किताब: चूड़ी बाज़ार में लड़की
लेखक: कृष्ण कुमार
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
कीमत: 300 रुपये (हार्डबाउंड)
स्त्री को लेकर प्रचलित मान्यताओं का घेरा 18 वर्ष की आयु की लड़की को जिस पूर्णता से कसता है, वह किसी अन्य आयु पर लागू नहीं होता. इस उम्र में परिवार, समाज, धर्म, नैतिकता यह सबकुछ एक साथ हावी होने लगते हैं. ऐसा लगने लगता है जैसे वह लड़की 18 की होकर गुनाह कर बैठी. एक अलग तरह के भय को साथ लेकर जीना उसकी आदत में शुमार हो जाता है. उसे तमाम हिदायतें दी जाने लगती हैं... ऐसे मत चलो, ऐसे मत रुको, ऐसे मत बोलो, ऐसे मत देखो... और फिर वह एक भय के साथ जीने लगती है. सच कहें तो वह भय नहीं आतंक होता है. भय तो उसे कहते हैं जो कभी-कभार लगे, जैसे अंधेरे से लगे तो उजाले में आकर दूर हो जाए, पिता से लगे तो उसके ऑफिस जाने पर हट जाए. परिवार, समाज, धर्म, नैतिकता का डर तो समूची चेतना में पसर जाता है, लड़कियां उसके साथ जीना सीखती हैं और इस तरह जीना उनके लड़की होने की परिभाषा बन जाता है.
भारत के संदर्भ में देखें तो नारी एक जटिल सामाजिक रचना है. मानव के रूप में वह पैदा भर होती है, पर जन्म के साथ ही उसकी पुनर्रचना का उपक्रम संस्कृति के कठोर औजारों के बल से आरंभ हो जाता है. संस्कृति के इसी कठोर औजारों पर जब एक सधे हुए शिक्षाविद् की नज़र पड़ती है तो उसके लिए समाज के इस सांस्कृतिक चेहरे की क्रूरता को देखना काफी कष्टदाई हो जाता है. वह बेचैन हो उठता है और फिर शुरू होती है उसकी अपनी यात्रा. उसे याद आ रही होती है बचपन की वह घटना जहां वो लड़कियों को अपनी मां एवं अन्य औरतों के साथ चूड़ी की दुकान में जाते देखा करता था. जहां कोई लड़की चूड़ी पहनने के लिए दुकानदार के सामने अपना हाथ बढ़ाती थी. अब उसे वह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना जान पड़ती है. अब उसे समझ में आता है कि चूड़ी पहनाए जाने की इच्छा का जन्म और चूड़ी को अपनी सुंदरता का साधन मान लेने का भाव छोटी लड़की को पुरुष-प्रधान सभ्यता में ढालने के सहज चरण हैं.
'चूड़ी बाज़ार में लड़की' पांच अध्याय में सिमटी भारतीय स्त्री की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक व्यवस्था पर गहन पड़ताल करती एक क्ला़सिक कृति है. इस पुस्तक में घर और परिवार में लड़कियों के प्रति होने वाले व्यवहार और इससे उसके जीवन में क्या बदलाव होता है, इसका काफी सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है. तमाम तरह के साहित्यिक और सांस्कृातिक मिथकों पर गहन चिंतन के साथ ही एक बच्ची के बचपन से लेकर जवानी और फिर उसके कई रूपों में स्थापित होने तक अर्थात बच्ची से युवती और फिर औरत बनने की पूरी प्रकिया कैसे पुरुषवादी सोच के इर्द-गिर्द सामाजिक और सांस्कृतिक क्रिया-कलापों द्वारा संचालित हो रही है, लेखक कृष्ण कुमार ने इसका विश्लेलषण इस पुस्तक में काफी गहराई से किया है.
किसी पुरुष द्वारा सफल महिला को सशंकित होकर देखना उस पुरुष के सामाजिक और सांस्कृतिक संकट को दर्शता है. पहले मेरी समझ कुछ ऐसी ही थी लेकिन इस पुस्तक का अध्ययन करने के बाद यह समझ बनी कि वह पुरुष ही नहीं समाज में प्रचलित मान्यताओं, सांस्कृतिक मिथकों और नैतिकता के नाम पर एक घेरे में महिलाओं को बांधने का चलन एक प्रक्रिया है जिसका संचालन बड़े सुनियोजित ढंग से परिवार, समाज, शिक्षा और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए किया जा रहा है. वह पुरुष तो सिर्फ उसका एक अंग मात्र है. जरूरत है जहां भी और जिस स्वरूप में ऐसे मिथक सामने आएं उस पर खुलकर चर्चा हो. लड़के और लड़कियों के सामने चर्चा हो. इस पुस्तक के माध्यम से शिक्षाविद् कृष्ण कुमार ने एक बच्ची से औरत बनने की उन सारी सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं को काफी संवेदनशीलता के साथ बयान किया है.
और एक बात यह भी कि मिथक का महत्व शाश्वत है, मगर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उसकी भूमिका इतिहास के पैमाने पर रखी जाकर बदली जानी चाहिए. भारत की स्त्रियों के जीवन में ऐसा क्यों नहीं हुआ, यह एक बड़ा प्रश्न है जिसके उत्तर की टोह में जाने पर हमें पितृसत्ता, संस्कृति और राज्य (शिक्षा को लेकर) के बीच गठबंधन का मजबूत ढांचा नज़र आएगा.
आधुनिक युग में जब लोकतांत्रिक राज्य ने व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तियों के बीच समानता को कानूनी संरक्षण दिया है, भारतीय स्त्री के जीवन से उन मिथकों की छाया हटनी चाहिए जो उसे नारी की असहायता का संदेश देते हैं. ये मिथक कभी धर्म की आड़ में तो कभी परंपरा और प्रचलन की आड़ में लड़कियों के दिमाग पर अपनी पकड़ बनाते हैं और शिक्षा इस पकड़ को ढीला नहीं कर पाती. आज की लड़कियों को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए ताकि उन परिस्थितियों को समझने में उन्हें सहूलियत मिल सके जो अनावश्यक रूप से उनकी प्रगति की राह में बाधा हैं.