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जयंती विशेषः भारतीय काव्‍य परंपरा के वैष्‍णव जन नरेश मेहता

नरेश मेहता भारतीय काव्‍य परंपरा में जयशंकर प्रसाद की तरह वैदिक मंत्रों से रस खींचने वाले कवि थे. उनकी जयंती पर साहित्य आजतक पर उन्हें याद कर रहे हैं कवि, समालोचक डॉ ओम निश्‍चल

कवि नरेश मेहता [ फोटोः India Today Archive ] कवि नरेश मेहता [ फोटोः India Today Archive ]

हिंदी कविता कितनी भारतीय है इधर के विपुल काव्‍य-संसार का अवगाहन करते हुए यह बात मन में अक्‍सर उभरती है. कवि का देश-काल, उसका भूगोल कितना संकुचित होता गया है, यह देख कर विपन्‍नता का अहसास होता है. नरेश मेहता इस अर्थ में प्रसाद की तरह भारतीय काव्‍य परंपरा और वैदिक मंत्रों से रस खींचने वाले कवि थे. उनकी जयंती पर साहित्य आजतक पर उन्हें याद कर रहे हैं कवि, समालोचक डॉ ओम निश्‍चल
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हमारे समाज में राजनीतिक उठापटक ने संस्कृति, सभ्य‍ता, राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद और भाषाई शुचिता की सच्ची अर्थवत्ता को संदिग्ध बना दिया है. ऐसे में कोई ऋषितुल्य कवि या चिंतक लाख प्रमाण देकर भी अपनी मानवीय तटस्थता की दुहाई दे तो भी राजनीति के संकरे हितों के वशीभूत लोग उसके लेखन-चिंतन को सांप्रदायिक करार देने में नहीं हिचकते. आखिर इसी देश में गांधी जैसे महात्मा की हत्या हुई, जिस पर नरेश जी उत्तर कथा में लिखते हैं, 'राजनीति से जब भी प्रार्थना-व्यक्तित्व सहन नहीं होते, तब यही प्रक्रिया संपन्न होती है.' नरेश मेहता के साथ भी आलोचकों का सुलूक कुछ ऐसा ही रहा है. पर उनकी मंत्रोपम कविता के भाष्य का ऐसा सरलीकरण औचित्यपूर्ण नहीं है. वह अपने समकालीन कवियों की पूरी बिरादरी की भाषा, भंगिमा, कथ्य और रस से छिटकी प्रतीत होती है. वह भारतीय वांड्.मय की परंपरा का अनुश्रवण करने वाली कविता है. वह मनुष्य के बृहत्तर जिज्ञासाओं का काव्य है. उसमें मानवीय चिंताओं का घना रसायन मौजूद है. कविता के गोमुख से वह शक्ति लेती है. रामायण, महाभारत व आर्षग्रंथों को उपजीव्य मानती हुई उन्हें व अपने समय की चिंताओं के परिप्रेक्ष्य में रचती उकेरती है. इसलिए जब हम नरेश मेहता जैसे कवियों की सांस्कृ्तिक अर्थवत्ता पर बात करते हैं, ये सारी उलझनें हमारे सम्मुख आ खड़ी होती हैं. एक विराट अर्थसंपदा के कवि को हम आज के वक्त कैसे मूल्यांकित करें? पर जब आज के दौर में विग्रहवादी शक्तियां ज्यादा प्रबल हों, नरेश मेहता जैसे कवियों के काव्य में वे मूल्य निहित दिखते हैं जो इस सदी के मनुष्य को नई चेतना से भरते हैं.

नरेश मेहता उस सांस्कृतिक काव्य वैभव की उपज हैं जिसे हमारे मंत्रद्रष्टा कहे जाने वाले कवियों ने सदियों से सहेजा है. वे मालवा के एक कस्बे में 15 फरवरी, 1922 को जन्मे. एक काव्यसभा में अच्छी कविता सुनाने पर वहां की राजमाता ने उन्हें नरेश उपनाम दिया लिहाजा पूर्णशंकर मेहता आगे चलकर नरेश मेहता बन गए. जन्म से ही नरेश मेहता से नियति कुछ ऐसी रूठी कि वे मां का सुख न पा सके. शायद उसकी कोई हल्की झलक भी उन्हें न मिल सकी. और पिता ऐसे मिले कि तीन-तीन पत्नियों से प्राप्त इस अकेली संतान का भी तनिक मोह नहीं. मां के मरने के बाद एक बहन थीं जो उनके दस साल होते-होते चल बसीं. इस तरह मां व बहन दोनों के स्नेह से वंचित नरेश मेहता के मन में मां का अभाव कहीं न कहीं सालता रहा. पितामह की विधवा बहन ने नरेश का यथेष्ट लालन पालन जरूर किया पर मां तो मां ही होती है. इसीलिए 'देखना एक दिन' कविता में उनकी मार्मिक अभिव्यक्ति कुछ यूं छलक जाती है:

मैं नहीं जानता क्योंकि नहीं देखा है कभी-
पर जो भी जहां भी लीपता होता है गोबर के घर आंगन,
जो भी जहां भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे कुंकुम से अल्पना,
जो भी जहां भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है
मेथी की भाजी, जो भी जहां भी चिंता भरी आंखें लिए निहारता होता है
दूर तक का पथ-
वही, हां, वही है मां.
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मां बिहीन बचपन

वे शायद यही सोचा करते थे, हमारे आंगन में साड़ियां क्यों नही सूखतीं, जैसी लोगों के घरों में सूखती हैं. इस तरह एक घर का जो बिम्ब हमारे मन में होता है और जो लगभग सभी भारतीय घरों का एक बिम्ब है, वह नरेश की आंखों व यथार्थ जीवन से हमेशा ओझल ही रहा. इस तरह मातृहीन नरेश अपनी कल्पनाओं में भी मां व एक भारतीय घर का सपना देखते रहे जहां स्त्रियों का निवास हो, उनकी साड़ियां आगंन में सूखती दिखें. वे स्कूल भी जाते तो मां के डिठौने से वंचित, उस देखभाल से उस पुलक से वंचित जो एक मां ही बेटे को दे सकती है. साथ पढ़ने वाले बच्चों के घर से मांएं कितना कुछ बना कर देतीं जो नरेश को सुलभ न था. उन्हें शाजापुर के पास के आगर की एक काकी के हाथ की बनी मेथी की सब्जी का स्वाद नहीं भूला जिसका जिक्र उन्होंने कभी प्रभाकर श्रोत्रिय जी से बड़े भावविह्वल होकर किया और कहा सामान्य सी लगने वाली लगभग अलंकारशून्य वे सांवली महिला साधारणता में भी महिमा का गान लगती थीं. वे कहते थे ऐसा सुना जाता हे कि अवतारी व्यक्तियों के स्वत्व से सुगंध आती है, हो सकता है पर मुझे लगता है कि परम साधारणता में भी सुगंध होती है. हम जब उनके काव्य में सांस्कृतिक उदात्तता की चर्चा करें तो यह न भूलें कि उनकी सांस्कृतिक जमीन ऐसे संस्कारों से ही बनी है जहां साधारणता का बखान है. साधारणता का औदात्य अंकित है.

उनकी वैष्णवता की चर्चा बहुत होती है तो उनकी कविता को भी वैष्णवता का लेबल लगाकर उपेक्षित करने की कोशिश भी हुई. पर वैष्णवता उनकी निगाह में क्या थी, इसे मुक्तिबोध: एक अवधूत कविता में उनके इस कथन से जांचा जा सकता है कि ''मुझे लगता है कि मुक्तिबोध अपनी वैचारिकता से शैव थे, परंतु आचरण से वैष्णव जबकि मैं शायद वैचारिकता से वैष्णव रहा हूं पर आचरण में शैव.'' और इसकी तसदीक कविवर राजेश जोशी भी यह कहते हुए करते हैं कि उनकी कविता अपने रचाव में वैष्णवी है और उनका कवि अपने स्वभाव में शैवों की तरह फक्कड़ है. पर मुझे तो लगता है, इस वैष्णवता और शैव का वैपरीत्य भाव वे आजीवन जीते रहे.

नरेश मेहता का जीवन भले विपन्नन रहा हो पर उन्होंने अभावों के बीच संपन्नता के संस्कार सीखे. काका, पिता और पितामह इन सबसे और सबसे ज्यादा उन मांओं से जिन्हें उन्होंने दूसरों की मांओं के रूप में ही जाना और देखा, उनसे मां होने की अर्थवत्ता जानी. वरना हमारी तो भारतीय संस्कृति कहती ही है: माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:.
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अनासक्‍त पिता

नरेश मेहता ने इंटर तक की शिक्षा उज्जैन के माधव कालेज से पाई. पर उच्च शिक्षा के लिए वे काशी गए. काशी जाने की आर्थिक शक्ति उनके पास न थी. पिता स्वयं अपरिग्रही स्वभाव के. वे भला क्या देते. पर काशी जाने की इच्छा प्रकट होने पर उन्होंने जेब से बत्तीस रूपए निकाल कर उन्हें देते हुए बस इतना ही बोले थे कि ''मेरे पास कुल इतना ही पैसा है और मैं प्रतिमास बीस रूपए ही भेज सकता हूं. अब आप चाहें तो बनारस जाएं या जापान.'' पिता और पुत्र में ऐसा ही अजाना सा रिश्ता था. बाद में वे जब बनारस से शाजापुर आते तो प्राय: अपने काका के घर ही ठहरते. और हवाखोरी के बहाने निकलने पर पिता से भेंट होती तो बहुत ही औपचारिक लहजे में संवाद होते. कोई पुलक कोई हुलस नहीं. पर पिता को समझने में नरेश की पूरी उम्र गुजर गयी. पिता होना क्या होता है, यह उन्होंने पिता होकर नहीं, पिता को खो कर जाना.

बनारस आना उनके जीवन का बड़ा मोड़ है. हालांकि वे पंडितों की नगरी से होकर आए थे. पर बनारस तो पं केशवप्रसाद मिश्र, विश्वनाथप्रसाद मिश्र, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का गढ़ था. पं गोपीनाथ कविराज का बनारस था. लिहाजा बीएचयू में आकर वे वाराणसी की नई काव्यचेतना का अंग बने. उन पर पं केशवप्रसाद मिश्र का वरदहस्त था जिन्हें पूर्ण आश्वस्ति थी कि नरेश एक दिन बहुत बड़े कवि बनेंगे. केशवप्रसाद जी का ऐसा व्यक्तित्व कि गंगास्नान को आते हुए पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को एक बार वे टकरा गए तो द्विवेदी जी आगे घाट की तरफ न जाकर वापस लौट पड़े. केशव जी ने पूछा, 'आप तो स्नान करने जा रहे थे?' तो हजारी प्रसाद जी ने कहा, 'हो गया स्नान.' ऐसे गुरु से दीक्षित नरेश जी को ऐसा ही विराट कवि होना था जिसकी मिसाल वे खुद थे.

पढाई के बाद वे मिलिट्री में भी गए, एक बार बौद्ध भिक्षु भी बने, आकाशवाणी की नौकरी भी की. लखनऊ रहे, नागपुर रहे, दिल्ली भी, पर सृजन की अपरिहार्यता उन्हें अंतत: इलाहाबाद खींच लाई. इलाहाबाद भी साहित्यिकों का गढ़ था सो वहां उनकी वैचारिक टकराहटें भी हुईं पर अंतत: प्रयाग की मनोभूमि उन्हें रास आई और वे 1959 से 1985 तक वहीं रहे. बाद में प्रेमचंद सृजनपीठ बनने पर वे उज्जैन आए. पर इलाहाबाद उनके मन से बिसरा नहीं.
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कविता: एक अनवरत यात्रा

'बनपाखी सुनो' उनका पहला कविता संग्रह है. वैसा ही जैसा युवा कवियों का होता है पर हिंदी के आलोचकों ने उस पर प्रहार कम नहीं किए. शायद वैचारिक शिविरबद्धता से अलग होने का यह दंड मिलना था. आज भी ऐसा ही होता है. पर वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे. अपने वैशिष्टय से ही वे अज्ञेय संपादित दूसरा सप्तक में शामिल हुए. अपनी उपेक्षा का जवाब भी कहीं न कहीं वे अपनी कृतियों में देते थे. बोलने दो चीड़ को- खुद में एक उत्तर है तमाम प्रश्नाकुल और खड्गहस्त समवाय का. इस कृति में उन्होंने लिखा है:

तुम्हारे पैरों के नीचे
मेरा नाम कहीं दब गया है
उठा लेने दो
मेरे लिए वह मूल्य है.

सोचें ऐसे ही किन्हीं प्रहारों से आहत होकर अज्ञेय ने लिखा होगा. आ! तू मेरे पीछे आ. मेरे पैरों पर पैर रखता.

'उत्‍सवा' से नरेश मेहता की काव्यभूमि खिल उठती है. इसमें महाकाव्य सी श्रेष्ठता निहित है. इसे वैष्णवता के काव्य के रूप में देखा और सराहा गया, जिसमें वैदिक अनुगूंजें भी हैं, लौकिक छवियां भी. इसके सौष्ठव को देख प्रभाकर श्रोत्रिय कह उठते हैं: धरती को जहां से छुओ, ऋचा लगती है, वह दूर्वादल की भाषा वाली एक भागवत कथा है, वन उपवन धरती के काव्य-संकलन हैं, नदियां कृष्णप्रियायें हैं और हवाएं पीपल पर अपनी प्रार्थनाएं टांग सूर्यास्त का पीछा करते हुए आकाश के भी आकाश में गरुड़ों-सी चली गयी हैं. 'अरण्या' कास्मिक इमेजरी का काव्य है. ऐंद्रियता का एक अलग क्षितिज यहां खुलता दीखता है. प्रेम की विरल अनुभूतियां 'तुम मेरा मौन हो' में देखने को मिलती हैं.

नरेश मेहता की कविता 'आखिर समुद्र से तात्पर्य' और 'पिछले दिनों नंगे पैरो' व 'देखना एक दिन' में एक नया संस्कार पाती है. नई कविता की भाषा का उन पर प्रभाव है. उनकी वैदिक दृष्टि लौकिक वास्तविकताओं से यहां टकराती जान पड़ती है. 'देखना एक दिन' छोटी-छोटी कविताओं का संग्रह है पर चित्त को वेध्य है. जिस तरह कुंवर जी 'चक्रव्यूह' और 'आत्मजयी' के बाद अपनी कविताओं में सहजता की ओर उन्मुख होते हैं, कुछ-कुछ उस तरह नरेशजी ने इन तीनों कविता संग्रहों में अपनी सरलता का भाष्य उपस्‍थित किया है.

नरेश मेहता सांस्कृतिक स्मृतियों के कवि हैं. उनके उपन्यासों में भी जीवन की समाज की अपनी अनुगूंजें हैं. लोक जीवन की सरलता है. परदुख कातरता है. कारुण्य है. उन्हें पढ़ते हुए भारतीय मनीषा की उदात्तता ताजा हो उठती है. वे केवल कवि नहीं, कवि चिंतक हैं. समयद्रष्टा हैं, उनकी भाषा को छूते हुए जैसे वैदिक ऋचाओं की- सी अनुभूति होती है. गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति. गद्य कवियों की कसौटी है और गद्यकार मूलत: कवि ही हो तो? अच्‍छे गद्य की पहचान बताते हुए नर्मदा वृत्तांत ‘अलविदा नर्मदा’ में अमृतलाल वेगड़ कहते हैं: 'हमारे देश की महिलाएं खुले में इस तरह नहा सकती हैं कि अपने तन का एक भी अंग दिखने नहीं देतीं. अच्छे गद्य में भी यही बात होती है. अपने भीतर की कविता को वह दिखने नहीं देता.'

नरेश मेहता को अपने जीवनकाल में उदार आलोचक नहीं मिले जो उनकी रचनाओं में पैठ कर उनकी विपुल काव्य-संपदा का अवलोकन कर सकते. निराला, केदारनाथ अग्रवाल और अमृतलाल नागर को प्रोफेसर रामविलास शर्मा जैसे मित्र आलोचक मिले. पर नरेश जी को ऐसे दिग्गज आलोचक सुलभ न हुए. ले दे कर प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे सुधी आलोचक ने उन पर मन से काम किया है. यह सच भी है कि एक मालवी कवि को एक मालवा का कवि-हृदय आलोचक ही समझ सकता है. वे लिखते हैं, "शुरुआत में नरेश जी के लिए संस्कृति भले ही एक भ्रामक शब्द था, फिर भी वे उसके शोध पर सहमत थे, संभवत: इसी शोध का परिणाम था कि फिर उनके भीतर निरंतर अग्निहोत्र चलता रहा, अहोरात्र प्रार्थनाएं होती रहीं. यह उनकी कविता में न उपनिषद काल का लौटना था न विनय पत्रिका-काल का. यह नरेश मेहता के भीतर ज्वलित जागृत आधुनिकता थी, जो अपनी जड़ों से नया जीवन रस खींचती रही, जैसे फूल खींचता है, फल खींचता है. उन्होंने प्राचीन को अर्वाचीन अर्थ दिया. धधकती समयाग्नि में अभाव और असुरक्षा का एकांत भोगती फिर भी स्निग्ध सौम्यता से आप्ला‍वित करती नरेश मेहता की आत्मा का भूगोल, लगता है भारत के सांस्कृतिक उपादानों ने खुद रचा है."
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वैष्‍णवता की उपस्‍थिति

नरेश मेहता की भाषा दूर से ही वैदिक सूक्तों से आप्लावित लगती है, औपनिषदिक चेतना से प्रभावित लगती है, जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें एक खास सांस्कृतिक बोध के कवि के रुप में परिगणित किए जाने की चेष्टाएं हुईं. पर नरेश जी जिनकी परवरिश खास तौर पर उज्जैन जैसे महापंडितों के नगर में हुई हो, तालीम काशी से ली हो, काव्य के मूलगामी संस्कार उस बनारस से पड़े हों जहां प्रसाद जैसा दिग्गज कवि पहले ही कामायनी जैसा काव्य लिख चुका हो, जहां उनके लगभग समकालीनों में शिवप्रसाद सिंह जैसे अप्रतिम उपन्यासकार रहे हों, उस जमीन की भी अपनी विशेषता होती है. प्राचीन अर्वाचीन सबसे जीवन मूल्य  के स्फुलिंग चुनने बीनने वाले नरेश मेहता ने नई कविता के शिखरकाल में उससे अलग अपनी भाषा व चिंतना निर्मित की. उन्होंने जीवन के सांस्कृतिक मूल्यों का स्थापन ही नहीं पुनरन्वेषण किया. उसे कविताओं में बांधा, उपन्यासों में रेखांकित किया. एक सनातनता का बोध पैदा किया अपने कृतित्व में. उन्हें पढ़ते हुए पुराणमित्येव न साधु सर्वम् न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् सुभाषित याद आता है.

'उत्सवा' में लोकोन्मुखता के दर्शन होते हैं तो 'बनपाखी सुनो', 'बोलने दो चीड़ को', 'आखिर समुद्र से तात्पर्य', 'देखना एक दिन' की कविताएं सांस्कृतिक स्निग्धता से भीगी हैं. प्राचीनता को गौरव देते हुए लिखे गए 'संशय की एक रात', 'प्रवादपर्व', 'महाप्रस्थान' और 'शबरी काव्य' में उन्होंने आधुनिक मूल्यों का सन्निवेश किया है. खुद वे अपने पिता को किस रूप में देखते हैं. अनासक्त, अपरिग्रही. पुत्र कलत्र वित्त से निस्पृह. ऐसे लोगों को ही वे मूर्त वैष्णव कहा करते थे. उत्स‍वा की वैष्णव यात्रा शीर्षक कविता खुद अपने में एक मूल्य बोध है. अहिंसा तो हमारे भारतीय जीवन मूल्य की धुरी रहा है. गांधी ने उसे अपने जीवन के केंद्र में रखा. नरेश मेहता ने उसे अपने काव्य में यों प्रतिष्ठित किया है:

जब भी कोई फूल
पैरों के नीचे आ जाता है
लगता है कोई मंत्र दब गया है.
चींटी के आहत होते ही संहिता की हत्या-सा लगता है. (वैष्णव यात्रा)

वैष्णवता को लेकर उनके बारे में एक संशयी भाव साहित्य जगत में हमेशा विद्यमान रहा. पर जरा देखिए गांधी के वैष्णव जन कौन थे. वैष्णव जन तो तेणे कहिए. जे पीर पड़ाई जाने रे.... यह थी गांधी की वैष्णवता की परिभाषा. नरेश जी की परिभाषा भी इससे अलग न थी. वे पूछते थे, क्यों भाई, कितने दिनों से मनुष्य नहीं बन सके हो? मंत्रमयी उनकी भाषा एक सम्मोहन में बांधती सी लगती है. पर यह मंत्र है क्या? वे पूछते हैं, मंत्र की इस शक्तिमत्ता को कभी अपने में अनुभव किया है? उनकी कविता पशुता के विरुद्ध मनुष्यता का काव्य है. उनकी वैष्णवता, माधवता, उत्सवता सबका एक उदात्त अर्थ है. उन्होंने शब्दों को महिमा दी है. तुम मेरा मौन हो- जैसी प्रेम कविता लिखने वाले नरेश मेहता ने जीवन में भाषा की प्रीतिकर जगह बनाई. जहां कवि की भाषा प्रेयसी के केशों की माधवता से मुग्ध हो स्व्यं भाषा सीखती है.

रस की दृष्टि से पूछा जाय कि नरेश मेहता के काव्य में कौन सा रस केंद्र में है तो कहना होगा करुण. एको रस: करुणएव. कहा भी गया है. उनकी कविता में मूल में करुणा का महाभाव है. जिसमें करुणा का निवास है वही पुरुष चैत्य पुरुष है. वे कहते भी तो हैं: व्यक्ति का नहीं, मनुष्य मात्र का चैत्य‍ पुरुष बनना ही मेरा काव्य है. (अरण्या )
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भारतीय संस्‍कृति के दर्पण में

वे अपनी कविता की खोज के लिए रामायण में गए. संशय की एक रात, प्रवादपर्व और शबरी की विषयवस्तु वहीं से उठाई. रामायण खुद भारतीय संस्कृति का उदात्त काव्य है. सारे भाव विभाव मानवीय क्रियाएं नीति अनीति युद्ध राग विराग कर्तव्य सबका समाहार रामायण में है. 'संशय की एक रात' राम के भीतर युद्ध के संशय का महाआख्यान है तो 'प्रवादपर्व' सीता के निर्वासन व अग्निपरीक्षा के प्रवाद को विषय बनाया. 'शबरी' एक साधारण की प्रतिष्ठा का काव्य है. यह वर्णव्य‍वस्था की संकीर्णता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए आधुनिक सोच की परिधि को छूता है. क्या धर्मतत्व से ऊंची है वर्णाश्रम की मर्यादा? तब व्यर्थ तपस्या पूजन यह गंगा भी है शूद्रा.
महाप्रस्थान महाभारत से गृहीत पांडवों का स्वर्गारोहण प्रसंग है.

हमारे जीवन में महाभारत या रामायण उपनिषद, आरण्यक आदि ग्रंथ क्या अहमियत रखते हैं?
क्या ये केवल काव्य हैं, आख्यान हैं, या हमारी सांस्कृतिक संपदा? या वह धरोहर जो कंठ से होती हुई हमारे जीवन-व्यवहार में घुल मिल गयी है? हम पग-पग पर रामायण, रामचरित मानस का उदाहरण क्यों देते हैं? हम महाभारत के आख्यानों से आज के जीवन के महाभारत को क्यों तौलते हैं? रामायण, रामचरित मानस या महाभारत ये हमारे सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के निकष हैं. यहां नीति-अनीति, उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म, गुण-दोष, आचार-विचार, मनुष्यता-पुशता, देवत्व-राक्षसत्व, हिंसा-अहिंसा सब पर व्यापक विचार किया गया है. हमारे जीवन के लिए अपरिहार्य क्या है जो इनमें नहीं है. अपने समय के सम्मुख हर कवि अपनी परंपरा का नया भाष्य लिखता है. वे ऐसा नहीं कि औपनिषदिक चरित्र के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं. वे भारतीय मनुष्य के स्वभाव को भी परखते हैं बिल्कुल लौकिक होकर.
क्‍या महीन व्‍यंग्‍य है मनुष्‍य पर :

कुत्ते
सिर्फ क्वॉंर में ही हो पाते हैं आदमी
जबकि आदमी
वर्ष भर क्वॉंर में ही बना रहता है. (स्वभाव; आखिर समुद्र से तात्पर्य)

पर समग्रत: उनकी चेतना प्रार्थना धेनुएं, धूप कृष्णा, बृक्ष बोध, मंत्र गंध और भाषा, वैष्णव चिड़िया, नेत्र बॉंशी, वृक्षत्‍व, चैत्या पुरुष, काव्य कपिला, दैवीय पुकार, प्रार्थना, किरन धेनुएं, उषस् तथा चरैवेति-जन गरबा जैसी कविताओं में विश्रांति का अनुभव करती है. वे सांस्कृतिक स्मृतियों को और उसमें जीने वाले कवि रहे हैं. अपने सांस्कृतिक एकांत में रमण करते हुए वे लोक के गवाक्ष से झांकते हुए जनचित्त का आकलन भी करते हैं. इस तरह काव्य  की सांस्कृतिक जमीन को नरेश मेहता ने अपने काव्य में निरंतर सिंचित और संवर्धित किया है.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब  द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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