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नई हिंदी का जिंदा उपन्यास- दलाल की बीवी

सिने पत्रकार रवि बुले का पहला उपन्यास है दलाल की बीवी. जैसा कि परिचय से जाहिर होता है यह एक त्रासदी की कहानी है. त्रासदी जिसकी जमीन उस वक्त पर बनी है, जब ये देश भारत पहली बार मंदी नाम के आर्थिक जाल में फंसा था.

रवि बुले का पहला उपन्यास है दलाल की बीवी रवि बुले का पहला उपन्यास है दलाल की बीवी

किताबः दलाल की बीवी (मंदी के दिनों में लव सेक्स और धोखे की कहानी)
लेखकः रवि बुले
प्रकाशकः हार्पर हिंदी
कवरः पेपर बैक
कीमतः 199 रुपये
सिने पत्रकार रवि बुले का पहला उपन्यास है दलाल की बीवी. जैसा कि परिचय से जाहिर होता है यह एक त्रासदी की कहानी है. त्रासदी जिसकी जमीन उस वक्त पर बनी है, जब ये देश भारत पहली बार मंदी नाम के आर्थिक जाल में फंसा था. जब पिंक स्लिप नाम के टर्म से प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोग वाकिफ हुए थे. जब अचानक बेरोजगार होना एक दूर की कौड़ी नहीं, बल्कि हर वक्त जाहिर हो सकने वाली सच्चाई बन गया था.

ऐसे में एक ऐसे पेशे की कहानी कुछ किरदारों के सहारे हमारे सामने रवि पेश करते हैं, जो कथित तौर पर बाजार की प्रकट परिधि में हाशिये पर हैं. मगर क्या वाकई बाजार सिर्फ ऊंची बिल्डिंगों के भीतर कंप्यूटर और फाइलों पर खटर पटर करते लोगों तक सीमित है. या कि नैतिक विचलन, काई पर फिसलल और भी आगे जाकर नुमांया होती है. और इस त्रासदी के आखिर का सबक क्या है.

ये कहानी एक सीधी रेखा पर नहीं चलती. इसमें जादुई यथार्थवाद है. जब आदमी जानवर बन चला हो तो जानवरों का भी आदमी बनना एक स्वाभाविक सच्चाई सा लगता है. ऐसे में बिल्लियां अपने बच्चों का पोषण करते करते खुद अनजाने पुरुष डर से भर जाती हैं. इस दौरान वह दुनियादारी सिखाने के लिए बच्चों को राजा योगानंद की नीति कथा सुनाती हैं. कैसे वह अति सुंदर रानी को कैद में रखता है और फिर शक होने पर प्रतिकार के बाद निर्मोही हो जाता है.

उत्तर आधुनिक समय में बिल्ली के बच्चे इसका एक नया नृशंस पाठ भी पेश करते हैं. जब राजा एक युक्ति के सहारे उन सारे पुरुषों को चिह्नित करता है, जिन्होंने रानी के साथ संभोग किया. जरिया बनती है एक तस्वीर और जांघ का तिल. राजा योगानंद की त्रासदी एक घुप्प अंधेरे में जाकर ढोंगी साधु नयनानंद में मिल जाती है. भगवा चोले में दलाली करता एक भड़वा. जो कभी गृहस्थी तो कभी गरीबी से परेशान लड़कियों को पहले तो अपनी वासना के दलदल में खींचता है. और फिर उनका कीचड़ साफ करने के नाम पर कोठे नाम के और बड़े कीचड़ के समंदर में ढकेल देता है.

इन्हीं सब के बीच एक समंदर है मुंबई नाम का. जहां ये सारी कहानियां अपना क्लाइमैक्स हासिल करती हैं. यहां एक दलाल है जो कभी अपनी क्लास की सबसे बदचलन मगर बेचारी सी दिखती लड़की से प्रेम कर बैठता है. जब ये एकाकी प्रेम खंडित होता है तो उसके भीतर कुंठा का बेशरम सा बदबूदार पेड़ पनप आता है. मुंबई में ये दलाल लोगों के तन को अंधेरा मुहैया कराता है और बदले में रौशनी कमाने का भरम पालता है.

इसी दौरान वह एक बार डांसर के प्रेम में पड़े गृहस्थी बसाता है. मगर जब सब कुछ ढर्रे पर आता नजर आता है, तभी मंदी भी आती है. बुलबुला फटता है और पानी से लेकर जमीन तक हर जगह धंधेबाजी सिर उठाने लगती है. धंधे के लिए लाई गई एक लड़की जिसका नाम पता बस एक ही नेपालन, दलाल की नजर में चढ़ आती है.

नेपालन की आमद दलाल की बीवी के लिए रुसवाई का सबब बनती है. लगाव दुराव का ये खेल चलता रहता है और इस दौरान फर्श पर कुछ और कहानियां भी रेंगने लगती हैं. कल तक व्हाइट कॉलर जॉब करते लड़के चेन स्नैचिंग करने लगते हैं. नौकरी के डर में दुबलाती युवती फ्लाइट छूटने की काल्पनिक हताशा में ऊंची बिल्डिंग से छलांग लगाने लगती है. तलाकशुदा युवती युवा प्रेमी से वेश्या का तमगा पा बिफर उठती है.

इन सबके बीच कुछ हरी दिखती मगर असल में काई सी रपटीली प्रेम कहानियां भी पनपती हैं. मसलन, दलाल जब नेपालन की देह में उतरा रहा होता है, तो कभी उसकी छाती के बीच बच्चे सा दुबक जाता है और एक गुलाबी सुनहरेपन में जागने सा लगता है. दलाल की बीवी पेट में एक लंगड़े के जरिए मिले अंखुए के पलने की संभावनाओं से मुदित हो जाती है. दलाल का एक दोस्त अपनी भागी हुई बीवी के लिए दारू पीकर बिसूरते हुए अचानक एक सच्चा दोस्त बनने लगता है.

फिर इन कहानियों के पैर फिसलते हैं और जो गिरता है उसका सिर फटा होता है. लिसलिसा खून एक सच्चाई बन जाता है. इसमें खून के, प्रेम के, यकीन के रिश्ते बह बहकर दम तोड़ते हैं. क्रूरता एक नया शिकार तलाशने को निकलती है और बेबसी एक बार फिर से शिकार बनने को नजर झुकाती है.

दलाल की बीवी के 156 पन्ने आपको आदि से अंत तक बांधे रहते हैं. इस दौरान आप शिल्प के नयेपन और भाषा की सरलता के सहारे आगे बढ़ते रहते हैं और मुखौटों का एक एक कर उतरना देखते हैं.

मगर कुछ कमियां भी हैं. मसलन, कई एक जगह प्रूफ की गलती. एक सम्मानित प्रकाशक और एक पत्रकार लेखक की किताब में यह व्यवधान कसकता है. कई एक बार लगता है कि गूढ़ सत्य को प्रकट करने के फेर में लेखक संकेतों की सीढ़ी बुन रहा है. मगर इस फेर में वह यह गौर नहीं कर पा रहा कि क्या पाठक भी इन संकेतों के सहारे ऊपर चढ़ रहा है. बहरहाल, प्रयोगों में इस तरह की कमीबेशी तो हो ही सकती है.

रवि बुले का यह पहला उपन्यास बहुत प्रौढ़ प्रयास है और अपने तईं नए किस्म की कहन सामने रखता है. अगर आपको बदनाम गलियों की बेबसी का एक नया आख्यान पढ़ने की ख्वाहिश है, तो यह किताब आपके लिए है. इसका कलेवर आकर्षक है. लेखक को इस किताब के लिए बधाई और पाठकों को आमंत्रण. नई जिंदा हिंदी की एक खिड़की खुली है. इसमें झांकिए जरूर.

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