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प्रयाण: कुंवर बेचैन, मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूं?

कवि सम्मेलनों में शिरकत करने वाला हर शख्स कुंवर बेचैन का नाम अवश्य जानता होगा. गए पांच दशकों से वे कवि सम्‍मेलनों की स्थायी उपस्थि़ति थे. इस मधुर और दिलकश कवि, गीतकार व ग़ज़लगो का आत्मीय स्मरण

डॉ कुंवर बेचैनः जितनी दूर नयन से सपना [सौजन्यः फेसबुक] डॉ कुंवर बेचैनः जितनी दूर नयन से सपना [सौजन्यः फेसबुक]

जिसने गीत की एक लंबी शानदार परंपरा देखी हो, मंच की एक लंबी शानदार पारी खेली हो, देश-विदेश के हजारों मंचों पर गीत के राजकुमार की तरह काव्यपाठ किया हो तथा अपनी मोहिनी मुस्कान और गीत के लालित्य से मोह लेने का कौशल जिसके पास हो, ऐसे कुंवर बेचैन का इस असार संसार से जाना हिंदी की एक बहुत बड़ी क्षति है. पिछले कुछ महीने पहले ही उनसे आईआईटी खड़गपुर के आभासी मंच पर आयोजित कवि सम्मेलन में मुलाकात हुई थी तथा काव्यपाठ के बाद वे लगभग एक घंटे अलग से बतियाते रहे थे. गीत को लेकर और मेरे संचालन से प्रसन्न होकर उन्होंने अभिभूत होते हुए कहा था ओम जी इतने कवि सम्मेलनों में भाग लिया है, कहां-कहां नहीं गया पर ऐसे शब्दों, ऐसी ऐतिहासिक एवं गरिमापूर्ण गीत परंपरा में मुझे चिह्नित करते हुए बुलाने का यह शुद्ध साहित्‍यिक अंदाज मैंने और कहीं नहीं देखा. आपके लेख पढ़ते हुए आपकी विद्वत्ता का कायल होता हूं पर आप इतना अच्छा संचालन और काव्य पाठ खुद करते हैं यह आज देखने को मिला. इससे पूर्व कुछ कार्यालयीन कवि सम्मेलनों में उनके साथ पढ़ने का सौभाग्य मिला है तथा कई अन्य मंचों पर उन्हें बतौर श्रोता सुना है. वे मंच पर जैसे गीत की सदानीरा बहा देते थे और ग़ज़लों में उतरते थे तो अपने अंदाजेबयां से मोह लेते थे.

गीतकारों में नीरज ने जीवन की क्षणभंगुरता पर सबसे अधिक गीत लिखे हैं. 'जिन्दगी दुल्हन है एक रात की.' 'इस तरह तय हुआ सांस का यह सफर/ जिन्दगी थक गयी मौत चलती रही' और कितने ही गीतों में मृत्यु की आहट को उन्होंने स्वर दिया है. जीवन और मृत्यु के बीच की कश्‍मकश के इस खेल को जीवन दर्शन की तरह कवियों ने जिया है. किन्तु एक कवि का जाना ऐसे समय हो जब देश में महामारी फैली हो तो यह कितने दारुण दुख की बात है. कुंवर बेचैन ऐसे कवियों में हैं जिन्होंने कभी पस्ती का गीत नहीं लिखा, हताशा का गीत नहीं लिखा. लेकिन एक ऐसे भयावह कोरोनाग्रस्त समय में वे इहलोक से विदा हो रहे हैं जब पूरे देश में पस्ती और हताशा का आलम है, और एक से एक विभूतियां, आम नागरिक बूढ़े और युवा हमारे बीच से विदा हो रहे हैं. बेचैन पिछले कुछ दिनों से कैलाश हास्पिटल में उपचार के लिए भर्ती थे तथा उपचार से सुधार की दिशा में बढ़ भी रहे थे कि सुबह ही हिला देने वाली खबर मिली कि कोरोना उपचार के बीच-बीच में सुखद चैतन्य में लौटने वाले, बोलते बतियाते रहने वाले, यहां तक कि बीमारी में भी ग़ज़ल के कुछ अशआर लिखने वाले कुंवर बेचैन अचानक सांस लेने में कठिनाई की हालत में कल फिर वेंटीलेटर पर लाए गए तथा आज सुबह नहीं रहे. कोरोना ने हिंदी के वर्तमान समय के सबसे मधुर गीतकार और अलग अंदाजेबयां के ग़ज़लगो को छीन लिया. उनसे वादा था कि एक दिन एक लंबी गप्प होगी, एक लंबा आलेख उन पर लिखूंगा पर यह उनके रहते संभव न हो सका.

मुरादाबाद के ग्राम उमरी में 1 जुलाई, 1942 में पैदा हुए कुंवर का बचपन चंदौसी में बीता. एम.काम, एम.ए हिंदी एवं पीएचडी की उपाधि हासिल करने के बाद वे एमएमएच कालेज गाजियाबाद में 1965 में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए तथा वहां 2001 में वे विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की धरती छंद की दृष्टि से उर्वर मानी जाती है. गीतों के एक से एक धुरंधर कवि यहीं पैदा हुए. नीरज, भारत भूषण, किशन सरोज, बलबीर सिंह रंग, रमेश रंजक तथा रामावतार त्यागी ऐसे बहुतेरे गीतकार इसी इलाके से ताल्लुक रखते हैं. इनमें से हर गीतकार का अपना रंग रहा है तथा मंच की दुनिया इनसे ही पहचानी जाती रही है. यही कारण है कि कुंवर बहादुर सक्सेना से कुंवर बेचैन बने इस कवि ने लिखना शुरू किया तो गीतों में जैसे एक नयी चमक और गमक आ गयी. उनके शुरुआती संग्रहों 'पिन बहुत सारे', तथा 'भीतर सांकल, बाहर सांकल' सहित अनेक काव्य कृतियों को पढ़ने का सुअवसर मिला है तथा कह सकता हूं कि जीवन जगत का ऐसा कौन सा भाव होगा जो कुंवर बेचैन की रचनाओं में द्रष्टव्य न हो. मान का गीत हो, मनुहार का गीत हो, विरह का हो कि श्रृंगार का हो, ओज का हो या उदात्त का हो, आशा और उल्लास का हो, कुंवर बेचैन के यहां लगभग तमाम रस, तमाम शैलियों के गीत मिल जाएंगे. ऐसा ही हाल उनका ग़ज़लों में है. हिंदी ग़ज़ल बेशक अपनी तरह से अपना उद्भव और विकास लिखता रहे, किन्तु हिंदी ग़ज़ल में कुंवर बेचैन के अलावा ऐसा कौन सा आधुनिक हिंदी ग़ज़लगो है जो उनके मुकाबिल तुलनीय हो. बोलचाल के आम मुहावरों से गीत के स्थायी बुनने वाले तथा ऐसे ही आम बोलचाल के वाक्यों से ग़ज़ल के अशआर तैयार कर देने वाले कुंवर बेचैन की ग़ज़लें न केवल हिंदी बल्कि उर्दू की ग़ज़ल परंपरा को भी आईना दिखाती है.
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एक लंबी कविता यात्रा
मंच से जुड़े गीतकार कवियों का यह दुर्भाग्य है कि वे मंच के तो सेलीब्रिटी कवि होते हैं किन्तु लिखने-पढ़ने वाले गंभीर कवियों के बीच उनकी कोई सुनवाई नहीं होती. या फिर मंच पर बरसों पढ़ने वाले कवियों में से किसी-किसी के खाते में बस एकाधिक संग्रह होते हैं. अक्सर लोग वही-वही रचनाएं शुरू से अंत तक सुनाते रहते हैं और जीवन बीत जाता है. कुंवर बेचैन इस मामले में अद्वितीय थे कि उनके पास हजारों गीत व ग़जलों का भंडार था. वे श्रोताओं की मांग पर बेशक अपनी कुछ लोकप्रिय रचनाएं जरूर दोबारा सुनाते थे पर इससे भ्रम न हो कि वे दो चार पचास सौ गीतों के रचयिता या चंद ग़ज़लों के रचनाकार थे. उन्होंने लगभग पैंतीस से अधिक कृतियां रचीं, जिनमें गीत, ग़ज़ल, कविता, महाकाव्य़, हाइकू, उपन्यास व समालोचना विधा शामिल हैं. 9 गीत संग्रह, 15 ग़ज़ल संग्रह, एक महाकाव्य़, एक हाइकू, एक दोहा संग्रह, दो उपन्यास, एक यात्रा वृत्तांत व कुछ अन्य कृतियां शामिल हैं, जिनकी सूची निम्नांकित है- पिन बहुत सारे (1972), भीतर साँकल: बाहर साँकल (1978), शामियाने काँच के (1983), महावर इंतज़ारों का (1983), रस्सियाँ पानी की (1987), उर्वशी हो तुम (1987), झुलसो मत मोरपंख (1990), पत्थर की बाँसुरी (1990), दीवारों पर दस्तक  (1991), नाव बनता हुआ काग़ज़ (1991), आग पर कंदील (1993), एक दीप चौमुखी (1997), आँधियों में पेड़ (1997), आठ सुरों की बाँसुरी (1997), आँगन की अलगनी (1997), नदी तुम रुक क्यों गई (1997), शब्द: एक लालटेन (1997), तो सुबह हो (2000), कोई आवाज़ देता है (2005), नदी पसीने की (2005), दिन दिवंगत हुए (2005), डॉ कुंवर बैचेन के नवगीत, पांचाली (महाकाव्य).

इस तरह कहा जाय तो उन्हें छंद की हर काव्य शैली में महारत थी. ग़ज़ल के व्याकरण पर उनका अधिकार था. गज़ल लेखन पर उनकी पुस्तक ग़ज़ल को समझने की एक मानक कृति मानी जाती है. वे बीमार होने के पहले तक हर दिन कुछ न कुछ लिखते, सोचते रहते थे. कोई ग़ज़ल पूरी हुई कि उसे वे फेसबुक मित्रों के लिए पोस्ट भी कर दिया करते थे. विनम्र इतने कि कोई भी उन्हें फोन कर सकता था. इतने बड़े गीतकार ग़ज़लगो में कोई अहंकार न था. प्राय: कविगण  तमाम माथापच्चीं कर भी बेहतरीन काफिये रदीफ नहीं जुटा सकते, कुंवर बेचैन के गीत या ग़ज़लें पढ़िए तो लगेगा कि अरे वाह. कहां से ऐसा काफिया खोज लाए कुंवर जी. तभी वे बीच -बीच में लोकशैली की रचनाएं भी लिखा करते थे जिनमें से कुछ तो मंच पर श्रोताओं की फरमाइशों में शुमार थीं. उदाहरणत: नदी बोली समंदर से या जितनी दूर नयन से सपना जैसे गीत.
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मन पुरुरवा उर्वशी हो तुम: गीतों का चुम्बकीय आकर्षण
कुंवर बेचैन के गीतों में एक अनूठापन है. उन्हें कभी भी गुनगुनाइये, किसी को सुनाइये, उसकी माधुरी खत्म होने वाली नहीं है. जैसे कभी एक गीत में शतदल ने लिखा था: गंध ने छू लिया प्यार से क्या इन्हें/ ये अधर इस जनम तो हुए बांसुरी. कुछ कुछ ऐसा ही चित्ताकर्षी स्वभाव है उनके गीतों का भी. जिन दिनों हम गीत की टोह में हुआ करते थे, यानी 1975-80 के आस पास के दिन तो वह दौर बड़े गीतकारों का था. नीरज, रमानाथ अवस्थी, भारत भूषण, वीरेंद्र मिश्र, किशन सरोज, रूप नारायण त्रिपाठी, उमाकांत मालवीय, शंभुनाथ सिंह, विष्णुकुमार त्रिपाठी राकेश, ठाकुर प्रसाद सिंह, शिवमंगल सिंह सुमन, मुकुट बिहारी सरोज, बुद्धिनाथ मिश्र, रमेश रंजक, रामावतार त्यागी, कुमार शिव, जगत प्रकाश चतुर्वेदी और कन्हैयालाल नंदन- कौन बड़ा से बड़ा कवि मंच पर सक्रिय न था. ये सब छायावादोत्तर काल और गुणसूत्र के कवि थे तथा मंच का पतन आज की तरह नहीं हुआ था. गीतकार उस वक्त के मंच के बादशाह हुआ करते थे. कवि सम्मेलनों की सुबह प्राय: किसी बड़े गीतकार की रचनाओं से ही होती थी. इन्हीं दिनों नवगीत की धारा भी तेजी से पनप रही थी तथा शंभुनाथ सिंह नवगीत दशक के प्रकाशन-अभियान की ओर उन्मुख हो रहे थे. ऐसे वक्त कुंवर बेचैन अपने दो शुरूआती गीत संग्रहों पिन बहुत सारे (1972) व भीतर सांकल-बाहर सांकल (1978) से परिदृश्य में जगह बना चुके थे. उस वक्त बहुतेरे गीतकारों के एकाधिक संकलन ही आ सके थे. इन्ही दिनों का उनका यह गीत आधुनिकता भरे परिदृश्य में परंपरा को कैसे नेपथ्य में ढकेला जा रहा है, इसकी बहुत ही नुकीली अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है-

जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने
दादी की हँसुली ने, माँ की पायल ने
उस सच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टँगने से कतराती है.

गीतों में उनके प्रयोग उस दौर के कवियों की तुलना में बेहतरीन कहे जा सकते हैं. उस दौर का एक गीत भारत भूषण का आया था- 'सीपिया बरन मंगलमय तन/ जीवन दर्शन बांचते नयन.' लगभग इसी धुन और बोल पर कुंवर बेचैन का उस वक्त का एक गीत धीरे-धीरे लोगों के होठों पर चढ़ गया था. वह गीत था:
बहुत धीरे बहुत धीरे से.
कान में खनके मँजीरे से
स्वप्न में शायद हँसी हो तुम.
मन पुरुरवा उर्वशी हो तुम.

इसी तरह उनके कुछ अन्य गीतों का आकर्षण ऐसा था कि उसका स्थायी ही मन मोह लेता था. गीत जिस प्रसाद गुण के लिए जाने जाते हैं वे उनके गीतों में प्रचुरता से विद्यमान थे. ऐसे कुछ गीतों के उदाहरण देखें-
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बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
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जितनी दूर नयन से सपना
जितनी दूर अधर से हँसना
बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से
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नदी बोली समन्दर से,
मैं तेरे पास आई हूं.
मुझे भी गा मेरे शायर,
मैं तेरी ही-ही रुबाई हूं.
-और यह रुबाई वाला गीत तो गाते हुए वे जैसे मंच पर खो जाते थे.
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वो ग़ज़ल किसी से तो कम न थी जिसे हम सुना के चले गए
जैसा कि मैंने कहा कि कुंवर जी ने शुरुआत तो गीतों से की थी किन्तु जैसा एक गीतकार आनंदवर्धन द्विवेदी ने लिखा है, ''हम भटक फिर गए गीत को कर शुरू/ फिर से लिखने को लिख हम ग़ज़ल ही गए.'' यही वजह है कि कुंवर बेचैन ने पहले तो गीत की देहरी पर शानदार कदम रखा तथा अनेक कालजयी गीत लिखे पर धीरे-धीरे वे ग़ज़लों की ओर खिंचते चले गए. कवि सम्मेलनों में ग़ज़लों की दुनिया तब परवान चढ़ रही थी और वे मुशायरों में गीतकार व ग़ज़लकार दोनों हैसियत से महत्व रखते थे. बल्कि हुआ यह कि बाद के वर्षों में गीतों से ज्यादा उनके ग़ज़लों के संग्रह आए और वे इस दुनिया मे रम जम गए.

जैसा कि मैंने कहा है गीतों व ग़ज़लों दोनों में उनके काफिये रदीफ चुस्त दुरुस्त हैं. ग़ज़लों का व्याकरण उनका इतना सटीक था कि लोग तुकांतों की खोज के लिए उनकी ग़ज़लों को पढा करते थे. आम आदमी अक्सर मृत्यु से घबराता है. पर कवियों में ही यह साहस है कि वे न केवल मृत्यु का सामना करते हैं बल्कि मृत्यु पर लिखते भी सर्वाधिक हैं. यों तो वे मूलत: आशावादी कवि रहे हैं फिर भी देखिए मृत्यु को भी वे किस दिलेरी से स्वी‍कार करते हुए लिखते हैं-

मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूं
जिन्दगी आ, तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूं

जिसमें माँ और बाप की सेवा का शुभ संकल्प हो
चाहता हूं मैं भी काँधे पर वही काँवर रखूं

कौन जाने कब बुलावा आए और जाना पड़े
सोचता हूं हर घड़ी तैयार अब बिस्तर रखूं

और देखिए कि किस घड़ी में उन्हें यहां से जाना पड़ा जैसे कि वे इस घड़ी के लिए तैयार बैठे हों बोरिया बिस्तर लेकर जैसा वे कहते हैं. लेकिन अपनी ग़ज़ल में वे मां-बाप की जिस सेवा का संकल्प दुहराते हैं उनकी सेवा का अवसर उन्हें नहीं मिला. बचपन में ही उनके मां-बाप गुजर गए थे. उन्हें उनकी बहन और बहनोई ने पाला पोसा. पर जब 9 साल के हुए तो बहन भी छोड़ कर चली गयीं. शुरुआती दौर में ऐसी मौतों का सामना करने के बावजूद कुंवर बेचैन ने हमेशा आशा जीवन और उमीदों की ग़ज़लें लिखीं. वे जीवन में किसी भी तरह की मायूसी के खिलाफ थे-

हो के मायूस न यूं शाम-से ढलते रहिये
ज़िन्दगी भोर है सूरज-से निकलते रहिये

एक ही ठांव पे ठहरेंगे तो थक जायेंगे
धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिये

अब एक ऐसी बहर और अनूठे काफिये रदीफ वाली ग़ज़ल का उदाहरण रख रहा हूं जिसे वे सम्मेलनों में अक्सर सुनाते थे. पर इसलिए नहीं कि यह उन्हें याद रही होगी बल्कि इसलिए भी कि इसका काफिया रदीफ बहुत अलग किस्म का है और अर्थ तो खुद ही इन दो अशआर में देख लीजिए-

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक
चाँदनी चार क़दम, धूप चली मीलों तक

प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर
ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक

किस तरह वे अपनी ग़ज़लों में एक नई दुनिया के मुंतजिर थे जो हथियारों से न भरी हो, आदमी आदमी के बीच दीवारें न हों, यह फूलों से महकती हो, खार इसके दामन में न हों, इसका उदाहरण एक ग़ज़ल के इन तीन अशआर में  देखें --

फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया.

मैं महकती हुई मिटटी हूं किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया.

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया.

तीज त्योहार से अलग रहने पर कैसी अनुभूति होती है, इसे जानता तो हर कोई है पर इसे खूबसूरती से केवल कवि कह सकता है. कुंवर बेचैन ने इस भाव को बहुत शिद्दत से इस ग़ज़ल में महसूस किया है-

हम बहुत रोए किसी त्यौहार से रहकर अलग,
जी सका है कौन अपने प्यार से रहकर अलग .

चाहे कोई हो उसे कुछ तो सहारा चाहिए,
सज सकी तस्वीर कब दीवार से रहकर अलग .

कुंवर बेचैन ने लगभग हजार से ज्यादा ग़ज़लें लिखी हैं. सब एक से एक बढ़ कर. ऐसे ही लोकप्रिय शायरों के बारे में हम गुलाब खंडेलवाल लिख गए हैं--
उसे अपने मन के गुरुर से न सुना किसी ने तो क्या हुआ
वो ग़ज़ल किसी से तो कम न थी जिसे हम सुना के चले गए.
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विश्‍वव्‍यापी यात्राएं, काव्‍यपाठ और सम्‍मान
कुंवर जी को जीवन में बहुत से सम्मान मिले. छोटी बड़ी संस्थाओं को मिला लें तो कोई ढाई सौ से ज्यादा संस्थाओं द्वारा वे सम्माननित हुए हैं. किन्तु इनमें उल्लेखनीय है उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान, परिवार संस्था मुंबई का सम्मान, गीत गौरव, गीत पुरुष, भारत श्री, राष्ट्रीय आत्मा पुरस्कार व कबीर पुरस्का‍र आदि. उनके गीत की दुंदुभि देखते-देखते पूरे विश्व के हिंदी जगत में फैलती गयी और वे अनेक देशों यथा,  मारीशस, रूस, सिंगापुर, इंडोनेशिया, मस्कैट, अमेरिका, कनाडा, यूके, दुबई, सूरीनाम, हालैंड, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, स्विटजरलैंड, लक्ज‍मबर्ग, पाकिस्तान व जापान आदि में काव्य पाठ के लिए बुलाए गए. उनकी ग़ज़ले अनेक नामचीन गायकों ने भी गाई हैं.

ऐसे अप्रतिम गीतकार, ग़ज़लगो, बेहतरीन काव्यपाठ के नायक कुंवर बेचैन जिस महामारी के दौर में गए हैं वह पूरे देश को श्मशान बनाए दे रही है. बीमारी के हर दिन सुबह शाम उनसे संपर्क व संवाद में रहने वाला बेटा प्रगीत कुंवर आज इतनी दूर विदेश में है कि इस महामारी में उसे आने तक की इजाजत नहीं है. बेटे को लक्ष्य कर कुंवर जी ने कभी एक बेहतरीन गीत लिखा था-
 
पुत्र. तुम उज्जवल, भविष्यत् फल.
हम तुम्हारे आज हैं, लेकिन-
तुम हमारे आज के शुभ कल.
पुत्र, तुम उज्ज्वल भविष्यत् फल.

तुम हमारे मौन स्वर की भी
मधुमयी, मधु छंदमय भाषा
तुम हमारी हृदय-डाली के
फूल की मुस्कान, परिभाषा

झील हम, तो तुम नवल उत्पल.
पुत्र, तुम उज्ज्वल भविष्यत् फल.

तुम हमारे प्यार का सपना
तुम बढ़े तो क़द बढ़ा अपना
छाँव यदि मिलती रही तुमको
तो हमें अच्छा लगा तपना

हर समस्या का सरल-सा हल.
पुत्र, तुम उज्ज्वल भविष्यत् फल.
 
कैसी विषाद वेला है कि आज वही पुत्र उनकी पार्थिव देह को अंतिम विदा नहीं कह सका. इससे बड़ी वक्त की विडंबना और क्या हो सकती है. किन्तु कहा गया है, कालो न यात: वयमेव यात:. समय नहीं, हमी हैं जो बीत रहे हैं. कल तक कविवर अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास उनकी रोज खोज खबर ले रहे थे. उन्हें आशा थी कि गीतों का यह राजकुंवर जल्दी ही उठ कर अपनी कुटिया में पधारेगा. महफिलें फिर उनके गीतों से गूंजेंगी. कविवर अशोक चक्रधर से उनके पुत्र प्रगीत कुंवर का सतत संवाद था. फोन पर ही उनका हालचाल-कुशल क्षेम लेते रहते थे. शिक्षाविद डॉ महेश शर्मा ने उनके इलाज में कोई कोर कसर न छोड़ी किन्तु आज का ही दिन जैसे उनकी मृत्यु के लिए मुकर्रर था, जब उन्हें उनके ही शब्दों में बिस्तर समेट कर तैयार रहना था. कुंवर जी 79 साल का भरापूरा जीवन जी कर इहलोक से विदा हो चुके हैं किन्तु उनके गीत उनकी ग़ज़लों की अनुगूंज कभी भी मंद नहीं पड़ने वाली. सोशल मीडिया व कवि सम्मेलनों के इतने वीडियो उनके मौजूद हैं कि कोई भी उन्हें सुन कर शुद्ध गीतों, कविताओं, ग़ज़लों व काव्‍यपाठ का आनंद ले सकता है. कवि इसी तरह सदियों के समय के कैनवस पर सदैव उपस्थित रहता है. वे भी हिंदी जगत की स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे. उन्हें आजतक की विनम्र श्रद्धांजलि.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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