वामपंथी मजदूर आंदोलन संगठित करने लेकर प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में अगुआ रहने वाली रमणिका गुप्ता ने सांस्कृतिक-रचनाकार और संगठक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई. उन्होंने आदिवासी-दलित समुदाय के साहित्यिक स्वर को मुखरता के साथ अभिव्यक्त किया. नारी मुक्ति के साथ-साथ झारखंड समेत देश के आदिवासी साहित्यिक स्वर को मुख्यधारा में लाने के उनके विशिष्ट योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.
रमणिका गुप्ता सीपीआईएम की राज्य कमेटी की सदस्य के साथ-साथ सीटू से संबंधित कोयला यूनियन की मुख्य संरक्षिका भी थी. मांडू से वह 1977 में विधायक चुनी गईं. इससे पूर्व एमएलसी सदस्य थीं. कभी कांग्रेस से भी उनका लगाव था. इंटक से भी. चुनावी राजनीति से अलग होने के बाद भी वह मजदूर यूनियनों से जुड़ी रहीं. उनकी किताबों की एक लंबी सूची है.
हालांकि उन्होंने गद्य भी खूब लिखा, पर शुरुआत में उन्होंने कविता ही लिखी और उन्हें कवयित्री कहलाना पसंद था. उन्होंने कहा भी था, 'मेरे अनुभव कलम की नोक पर सवार हो, पन्नों पर उतरने लगे! पहले यदा-कदा लिखती थी, मूड आने पर लिखती थी, बस केवल कविताएं, जो संघर्षों के दौरान बलात मुझ पर तारी हो जाती थीं.' उनके कविता संग्रहों में भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल-तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूं, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदम से आदमी तक, विज्ञापन बनते कवि, कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का, निज घरे परदेसी, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल: एक कविता यात्रा, आम आदमी के लिए, खूंटे, अब और तब, गीत-अगीत शामिल है.
उनकी गद्य पुस्तकों में- कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे, दलित चेतना- साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण- वाम के कठघरे और दलित साहित्य, असम नरसंहार- एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज काफी चर्चित रहे. इसके अलावा उन्होंने 'सीता' और 'मौसी' नामक उपन्यास और बहू जुठाई नामक कहानी संग्रह भी लिखा.
पर जो चर्चा उन्हें अपनी आत्मकथा से मिली वह अन्य किताबों से नहीं यह एक बोल्ड लेखन था, जिसमें उन्होंने बहुत कुछ ऐसा स्वीकारा, जिसकी लोग चर्चा भी नहीं करना चाहते. यह आत्मकथा 'हादसे' और 'आपहुदरी- एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा' नाम से छपी.
उन्हीं के शब्दों में 'आपहुदरी' की यह कथा एक स्त्री की दृष्टि में मेरे जीवन में घटी घटनाओं, टकराहटों, संघर्षों और भटकावों का आंकलन है. ‘आपहुदरी’ मेरी आत्मकथा की दूसरी कड़ी है. 'आपहुदरी' में मैंने निजी जीवन और संघर्ष के सच को स्त्री दृष्टि की कसौटी पर, आज के परिप्रेरक्ष्य में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. 448 पेज की उनकी यह आत्मकथा साल 2015 में सामयिक प्रकाशन ने छापी थी. दूसरा संस्करण अभी कुछ दिन पहले ही प्रकाशित हुआ.
प्रकाशक महेश भारद्वाज के शब्दों में उन्होंने भारतीय साहित्य में इतना बोल्ड व बिंदास लेखन नहीं देखा. रमणिका गुप्ता ने जिस साफगोई से अपने जीवन को देखा, और स्वीकारा वह हर लड़की के लिए एक प्रेरणा है कि उसे जीवन में आगे बढ़ना है तो अपने शरीर से, कथित गलतियों से ऊपर उठना होगा.
साहित्य आजतक के पाठकों के लिए 'आपहुदरी'- एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा' का अंशः
सिर ढक कर चलो
- रमणिका गुप्ता
"सिर ढक कर चलो." मां ने घर से बाहर कदम रखते ही कहा.
"नहीं ढकूंगी सिर! क्यों ढकूं? क्या लड़के सिर ढक कर चलते हैं ? रवि को क्यों नहीं कहतीं अपना सिर ढकने को? मैं कोई उससे कम हूं क्या? नाना जी की हवेली और क्लब में इतनी मेमें आती हैं, वे ‘चुन्नी’ (दुपट्टा) नहीं ओढ़तीं. मैं क्यों नहीं उनकी तरह बिना ‘चुन्नी’ ओढ़े चल सकती ?"
"यह अच्छे घर की लड़कियों का रिवाज़ नहीं है." मां मुझे समझाते हुई कहती.
"मुझे नहीं चाहिए अच्छे घर के रिवाज़. मैं नहीं बनूंगी अच्छे घर की लड़की. यह सब पुरानी बातें हैं. मैं नहीं मानूंगी कोई पुरानी बात. मैं अपना ही रिवाज़ चलाऊंगी, खुद अपने आप." मैं ज़ोर देकर कहती.
बीबी जी चुप हो जातीं. दादी गुरु नानक के बारे में मुझे खूब कहानियां-किस्से सुनाती थीं.
"मैं भी तो उनकी ही औलाद हूं. मैं भी उनकी तरह अपना पन्थ क्यों न चलाऊं ?" यह प्रश्न मैं इनसे बार-बार पूछती.
"ये लड़की बड़ी होकर बाप की नाक कटाएगी. अभी से ये लच्छन हैं, तो आगे जाकर क्या होगा ? कैसे ऊटंग-ऊटंग कर लड़कों की तरह बाप की साइकिल चलाती है, घोड़ा चलाती है. तांगे में बैठती है, तो परदे से मुंह निकाल कर घुल्ले खां की बगल में हंटर पकड़ कर जा बैठती है. इसे पीछे की सीट पर जबरन पकड़ कर बैठाना पड़ता है. यह किसी की नहीं सुनती. मार लो, पीट लो लेकिन करती अपने मन की है. आपहुदरी कहीं की.' घर वापस लौटने पर बीबी जी दादी से शिकायत के लहज़े में कहतीं, जैसे दादी की वजह से ही मैं ऐसी हो गयी होऊं.
दरअसल बीबी जी कहना यह चाहती थीं कि दादी और पापा जी के प्यार ने ही मुझे सिर चढ़ा दिया है. दादी जवाब नहीं देती. वह जानती हैं कि गुस्से में बीबी जी ऐसे ही बोला करती हैं. बीबी जी फिर शुरू कर देतीं अपनी प्रिय गालियां, जिन्हें मैं अपनी देह और मन से ऐसे झाड़ देती जैसे बारिश में भीगने के बाद बिल्ली देह झाड़ कर खड़ी हो जाती है.
एक दिन तो मैंने बीबी जी को कह ही दिया, "सब गालियां आपको वापस लौटा दीं मैंने बीबी जी. एक नहीं रखी मैंने अपने पास. आप ही रखें इन्हें सम्भाल कर."
फिर क्या था! धपा-धप मार पड़ी.
"मुझे गाली देती है. अपने बाप को गाली देती है. ये देखो जी अपनी लाडली को, मेरे सामने ज़बान लड़ाती है."
बीबी जी ने पापा जी से ऐसे कहा जैसे उन्हीं के कारण मैंने बीबी जी को गाली देने की जुर्रत की हो या हिम्मत जुटाई हो.
"इतनी गालियां मत दो उसे! इतना तंग मत करो कि वह तुम्हारे जुल्म के खिलाफ तुम्हारे ही सामने खड़ी हो जाए." चाह कर भी पापा जी यह न कह पाते.
उन्हें अपनी शांति बरकरार रखने के लिए बीबी जी की हां में हां मिलाना ही काफी नहीं था बल्कि वे उनसे सहमत हैं, इसका प्रमाण देने के लिए मुझे दो-चार थप्पड़ मार देना भी जरूरी होता था. इसलिए उस दिन भी उन्होंने गुस्से का नाटक करते हुए, मुझे मारना शुरू किया. मैं कहती रही, "मैंने गलती नहीं की है. बीबी जी ने मुझे बुरी-बुरी गालियां दीं. मैंने बीबी जी की गालियां उन्हें वापस लौटा दीं. मैंने अपने मुंह से एक भी गाली नहीं दी."
मेरी नन्हीं समझ में नहीं आ रहा था कि यह गाली देना कैसे हुआ ? मैंने तो कोई अपशब्द नहीं बोला था. वे सब तो मां ने ही बोले थे. मैंने तो केवल तर्क दिया था.
‘क्या तर्क करना गाली देना होता है ?’ मैं ‘अच्छी’ लड़की से एकांत में पूछती.
‘तर्क गाली नहीं होता, कटु होता है.’ ‘अच्छी’ लड़की बताती.
‘पर तर्क सच तो होता है न! मैं किसी का झूठ नहीं मानूंगी. भले मुझे बुरा कहें सब लोग. तुम मुझे अच्छा कहती हो न! बस यही काफी है मेरे लिए.’
मैं ‘अच्छी’ लड़की से कहती और अपने मन को तसल्ली देती.
प्रायः समय निकाल कर मैं ‘अच्छी’ लड़की से बतिया जरूर लेती थी. आरोपों और लांछनों से घिरी जब मैं नितांत अकेली होती तो वही ‘अच्छी’ लड़की मुझे हँसाती, मेरा हौसला बढ़ाती, मेरा साथ देती. वह ‘अच्छी’ कहकर मुझे पुकारती थी.
- सौजन्यः सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली, प्रकाशकः 'आपहुदरी'- एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा', लेखकः रमणिका गुप्ता