहाने आए मेरे पास.

यों तो ये सारी निज के दायरे की कविताएं हैं. किसी पराई पीर के अहसास से दूर. बल्कि जीवन इतना चाकचिक्य दिखे, किसी चिकने संगमरमरी फर्श की तरह, यह देख कर रोमांच होता है. जिस तरह की आज की दुनिया है, रिश्ते न बनते देर लगती है न टूटते. जीवन का छंद किस पल टूट जाए क्या भरोसा. पर जिस साज पर यह सरगम दोनों कवि दंपतियों ने मिल कर रचा है, वह जीवन का साज है. जीवन किसी सरगम-सा सध सके, राग रागिनियों की बंदिश में ढल सके इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता. इन कविताओं में चाहे कविता के तत्व कम हों, जीवन के, उल्लास के, ख्वाहिशों के, सपनों के तत्व कहीं कमतर प्रतीत नहीं होते हैं, इस उल्लास में पल्लव-सी ताज़गी है, जिस पर दुनियावी झंझावातों की कोई धूल अभी नहीं पड़ी है. ''यूँ ही साथ साथ चलते'' शीर्षक से बशीर बद्र याद हो आते हैं यह कहते हुए कि--
कभी शब के फूल को चूम कर
कभी
यूं ही साथ-साथ चलें सदा
कभी खत्म अपना सफर न हो.

पुस्तक: यूं ही साथ-साथ चलते
रचनाकार: मालविका-सच्चिदानंद जोशी
विधाः कविता
प्रकाशक: सान्निध्य बुक्स, दिल्ली- 110031
पृष्ठ संख्या: 72
मूल्यः रुपए 500

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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