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बुक रिव्यू: ये कहानी है लश्कर के आतंक की

आतंकवाद हमारे देश के साथ-साथ पूरे विश्व के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है. ना जाने कितने ही मासूम लोग इसकी जद में आकर अपनी जान गवां चुके हैं. बात आतंक की हो तो उसमें लश्कर एक बड़ा नाम है. इस किताब में इसी आतंकी संगठन के अंदरूनी चेहरे को दिखाने की कोशिश की गई है.

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किताब का नाम: लश्कर, आतंक के सात दिन
लेखक: मुकुल देवा
अनुवाद: कविता पंत
पब्लिशर: हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया
कीमत: 125 रुपये

आतंक हमारे देश के साथ-साथ पूरे विश्व के लिेए एक बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है. ना जाने कितने ही मासूम लोग इसकी जद में आकर अपनी जान गवां चुके हैं. बात आतंक की हो तो उसमें लश्कर एक बड़ा नाम है. इस खूंखार आतंकी संगठन ने भारत में अब तक ना जाने कितने ही आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया है. इस किताब में इसी आतंकी संगठन के अंदरूनी चेहरे को दिखाने की कोशिश की गई है.

हालांकि किताब काल्पनिक घटनाओं के आधार पर लिखा गया है, लेकिन कहानी में जान डालने के लिए कई सच्ची घटनाओं को भी इसमें शामिल किया गया है. लेखक ने इस किताब में तकनीकी विवरण, बमों के बारे में विशेष जानकारी और उसे बनाने का तरीका, पुलिस सेना या सैन्य संगठन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार और दांव-पेंच, अदालती और जांच प्रकियाओं का जिक्र भी किया है. लेकिन कई मौकों पर ऐसी जानकारियों को जानबुझकर अधूरा या अस्पष्ट रखा गया है ताकि किसी भी सूचना का दुरुपयोग ना हो सके.

किताब की कहानी 29 अक्टूबर 2005 से शुरू होती है. 29 अक्टूबर 2005, दीवाली और ईद की एक शाम पहले. दिल्ली के कई इलाके जहां दिल्ली वाले त्योहारों की खुशियां मना रहे थे तभी एक के बाद एक कई बम फटे. ये किताब आतंकी और आम आदमी दोनों के नजरिए को दर्शाती है. किताब में ये भी बताया गया है कि कैसे एक भारतीय युवा भटक कर आतंक के रास्ते पर निकल पड़ता है.

इस किताब को पढ़ने के बाद आपको लश्कर जैसे आतंकी संगठनों के काम करने के तरीके में जानकारी मिल सकती है. हां, कहीं कहीं पर आपको कहानी की रफ्तार थोड़ी धीमी लग सकती है. किताब में कई ऐसे मोड़ हैं जहां आपको लगेगा कि अब सब कुछ बोरिंग सा होने वाला है लेकिन फिर कुछ ऐसा होता है कि आप दोबारा रोमांचित महसूस करने लगेंगे.

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