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अनेक पल और मैंः शब्दों के आलोक में स्‍वप्‍नमयता का इज़हार हैं बसंत चौधरी की कविताएं

कविता केवल रस नहीं, भाव नहीं, रीति नहीं, ध्वनि नहीं, वह एक विचार भी है. हर कविता एक विचार करती है. वह कवि के विवेक का उद्भावक होती है. बसंत चौधरी की कविताएं विचारों और भावों की सहचरी हैं.

बसंत चौधरी के काव्य-संकलन 'अनेक पल और मैं' का आवरण चित्र बसंत चौधरी के काव्य-संकलन 'अनेक पल और मैं' का आवरण चित्र

कविता के बारे में सदियों से काव्यशास्त्रियों ने कसौटियां बताई हैं. कविता क्या है? रस क्या है? भाव क्या है? संवेदना क्या है? हमारी कवि परंपरा बहुत समृद्ध है. यहां वाल्मी‍कि, कालिदास, भास, भवभूति से लेकर आज तक की कविता पंरपरा में जो कुछ लिखा जा रहा है वह सब इस कविता पंरपरा का दाय है. कविताएं लिखीं जाती रहेंगी जब तक एक भी सहृदय व्यक्ति धरती पर उपस्थित रहेगा. कविता एक कला है. यह कवि को एक साधारण मनुष्य से अलग करती है. हम सब वहीं देखते हैं जो एक कवि देखता है, वही अनुभव करते हैं जो एक कवि करता है, वही कहना चाहते हैं जो एक कवि कहता है. लेकिन एक साधारण मनुष्य के देखने और कवि के अवलोकन में फर्क है. यही फर्क एक मनुष्य  को कवि रूप में परिणत करता है.
कैसी हो कविता जो साधारण चित्त को छुए. जो हृदय का परिष्कार करे. मनुष्य की मलिनताओं को दूर करने में सहायक हो. कविता के लिए आचार्यों ने अपनी-अपनी मति और कवित विवेक से बहुतेरी परिभाषाएं दी हैं. एक रस से परिपूर्ण वाक्य ही कविता है. वह काव्य क्या जिसमें रस न हो. यही कारण था कि संस्कृत के महाकवि वाणभट्ट जब मृत्यु के सन्निकट थे तो उन्हें चिंता हुई कि कादंबरी, जो तीन जन्मों की कथा है, वह तो अधूरी ही है. असमय देहावसान हुआ तो इसे कौन पूरा करेगा. लिहाजा अपने दोनों पुत्रों को बुलाया और कहा, देखो जो सामने दिख रहा है उसे अपने शब्दों में कहो. वे एक सूखे पेड़ की ओर दोनों का ध्यान आकृष्ट कर रहे थे. एक पुत्र ने जस का तस दृश्य रख दिया उनके समक्ष. शुष्कं वृक्षं तिष्ठत्यग्रे. वाणभट्ट को लग गया इसमें कवित्व नहीं है. यह तो बहुत नीरस दृश्यांकन है. दूसरे पुत्र को बुलाया और कहा तुम बताओ क्या है यह. उसने कहा: नीरस तरुरिह विलसति पुरत:. ऐसा सजल सरस दृश्यांकन सुनकर वे आश्वस्त हुए कि अब कोई चिंता नहीं. मर भी गया तो कादंबरी की चिंता न रहेगी. तो यह होता है कवित्व जो साधारण से दृश्य‍ के बखान या वर्णन से मार्मिकता भर देता है.
आचार्य वामन ने कहा है, कविता की आत्मा रीति है. रचने का तरीका. प्रविधि. ऐसे भी कवि हुए हैं हमारे समय में जिन्होंने रीतिबद्धता को अपने काव्य का उद्देश्य माना. एक आचार्य ने कहा, काव्यास्यामत्मा ध्वनि:. काव्य की आत्मा तो ध्वनि है. इस तरह कविता की अनेक शास्त्रीय परिभाषाएं की गयीं. आचार्य विश्वनाथ, मम्मट, वामन, पंडित राजशेखर, सभी के अपने अपने मत. लेकिन 'कवय: तु निरंकुशा:'. कवि तो निरंकुश होते हैं. काव्य के लक्षणों पर कविता करना सहज नहीं है. इसीलिए आचार्य क्षेमेंद्र ने 'कवि कंठाभरण' में कवियों को सचेत किया कि वे वैयाकरणों से बच कर रहें. वे हर जगह जाएं, हर अनुभव लें, पर वैयाकरणों, आलोचकों से बचें. कविता की परिभाषाएं बन सकती हैं पर कवि किसी बंधन में नहीं बांधे जा सकते. इसीलिए कहा जाता है कि फलां कवि के लिए अलग काव्य शास्त्र  चाहिए. उसे परखने की कसौटियां प्रासंगिक नहीं हैं.
आज कविता छंदों के कठिन पथ से बहुत आगे निकल आई है. कविता की मुक्ति के लिए निराला ने जो आह्वान किया था, उस पथ पर आकर उसने वैचारिकी का सहारा लिया है. अब कविता केवल रस नहीं, भाव नहीं, रीति नहीं, ध्वनि नहीं, वह एक विचार भी है. हर कविता एक विचार करती है. वह कवि के विवेक का उद्भावक होती है. बसंत चौधरी की कविताएं विचारों और भावों की सहचरी हैं. 'अनेक पल और मै' शीर्षक काव्यकृति में वे अपनी लगभग 79 कविताओं में भिन्न-भिन्न कथ्य और विचारों के साथ सामने आते हैं. ये कविताएं बसंत के चित्त का ज्ञापन भी हैं और इस समय की गतिविधियों का साक्ष्य भी. अच्छी कविता संकेतों में बात करती है. बहुत ज्यादा नहीं बोलती. वह पाठकों के लिए सहृदयों के लिए अंतराल छोड़ती चलती है. वह अपने पाठ के अलावा पाठांतर में होती है. कविता के अर्थ को भी बांधा नहीं जा सकता. पाठ वही पर विवेचन अलग-अलग. यह रसज्ञ के सामर्थ्य पर है कि वह कैसा अर्थ लगाता है. वे कहते भी हैं-
मन की अशुद्धता
विकृत कर देती है बुद्धि को भी.
क्योंकि चिन्तन के लिए
महत्त्वपूर्ण है,
शुद्ध आत्मिक, सात्विक
और सार्वभौमिक मनन.
आवश्यक है,
तन-मन की शुद्धता
और बुद्धिमत्ता,
ताकि किया जा सके
चिंतन! विशुद्ध चिंतन!!
कविता एक स्तर तक पहुंच कर विशुद्ध चिंतन में बदल जाती है. कविमना व्‍यक्ति को बिना पुस्तक के साहचर्य के नींद नहीं आती. सिरहाने पुस्तकें हों तो मन जैसे किसी पवित्र परिसर में महूसस करता है. वही तो हैं जो चित्त का परिष्का‍र करती हैं. बसंत चौधरी ऐसी ही एक कविता में कहते हैं
किताबें-
समा जाना चाहती हैं मुझमें
और आहिस्ता-आहिस्ता मैं
उपवन, पहाड़, सुगंध और
यादों से भरी पंक्तियों में
रूपांतरित हो जाता हूं.
और फिर मैं, मैं नहीं रहता
बन जाता हूं एक पूरी किताब
बसंत चौधरी की इन कविताओं में स्मृतियों की आभा है. सुधियों के आकाशदीप हैं जो कल्पनाओं का पथ प्रशस्त करते हैं. वे अकारण नहीं कहते-
जहां मिलते हैं धरती और आकाश
उस गोधूली अनुपम बेला में
लौट रही गायों और
धूलकणों के संग
तुम्हारी याद भी उड़ कर आती है
और मुझे छू जाती है.
गोधूलि वेला पर कवियों की सदैव सौंदर्यदृष्टि रही है. यह एक तरह से अभिसार वेला भी है. इसी संधिबिन्दु पर पहुंच कर चित्त काव्यमय हो उठता है. कवि की कामना के पथ में शब्द भी जैसे निरस्तित्व हो उठते हैं. वह प्रेम के पथ बुहारता है जैसे बसंत धरती की अगवानी करता हो पुष्पवल्लियों से. कवि कहता है:
आओ, बेहिचक आओ
क्यों दिग्भ्रमित हो
क्यों नहीं सुन रहे हो
मेरी पुकार
मैं शब्दों के व्यापार से
बहुत दूर हूं
और शायद तुम भी.
शब्द तो जाल हैं,
प्रेम नहीं
मैंने बिछा रखी हैं पलकें,
तुम्हारे सत्कार हेतु.
कवि कह रहा है अपने प्रेयस से कि मैं चित्त से सर्वथा शुद्ध हूं, शब्दों के कारोबार से भी विरत, क्योंकि शब्द भी तो एक जाल हैं. इसलिए कभी-कभी हम शब्दों से नहीं, उस भावना से काम लेते हैं जिसके आगे शब्द भी बेमानी हो उठते हैं. शब्द ही पर्याप्त होते तो 'रही सही दोऊ कहि दीन हिचकियन सौं' -अभिव्यक्ति का अचूक माध्यम क्यों कर होता. इन कविताओं में ऐसे ही मंद-मंद दीपक सा जलता है मन के कोने को उजियार करता हुआ. बिना प्रेम के कोई अभिव्यक्ति संपूर्ण नहीं होती. इस अर्थ में हर कवि जैसे प्रेम का कवि होता है, कवि प्रिय से संवाद का कोई न कोई अवसर निकाल ही लेता है. कहा है घनानंद ने 'अति सूधो सनेह को मारग है'. प्रेम का पथ कितना सहज है. कोई छल नहीं कोई प्रपंच नहीं, यह एक साझा संवेदना है जो प्रिय के स्मरण मात्र से सुधियों का एक पुल बनाती है. तभी नीरज ने एक गीत मे लिखा था: प्रेम पथ हो न सूना कभी इसलिए/ जिस जगह मैं थकूं उस जगह तुम चलो.
ऐसी सुकोमल भावनाएं यहां अनेक कविताओं में व्यंजित हैं जिससे बसंत चौधरी के चित्त में उतरने पर बसंत की खुशबू आती है. यह बसंत की नहीं, प्रेम की खुशबू हैं, अनुराग का रस है, शब्दों का मौन अनहद है, जो केवल प्रिय चित्त में धड़कता है. वह कहता है: नेह-नीर बह निकली है/ आंखों की कोर से/ पावन गंगा बन. किसी कवि ने क्या खूब कहा है- वो मुझे याद करके रोया है/ हो गया इश्क का बयां आखिर. आंखों की कोर का भीगना एक क्रिया भर नहीं है. वह एक अभिव्यक्ति है जो आंखों की कोर से बह रही है पावन शुद्ध चिति का चैतन्य बन. जैसे धरती पर बालरवि की किरणें पड़ते ही पूरी वसुंधरा रोशनी से आच्छादित हो उठती है वैसे ही शब्दों के आलोक से प्रिय का चित्त़ निनादित हो उठता है, दीप्त हो उठता है. प्रेम कभी बसंत बन कर आता है, कभी घन आनंद बन कर छाता है, कभी शरद की रातों का उल्लास बन कर. वह ऋतुओं के वैविध्य में पनपता है. शब्द ऋतु बन कर प्रेमियों को हुलसाते हैं. और जब प्रीति की यह कनी प्रेमी कवि के ही चित्त में समा जाए तो प्रणय की उदात्त आभा जैसे एक परस बन कर, छुवन बन कर कुछ-कुछ लौकिक और आध्यात्मिक सुवास बन कर फैल जाती है. बंसत चौधरी की प्रेम से भीगी अनेक कविताओं के गुच्छे यहां हैं जिनसे गुजरते हुए लगता है हम ऋतुओं के किसी महोत्सव में आ गए हैं.
बसंत चौधरी ने उजाले पर लिखा है, दीपोत्सव पर लिखा है, ऋतुओं पर लिखा है. बादल पर लिखा है, पौष और शरद पर लिखा है, सुख-दुख और धूप-छांव पर लिखा है, मां, बेटी और बाबू जी पर लिखा है, आंगन के उस दरख्त पर लिखा है, जो बरसों से जमीन पर दृढ़ता से टिका हुआ है, जिसने समय के पतझर और कितने ही बसंत देखे हैं. इस तरह देखा जाए तो बसंत चौधरी संबंधों के कवि हैं, गार्हस्थ्‍य बोध के कवि हैं. अपने देस, अपनी जमीन के कवि हैं. नेपाल के लिए उनके मन में अटूट प्रेम है. तभी तो वे स्‍वच्‍छ नेपाल की परिकल्पना करते हैं. अपने देश की बेहतरी की कल्पना करते हैं. यह कवि की राष्ट्रीयता है जो उन्हें घर, पत्नी मां पिता व प्रिय से घनिष्ठता से जोड़े रहती है. वह फागुन की राह अगोरता है, सावन की कल्प‍ना में भीगता है, बसंत और फागुन की जुगलबंदी उससे बतियाती है, कहना न होगा कि बसंत चौधरी के नाम में ही ऐसा वासंती उल्लास है कि वह उनकी कविताओं में महुए सा चूता और महकाता है. उन्हें झरने लुभाते हैं, बचपन लुभाता है, वे प्रेम की उदात्तता को छूना और जीना चाहते हैं, वे पत्थरों में भी अप्रतिम रूप लावण्य देख कर भाव विभोर हो उठते हैं, उसे मुक्त मन सराहते हुए नहीं थकते. कविताएं उनके इस सौंदर्यबोध की गवाही देती हैं. वे अंतर्मुखी नहीं बहिर्मुखी कवि हैं. उनका मन संवादी है. वह भीतर ही भीतर उमड़-घुमड़ कर नहीं रह जाता बल्कि अपने भाव को शब्दों के आभरण में सजाना जानता है और सब कुछ सीधे-सीधे कह देने में यकीन रखता है बच्चन की तरह जो कहा करते थे: मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता. देखिए बचपन पर हम सबने बहुतेरी कविताएं पढ़ी हैं. सुपरिचित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की 'बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी' भी. पर बसंत चौधरी बचपन की मनुहार कैसे करते हैं, यह कविता खुद जताती है-
कभी-कभी तो आ जाया कर
भोले बचपन,
प्यारे और सलोने बचपन
मां-बापू, दीदी का बचपन
अल्हड़, चंचल, नटखट बचपन
कभी-कभी तो आ जाया कर

कब आया, कब चला गया तू
आ फिर से हम नाचें गाएं,
बिना काम हम दौड़ लगाएं
आ जा फिर फिसलेंगे बचपन
कभी-कभी तो आ जाया कर.

बना गया है एक युवक भी
प्रेम दिवाना या मस्ताना
स्कूल, कॉलेज मस्ती के दिन
आवारा, यायावर जीवन
लक्ष्यहीन क्षण प्रेम-प्रीत के,
छुप-छुप गुपचुप मिलना-जुलना
नवल प्रीत का ज्वार जगाकर
प्रथम प्रेम के किसलय बचपन
कभी-कभी तो आ जाया कर.

आ जा जल्दी, भूले प्रियवर
फिर मिलवा दे या दिखला दे
बगिया की झाड़ी में दुबके
नवल नेह के वो नाजुक पल
कवित कोश के उज्ज्वल बचपन
कभी-कभी तो आ जाया कर.

युगल गीत-गायन की घड़ियां
फूलों पर मंडराती कलियां
भंवरों से बतियाती तितलियां
तेरा घर वो तेरी गलियां
पावन,पाक परिमल बचपन
कभी-कभी तो आ जाया कर.
यह अतीत राग है. बीते हुए दिन हम फिर से जीना चाहते हैं और चाहते हैं कि वे चित्र बचपन के वे शैतानियां बचपन की वह भोलापन बचपन का फिर से लौट आए. पर बीते हुए दिन कहां लौटते हैं भला. काल की यही गति है. कालो न यात: वयमेव यात:. वे कहते हैं अभी समय है. जागो चेतो. खुद से प्यार करना सीखो. खुद से संवाद करना सीखो.
जाग जा, चेत जा, समय रहते
स्वयं से तकरार कर, स्वयं से ही प्यार
अद्भुत निजी सुन्दर वार्तालाप
संभलकर पर भीतर उतर.
अब झांको जरा अपने भीतर.
इसे पढ़ कर किसी शायर का कहा याद हो आता है: छोड़ दे कुछ नहीं है रंजिश में/ आ मेरे साथ खेल बारिश में. याद कर नंगे पांव दौड़ते थे/ दूर तक तितलियों की ख्वाहिश में. इस तरह ये कविताएं भी सुकोमल चित्त का आभार ज्ञापन हैं. कवि के ही शब्द उधार लेकर कहें तो इनमें नदियों, झरनों की कल-कल है, पक्षियों का कलरव है, भ्रमरों और तितलियों का गुंजन है, वृक्षों व लताओं की मर्मर है. यानी जीवन के उल्लास के ये क्षण कितनी विविधवर्णी हैं और इस विविधवर्णी अनेक पलों के बीच कवि है. शब्दों और भावनाओं का एक अलग ही संसार बसाए. अपने भीतर के बसंत और अपने भीतर के दीप को जलाता हुआ अप्प दीपो भव की मुद्रा में कवि के ये शब्द निष्कंप दीप पंक्ति की तरह हैं जो अंधेरे अवसाद भरे पलों को उल्लास से रोशन करते हैं.
किसी ने क्या खूब कहा है कि 'कविता पर अत्याचार भी बहुत कुछ हुआ है. लोभियों, स्वार्थियों और खुशामदियों ने उसका गला दबाकर कहीं अपात्रों की-आसमान पर चढ़ने वाली स्तुति कराई है, कहीं द्रव्य न देने वालों की निराधार निंदा. ऐसी तुच्छ वृत्ति वालों का अपवित्र हृदय कविता के निवास के योग्य नहीं. कविता देवी के मंदिर ऊंचे खुले, विस्तृत और पुनीत हृदय हैं. सच्चे कवि राजाओं की सवारी, ऐश्वर्य की सामग्री में ही सौंदर्य नहीं ढूंढ़ा करते. वे फूस के झोंपड़ों, धूल-मिट्टी में सने किसानों, बच्चों के मुंह में चारा डालते हुए पक्षियों, दौड़ते हुए कुत्तों और चोरी करती हुई बिल्लियों में कभी-कभी ऐसे सौंदर्य का दर्शन करते हैं जिसकी छाया भी महलों और दरबारों तक नहीं पहुंच सकती. श्रीमानों के शुभागमन पर पद्य बनाना, बात-बात में उनको बधाई देना, कवि का काम नहीं. जिनके रूप या कर्मकलाप जगत् और जीवन के बीच में उसे सुंदर लगते हैं, उन्हीं के वर्णन में वह 'स्वांत: सुखाय' प्रवृत्त होता है.'
कविता मनुष्य से मनुष्य के बीच के रागात्मक संबंधों का पुल है जिसके निर्माण में कवि अनवरत संलग्न रहता है. 'अनेक पल और मैं' की कविताएं इसी स्वप्नमयता और अनुरागमयता का इज़हार हैं. समकालीन कविता में ये सुकोमल कविताएं निश्चय ही अपना स्थान बनाएंगी, ऐसा विश्वास है.

पुस्तकः अनेक पल और मैं
रचनाकारः बसंत चौधरी
विधाः कविता
भाषा:‎ हिंदी
प्रकाशक: ‎ वाणी प्रकाशन
मूल्यः 399.00 रुपए
पृष्ठ संख्याः 192 पेज, हार्डकवर ‎
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डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हैं. वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059, फोनः 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

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