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देवी पूजन के तमाम रहस्यों से पर्दा उठाती है यह किताब

क्या कभी ये सवाल लक्ष्मी की मूर्ति को देखकर मन में उठा कि जहां कहीं लक्ष्मी की प्रतिमा दिखाई देती है वहां हाथी और उसकी सूंड से बहती जलधारा भी दिखती है. क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश की कि आखिर इसके पीछे क्या तर्क हो सकता है.ऐसे तमाम सवालों का जवाब ढूंढती है देवदत्त पटनायक की पुस्तक देवी के सात रहस्य.

पुस्तक का कवर पुस्तक का कवर

दीपावली के मौके पर लक्ष्मी यानी धन की देवी के अलग-अलग रूपों में की जाने वाली उपासना ही इस त्योहार का केंद्र है. लेकिन क्या कभी ये सवाल लक्ष्मी की मूर्ति को देखकर मन में उठा कि जहां कहीं लक्ष्मी की प्रतिमा दिखाई देती है वहां हाथी और उसकी सूंड से बहती जलधारा भी दिखती है. क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश की कि आखिर इसके पीछे क्या तर्क हो सकता है.

लक्ष्मी अगर सुख और समृद्धि का प्रतीक है तो हाथी एक शाकाहारी पशु होने के साथ साथ देवताओं में इंद्र की सवारी के तौर पर देखा जाता है. ऐसे में लक्ष्मी के साथ हाथी की जलधारा बहाती सूंड़ का आपस में क्या रिश्ता है. देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं. और कथाओं के चित्रण में लक्ष्मी को शेषनाग पर लेटे विष्णु के पैर दबाते दिखाया जाता है. इसके बावजूद स्वर्ग के तमाम वैभव और ऐश्वर्य का स्वामी इंद्र को ही क्यों नियुक्त किया गया है. इसके पीछे क्या वजह हो सकती है. कहीं लक्ष्मी का अर्थ लक्ष्य तो नहीं .

कहा जाता है कि शक्ति का प्रतीक देवी दुर्गा वैवाहिक वस्त्र और आभूषण पहने होने के बावजूद केश खुले रखती हैं. और ये भी व्याख्या की गई है कि उनके खुले केश किसी एक अवस्था के प्रति उनकी मनाही का प्रतीक है. तो क्या दुर्गा प्रकृति और संस्कृति के बीच, किसी छोर पर खड़ी हैं. या फिर इसका कोई और रहस्य है. ये सवाल क्या कभी किसी के मन को विचलित कर सके. भारत की तांत्रिक परंपरा के मुताबिक तीन प्रमुख देवियों लक्ष्मी, सरस्वती और गौरी के प्राकट्य का क्या किस्सा है और इस किस्से में तीनों देव ब्रह्मा विष्णु और महेश की क्या भूमिका है. क्या कोई ये सब जानता है. या किसी के भी मन ऐसे सवाल दस्तक देते हैं.

लेकिन पौराणिक विषयों पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले देवदत्त पटनायक ने ऐसे ही कौतूहल भरे सवालों को पूरी शिद्दत से टटोला है और दुनिया भर में हुए शोध के साथ साथ वेद और पुराणों में ऐसे सवालों की जो भी व्याख्या की गई है उसे संकलित करके उन्हें एक किताब की शक्ल में प्रस्तुत करने का वृहद काम किया है. देवी के सात रहस्य नाम की पुस्तक में देवदत्त पटनायक ने यूनान से लेकर हिन्दुस्तान तक जहां कहीं भी देवी पूजन की महत्ता है, उसकी न सिर्फ व्याख्या की है बल्कि समाज में देवीयानी स्त्री के विभिन्न स्वरुपों का ऐसा वर्णन भी करने का हौसला दिखाया है, जिसके बारे में शायद हमारा समाज सोचने की हिम्मत नहीं रख पाता.

इसके साथ ही साथ देवदत्त पटनायक ने इसी पुस्तक के जरिए कुछ ऐसे सवालों को भी छूने का प्रयास किया, जो उठे तो लेकिन भाव और वर्चस्व के संघर्ष में कहीं लुप्त हो गए. जैसे लक्ष्मी का विष्णु के चरण दबाना क्या ये पुरुष वर्चस्व का प्रतीक है. या काली शिव की छाती पर अगर खड़ी दिखाई दे रही हैं तो क्या ये स्त्री सत्ता का उच्च शिखर है? शिव अर्धनारीश्वर हैं तो क्या ये यौन समता का उद्गोष है. यानी तमाम हिन्दू धर्म से ज़ुडी कथाएं प्रतीक और रीति-रिवाज हमारे समाज की खूबी और खामियों के बारे में क्या बताते हैं. वो कौन सी बात है जो इन प्रतीकों के जरिए हमारे सच को उजागर करने की कोशिश की गई है, और जिसे अभी तक व्याख्या करके समाज में प्रसारित और प्रचारित नहीं करवाया जा सका.

हिन्दुत्व में स्त्री को देवी का रूप माना गया है. देश क्या दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में देवी के अलग अलग रूपों में आराधना और अनुष्ठान का चलन है. प्रकृति से लेकर माता तक को देवी का स्थान दिया गया है. मानवता की श्रेष्ठता और ज्ञान का अंतिम चरण भी देवी को ही माना गया है. लेकिन देवी से जुड़े प्रतीक और कर्मकांडों को लेकर आदिकाल से बहस होती रही है. लेकिन उनका क्या मतलब रह जाता है बस इन्हीं बातों को समझाने का प्रयास देवदत्त पटनायक ने देवी के सात रहस्य में किया है.

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