किताब का नाम- एडवांटेज लव
लेखिका- माधुरी बनर्जी
प्रकाशक- रुपा पब्लिकेशन
कीमत- 195 रुपये (पेपरबैक)
तो भई! कहानी में एक लड़का है और एक लड़की है. दोनों की मुलाकात होती है. दोनों में प्यार होता है. परिस्थितियां भी पक्ष में हैं. माता-पिता भी राजी हैं और फिर दोनों शादी करके एक खुशहाल जीवन बिताते हैं.
क्या हुआ मजा नहीं आया? तो एक दूसरी कहानी सुनो...
एक लड़का, एक लड़की. दोनों की मुलाकात होती है. शुरुआती तकरार फिर प्यार. लेकिन समय ठीक नहीं है भइया और मां-बाप को लेकर भी समस्या है. दोनों अलग हो जाते हैं. फिर जीवन में दूसरा प्यार आता है. लेकिन अब आगे क्या? क्या बाद वाले के साथ सेटल होकर कहानी खुशी-खुशी आगे बढ़ती है या फिर पिछला प्यार पीछा कर पछाड़ मार जाता है?
तो भइया कहानी में ट्विस्ट है और यकीन मानिए यह ट्विस्ट ऐसा है कि आप किताब के पहले पन्ने से लेकर 191वें पन्ने को एक ही दिन में चट कर जाना चाहेंगे. लेकिन एक और बात यह सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है. इसमें द्वंद्व है. समय की सीख है और बदलते समय के साथ प्यार की बारीकी और उसका अनुभव भी है.
माधुरी बनर्जी की किताब 'एडवांटेज लव' प्यार की ऐसी ही परिस्थिति और प्रेम से मिलती सीख का ताना-बाना है, जहां दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में तृषा की मुलाकात वेदांत से होती है. तृषा होनहार है, डिबेट में उसकी कला बेहतरीन है और यहीं वह वेदांत से टकराती है. लखनऊ में पली-बढ़ी तृषा के माता-पिता प्रोफेसर हैं, जबकि वेदांत महाराष्ट्र के एक मशहूर राजनीतिज्ञ का बेटा है. तृषा और वेदांत दोनों ही डिबेट में खुद को ऊपर साबित करने में जुटे हैं, लेकिन इसी बीच एक डिबेट कंपीटिशन के दौरान तृषा अपनी जीत की घोषणा से पहले बेहोश हो जाती है.
अब अस्पताल का कमरा और लड़का-लड़की. लड़का-लड़की हैं तो बातचीत है और बातचीत है तो धीरे-धीरे प्यार तो होना बनता है. और जब प्यार हो ही गया तो कॉलेज की सड़कों से लेकर बगीचों में प्यार के मनमौजियों पर हर किसी की नजर रहना कोई नई बात नहीं है. इस बीच वेदांत स्टूडेंट इलेक्शन में खड़ा होता है. वह चाहता है कि उसे अपने पिता की पार्टी में युवा मोर्चा में जगह मिल जाए. वेदांत की इस कर्मभूमि में तृषा भाषण लिखने से लेकर रैलियों तक में उसका साथ देती है. वेदांत भी तृषा के भाषणों के बदले अपनी कविताओं और पसंदीदा रेस्त्रां में खाना खिलाकर उसके दिल में अपने लिए प्रेम की मूरत बनाए रखता है.
कहानी में ट्विस्ट
तृषा और वेदांत की प्रेम कहानी प्रेम नगर के सही रास्ते पर थी, लेकिन तृषा के मन में वेदांत संग अपने रिश्तों को लेकर कई सवाल उभरते हैं, जिसका जवाब वेदांत नहीं दे पाता है. वह वेदांत के साथ रिश्ते के भविष्य को लेकर कई बार चर्चा करती है लेकिन यह चर्चा बहस में बदलती है और दोनों के रिश्तों में दूरी का कारण ही बनती है. इस बीच 'ग्रेजुएशन डे' आता है. तृषा के माता-पिता भी वेदांत के माता-पिता या यह कहें कि दोनों एक दूसरे को कुछ ज्यादा रास नहीं आते और इस तरह तृषा और वेदांत अलग हो जाते हैं.
अभिमन्यु की एंट्री
तृषा टूट जाती है और अपने अकेलेपन से पार पाने के लिए यूनिसेफ में एक नौकरी ढूंढती है. यहां एक प्रोजेक्ट के दौरान उसकी मुलकात अभिमन्यु लक्ष्मण से होती है. अभिमन्यु एक नेशनल लेवल टेनिस प्लेयर है, लेकिन तृषा इस बात से अनजान है. वह अभिमन्यु से एक आम मध्यमवर्गीय इंसान की तरह मिलती है.
तो अब क्या? क्या तृषा अभिमन्यु में अपना खोया प्यार पाती है? क्या दोनों की जिंदगी पटरी पर आती है? या फिर वेदांत लौटता है? तृषा किसे चुनती है वेदांत या अभिमन्यु को? अतीत और वर्तमान की इस प्रेम कहानी में जीत किसकी होती है? माधुरी बनर्जी की 'एडवांटेज लव' इन सारे सवालों के जवाब को लगभग 200 पन्नों में समेटती है.
'एडवांटेज लव' मौजूदा समय की एक ऐसी लड़की तृषा की कहानी है जो अपनी दोस्त जूही की मदद से खुद को अपनी चाहत और अपनी इच्छाओं को जानने की कोशिश करती है. हालांकि इसके बावजूद वह अपने करियर को लेकर संजीदा है और प्यार में चोट के बाद भी ऊंचाईयों तक पहुंचती है. तृषा का किरदार खुद को आज की हर उस लड़की से जोड़ता है जो सच्चे प्यार की खोज में है. तलाश उस प्यार की जो उसकी स्वतंत्रता से प्रेम करे, उसे ईज्जत दे और हां, उसके लिए कविताएं भी लिखे.
बनर्जी की किताब में कई मशहूर हस्तियों की कविताएं हैं जो पाठक को प्रेम की अनुभूति के सागर में गोते लगाने के लिए मजबूर करती हैं. किताब के पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक आप तृषा के साथ रहते हैं. घटनाओं से खुद को जोड़ते हैं और उसके प्रेम व द्वंद्व को महसूस करते हैं. एक लेखिका के तौर पर माधुरी बनर्जी तृषा की मर्म को स्पर्श करती हैं और पाठक को भी उसकी छुअन का एहसास दिलाती हैं.
क्या रह गई कमी...
किताब में कई जगहों पर खासकर बातचीत के क्षणों में जहां एक से ज्यादा किरदार का जिक्र है, वहां संवाद संप्रेषण की कला में लेखिका मात खा जाती हैं. वह यह स्पष्ट नहीं कर पाती हैं कि वह कब किसकी तरफ से बोल रही हैं या किसके विचार रख रही हैं. इस तरह कई जगहों पर कहानी से तारतम्य भी टूटता है और आप खुद को कहानी में भटका हुआ महसूस करते हैं. हालांकि फिर अगले ही पल कहानी आपको खुद से जोड़ लेती है और आप बतौर पाठक आखिरी पन्ने तक तृषा, उसके प्रेम, उसके द्वंद्व, उसके अनुभव और उसके विचारों के साथ बहते जाते हैं.