"मुझमें आज न वैसे उत्साह का अतिरेक है, न भावुकता का आंदोलन ही है. समाज और जीवन का यथार्थ बहुत कुछ समझ में आ गया है. हिंदी पट्टी में पढ़े-लिखों की साहित्य के प्रति छाई उदासीनता और सारे समय पैसे व मनोरंजन के पीछे भागने की मानसिकता ने भी निरंतर क्षुब्ध ही किया है. जो पढ़ना ही नहीं चाहते, लेखक उन्हें साहित्य पढ़ने के लिए विवश कैसे करे ? उसपर लेखकों को पूछता ही कौन है- न अखबारवाले न मीडियावाले और न सत्तातंत्र के विभिन्न आसंदियों पर विराजमान जनसंपर्क से जुड़े लोग ही. लेखक की हैसियत को आँकना इन सभी के बूते के बाहर है. जो एक अच्छी पुस्तक पर अपनी राय नहीं दे सकते, उस लेखक के बारे में कुछ बता नहीं सकते, वे लेखकों को हेय तो समझेंगे ही." यह बात अपने दौर के बीहड़ किस्सागो अमर गोस्वामी ने 'कल का भरोसा' नाम से छपे कहानी संग्रह की 'अपनी बात' में लिखी थी.
आज अमर गोस्वामी होते तो वह देखते कि साहित्य ने किस तरह से तेजी से मुख्यधारा में अपनी जगह बनाई है. साहित्यिक मेले अब सैकड़ों की संख्या में पूरे देश में हो रहे हैं और इंडिया टुडे समूह अपनी पत्रिकाओं में ही नहीं बल्कि देश के सबसे तेज चैनल आजतक में भी साहित्य को प्रमुखता से जगह मिल रही है. यहां तक कि साहित्य आजतक ने स्वयं अमर गोस्वामी को उनकी पुण्यतिथि पर न केवल अपने इस लेख से बल्कि उनकी कहानी प्रकाशित कर उन्हें याद कर रहा है.
राकेश मिश्र ने उनके बारे में लिखा है, "अमर गोस्वामी की कहानियों में कहानी के पात्र नहीं, कथाकार का अनुभव बोलता है, जो हमारे समाज का ही अनुभव है. इन कहानियों को पढ़कर हम चौंकते नहीं, एक गहरा उच्छ्वास भर लेते हैं और होंठ जबरन तिरछे हो जाते हैं. हम अपनी मुसकान को लेखक की कटाक्ष भरी मुसकान से मिलाए रहते हैं और खत्म होने पर बुदबुदाते हैं- 'मान गए गुरु, कहानी ऐसे भी लिखी जा सकती है."
अमर गोस्वामी का जन्म 28 नवंबर, 1944 को मुलतान में एक बांग्लाभाषी परिवार में हुआ था और देहांत जून के आखिरी हफ्ते में. तारीख थी संभवतः 28 जून, 2012. संभवतः यहां इसलिए लिखा गया है कि इंटरनेट पर अंग्रेजी में कहीं-कहीं यह तारीख 26 जून लिखी हुई है. अमर गोस्वामी एक चर्चित किस्सागो थे. हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर करने के बाद दो महाविद्यालयों में अध्यापन किया, पर मन न लगा तो पत्रकारिता में सक्रिय हो गए. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन केंद्रों में संपादन सहयोग किया. 'मनोरमा' और 'गंगा' जैसी पत्रिकाओं से जुड़े रहे और 'वैचारिकी' नामक साहित्यिक संस्था की स्थापना की.
रवींद्रनाथ त्यागी का कहना था कि अमर गोस्वामी को मनुष्य के मन को परत-दर-परत पढऩे की शक्ति प्राप्त है और उनकी कलम कभी-कभी जादूगर का डंडा हो जाती है. वे कहानी कहते जाते हैं और आप उनके साथ बहते जाते हैं. कथाकार प्रकाश मनु इसे दूसरे अर्थ में देखते हैं. उनके अनुसार "अमर गोस्वामी समकालीन दौर के उन चंद कहानीकारों में से हैं, जिन्होंने अपना मुहावरा पा लिया है." वाकई अगर हम अमर गोस्वामी की रचनाओं को देखें तो यह बात सही लगती है.
अमर गोस्वामी ने जीवनयापन की नौकरी वाली आपाधापी के बीच भी खूब लिखा. 'इस दौर में हमसफर', 'शाबाश मुन्नू' नामक उपन्यास और 'हिमायती', 'महुए का पेड़', 'अरण्य में हम', 'उदास राघोदा', 'बूजो बहादुर', 'धरतीपुत्र', 'महाबली', 'इक्कीस कहानियाँ', 'अपनी-अपनी दुनिया', 'बल का मनोरथ', 'तोहफा तथा अन्य चर्चित कहानियाँ' नामक संकलन तो छपे ही, बच्चों की बीस से ज्यादा पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं. उन्होंने बँगला से हिंदी में पचास से अधिक पुस्तकें अनूदित कीं. कुछ कहानियों का टीवी रूपांतरण भी किया. इस दौरान वह केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली, हिंदी अकादमी दिल्ली, उप्र हिंदी संस्थान लखनऊ, शब्दों-सोवियत लिटरेरी क्लब तथा अन्य संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत, सम्मानित भी हुए.
चित्रकार अशोक भौमिक का मानना था कि अमर गोस्वामी की कहानियों में बार-बार एक अमानवीय ऊँचाई पर पहुँचकर त्रासदी और कौतुक के बीच का फेंस टूटकर बिखर जाता है और दर्द की चुभन से हम ठहाका लगाकर हँसते नजर आते हैं. सिर्फ कहानी में ही नहीं, किसी भी कला विधा में ऐसे शिल्प को पाना अत्यंत कठिन काम है. कथाकार का यह शिल्प न केवल उन्हें विशिष्ट बनाता है, बल्कि अपने युग के कथाकार होने की सार्थकता को भी चिह्नित करता है. दरअसल जैसा कि प्रमोद सिन्हा का कहना है, "अमर गोस्वामी के पात्र व्यवस्था की माँग नहीं, बल्कि व्यवस्था की जड़ता पर गहरी चोट करते हैं और व्यवस्था के यथास्थितिवाद के प्रति उनमें एक गहरा आक्रोश है. वे सही मायने में विपक्ष की भूमिका निभाते हैं."
उनकी जिस टिप्पणी का जिक्र इस लेख की शुरुआत में ही किया है, उसका प्रकाशन साल 2004 में ग्रंथ अकादमी ने किया था. इसी संकलन में अमर गोस्वामी ने लिखा कि आज से तीस-पैंतीस साल पहले अगर कोई मुझसे पूछता कि मैं क्यों लिखता हूँ, तो उस वक्त जो जवाब होता, वह आज मैं नहीं दे सकता. वह युवा वय के अति उत्साह का भावुकता भरा दौर था. लगता-चीजें मेरी मुट्ठी में हैं और लेखन में मेरी सक्रियता से बहुत कुछ बदल जाएगा. तथाकथित प्रगतिशील मित्रों की चपलताओं से भी कुछ ऐसी धारणा बन गई थी.
जीवन में बहुत कुछ प्रचार पर चलता है. बिना प्रचार के हिंदी साहित्य सही पाठकों तक न पहुँच पाने के कारण गोदामों में या सेल्फों-अलमारियों में सजाने की वस्तु हो गया है. इन सबसे बचने के लिए कुछ गुटीय लेखकों ने जरूर अपने प्रचार का एक सिलसिला बना रखा है. इससे वे व्यक्तिगत रूप से लाभान्वित हो जाते हैं; पर हिन्दी साहित्य तथा अन्य साहित्कारों का इससे कोई भला नहीं होता. यह तो भला हो हिंदी प्रकाशकों का, जो व्यवसाय के कारण लेखकों की पुस्तकें छापते रहते हैं, जिससे लेखकों को आर्थिक रूप से भले ही कोई खास लाभ न मिलता हो, पर कुछ पुस्तकें पढ़नेवाली जनता तक पहुँच तो जाती हैं.
कमोबेश यह अपने हिंदी समाज की स्थिति है, एक रेगिस्तान जैसी स्थिति, जहाँ कभी-कभार कोई नखलिस्तान दिख जाता है. ऐसे माहौल में रहकर भी मैं क्यों लिखता हूँ? ऐसी क्या विवशता है मेरे साथ ? ऐसी हालत में, जबकि न जाने कितने लोग अपने यौवनजन्य उत्साह के समाप्त होने और किन्ही कारणों से लिखना बंद कर चुके हैं. मेरा लिखना क्या ‘स्वांतः सुखाय’ है या मन की मौज है, जो मुझसे लिखवाती रहती है, जैसा कि हाशिए पर बैठे बहुत से लोग अपने बारे में कहते रहते हैं.
मैं नहीं जानता कि कहानीकार के तौर पर मेरी स्थित क्या है ? इसमें बड़ा ‘कन्फ्यूजन’ है. मगर इतना मैं बतौर लेखक बता देना चाहता हूँ कि मैं ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं लिखता, ‘पर सुखाय’ लिखता हूँ. यह ‘पर सुखाय’ ही मेरा ‘स्वांतः सुखाय है. मनुष्य के प्रति मेरी चिन्ताएँ मुझे लिखने के लिए उकसाती हैं. दरअसल और कुछ करने के लिए मेरी क्षमता बहुत सीमित है और स्वभाव भी अंतर्मुखी है, थोड़ा कायर भी हूँ. तो ऐसा आदमी क्या चुपचाप बैठ जाए और कोई प्रतिरोध न करे ? अपनी असहायता ने मुझमें प्रतिरोध को जन्म दिया है.
मैं जीवन में अन्याय के प्रतिरोध में अपनी कलम को मुखर बनाने की चेष्टा करता रहता हूँ. किसी सर्वहारा के पक्ष में कलम बोलती है तो मुझे सुकून मिलता है और यह सुकून मुझे उन सभी लेखकों की कलम से मिलता है जो बोलती हैं- वे भले ही कोई पंथानुगामी हों. लिखना इसलिए मेरे लिए जरूरी हो गया है और यह एक नशे की आदत में बदल गया है. आप लिखें और लगे की आपकी कलम से देश का लोकतन्त्र बोल रहा है, इससे सुखद अहसास और क्या हो सकता है! लेखन ने लगातार मुझे दायित्वशील बनने के लिए बाध्य किया है, इसलिए औरों की अपने प्रति निंदा, प्रशंसा या उपेक्षा का मेरे लिए अर्थ नहीं रह गया है.
कई विधाओं में लिखने के बावजूद मैं खुद को कथाकार ही मानता हूँ. मैं कोशिश करता हूँ कि मेरी कहानियों में पाठकों को वे चुनौतियाँ तथा असहमतियाँ नजर आएँ, जिनमें आम भारतीय जूझता रहता है और अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए खून-पसीना एक करता रहता है. उसकी सामयिक पराजय में भी मुझे महिमा नजर आती है तथा कमजोर का बल, जो आनेवाले कल के प्रति भरोसा जगाता है. वाकई उनकी कहानियों से यह भरोसा जगता है, बशर्ते यह देखने के लिए अमर गोस्वामी जी नहीं हैं.