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संस्मरणः ओह, कैसे-कैसे दुखों से तपकर निकला है यह ऊंचे कद का कड़ियल लेखक शैलेश मटियानी

प्रेमचंद के बाद हिंदी को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानियां देने वाले कथाकार शैलेश मटियानी ही हैं. इस मामले में न कमलेश्वर और राजेंद्र यादव जैसे कहानी के दिग्गज उनके आगे ठहर सकते हैं और न फणीश्वरनाथ रेणु जैसे बड़े लेखक.

शैलेश मटियानी और उनकी चंद किताबें शैलेश मटियानी और उनकी चंद किताबें

खूब अच्छी तरह याद है, पहली मुलाकात उनसे राजेंद्र यादव ने करवाई थी. मैं 'हंस' के दफ्तर गया था राजेंद्र जी से मिलने. उन्होंने सामने सोफे पर विराजमान एक भव्य 'काया' की ओर इशारा करते हुए कहा, "इनसे परिचय है आपका?"
"नहीं." मैंने अचकचाकर कहा.
"आप शैलेश मटियानी...!"
"ओह!" मैं खड़ा हुआ, दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और शायद बेतुके ढंग से हाथ भी मिलाया.
मेरी खुशी ऐसी है, जैसे इस अपार संसार में किसी को एकाएक किसी मोड़ पर अपना हमसफर- नहीं-नहीं, 'हमशक्ल' मिल जाए. कहते हैं न कि दुनिया में हर किसी का कोई न कोई 'हमशक्ल' जरूर होता है, और किसने कहा कि वह उम्र में बड़ा नहीं हो सकता? यों मटियानी जी से पहली ही बार मिला तो लगा, किसी और से नहीं, खुद अपने आप से मिल रहा हूं.
"इधर आप लगता है, साहित्य के मैदान की सफाई में जुटे हैं. बड़े-बड़े युद्ध लड़ रहे हैं, एकदम खड्गहस्त होकर!" यह उनसे मिलने पर मेरा पहला वाक्य था. मुझे आज भी याद है, खूब अच्छी तरह.
"अच्छा, तो पढ़ लिया आपने?" वे हंस रहे हैं. किसी भोले-भाले गोलमटोल बच्चे की तरह, जो जरा-सी बात पर खुश हो जाता है, जरा-सी बात पर तुनक जाता है, लेकिन अपने भीतर कुछ नहीं रखता. मुझे वह हंसी बड़ी प्यारी मालूम देती है. एकदम निर्मल, निष्कलुष. जैसी बेलाग बातें, वैसी बेलाग हंसी. क्षण भर में जैसे हम 'संवाद' की स्थिति में आ गए हों.
उन दिनों छपा उनका सारा कुछ तो शायद नहीं पढ़ा होगा. हां, कुछ अरसा पहले एक उद्धत आलोचक को एक अखबार के गुलशन नंदाई मेनिया के जवाब में, उन्होंने जो जवाब दिया था वह मैंने पढ़ा था, और उससे मैं काफी प्रभावित भी हुआ था. यह मैंने उन्हें बताया.
"गुलशन नंदाई मेनिया!" सुनकर वे फिर हंसे हैं. यह एक्सप्रेशन शायद उन्हें खासा जोरदार लगा होगा.
"कैसा लगा?" उन्होंने पूछा.
"शानदार, एकदम शानदार! आपके तर्क लपेट-लपेटकर पीटने वाले हैं..."
"असल में इनका सोचना किसी-किसी कुंजी-लेखक अध्यापक की तरह है, जो साहित्य के सरोकारों को समझ ही नहीं सकता."
मटियानी ने अपनी रौ में आकर कहा, "इसलिए कि इनकी कोई गहरी रुचि ही इसमें नहीं है. सिर्फ चालू बातें ये कहते हैं और लेखकों को अपने डंडे से हांकना चाहते हैं....यानी ताज्जुब है, गुलशन नंदा, प्रेमचंद से बड़े हो गए, क्योंकि प्रेमचंद तो इतने बिकेंगे नहीं. जाहिर है, नहीं बिकेंगे तो फिर बड़े किस बात के? असल में हिंदी में लेखक के स्वाभिमान को खतरा है तो इन्हीं लोगों से!"
इतनी लंबी-चौड़ी बातचीत के बाद उन्हें खयाल आता है, "आप क्या लिखते हैं?"
"थोड़ा-बहुत लिखता हूं- कुछ कविताएं, लेख...!" मैंने संकोच से कहा.
"देवेंद्र सत्यार्थी पर इनकी किताब आई है- देवेंद्र सत्यार्थी: चुनी हुई रचनाएं."
राजेंद्र यादव जो हमें भिड़ाकर उत्सुकता से सुन रहे थे, किताब के साथ-साथ बातचीत का एक सिरा पकड़ा देते हैं मटियानी जी को.
"अच्छा, यह तो बहुत अच्छा काम है." पुस्तक पलटते हुए मटियानी जी ने कहा.
"आपने पढ़ा है सत्यार्थी जी को? मिले हैं उनसे...?" मैं उत्सुकता को दबा न सका.
"उन दिनों जब किशोरावस्था में साहित्य के संस्कार हम बटोर रहे थे, तब सत्यार्थी जी की बहुत सी पुस्तकें पढ़ी थीं. हमारे शहर के पुस्तकालय में थीं, 'धरती गाती है', 'बेला फूले आधी रात', 'बाजत आवे ढोल', 'ब्रह्मपुत्र'!" मटियानी याद करके बताते हैं.
"ये काफी निकट हैं सत्यार्थी जी के, सारा साहित्य पढ़ा है उनका." राजेंद्र यादव मेरे परिचय को हल्का-सा गाढ़ा करते हैं. फिर मेरी ओर मुखातिब होते हैं, "आप कुछ बताइए, सत्यार्थी जी के बारे में. आपको लगता नहीं कि ऐसा आदमी परिवार वालों के लिए तो बड़ी मुसीबत बन जाता है. लेखक के लिए सामाजिक जिम्मेदारियां भी जरूरी हैं कि नहीं?"
"ऐसा है, राजेंद्र जी, लेखक चौखटों से बाहर तो रहता ही है, रहेगा ही, वरना वह रह नहीं जाएगा. मुझे याद है, आपने लिखा था अपने एक लेख में- शायद 'प्रेमचंद की विरासत' में कि अगर मैं यह सोचूं कि आज मैं ठीक से कमा लूं, सेटिल्ड हो जाऊं, यह-वह हो मेरे पास, लिख तो मैं कभी भी लूंगा, तो जाहिर है, लिखना आपका स्थगित होता चला जाएगा और आप कभी भी नहीं लिख पाएंगे. तो यह शख्स ऐसे ही लेखकों में से हैं जिसने लिखने की कीमत पर सब कुछ छोड़ा और फिर भी साहित्य में कैसी बेकदरी हुई, आप देख ही रहे हैं- क्योंकि साहित्य में भी वही जाने जा रहे हैं जिनके पास पैसा, कुर्सी, दबदबा सभी कुछ है."
और फिर मैं बताने लगा, सत्यार्थी जी से अपनी पहली मुलाकात के बारे में कि मैं वहां गया तो बाल पत्रिका 'नंदन' के लिए एक कहानी लेने, मगर वहां जाकर लंबी सफेद दाढ़ी वाले सत्यार्थी जी के सम्मोहन में ऐसा फंसा कि आज तक नहीं निकल पाया. मुझे लगता है, जरूर सत्यार्थी जी कोई जादूगर हैं, या फिर उनकी लंबी सफेद दाढ़ी तो जरूर ही...!
"क्या आप जानना चाहेंगे कि कैसे मैं उनके जादुई सम्मोहन की गिरफ्त में आ गया?" चमकती आंखों से मैंने पूछा तो लगा, राजेंद्र यादव से ज्यादा मटियानी जी मुझे सुन रहे हैं. मैं सत्यार्थी जी से हुई मुलाकात का पूरा किस्सा बताने लगा-
"असल में मैं वहां गया तो पास ही उनकी पांडुलिपि पड़ी थी- चिप्पियों से भरी हुई. मैंने उन्हें टोका कि आप ऐसा क्यों करते हैं इस बुढ़ापे में? मेरी तरह क्यों नहीं करते कि अलग-अलग पन्ने लिए और जिस पन्ने पर ज्यादा काट-पीट हुई, उसे बदल दिया. इस पर मुसकराती आंखों से उन्होंने मेरी तरफ देखा और जड़ दिया, 'यह तो ऐसे ही है जैसे एक प्रेमिका दूसरी से कहे कि बहना, प्रेम ऐसे नहीं, ऐसे किया जाता है! भई, असल में हर किसी का प्रेम करने का अलग ढंग होता है...!' उस दिन के बाद से मैंने महसूस किया, मैं इस खूबसूरत बूढ़े से, जो मन से, विचारों से, आत्मा से खूबसूरत है- प्यार करने लगा हूं."
इस पर मटियानी जी और राजेंद्र यादव भी खुलकर हंसे.
"मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है यह प्रसंग." मैंने बताया और यह भी कि किस बेबाकी से मैंने सत्यार्थी जी के साथ साहित्य-चर्चा में, अपनी असहमतियों के बारे में भी लिखा है. और मजे की बात यह है कि सत्यार्थी जी खुद इसका आनंद लेते रहे हैं. वे जरा भी इसका बुरा नहीं मानते. इस लिहाज से वे एक अलग ही दुनिया के आदमी हैं. बिल्कुल एक बच्चे की तरह मासूम....
अब तक मटियानी जी पुस्तक उलट-पुलट चुके थे. पुस्तक फिर से राजेंद्र यादव की मेज पर आ गई थी.
"मैं पुस्तक की एक प्रति आपको भेंट करना चाहता हूं. कैसे होगा, यह बताइए? क्योंकि अभी तो पुस्तक मेरे पास है नहीं." मैंने अपनी समस्या बताई.
"यहां आप छोड़ दें तो मुझे मिल जाएगी....वैसे हो सकता है, मैं आऊं उधर दो-एक रोज में. खुद आकर ले लूंगा." कहते हुए लग रहा था, प्रेम उनकी आंखों से झर रहा है.
मैं तो राजेंद्र जी को सत्यार्थी जी की चुनिंदा रचनाओं का संचयन भेंट करने आया था. पर वह मुलाकात ऐसी यादगार बन जाएगी कि मैं जीवन के आखिरी पलों तक उसे भूल नहीं पाऊंगा, यह तो मैंने नहीं सोचा था.
एक संक्षिप्त-सी मुलाकात. लगभग बेमालूम-सी. लेकिन उसमें से बहुत कुछ अभी सामने आना था. वापस अपने दफ्तर आया तो लगा, मटियानी जी मेरे भीतर आकर पैठ गए हैं.
मैंने खुद को भीतर से इतना भरा-पूरा कभी महसूस नहीं किया था. लग रहा था, एक लेखक के रूप में मेरा जीवन धन्य हो गया.
***

इसके दो-तीन रोज बाद की बात है. लंच में जब मैं दफ्तर में अकेला ही था और मजे में पैर फैलाकर कोई किताब पढ़ रहा था, देखा दरवाजा खुला और वही भव्याकृति जो 'हंस' में मिली थी, मुसकराती हुई मेरी मेज की ओर बढ़ी चली आ रही है.
फर्क सिर्फ यही कि अब हाथ में एक छोटा-सा काला ब्रीफकेस है, दाढ़ी कुछ-कुछ उसी तरह बढ़ी हुई. मुसकराहट में गहरा प्रेम और अपनत्व!
"अरे, मटियानी जी, आप...!" घबराहट, उत्सुकता और सम्मान के मिले-जुले भाव से मैं खड़ा हो गया और सम्मान से उन्हें बैठाया, "आइए...आइए, बैठिए न!"
वे बैठ गए, फिर भी देर तक मेरे भीतर खुदर-बुदर चलती रही, जैसे विश्वास न हो रहा हो कि जो शख्स सामने बैठा है, वह शैलेश मटियानी ही है.
शैलेश मटियानी, यानी हिंदी के दिग्गज कथाकार. शैलेश मटियानी, यानी हिंदी के अद्भुत कथापुरुष, जिनकी 'छाक', 'अर्धांगिनी', 'दो दुखों का एक सुख' सरीखी कहानियों की हिंदी में धूम थी. वे भला मुझे इतने सहज कैसे प्राप्त हो सकते हैं?
यह खुशी से अवाक् या सन्न रहने की स्थिति थोड़ी ही देर रही. फिर एक छोटे-से विषाद ने आकर मुझे घेर लिया. "अरे, पुस्तक लेने खुद मटियानी जी आए, लेकिन इस समय पुस्तक की प्रति तो है ही नहीं मेरे पास. एक प्रति थी, वह आज सुबह ही एक सज्जन आकर ले गए. उन्हें देते हुए शायद मैंने सोचा हो कि मटियानी जी ने कहा तो है, मगर वे कहां आएंगे? इतने बड़े लेखक हैं, क्या याद रहेगा? और याद रहा भी, तो कहां वे, कहां मैं! मुझ जैसे एक मामूली लेखक से से एक किताब लेने भला वे क्यों आएंगे?"
मैंने मटियानी जी को बड़े संकोच सहित अपनी समस्या बता दी. पर उनके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आई. हंसकर बोले, "कोई बात नहीं, फिर कभी आकर ले लूंगा. मैं तो आपसे मिलने चला आया था."
मैं उनकी इस सरल सादगी पर मर मिट चला- क्या यह सच है? मुझसे मिलने आए हैं मटियानी जी, मुझ जैसे तुच्छ आदमी से?
मैं महसूस करता हूं, मटियानी का बड़प्पन और बड़ा हो गया है और मेरी 'तुच्छता' भी उनकी निकटता से महिमामंडित हो चली है.
मैं फिर वही विषय छेड़ देता हूं, मीडिया और साहित्य का- कि वह बहस चली कैसे थी? आखिरी क्या था जिससे वे इतना चिढ़ गए? मटियानी जी विस्तार से बताने लगे कि गुलशन नंदा लाखों में बिकता है, इसलिए वह बड़ा है- एक कथित आलोचक का यह वाक्य उन्हें तिलमिला गया. हिंदी का लेखक इतना गरिमाविहीन नहीं हो गया कि कोई कुछ भी कहता रहे और वह उसे सुन ले.
"इन्हें साहित्य से कोई मतलब नहीं. ये साहित्य के धंधेबाज लोग हैं जिन्हें नेता होने का शौक चर्रा रहा है!" शैलेश मटियानी बताने लगे. और फिर जो लोग लेखक और साहित्य की संवेदना को समझते नहीं हैं और अपने पुलिसिया डंडे से लेखक को हांकना चाहता हैं, उन पर मुझे बेहद-बेहद गुस्सा आता है.
तभी पहलेपहल पता चला- और बाद में तो बीसियों प्रसंग ऐसे बने कि यह बात खुद-ब-खुद रेखांकित होती गई कि लेखक के स्वाभिमान का जहां भी सवाल आता है, मटियानी जी मर मिटने की हद तक जूझ पड़ते थे. इस मामले में बड़े से बड़े दिग्गज की भी वे परवाह नहीं करते. गुलशन नंदा से अपनी या हिंदी के किसी भी प्रतिष्ठित लेखक की तुलना ने इसलिए उन्हें बौखला दिया. और मटियानी जी गुस्से में होते तो उनके शब्द किसी अंगार की तरह लगते, दहकते और झुलसाते हुए.
फिर और बहुत सी बातें चल निकलीं. एक बार साहित्य-चर्चा में रमे तो मटियानी जी को समय का कुछ होश नहीं रहा. यहां तक कि देह की भी कोई सुध-बुध नहीं.
कोई डेढ़-दो घंटे तक बातचीत चली. इसमें बड़ा अपनापन था, क्योंकि बीच में 'माध्यम' कोई नहीं था. लिहाजा किसी दिखावे या बनावट की भी जरूरत नहीं थी.
फिर मटियानी जी उठकर चलने लगे तो मैं सम्मानपूर्वक उठकर खड़ा हो गया. मैं अपने आप को भीतर-बाहर से तृप्त महसूस कर रहा था. एकदम भरा-पूरा. लगा, मटियानी जी तो बिल्कुल अपने से लेखक हैं. जैसे मेरे ही घर-परिवार के हों, बड़े भाई सरीखे. उनसे खूब खुलकर बात हो सकती है, एकदम बेझिझक होकर.
मटियानी जी कितने बड़े लेखक थे और मैं कितना छोटा और मामूली सा लेखक, पर हमारी मुलाकात में यह फासला तो बीच में कहीं रहा ही नहीं. इसलिए कि मटियानी जी सामने वाले पर अपने बड़प्पन का भारी बोझा नहीं डालते. बल्कि उलटा उसे सहारा देकर कुछ और बड़ा और गरिमामय बना देते हैं.
मटियानी जी की यही खूबी उन्हें सबका अपना और पसंदीदा लेखक बना देती है. और इससे उनका बड़प्पन, सहज ही कुछ और निखर आता है. उन्होंने अपने प्रेम और सादगी से हजारों लेखकों के दिलों में अपना घर बनाया है, और यहां उनसे मुकाबला कर सके, ऐसा कोई दूसरा लेखक नहीं है.
मैं नीचे तक उन्हें छोड़कर आया. इस बात के लिए फिर से माफी मांगी कि वे आए तो किताब मेरे पास न थी.
"कोई बात नहीं. अब की आप मेरा नाम लिखकर अलग रख दीजिएगा. फिर कोई नहीं लेगा." चलते-चलते मटियानी जी ने हंसकर कहा.
उन्हें छोड़कर ऊपर आया. सीट पर बैठा तो देर तक दिमाग झनझनाता रहा. लग रहा था, जैसे मैं हवा में उड़ रहा हूं. एक अजब-सा नशा था जो पूरे दिन को-जी नहीं, आपके होने को कुछ नया-नया कर देता है.
***

इसके बाद तो मटियानी जी से लगातार मिलना हुआ. कभी-कभी हफ्ते में दो-दो बार भी.
जब भी वे हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के पास से गुजर रहे होते, उनके पैर जैसे खींचकर उन्हें मेरे पास ले आते और हमारी बातें चल पड़तीं.
पता नहीं क्या था मुझमें, जो उन्हें भा गया था. और मेरे तो वे पसंदीदा लेखक थे ही. कहना चाहिए, हीरो. वे उन बड़े कहानीकारों में से थे, जिन्हें पढ़-पढ़कर हम बड़े हुए थे. कभी उनसे मिल पाऊंगा, यह सोचना ही मुझे रोमांच से भर देता था.
बहरहाल, वे मेरे पास होते तो मन बातें करने के लिए ललकता था. कोई भी विषय हम उठा लेते और उस पर मटियानी जी के बड़े तीखे और एक अजीब व्याकुलता भरे विचार सुनने को मिलते, जिसके पीछे उनकी लेखकीय खुद्दारी और जीवन भर के संघर्ष थे. उन विचारों से आपकी सहमति या असहमति तो हो सकती थी, पर यह तय था कि वे सौ प्रतिशत मटियानी जी के ही विचार होते और पूरे हिंदी जगत में वैसा सोचने वाला लेखक शायद ही कोई और हो. मटियानी जी का व्यक्तित्व ही नहीं, उनका लिखना और सोचना भी सबसे अलग था. वे अपनी शर्तों पर जीने और अपनी शर्तों पर लिखने वाले लेखक थे.
जल्दी ही बातचीत में पता चल गया कि मटियानी जी 'दीर्घसूत्री' हैं और उनसे बातचीत करते हुए न समय का अंदाजा आपको होता, न उन्हें. अगर पंद्रह-बीस मिनट में आपको कोई बात करनी है तो हो सकता है, दो-ढाई घंटे हो जाएं और बात फिर भी अधूरी ही रहे. फिर अचानक घड़ी पर आपकी नजर पड़े और आप एकदम अचकचा से जाएं, "अच्छा, ढाई घंटे हो गए, कुछ पता नहीं चला. कमाल है!"
मुझे अच्छी तरह याद है, एक बार दफ्तर का समय खत्म होने के बाद कोई आठ बजे चौकीदार के तिबारा-चौबारा खटखटाने पर हम उठे थे.
***

उन्हीं दिनों उनके कहानी-संग्रह 'बर्फ की चट्टानें' पर मैंने 'दैनिक हिंदुस्तान' में एक लंबा आलोचनात्मक लेख लिखा था. इसमें संग्रह की अच्छी कहानियों 'छाक', 'अर्धांगिनी', 'दो दुखों का एक सुख' और 'प्रेत मुक्ति' की विस्तार से चर्चा के साथ-साथ जो कमजोर कहानियां थीं, उन पर भी टीप थी कि ये कच्ची कहानियां हैं, इन्हें हरगिज इस संग्रह में नहीं होना चाहिए था.
लेख छपा तो मुझे आशंका थी कि हो सकता है, मटियानी जी बुरा मान जाएं. उनके बारे में चारों तरफ इसी तरह की बातें कही-सुनी जाती थीं. कुछ लोग तो उन्हें झगड़ालू तक कहते थे. इसलिए लिखने को लिख तो गया मैं, पर अंदर ही अंदर कुछ डरा हुआ था कि कहीं मटियानी जी नाराज न हो जाएं. उनसे इतने प्रीतिकर संबंध बन चुके थे कि मैं उन्हें खोना नहीं चाहता था. पर दूसरी ओर जब किताब पर समग्रता से लिखने की बात आई तो मटियानी जी की बेहतरीन कहानियों की प्रशंसा के साथ-साथ, संग्रह की कुछेक कमजोर कहानियों की चर्चा कैसे न करता? हालांकि साफ लग रहा था कि ये मटियानी जी के प्रारंभिक दौर की कहानियां हैं.
लेकिन मेरे लिए यह बड़े सुखद आश्चर्य की बात थी कि जब मटियानी जी ने इस विस्तृत समीक्षा को पढ़ा तो उस पर खुशी ही प्रकट की. बोले, "इतने विस्तार से मेरी कहानियों पर कम ही लोगों ने लिखा है. जो लेख लिखे भी गए, वे छपे नहीं- हिंदी साहित्य की विचित्र राजनीति के कारण. ऐसा भी हुआ कि लेख छपने गया और आखिरी वक्त पर रोक लिया गया. डा. रघुवंश का मुझ पर लिखा गया ऐसा ही एक लेख अब भी मेरे पास पड़ा होगा...."
फिर उन्होंने एक तरह के आत्म-स्वीकार के साथ कहा, "मनु, तुमने संग्रह की जिन कहानियों को कमजोर बताया है, वे मेरी भी प्रिय कहानियां नहीं हैं. बस, आ गईं किसी तरह!...आगे मेरे किसी संग्रह में शामिल न होंगी."
मटियानी जी इतने प्यार और हार्दिकता के साथ मेरे इस समीक्षात्मक आलेख की चर्चा कर रहे थे कि मैं अवाक सा रह गया. मैं तो उनका गुस्सा झेलने की आशंका से कुछ डरा-डरा सा उनके सामने बैठा था, पर वे तो प्रशंसात्मक शब्दों की झड़ी पर झड़ी लगाए जा रहे थे. उन्होंने कहा, "मनु, तुम्हारी कहानियों की समझ बहुत अच्छी है, और भाषा भी बड़ी दमदार है. तुम चाहो तो कहानियों की आलोचना पर अच्छा काम कर सकते हो."
यह हिंदी कथा-जगत के एक महारथी का ऐसा प्यार और उदारता भरा आशीर्वाद था, जिसने मेरी आंखें नम कर दीं.
मन कर रहा था, अभी झुककर मटियानी जी के पैर छू लूं. पर वहां इर्द-गिर्द दफ्तर का औपचारिक माहौल था. सो किसी तरह खुद को रोका.
मटियानी जी के लिए मन में आदर तो था ही, पर पहली बार मैंने महसूस किया कि मैं हिंदी कथा जगत के इस दुर्धर्ष कथाकार से प्यार करने लगा हूं.
***

कुछ समय बाद मेरे अनन्य मित्र और जाने-माने कथाकार अमर गोस्वामी 'संडे आब्जर्वर' में आ गए, तो मटियानी जी से मुलाकातों का सिलसिला और बढ़ गया. 'संडे आब्जर्वर' का दफ्तर हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के पास ही था. अमर गोस्वामी मटियानी जी के परम आत्मीय और निकटस्थ लोगों में से थे और मुझसे भी उनकी खासी आत्मीयता थी.
अब मटियानी जी को जब भी मिलना होता, वे मुझे वहीं बुला लेते. कभी भी फोन पर उनकी गूंजती हुई आवाज सुनाई दे जाती, "मनु, मैं इतने बजे आ रहा हूं. तुम 'संडे आब्जर्वर' में आ जाना. वहीं इंतजार करूंगा."
और जब उनसे बात हो रही हो तो समय का कोई दखल नहीं होता था. एकाध दफा जब चर्चा ज्यादा लंबी खिंच गई तो अमर जी ने थोड़ी समझदारी की. उन्हें उस समय जो भी केबिन खाली नजर आया, वहां हमारे अलग से बैठने की व्यवस्था कर दी और खुद काम में लग गए. रात उतरने के साथ ही जब मुझे फरीदाबाद की ओर जाने वाली अपनी आखिरी गाड़ी का ख्याल आया, तभी यह चर्चा खत्म हुई.
उस समय मैं सत्यार्थी जी के लिए 'तीन पीढ़ियों का सफर' किताब पर काम कर रहा था. मेरे छोटे भाई सरीखे संजीव ठाकुर भी इस काम में काफी सहयोग कर रहे थे. मैंने सोचा, मटियानी जी से भी आग्रह किया जाए कि वे सत्यार्थी जी की कहानियों पर कुछ लिखें. मटियानी जी ने सुना तो झट से 'हां' कर दी और उसे वाकई निभाया. सत्यार्थी जी की कहानियों के बारे में उनका लेख इस किताब के बेहतरीन लेखों में से एक हैं. इसकी खासियत यह है कि सत्यार्थी जी की केवल दो कहानियों 'जन्मभूमि' और 'कबरों के बीचोंबीच' को लेकर पूरा लेख तैयार किया गया है और इसमें सत्यार्थी के कहानीकार व्यक्तित्व की खासियत और कमजोरियों की भी कमाल की व्याख्या है.
कुछ रोज बाद राष्ट्रभाषा हिंदी पर मटियानी जी के लेखों की किताब 'राष्ट्रभाषा का सवाल' आई. ये लेख अखबारों में छपकर खूब चर्चित हो चुके थे और एक शब्द में कहा जाए तो दुस्साहसी लेख थे. मुझे हिंदी के सवाल पर इतनी बेबाकी से लिखने वाला कोई दूसरा लेखक नहीं नजर आता, सिवाय मटियानी जी के. लेकिन किताब आई तो हिंदी में समीक्षा की जो हालत है, उसे देखते हुए यह तय ही था कि उसकी उपेक्षा होगी. और सचमुच यही हुआ भी. कुछ समय बाद अमर गोस्वामी के कहने पर मैंने उस किताब पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखी, 'भाषा के मोरचे पर एक खतरनाक किताब'. इसमें मैंने खुलकर मटियानी के विचारों की चर्चा की थी कि ये विचार दूसरों से कितने अलग और समस्या से सीधा-सीधा मोरचा लेने वाले हैं.
आश्चर्य की बात तो यह है कि इस किताब में सबसे ज्यादा चोट तथाकथित 'हिंदी भक्तों' पर ही की गई थी जो दिखावे के लिए हिंदी की पूजा करते हैं, लेकिन असल में वे हिंदी के नाम पर जनता का पैसा खाते हैं, हवा में विलासितापूर्ण उड़ानें भरते हैं, बड़े-बड़े फंड डकार जाते हैं और हिंदी की हालत पहले से ज्यादा दुबली होती जाती है. मटियानी जी का कहना था कि अपने मक्खन-मलाई की चिंता में जो हिंदी की बेकद्री होते देख रहे हैं, वे हिंदी का भला चाहने वाले नहीं, बल्कि ढोंगी हैं.
जाहिर है, 'राष्ट्रभाषा का सवाल' किताब में मटियानी जी का तीखा गुस्सा और आवेश है, लेकिन इसके ठोस कारण भी हैं. हिंदी की जो हालत उन्होंने अपनी आंखों से देखी है और उससे जितना विचलित हुए हैं, उसे भला वे भुलाएं कैसे?
हालांकि यह बात याद रखनी चाहिए कि मटियानी जी केवल बहस के लिए बहस नहीं करते. बल्कि एक हिंदी लेखक और हिंदी समाज का सच्चा स्वाभिमान ही है, जो उनसे यह सब लिखवाता है. और जाहिर है, यह ऐसी चीज है, जिस पर मटियानी जी तिल भर भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं.
***

मटियानी जी से हुई मुलाकातों को याद करूं तो उसमें कहानी की मौजूदा हालत, लेखक के सरोकार और समाजिक प्रश्नों को लेकर मटियानी जी के तीखे विचारों और अनवरत संघर्षों की अनेक स्मृतियां तिरती चली आती हैं. इनमें कुछ प्रसंग तो ऐसे थे कि लेखकीय अस्मिता के सवाल पर मानो वे खुद को भी पूरी तरह दांव पर लगा देते हैं. इसके साथ ही स्वयं एक दारुण इतिहास बन चुके मटियानी जी के अतीत, घर-परिवार के हालात तथा कठिनतम जीवन-संघर्षों के वृत्तांत और मटियानी जी की एक से एक खूबसूरत कहानियों की विशद चर्चा समेत बहुत कुछ सिमटा चला आता है.
मटियानी जी की 'बर्फ की चट्टानें' के अलावा 'त्रिज्या' में छपी अनेक यादगार कहानियां और लेख मैंने पढ़ लिए थे और उनका बहुत गहरा प्रभाव मुझ पर पड़ा था. मानो मटियानी जी मेरे रोमछिद्रों तक में समा गए हों. उनकी 'लेखक और संवेदना' वगैरह किताबें भी मैं पढ़ चुका था, जो लेखक के जीवन और लेखकीय स्वाभिमान को लेकर एक गहरी तड़प और संवेदनशीलता के साथ लिखी गई थीं. और इन्हें पढ़ते हुए मेरे भीतर जैसे एक उबाल सा आ गया था.
हमारे यहां पूरी तरह लेखन पर निर्भर रहने वाले लेखक का संघर्ष वैसे भी कम नहीं होता. रोज कुआं खोदना, रोज पानी पीना. ऐसे में कभी-कभी भूखे रह जाने वाले हालात भी बन जाते हैं. इसे आकाशवृत्ति कुछ गलत नहीं कहा गया. अगर आसमान से पानी बरसा तो भूख मिटाने के लिए घर में दाने होंगे, और नहीं, तो कुछ भी नहीं. पर अगर इसके साथ ही कोई लेखक यह तय कर ले कि वह अपने लेखकीय स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, तिल भर भी नहीं झुकेगा, फिर चाहे सामने की कुर्सी पर बैठा आदमी कितनी ही बड़ी तोप क्यों न हो, तो उसके हालात और दारुण कष्टों की कल्पना की जा सकती है. मटियानी जी मानो इसी का एक साकार रूप थे.
अब मैं समझ गया था कि मटियानी जी किस मिट्टी के बने हैं और इस मामले में शायद ही कोई और हिंदी का लेखक हो, जिससे उनकी तुलना की जा सकती हो.
मटियानी जी की इन पुस्तकों को पढ़ लेने पर मेरी हालत कुछ ऐसी थी कि मैं हर क्षण जैसे उन्हीं के बारे में सोच रहा होता था. उफ, ऐसे विकट हालात में वे कैसे जीवित हैं? कैसे उनका घर-परिवार चल रहा है? और ऐसी विपरीत स्थितियों में भी वे 'छाक', 'अर्धांगिनी' सरीखी कथा के सर्वोच्च शिखरों को छूने वाली बेहतरीन कहानियां लिख कैसे लेते हैं, सोचकर मुझे हैरानी होती थी.
मुझे लग रहा था, जैसे एक से एक करुण प्रसंगों और तीखे घात-प्रतिघात वाला मटियानी जी की जिंदगी का पूरा महाभारत मेरे आगे खुल गया हो. उसमें से आधा मैंने पढ़ लिया था, बाकी आधा अभी नजरों से ओट था, लेकिन उसमें क्या क्या कुछ था, इसका अनुमान मटियानी जी से हुई अनंत मुलाकातों से लगा पाना मेरे लिए कठिन न था.
***

फिर कुछ रोज बाद एक बड़ा सुखद प्रसंग मेरे जीवन में आया, जिसके लिए मैं मटियानी जी का बेहद शुक्रगुजार हूं. असल में हुआ यह कि मटियानी जी मुझसे मिलने आए तो उनके हाथ में स्वयं अपने लिखे उपन्यासों का एक पूरा सेट था. मुझे ये उपन्यास भेंट करते हुए वे बोले, "मनु, तुमने मेरी कहानियां तो पढ़ी हैं और उन पर बहुत डूबकर लिखा भी है, पर शायद तुमने मेरे उपन्यास नहीं पढ़े. मेरा मन है कि तुम एक बार मेरे उपन्यासों को भी अच्छी तरह पढ़ लो. फिर ठीक लगे, तो उन पर कुछ लिखना."
अंधा क्या चाहे, दो आंखें. भला इससे बड़ी भेंट वे मुझे क्या दे सकते थे, और इससे बड़ा सुख मेरे जीवन में और क्या हो सकता था!
यह तो ऐसा ही था, जैसे कुआं खुद चलकर प्यासे के पास आ जाए. मेरे आनंद की कोई सीमा न थी. यों भी मटियानी जी से हुई आत्मीय मुलाकातों में सहज रूप से कई प्रसंगों में उनके उपन्यासों की चर्चा तो आती ही थी. मेरा मन ललकता था कि मटियानी जी के उपन्यास कहीं मिल जाएं और मैं उन्हें पढ़ूं. मटियानी जी हर बार मिलते तो अपने अकल्पनीय संघर्ष भरे जीवन के बारे में भी बहुत कुछ बता देते थे. लिहाजा उनकी पूरी जीवन कथा का एक बारीक तार सा मेरी स्मृतियों में खिंच गया था, जिससे उन्हें याद करते ही एकबारगी उनकी पूरी कहानी मन में बिजली की तरह कौंध उठती थी. पर मैंने उनके उपन्यास नहीं पढ़े थे, जो उनके जीवन और जीवन कथा से पूरी तरह वाबस्ता थे. और सौभाग्य से मटियानी जी आज स्वयं अपने उपन्यास लेकर मेरे पास आ पहुंचे थे. यह ऐसा ही था, जैसे एक भूखे की भूख को दूसरा बिना कहे ही जान ले और एक थाली भरकर पकवान उसके सामने लाकर रख दे.
फिर इससे जुड़ा एक छोटा सा संदर्भ भी मटियानी जी की बातों से सामने आया. असल में सचिन प्रकाशन ने उनके चार उपन्यास एक जिल्द में छापने की योजना बनाई थी. मटियानी जी ने अपनी पसंद के चार उपन्यास छांटने से लेकर भूमिका के रूप में उन पर एक विस्तृत आलोचनात्मक लेख लिखने का जिम्मा मुझ पर डाल दिया था. उन्होंने सचिन प्रकाशन के भाई सचिन पालीवाल को भी बता दिया था कि मैं प्रकाश मनु को यह काम सौंप रहा हूं. इस पर सचिन पालीवाल, जो मेरी लेखनी के खासे प्रशंसक थे, ने बड़ी खुशी और उत्साह प्रकट किया था.
जो भी हो, मेरे लिए तो ये अहैतुक खुशी और उल्लास के क्षण थे. मटियानी जी ने कहा था, "मनु, आप जितनी जल्दी यह काम करेंगे, उतनी जल्दी ही पुस्तक छपकर सामने आ जाएगी."
मैंने कहा, "मटियानी जी, आप निश्चिंत रहें. आपने मुझ पर भरोसा करके एक बड़ा जिम्मा सौंपा है, तो मैं इसे जी-जान से पूरा करूंगा....बस, आप समझ लीजिए, आज से ही मैं दिन-रात इसी काम में लग जाऊंगा. जब तक यह काम संपन्न नहीं हो जाएगा, मैं किसी दूसरे काम को हाथ नहीं लगाऊंगा."
और अब सचमुच मेरे जीवन में एक नई ही कहानी चल पड़ी. मटियानी जी के 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' से लेकर 'गोपुली गफूरन', 'मुठभेड़', 'बावन नदियों का संगम' और 'बर्फ गिर चुकने के बाद' समेत कोई दर्जन भर उपन्यास मेरे सामने थे. वे सब पुकार-पुकारकर मुझसे कहते थे, 'पहले मुझे पढ़ो...पहले मुझे...पहले मुझे...!'
मटियानी जी का पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' है, जिसमें उन्होंने अपनी बंबई (आज की मुंबई) की जिंदगी का रेशा-रेशा सामने रख दिया है. मुझे लगा, एक पाठक के तौर पर यहीं से मुझे शुरुआत करनी चाहिए. और सच ही 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' ने मुझे निराश नहीं किया. बहुत से लोग, जिन्हें समाज में छोटा और मामूली समझा जाता है, या कि बुरा, अधम और खराब कहा जाता है, उनके भीतर भी इनसानियत की कैसी लौ है, इसे मटियानी जी ने अपनी जिंदगी के वास्तविक अनुभवों से जोड़कर बताना शुरू किया, तो कहानी के तार खुद से खुद जुड़ते चले गए, और एक ऐसा उपन्यास रचा गया, जिसे पढ़कर इसी दुनिया के भीतर की एक और दुनिया हमारी आंखों के आगे खुलती है.
'बोरीवली से बोरीबंदर तक' मटियानी जी का पहला उपन्यास है, इसलिए इसके रचनात्मक कौशल में कुछ कमी हो सकती है, संरचना में थोड़ा ढीला-ढालापन और झोल भी हो सकती है, और कुछ अनगढ़ता भी बेशक इसमें है, लेकिन पठनीयता के लिहाज से देखा जाए तो 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' पाठकों को इस तरह बांध लेने वाला उपन्यास है कि एक बार शुरू करने पर उसे बिना पढ़े आप छोड़ नहीं सकते.    
फिर इसके बाद 'गोपुली गफूरन', 'मुठभेड़', 'बावन नदियों का संगम', 'रामकली', 'बर्फ गिर चुकने के बाद' वगैरह एक-एक कर मेरे दिल में अपनी जगह बनाते गए. मटियानी जी की औपन्यासिक दुनिया में प्रवेश के साथ ही मैं खुद मटियानी जी की सोच और जीवन-कथा के बिखरे ताने-बाने को जोड़ने की कोशिश करने लगा.
मटियानी जी जब भी मिलते, मैं इन उपन्यासों के रचना-काल और उनके लिखे जाने के समय की मन:स्थिति के बारे में उनसे खोद-खोदकर पूछता. कभी-कभी मुझे हैरानी होती, इतने अच्छे उपन्यास हैं ये, पर इनकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई. क्यों भला? 'मुठभेड़' और 'बावन नदियों का संगम' का तो मुझे बिल्कुल पता नहीं था, हालांकि ये बिल्कुल अपने ढंग के लाजवाब उपन्यास हैं.
***

इन्हीं साहित्य चर्चाओं में कभी-कभी मटियानी जी अपने दारुण अतीत के प्रसंग छेड़ देते तो मैं अवाक सा रह जाता. स्तब्ध. मेरे कान ही नहीं, मेरी आंखें और पूरा वजूद ही मानो कान बनकर सुनता मटियानी जी के उन अऩुभवों को, जो मेरे लिए अकल्पनीय थे. खासकर बंबई (आज की मुंबई) में बिताए गए अपने बेहद तकलीफ भरे दिनों के बारे में वे बताने लगते तो अपने आंसुओं पर काबू पाना मेरे लिए मुश्किल हो जाता.
ये ऐसे दिन थे, जब उन्हें हद से ज्यादा भूख और जलालत बर्दाश्त करनी पड़ी थी. बाद में उन्होंने ढाबे में बैरागीरी भी की. उस दौरान उन्हें बहुत दारुण किस्म के अनुभव हुए, जिन्हें वे कहानियों में ढालते और पत्र-पत्रिकाओं में भेज देते. हालांकि तब वे स्वयं भी कल्पना नहीं कर सकते थे कि एक दिन वे हिंदी के चोटी के कहानीकार बनेंगे और देश भर में फैले हजारों पाठक उन्हें दीवानगी से पढ़ेंगे और सराहेंगे.
इसी को केंद्र में रखकर मटियानी जी ने 'हंस' में 'बंबई: खराद पर' शीर्षक से संस्मरण लिखने शुरू किए, तो उन्हें सराहने वालों की बाढ़ आ गई. मटियानी जी बेहद प्रभावी भाषा में ये संस्मरण लिख रहे थे और यह सिलसिला बहुत अच्छा जा रहा था, पर फिर वह अचानक बंद हो गया.
"क्यों भला...?" पूछने पर वे कहते हैं, "मुझे शुरू से ही आशंका थी कि ऐसा होगा. पाठकों के खूब पत्र और अच्छी प्रतिक्रियाएं आ रही थीं. पर राजेंद्र यह कैसे पसंद कर सकते हैं? उन्होंने संपादकीय में मेरे खिलाफ टिप्पणी लिखी- ये तमाम तरीके थे मुझे निरस्त करने के. आखिर मैंने फैसला किया कि नहीं लिखूंगा."
कहते हुए एक अनबुझी कड़वाहट उनकी आवाज में नजर आती है.
कुछ देर रुककर कहते हैं, "यह अब आएगा कभी आत्मकथा की शक्ल में. तैयारी चल रही है. देखिए, कब तक हो पाता है?" कहते हुए मटियानी के चेहरे पर कुछ पस्ती नजर आती है.
मुझे 'सारिका' के 'गर्दिश के दिन' के लिए लिखी गई उनकी टिप्पणी 'लेखक की हैसियत से' याद आती है जिसमें उन्होंने दूसरों की तरह आत्मदया से ग्रस्त होकर अपने अतीत के दुखों को ग्लोरीफाई नहीं किया. इसके बजाय अपने भीतर की उस ताकत के बारे में लिखा है जो बुरे से बुरे हालात में उन्हें लड़ने की ताकत देती रही. सिर्फ उनके संघर्षपूर्ण जीवन के कुछ संकेत उसमें हैं. जरा आप भी पढ़ें ये पंक्तियां-
"मुंबा देवी के मंदिर के सामने भिखारियों की कतार है और अन्न की प्रतीक्षा है. चर्च गेट, बोरिवली या बोरीबंदर से कुरला थाना तक की बिना टिकट यात्राएं हैं और अन्न की प्रतीक्षा है. और इस अन्न की तलाश में भिखारियों की पंगत में बैठने से लेकर जान-बूझकर 'दफा चौवन' में भारत सरकार की शरण में जाना और जूते-चप्पलों तक का चुराना ही शामिल नहीं, राष्ट्रीय बेंतों और सामाजिक जूते-चप्पलों से पिटना भी शामिल है."
काश, मटियानी जी उस दौर के अनुभवों पर विस्तार से कलम चलाते. तब वह 'महाभारत', जिससे वे निकलकर आए हैं लेकिन जो समय की ओट है, वह हम सबके सामने आ पाता. वह किसी उपन्यास से ज्यादा सजीव और रोमांचक होता. पर मटियानी जी सब ओर से खुद को समेटकर उसे लिख नहीं सके. उनकी 'मुड़-मुड़के मत देख' सरीखी आत्मकथात्मक पुस्तकें महत्त्वपूर्ण हैं, पर वे अपने पूरे जोश में लिखते, तो सचमुच कोई बड़ी और यादगार कृति सामने आ पाती.
"आपने सुप्रीम कोर्ट तक हिंदी के लिए लड़ाई लड़ी और अपनी इतनी शक्ति और ऊर्जा उसमें झोंक दी. यह शक्ति आपके लेखन में भी लग सकती थी. तो इस तरह आप किसी 'एक्सट्रीम' तक क्यों चले जाते हैं? आखिर यह आपका काम तो नहीं है न! बातों-बातों में मैंने यह सवाल पूछा था.
सुनकर वे गंभीर हो गए और कुछ सोचते हुए कहा, "हां, औरों ने भी यह सवाल किया है. और ऊपर से देखने पर यह बात सही भी लग सकती है कि एक लेखक यह सब क्यों करे या इस हद तक क्यों जाए? लेकिन इस सवाल के जवाब में मेरा भी एक सवाल है कि अगर मैं यह लड़ाई न लड़ूं, अधबीच हारकर या चुप होकर बैठ जाऊं, तो कहानी या उपन्यास लिखने के लिए अनुभव कहां से निकलेंगे? क्या लिखने के लिए मैं अनुभव किसी से उधार मांगूंगा? और बगैर अनुभव के या इधर-उधर की सुनी-सुनाई या उड़ाई हुई बातों के आधार पर लिखना मुझे पसंद नहीं है."
फिर उन्होंने अपनी पुस्तक 'लेखक और संवेदना' में छपे एक लेख की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा, "'लेखक और संवेदना' में आपने पढ़ा होगा, मेरे यह कहने पर कि मैं हिंदी का एक सम्मानित लेखक हूं, जज का खौलता हुआ जवाब आया था, "यू मे बी द ग्रेटेस्ट राइटर ऑफ द वर्ल्ड, सो व्हाट?" आप कल्पना कर सकते हैं, यह सुनकर मुझ पर क्या बीती होगी?..."
मैं बिल्कुल सन्न सा मटियानी जी की बातें सुन रहा था. उनका दर्द मेरे भीतर बह रहा था, और मैं गहरी कचोट महसूस कर रहा था. काश, हमारे समाज ने मटियानी जी सरीखे बड़े कद के लेखक को वह सम्मान दिया होता, जिसके वे वाकई हकदार हैं.
मैं मटियानी जी के दर्द में सीझा हुआ, चुप- एकदम चुप हूं. भीतर एक लहर आती है, जाती है, फिर दूसरी चल पड़ती है. कुछ कहना चाहता हूं, पर समझ में नहीं आता, क्या कहूं, क्या न कहूं?
मटियानी जी मेरी मनःस्थिति समझ रहे थे. वे जैसे मुझे आश्वस्त करते हुए बोले, "हां, इस बीच आपने मेरी 'अर्धांगिनी' या 'छाक' वगैरह कहानियां पढ़ी हों तो आप समझ जाएंगे कि मैं अभी चुका नहीं हूं. कहानियां मैं अब भी बेहतर लिख सकता हूं, अगर लिखने पर आया तो!"
मटियानी जी सचमुच ठीक कह रहे थे, एकदम ठीक. मैंने अपने आप को ठकठकाया, काश, कुछ कहने से पहले मैंने उन्हें ठीक से समझा होता!
***

अब तक मन बन गया था कि मटियानी जी का एक लंबा इंटरव्यू लिया जाए. इतने बीहड़ आदमी को अपने सामने इतनी अंतरंगता के साथ खुलते देखकर बार-बार लगता था, मैं उनके गहरे अंतर्द्वंद्व का गवाह हूं. उसे लिखना मेरी जिम्मेदारी है.
एक दिन बात करते-करते बीच में टोककर अपनी इच्छा कही तो मटियानी जी बोले, "हां, इच्छा मेरी भी है. लेकिन वह आप बाद में कभी करें, उसके लिए टेपरिकॉर्ड होना जरूरी है. एक-एक शब्द टेप हो, फिर लिखा जाए. और कुछ मुद्दे तय कर लिए जाएं. वे साहित्य के हो सकते हैं, लेखक और समाज के संबंध में या लेखक और सत्ता के संबंध में हो सकते हैं. मेरी रचनाओं पर भी अलग से बात ही सकती है, आज के लेखक के सामने खड़े संकट पर बात हो सकती है. रचना और पुरस्कार तथा रचना और पारिश्रमिक को लेकर भी बात हो सकती है. और भी विषय लिए जा सकते हैं. कोई हफ्ता या पंद्रह दिन यह सिलसिला चले. फिर इस पर चाहें तो एक किताब ही हो सकती है. शर्त यह है कि उसकी रॉयल्टी आधी-आधी रहेगी."
इस शर्त को मानने में तो मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी? लेकिन उनकी इतनी बड़ी योजना सुनकर मैं भीतर से कुछ हिल गया. योजना मुझे बुरी नहीं लगी थी, लेकिन इसके पूरे होने की उम्मीद बहुत कम नजर आ रही थी. खासकर जिस तरह वे भागते हुए आते, भागते हुए जाते थे और तीन-चार घंटे का समय मुश्किल से मिलता था, (अगली मुलाकात तो अनिश्चित होती ही थी!) उससे यह सपना भी देख पाना कि वे हफ्ता-पंद्रह दिन मेरे यहां आकर ठहरेंगे, असंभव लगने लगा था.
तो हारकर एक तकरीब मैंने निकाली. जब-जब मटियानी जी मिलते, मैं उनके जीवन-इतिहास का कोई पन्ना खोल देता और वे बताना शुरू करते तो बताते चले जाते. इसी सिलसिले में उनके परिवार की पृष्ठभूमि का पता चला. पता चला कि उनका बचपन घोर नरक जैसी गरीबी में बीता. स्कूल की फीस एक-दो आने होती थी, लेकिन उतना देने को भी घर में पैसे नहीं थे. माता-पिता छोटी उम्र में अनाथ छोड़कर गुजर गए थे. चाचा के पास पल रहे थे. चाचा खिला रहे थे तो काम भला कैसे न लेते? लिहाजा मटियानी जी बकरियां चराने के लिए जाते तो एक स्कूल के सामने एक पेड़ के नीचे बैठ जाते. बच्चों को साफ कपड़े पहने स्कूल में जाते देखते रहते.
उनकी करुण आंखों में पढ़ने की बड़ी लालसा थी. पर भला उन्हें पढ़ाता कौन? लिहाजा स्कूल के बच्चों की गिनती और पहाड़े याद करने की आवाजें आतीं तो वे पेड़ के नीचे बैठे-बैठे दोहराते जाते. इस तरह उन्होंने वर्णमाला, गिनती और पहाड़े थोड़े-थोड़े सीख लिए. एक दिन स्कूल के हैडमास्टर गैलाकोटी जी बाहर निकले. बालक से पूछा, "क्यों, पढ़ोगे?" और बालक की आंखों से आंसुओं का झरना फूट पड़ा. वह बिलख-बिलखकर रोया.
मटियानी जी इस प्रसंग को सुनाते हुए बहुत भावुक हो गए थे. खुद मेरी हालत यह है कि वह रोता हुआ बच्चा मेरे अवचेतन का एक जरूरी हिस्सा हो गया है. ओह, कैसे-कैसे दुखों से तपकर निकला है यह ऊंचे कद का कड़ियल लेखक, जिसका नाम शैलेश मटियानी है.
फिर उन्होंने भागकर मुंबई चले जाने और एक होटल में बैरागीरी करने की 'कथा' सुनाई. वहीं होटल में 'छोटू' की भूमिका निभाते हुए, मैले बरतन घिसने के साथ-साथ उन्होंने कहानियां लिखीं. एक कहानी 'धर्मयुग' में छपने भेज दी और साथ में अपनी हालत भी बयान कर दी. 'धर्मयुग' संपादक सत्यकाम विद्यालंकार ने वह पत्र पढ़ा तो वे अपने सहयोगियों के साथ उस असाधारण प्रतिभाशाली बालक से मिलने के लिए आए.
किशोर रमेश मटियानी 'शैलेश' ने (तब शैलेश मटियानी इसी नाम से लिखा करते थे.) उन्हें चाय पिलाई और बाद में बात चलने पर उसे 'धर्मयुग' संपादकीय परिवार में लिए जाने की भी चर्चा चली. लेकिन रमेश मटियानी 'शैलेश' हाईस्कूल पास भी नहीं था, जो संपादकीय परिवार में शामिल किए जाने की न्यूनतम शर्त थी. तो भी उसकी रचनाएं 'धर्मयुग' में स्थान पाने लगीं.
अब मटियानी जी ने अपने जीवन की वह पहली और आखिरी नौकरी छोड़ दी और रचनाओं के पारिश्रमिक के आधार पर अपना गुजर-बसर करने लगे. फिर तो धीरे-धीरे यह हुआ कि उनकी कहानियों की धूम मच गई और पाठकों ने उन्हें इतना पसंद किया कि देखते ही देखते वे हिंदी के पहली कोटि के कहानीकारों की पांत में आ गए. लेकिन हिंदी कहानी में उनका यह स्थान बना तो आलोचकों के बल पर नहीं, पाठकों के बल पर. आलोचकों से उन्हें उपेक्षा ही मिली और आलोचना-जगत में उनकी किसी कहानी की कुछ खास चर्चा रही हो, याद नहीं आता. खुद मटियानी जी ने कभी आलोचकों की ज्यादा परवाह की होगी, नहीं लगता.
पहले शैलेश मटियानी कविताएं भी लिखा करते थे, बल्कि उनके लेखन की शुरुआत कविताओं से ही हुई. फिर धीरे-धीरे कविताएं छूट गईं और वे कहानीकार के रूप में ही ख्याति पाते चले गए. एक दिन बातों-बातों में मटियानी जी यह बता रहे थे तो मैंने उत्सुकता से पूछा, "क्यों...क्यों?" इस पर अपनी 'भव्य' काया की ओर इशारा करके वे बड़े जोर से हंसे, "भई, एक तर्क तो शरीर का तर्क भी था...कि इतने बड़े शरीर वाले आदमी को कुछ जरा जमकर बड़ी रचनाएं लिखनी चाहिए. सोलह-बीस पंक्तियों की कविता लिखते शर्म आती थी."
मटियानी जी ने इतना बड़ा जीवन बगैर नौकरी के कैसे निकाल दिया? कैसे उनके घर-परिवार का खर्च चला? जीवन में उन्हें क्या-क्या मुसीबतें, कैसे-कैसे अपमान झेलने पड़े? इसे शायद ही किसी ने समझने की कोशिश की हो. पर मटियानी जी कभी-कभी बातों के आवेग में अपने जीवन की कुछ ऐसी करुण सच्चाइयां भी बता दिया करते थे, जिन्हें सुनकर मैं अवाक और भौचक्का सा रह जाता.
इसी सिलसिले में एक दिन डाकिए की बात चल निकली. उनके जीवन का सारा ताना-बाना तो उसी के इर्द-गिर्द गुंथा हुआ था.
"एक फ्रीलांस राइटर के लिए डाकिए का क्या महत्त्व होता है," मटियानी जी अपनी रौ में बहते हुए बता रहे थे, "इसे कोई दूसरा जान ही नहीं सकता. कई बार तो हालत यह होती है कि घर में एक दाना तक नहीं था. पैसे के नाम पर एक फूटी चवन्नी तक नहीं, और घर में कोई मेहमान आया बैठा है. आप बाहर सड़क पर चहलकदमी कर रहे हैं कि शायद डाकिया आए और मनीऑर्डर लेकर आए...!"
मैं सोचता हूं, मटियानी जी सरीखे ऊंचे कद के साहित्यकार का यह जीवन भर का तप क्या किसी बड़ी से बड़ी तपस्या से कम है?
***

सच तो यह है कि शैलेश मटियानी हिंदी कहानी के शीर्ष पुरुषों में से एक हैं. हिंदी साहित्य को जितनी अच्छी और दमदार कहानियां उन्होंने दी हैं, उतनी शायद ही किसी और लेखक ने दी हों. इस मामले में न कमलेश्वर और राजेंद्र यादव जैसे कहानी के दिग्गज उनके आगे ठहर सकते हैं और न फणीश्वरनाथ रेणु जैसे बड़े लेखक.
रेणु उपन्यासकार के रूप में निस्संदेह, काफी बड़े हैं. बहुत अच्छी कहानियां भी उन्होंने लिखी हैं. पर जीवन की गहरी संवेदना और रोजमर्रा के यथार्थ से जुड़ी जैसी करुण और मार्मिक कहानियां मटियानी जी के यहां हैं, वैसी रेणु के यहां शायद ही मिलें. यों भी मटियानी जी के यहां प्रथम कोटि की अद्वितीय कहानियां दर्जनों की संख्या में है, जो कहानी के सर्वोत्कृष्ट शिखरों को छू आती हैं. और इस मामले में शायद ही आज का कोई और कहानीकार उनका मुकाबला कर सके.
प्रेमचंद के बाद हिंदी को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानियां देने वाले कथाकार शैलेश मटियानी ही हैं. लेकिन आश्चर्य, हिंदी के किसी बड़े आलोचक ने उनकी कहानियों की असाधारण संवेदनात्मक गहराई और कलात्मक सौष्ठव को लेकर गंभीरता से कुछ नहीं लिखा. शायद इसलिए कि मटियानी जी बेहद स्वाभिमानी लेखक थे और किसी के आगे झुकना उन्होंने कभी गवारा नहीं किया.
मैंने मटियानी जी के इसी स्वभाव को लेकर एक कविता लिखी थी और उन्हें एक ऐसा जुझारू शख्स बताया था, जिसे खतरों से खेलने में मजा आता है. मौत के साथ लगातार जूझते हुए भी जो अपना जीने का ढब नहीं छोड़ता. और उसका होना मुझे दुनिया में अपनी ही तरह की एक और 'आवाज' का होना लगता है.
एक बार बातों-बातों में मैंने मटियानी जी को इस कविता के बारे में बताया तो वे हंसे थे, "अच्छा, कभी सुनाना."
"लेकिन इंटरव्यू...? अब आप जल्दी से उसके लिए समय निकालिए." मैंने याद दिलाया.
इस पर उन्होंने कहा, "हां-हां, क्यों नहीं? हालांकि मेरा इंटरव्यू लेना इतना आसान नहीं है. जाने कितने लोग पीछे पड़े रहते हैं. 'सारिका' ने युवा कहानीकार अशोक अग्रवाल को मेरे पास इंटरव्यू लेने के लिए भेजा था. वे तो एक तरह से डेरा डालकर ही बैठ गए थे. पर मूड नहीं बना. लेकिन तुमसे बात करने का तो मेरा मन है." और फिर वह कमलेश्वर तथा कन्हैयालाल नंदन के जो इंटरव्यू मैंने किए, उनकी तारीफ करने लगे, "यह कला तुम्हें आती है, भीतर से बात निकलवाने की कला...!"
लेकिन कई महीनों नहीं, बरसों की कोशिश के बाद भी उनसे इंटरव्यू करने का सुयोग नहीं मिला. हालांकि न उम्मीद मैंने छोड़ी और न वे ही कभी कह सके कि- नहीं, अब यह संभव नहीं लगता!
समय खिसक रहा था और हम इस खिसकते हुए समय में एकाध खूंटा गाड़ पाने का अपना इरादा शायद कभी नहीं छोड़ पाते. अलबत्ता इस बहाने मटियानी जी को भीतर से जानने का एक मौका मिल गया और मैं इसे भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं मानता.
***

बहरहाल आगे चलकर मटियानी जी के मानसिक विक्षेप की थरथरा देने वाली बात सामने आई. यों उसके बाद भी उनकी जद्दोजहद एक क्षण के लिए भी रुकी नहीं. बेहोशी के दौरे पड़ते थे, सिर में मर्मातक पीड़ा जैसे कोई सिर पर हथौड़े चला रहा हो. लेकिन होश में आते ही फिर हाथ में कलम लेकर डट जाते.
इसी हालत में बीच-बीच में कई अविस्मरणीय मुलाकतें हुईं और गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल में ही कई घंटे चला एक अद्भुत इंटरव्यू, जिसमें मटियानी जी ने सवालों के ऐसे सधे हुए जवाब दिए कि मैं ही नहीं, मेरे साथ पहुंचे दोस्त रमेश तैलंग और शैलेंद्र चौहान भी स्तब्ध और सम्मोहित थे. एक यादगार इंटरव्यू, जो मन की बहुत उदात्त स्थितियों से निकला होगा.
इस इंटरव्यू में मटियनी जी ने बहुत सी ऐसी बातें कहीं, जो ऐतिहासिक महत्त्व की हैं, और जिसके एक-एक शब्द पर गौर करना जरूरी है.
भले ही हिंदी के बड़े आलोचकों ने मटियानी जी की उपेक्षा की हो, पर उन्हें पूरा यकीन था कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "लेखक की हैसियत से यह विश्वास कहीं मेरे भीतर है कि अगर आप कोई बेईमानी नहीं कर रहे और रचना के पीछे आपके सच्चे और ईमानदार अनुभव हैं तो आपको दबाया नहीं जा सकता!" कहते-कहते एक फीकी, उदास मुसकराहट उनके होंठों पर नजर आई.
ऐसे मटियानी को भला कौन पागल कहेगा? पर इलाहाबाद ने निराला के बाद अंतत: मटियानी को भी पागल बना ही दिया- और वे गुजरे. भीषण यातना झेलकर गुजरे. वे टूट गए, पर एक लेखक की स्वाभिमानी जिद को उन्होंने हरगिज छोड़ा नहीं. इसीलिए एक रचनाकार के रूप में उनका कद इतना बड़ा है कि उनके आगे हिंदी के बड़े से बड़े कथाकार आभाहीन लगते हैं.
मटियानी जी उन लेखकों में से हैं जिन्हें समय ने साबित किया है. उन्हें आलोचकों ने नहीं, पाठकों ने बनाया है और वे हैं तो इसलिए कि हिंदी के पाठकों ने लंबे अरसे से उन्हें अपने दिल में जगह दी है. मटियानी जी को यहां जो प्यार और सम्मान मिला है, वह शायद ही हिंदी के किसी और लेखक को मिला हो. जैसा कि बाबा नागार्जुन ने कहा, "वे हिंदी के गोर्की थे, जिन्हें ठीक से समझा नहीं गया." हालांकि मटियानी जी ने इतनी अमर और कालजयी कृतियां हिंदी को दी हैं कि उनका यह कहना जरा भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं लगता कि "मनु, मैं प्रेमचंद के बाद खुद को हिंदी का सबसे बड़ा कहानीकार मानता हूं."
मटियानी जी अब नहीं हैं. उन्हें गुजरे कोई बीस बरस हो गए. पर इसके बावजूद हिंदी कथा-जगत में एक शिखर कथाकार के रूप में मटियानी जी का होना यह साबित करने के लिए काफी है कि कथा-साहित्य में अब भी 'पाठक' की सत्ता 'आलोचक' से कहीं बड़ी है. और अंतत: समय की लंबी दौड़ में लेखक वही जिएगा, पाठक जिसे चाहेंगे और प्यार करेंगे. और कहना न होगा, यहां शैलेश मटियानी को जो जगह हासिल है, वह आने वाले बरसों में शायद ही किसी और हिंदी लेखक को हासिल हो सकेगी.
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संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09810602327, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com

 

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