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जन्मदिन विशेषः मैत्रेयी पुष्पा, जिन्होंने लिखा स्त्री मुक्ति केवल देह मुक्ति नहीं

हिंदी की बिंदास और बेबाक विचारों वाली लेखिकाओं में मैत्रेयी पुष्पा अग्रगण्य हैं. उनके 76वें जन्मदिवस के अवसर पर उनकी पुस्तक 'वह सफ़र था कि मुकाम था' के कुछ अंश

मैत्रेयी पुष्पा की पुस्तक 'वह सफ़र था कि मुकाम था' का कवर मैत्रेयी पुष्पा की पुस्तक 'वह सफ़र था कि मुकाम था' का कवर

स्त्री विमर्श केवल स्त्रियों का विषय है, और वह भी केवल उनकी देह तक सीमित है क्या? पुरुष इसमें कितना शामिल है और स्त्री के विवाहेतर संबध और पुरुष के परस्त्री-गमन के बीच का भेद कौन गढ़ता है? फिर अगर पुरुष कोई बड़ा साहित्यकार हुआ तो? हिंदी साहित्य में ऐसे झकझोर देने वाले विषय पर किसी लेखिका ने बेखटके लिखा है, तो वह हैं, मैत्रेयी पुष्पा.   

हिंदी की बिंदास और बेबाक विचारों वाली लेखिकाओं में मैत्रेयी पुष्पा अग्रगण्य हैं. उनकी लेखनी में एक सच्चाई है. भाषा सपाट और कथ्य इतने चुटीले कि सीधे मर्म भेद जाएं. मैत्रेयी पुष्पा का जन्म 30 नवंबर, 1944 उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ. उन्होंने अपनी लेखनी में ग्रामीण भारत को साकार किया है. 'इदन्नमम', 'अल्मा कबूतरी', 'बेतवा बहती रही' जैसे दस से भी अधिक चर्चित उपन्यासों के अलावा आपके बारह कहानी संकलन, एक कविता संग्रह, एक यात्रा-कथा, एक लेख संग्रह इस बात की गवाही हैं कि आप कितना लिखती पढ़ती हैं.

'कस्तूरी कुण्डल बसै' और 'गुड़िया भीतर गुड़िया' नामक छपी आपकी आत्मकथा काफी चर्चित रही. आप हिंदी अकादमी दिल्ली की उपाध्यक्ष भी रही हैं और साहित्य कृति सम्मान, कथा पुरस्कार और प्रेमचंद सम्मान जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं. आपके लेखन में गांव, खासकर ब्रज और बुंदेल की संस्कृतियों की झलक दिखाई देती है. आप रांगेय राघव और फणीश्वर नाथ 'रेणु' की श्रेणी की रचनाकार मानी जाती हैं. आज उनके 76वें जन्मदिवस के अवसर पर राजकमल प्रकाशन के सौजन्य से उनकी पुस्तक 'वह सफ़र था कि मुकाम था' के कुछ अंश हम आपके लिए लेकर आए हैं.

यह अंश इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें राजेंद्र यादव को लेकर मैत्रेयी पुष्पा की बेबाकी बेहिचक झलकती है. इस पुस्तक के परिचय में लिखा है- मैत्रेयी पुष्पा और राजेंद्र यादव को लेकर आधुनिक होने का दम भरनेवाले आज के हिन्दी समाज ने जितनी बातें बनाईं, उतनी शायद ही किसी और के हिस्से में आई हों. लेकिन यह किताब उन बातों की सफाई नहीं है. सफाई को लेकर मैत्रेयी जी स्पष्ट हैं कि सफाई वे दें जिनकी दाढ़ी में तिनके हों.

यह किताब उन छोटी-छोटी लकीरों के बरक्स जो समकालीनों ने उनके सामीप्य को लेकर खींचीं, एक बड़ी लकीर है. एक बड़े रिश्ते का बड़ा खाका. आरम्भ में मैत्रेयी पुष्पा बस लेखक थीं और राजेंद्रजी उनके सम्पादक, फिर अपने सम्पादकीय-लेखकीय कौशल के चलते ग्रामीण अनुभवों से सम्पन्न इस प्रौढ़-मन लेकिन नई लेखिका के कच्चे माल में उन्होंने इतनी सम्भावनाएँ देखीं कि वे उनके मार्गदर्शक, अध्यापक, प्रेरक, आलोचक -सब हो गए. और इस लेखिका में उन्होंने एक समर्थ लेखक के अलावा पाया एक सखा, जो उन्हें न अपने साहित्यिक मित्रों में मिला था न प्रतिद्वन्द्वियों में. एक ऐसा सखा जिसके सामने वे अपने मन के अन्तरतम तक को खंगाल कर देख पाते. अपनी कल्पनाओं की पतंगें उड़ा पाते, डींगें हाँक सकते, अपनी प्रेम-कहानियों और लीलाओं का स्मृति रस ले पाते. पूछ पाते, अच्छा बताओ तो डाक्टरनी, उस सौन्दर्य की देवी युवती ने मुझमें ऐसा क्या देखा! यानी वह व्यक्ति हो पाते जो सार्वजनिक छवि में बिंधा कोई भी आदमी कहीं न कहीं, कभी न कभी होना चाहता है.

यहाँ यह कहना भी अप्रासंगिक न होगा कि राजेंद्र यादव निपट इकहरे व्यक्ति न थे, लेखक और सम्पादक के रूप में उन्हें समझना आसान है, व्यक्ति के रूप में उतना नहीं. ऐसे व्यक्ति को एक निष्कलुष और निराग्रही सखा की ज़रूरत और भी ज़्यादा होती है. मैत्रेयी जी का यह वाक्य जो शायद वे अक्सर राजेंद्रजी को कहती थीं, मन को पुलक से भर देता है कि 'राजेंद्रजी, आप तो हमारी सहेली हैं!

पुस्तक अंशः वह सफर था कि मुकाम था

नया यह हो रहा था कि स्त्री विमर्श ने स्त्रियों का खुला आह्वान किया. और इसे चारों ओर राजेंद्र यादव की पुकार माना जाने लगा. हम मजाक में कहते—स्त्री विमर्श न हो गया कृष्ण की बाँसुरी हो गई! राजेंद्रजी यह सुनकर मानो अपना खून बढ़ा लेते हों.

इसमें शक भी नहीं कि अब तक चला आ रहा दुहराव, बासीपन और एकरसता का घेरा टूट रहा था क्योंकि कुछ आत्मकथाएँ भी आने लगीं यानी उस दुनिया का खुलासा जो अभी तक औरतों के भीतर बन्द तहखानों में सिमटी पड़ी थीं. ताज्जुब भी कम न रहा कि लेखिकाएँ 'तेरी मेरी उसकी कहानी' को सिर्फ 'उसकी कहानी' बनाकर लिखें मगर जब अपनी कहानी की बात आए तो सारे साहस और बेबाकी धरे रह जाएँ. इज्जत के रेशमी दुशाले अपने ऊपर ओढ़ लिये जाएँ.

राजेंद्रजी कह रहे थे- ''अनेक बार दोहराई गई बात को फिर से कहने का जोखिम उठाते हुए मैं कहना चाहता हूँ कि रीतिकालीन सड़ांध को दरकिनार करते हुए जिस तरह सन्त साहित्य में दलितों और स्त्रियों के लेखन में नई ऊर्जा, तेवर और लगभग सांस्कृतिक क्रान्ति के दर्शन हुए थे, ठीक वही युग वापस लौट रहा है, हिन्दी के अपने भीतर और बाहर छनकर हिन्दी में!”

जो स्त्री इस तरह का लिखने का सामर्थ्य रखती, उसका राजेंद्रजी खास खयाल रखते. बहस और बात करने के लिए उत्सुक रहते. जब हम उनके सामने ऐसे विचार रखते जो नैतिक मूल्य-मान्यताओं में दरार पैदा करें तो उनको यह बिन्दु पकड़ में आ जाता और पूछने लगते कि जवाब दो- 'हमारे अब तक के दिए हुए सांस्कृतिक सम्मान से तुमको शिकायत क्या है कि अपनी बात को अपनी जुबान से कहने की जिद ठाने हुए हो?’

वे हमें चिढ़ाते- 'दहेजदहन, हत्याएँ, आत्महत्याएँ, वेश्यावृत्ति, बलात्कार या सती-वती जैसी बातें तो हमेशा से होती रही हैं, इनसे हमारी उनके प्रति श्रद्धा सम्मान या 'जय माता दी' की भावना का क्या लेना-देना? मत भूलो कि तुम घर की शोभा और इज्जत हो. धरती की तरह तुम्हारा शील, धैर्य और सहिष्णुता ही है कि दुनिया भर में भारतीय नारी की पूजा होती है.’

राजेंद्र यादव उपरोक्त को सोचनेवाले कहाँ थे! वे तो स्त्री को अपने फैसले लेने के लिए ललकारते रहे.

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वह भी तो अपना फैसला लेकर आई थी!
    उस एक फैसले ने स्त्री की दुनिया के सारे पर्दे उखाड़ दिए कि खुद-ब-खुद हटाती चली गई वह लाज-लिहाज की चिलमनें?
आपने क्या समझा औरत की दुनिया को? भोली-भाली और सिर झुकाकर सहनेवाली? आपका बिगुल अपने स्वर में जो गूँजा, उसी का असर हुआ शायद कि उसने अपना मुकदमा आपकी पत्नी के कोर्ट में लगा दिया. लगाव, झुकाव या हमदर्दी आप यह गाढ़ा रिश्ता तो बनाते थे, लेकिन औरत के वजूद की नजरअन्दाजी भी अपने आपमें संगीन अपराध है. वंचना अन्याय है और यह सब कौन कर रहा है, यह भी अपने आपमें काबिलेगौर है.

वह मोहब्बत की तस्वीर... ओ की कहानी की नायिका की तरह प्रेम कर रही थी आपको, यह आप कहाँ चाहते थे? इसलिए वह 'ओ' नहीं बनी. वह वैसी ही तो थी जैसी स्त्री होने का आप डंका पीट रहे थे. इसलिए ही आप उसके हमदर्द हुए, उसकी परेशानियों पर पशेमान हुए. उसके साहस को शाबाशी दी और उसे गले से लगाया. यहाँ तक कि आपने उसको अपने ऊपर अधिकार बख्श दिया, बस इसलिए कि वह इस नए धरातल पर थी कि- मेरा शरीर मेरा है, मैं इसका अपनी इच्छा से इस्तेमाल करूँगी. कोई पति या परिवारीजन मुझे आदेश नहीं दे सकता, राय नहीं लाद सकता.

आपके लिए सोने में सुहागा! आज की युवती का ऐसा गजब संकल्प कि किताबों में उतरी इबारत को देह पर उतार लिया. राजेंद्रयादव की नई सोच को व्यावहारिक बना दिया. आप अहसानमन्द हुए कि निछावर होते चले गए उस यौन-क्रान्ति की सम्राज्ञी पर. वह आपको शारीरिक और मानसिक सुख दे रही थी तब आप हिन्दुस्तान की परम्परावादी दकियानूसी दुनिया को छोड़ अपने बनाए संसार में विचरण करने लगे थे. उस नई नायिका को जन्म देनेवाले आप उसके इशारों पर चलने में सौभाग्य मान रहे थे. उसको छूने की कीमत पर आपका आगामी सर्ग लिखा जा रहा था. वह ओ की कहानी की गुलामी को खंड-खंड कर रही थी कि भारतीय पत्नियाँ अपने मिजाज में दया, करुणा का सागर ही नहीं होतीं, पतिपरायणा ही नहीं होतीं, उनको सामाजिक इज्जत का खयाल हर समय नहीं सताता. निश्चित ही आप ऐसे समय में एक गम्भीर वैज्ञानिक की तरह अपने इस प्रयोग में डूबे हुए थे. और आप ऐसे उच्छृंखल पुरुष नहीं थे जिनके लिए कोई संगीन सजा तामील हो. आप न तो वेश्या-गमन कर रहे थे और न ही आपने कोई रखैल रख छोड़ी थी. फिर भी आप सद्गृहस्थ की उपाधि नहीं लेना चाहते थे.

आप बार-बार नैना साहनी की दुहाई दे रहे थे, आप देवराला की रूप कुँवर के सती होने को हत्या लिख रहे थे, आप जहर से मारी गई स्त्रियों के लिए शोक-सभाएँ करते जा रहे थे. यह आतंक औरत को काबू में रखने के लिए है, आप सम्पादकीय लिख रहे थे.

आपकी मनचाही औरत पास आई कि आप भूल गए कि पति कैसे हुआ करते हैं, कि आप कैसे पति हैं? कि आपने विवाह किया है, कि आपने वैवाहिक जिम्मेदारी कितनी निभाई? पिता होने का दायित्व क्या हुआ? सच में आपके लिए ये जिम्मेदारियाँ बन्धन रहीं. जरूरी नहीं कि बन्धन में रहकर बँधा हुआ रहा जाए.

मगर मुक्त स्त्री!
देखिए, अपनी पत्नी नाराज हो तो कलह करती है, लेकिन मुक्त स्त्री बिफर पड़ी तो कोलाहल मचा डाला.
जैसा कि मन्नू भंडारी की आत्मकथा में लिखा है, आपकी पत्नी भी ऐसी पतिव्रता नहीं थी कि पति व्यभिचारी है तो इस मामले को सड़क पर लाकर पूज्य मूर्ति को खंडित न किया जाए. बेशक, उनके सामने कितने ही पति परस्त्री-गमन को पुरानी मान्यता के रूप में लेते हुए सेक्स-सेक्स खेलते रहे. मन्नू जी ने अपने लेख 'कितने कमलेश्वर' के जरिए 'तहलका' पत्रिका में इसका ब्योरा दिया है. राजेंद्रयादव भी अपनी प्रतिष्ठा के दम पर मनमानी कर रहे हैं, स्त्री मुक्ति का नाम लेकर. शानदार पतियों की पत्नियाँ उनको लम्पट कहने का हक खो चुकी होती हैं. 'मैं चुप रहूँगी' घर की गरिमा का रक्षक वाक्य है.

यौन शुचिता अब नए मुहावरे में कि स्त्री ने अपनी सहमति से सम्बन्ध बनाया है तो पुरुष लम्पट कैसे हुआ?
मैंने सोचा-
'मर्द बलात्कार तो कर सकता है, सम्बन्ध नहीं बना सकता क्योंकि सम्बन्ध का ताल्लुक आपसी सहमति से होता है.’
राजेंद्र यादव तो बलात्कार भी नहीं कर सकते क्योंकि वे अपाहिज हैं जो बिना बैसाखी के खड़े तक नहीं हो सकते. यदि स्त्री नजदीकी सम्पर्क नहीं चाहती थी तो राजेंद्रजी अपनी जिद में उसका सामना कतई नहीं कर सकते थे. सहमति से बने संसर्ग में आपत्ति किस बात की? यहाँ तो शादी के झाँसे की भी बात नहीं आती क्योंकि औरत शादीशुदा बताई जा रही है.

बड़ी मुश्किल, सम्बन्ध उन दोनों का बना और शर्मसार एक गरिमामयी स्त्री हुई! तब क्या अर्द्धांगिनी का नाम अपनी सार्थकता में जिन्दा है? नहीं तो राजेंद्र यादव की पत्नी की ऐसी बेबसी क्यों? ऐसी त्रासदी ही तो भद्र महिलाओं को अवसाद की शिकार बना देती है या फिर धीरज की खोज में भटकनेवाली आत्मा हो जाती हैं वे.
''राजेंद्रजी” बोलकर मैंने खुद को उनके सामने दृढ़ किया था. कुछ कहना और जरूर कहना अपना फर्ज माना था. जो कुछ मेरी समझ में आ रहा था, उसे उनके 'स्त्री विमर्श’ में शामिल कर देने की मंशा थी मेरी.

-(राजेंद्र यादव) माना कि औरत की मुक्ति का समय है क्योंकि सन् 1947 की आजादी को भारतीय स्त्रियों की आजादी नहीं माना है. बेशक, अपना गणतंत्र बना और हमें नागरिकता हासिल हुई लेकिन भारतीय परिवारों में कैद स्त्रियों के लिए क्या बदला, यह सोचने का विषय है. वोट देने का अधिकार विदेशी महिलाओं की तुलना में हमें बड़ी आसानी से मिल गया मगर वोट का व्यवहार अभी तक हाथ में नहीं आया. सब कुछ जाननेवाली औरत को परिवारीजन नासमझ और बेवकूफ जैसी प्रतिक्रियाओं से गुजारते रहते हैं तो यह बेमकसद नहीं. इक्कीसवीं सदी में भी औरतें अपनी नागरिकता को प्राप्त करने में सशक्त दिखाई नहीं देतीं क्योंकि उनको अपने ही लोगों से संघर्ष करना है. यह संघर्ष उस स्वतंत्रता संग्राम से ज्यादा पेचीदा है जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा गया था.

आप इस स्त्री मुक्ति पर कुछ सोचते हैं या नहीं? स्त्री मुक्ति केवल देह मुक्ति है, ऐसा हरगिज नहीं है. हाँ, देहमुक्ति उस आजादी का एक पहलू जरूर है.

आप जो बोलते हैं, जो लिखते हैं उसका प्रभाव सकारात्मक है कि हम मानते हैं, यह सोलह आने सच है कि 'औरत जब तक अपने शरीर के लिए दूसरों के फैसलों की मोहताज रहेगी, स्वतंत्रता से कोसों दूर रहेगी.’

इस दैहिक सम्बन्ध को या स्त्री के दैहिक चुनाव को समाज में उसके प्रेम से जोड़कर देखा जाता है. क्या आप भी नहीं मान रहे थे कि आपको समर्पित होनेवाली हसीना आपको चाहती थी, प्रेम करती थी. आप यह भी मानने के लिए तैयार नहीं थे कि औरत भी अपने पाँसे चलती है कि वह आपको एक मनचाहा मर्द नहीं चुन रही थी, 'हंस’ सम्पादक मानकर अपना भविष्य बुन रही थी. अब यह कौन कहे कि आप भी सेक्स के लोलुप मर्दों की तरह उसे मेनका का निश्छल और स्वतंत्र प्यार मानते हुए आगे बढ़ते रहे और उसके बाद मुझसे पूछते रहे कि उस रम्भा ने आप पर रीझने की वजह क्या देखी? तब तो मैं कुछ कह नहीं पाई थी क्योंकि मेरी जानकारी कुछ नहीं थी और आपके सामने दो-टूक कहने की हिम्मत नहीं थी.

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पुस्तक: वह सफ़र था कि मुकाम था
• लेखक: मैत्रेयी पुष्पा
भाषा:  हिंदी
विधाः संस्मरण/ जीवनी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
बाईंडिंग: पेपरबैक : 160 पेज
मूल्य: 180/- रुपए

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