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जयंती विशेषः नैतिक जीवन मूल्यों के कवि कुंवर नारायण

कुंवर नारायण आज होते तो 93 वर्ष के होते. जो कभी गांधी जैसे महापुरुष से न मिला हो, वह कुंवर नारायण से मिलकर यह जान सकता था कि सच्‍ची वैष्‍णवता क्‍या होती है. कुंवर नारायण की जयंती पर खास लेख

नई कविता आंदोलन के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण [ फाइल फोटो] नई कविता आंदोलन के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण [ फाइल फोटो]

कुंवर नारायण आज होते तो 93 वर्ष के होते. वे 19 सिंतबर 1927 को अयोध्‍या फैजाबाद में पैदा हुए किन्‍तु अपनी रचनात्‍मक आभा से विश्‍व के चुनिंदा कवियों में स्‍थान बनाया. उनके गांधीवादी-लोहियावादी जीवन दर्शन में सबके प्रति स्‍वस्‍तिकामना थी. उनका काव्‍य इसी मानवीय नैतिकता का पर्याय है. उससे स्‍वत्‍व की सुगंध आती है. जो कभी गांधी जैसे महापुरुष से न मिला हो, वह कुंवर नारायण से मिलकर यह जान सकता था कि सच्‍ची वैष्‍णवता क्‍या होती है. कुंवर नारायण की जयंती पर उनके व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व पर अध्‍येता कवि समालोचक ओम निश्‍चल का यह आलेख.
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''कोई भी दुख
मनुष्‍य के साहस से बड़ा नहीं
वही हारा
जो लड़ा नहीं.''

कोई भी कवि अपने सुभाषितों से जाना जाता है या उन दृढताओं से जो उसने अपने कवि जीवन में प्रदर्शित कीं.  उपर्युक्‍त सहज उत्‍प्रेरक सुभाषित और सीख कुंवर नारायण जैसा कवि ही दे सकता है. यह किसी भी हारे हुए व्‍यक्‍ति को जीत के मुहाने तक ले जाने वाला साहसिक वाक्‍य है. ऐसे अनेक वाक्‍य और नैतिक कथन उनकी कविताओं में बिखरे हैं.
 
भारतीय साहित्य में कुंवर नारायण की एक समादृत उपस्थिति है. वे हिंदी के समकालीन कवियों में अग्रगण्य हैं. वे बहुपठित एवं आधुनिक संवेदना के उन कवियों में हैं जिनकी कविताओं में भारतीय इतिहास और विचार की एक समावेशी उपस्थिति महसूस की जा सकती है. उनकी कविताओं में साधारण एवं पेचीदा कथ्य की बारीकियां दृष्टिगत होती हैं जो शुद्ध कविता एवं गहरे मानवीय प्रत्ययों का एक विरल उदाहरण हैं. 1956 में उनकी पहली पुस्तक 'चक्रव्‍यूह' से लेकर 'सब इतना असमाप्‍त' तक सात दशकों के उनके सर्जनात्मक अवदान की अवधि में उनके भीतर के बड़े और उच्चादर्शों के प्रति उन्मुख व्यक्तित्व के साथ-साथ उदात्त काव्य वैभव एवं नैतिक प्रतिसंसार रचने की व्यग्रता के दर्शन होते हैं. वे इतिहास और मिथक के साथ एक अनन्य आधुनिक बोध का रिश्ता निर्मित करते हैं तथा भाषा के अध्यात्म का एक विरल साहचर्य संभव करते हैं. वे ऐसा करते हुए अपने सामाजिक और ऐतिहासिक बोध से तनिक भी नहीं डिगते तथा उसकी विसंगतियों एवं विपरीतताओं के प्रति एक विज़नरी रुख अपनाते हुए कविता को सामाजिक उद्देश्य की एक अनिवार्य संरचना में बदल देते हैं. उन्होंने अनेक विधाओं- कविता, प्रबंधात्मक काव्य, कहानी, आलोचना, अनुवाद, निबंध, डायरी एवं विश्व सिनेमा व कलाओं पर लिखा है. विश्व की अनेक भाषाओं में कुंवर नारायण की रचनाएं अनूदित हुईं. उन्हें कई सम्मान यथा साहित्य अकादेमी, कबीर सम्मान, वारसा विश्वूविद्यालय के ऑनरेरी मेडल, विश्व के विशिष्ट लेखक के रूप में इटली का प्रेमियो फेरिनिया सम्मान, पद्म भूषण, साहित्य अकादेमी का सर्वोच्च सम्मान वरिष्ठ फेलोशिप एवं भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा दिया जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्का‍र से नवाजा गया.

कुंवर नारायण के प्रारंभिक वर्ष अयोध्या एवं फैजाबाद में बीते. तदनंतर वे लखनऊ चले गए जहां लगभग पांच दशकों तक सतत लेखन में संलग्न रहे. उनके लेखन का अधिकांश यहीं लिखा गया. बाद में वे दिल्ली चले आए जहां पत्नी भारती एवं पुत्र अपूर्व के साथ आजीवन रहे. लखनऊ में उनका घर साहित्य एवं संगीत सभाओं का केंद्र हुआ करता था, जहां दूर-दूर से- देश एवं विदेश से लेखक, विद्वान, सिने एवं संगीतविद् मिलने आते. साठ के दशक में नई कविता आंदोलन से जुड़ कर उन्होंने इसके सीमांत को विस्तार दिया. वे उपनिषद एवं महाकाव्य, से लेकर कबीर एवं खुसरो, इतिहास एवं मिथक से लेकर बौद्ध दर्शन एवं मार्क्सवाद और काफ्का एवं कवाफी से लेकर गालिब और गांधी तक के प्रभावों से अनुप्राणित रहे. 1955 में योरोप, रूस एवं चीन की उनकी यात्राएं उनकी कवि-दृष्टि को मूल्यवान बनाने में महत्त्वपूर्ण रहीं. बाद में उन्होंने प्रतीकवादी कवियों मलार्मे, बादलेयर एवं वैलरी तथा बाद में कवाफी एवं बोर्खेस जैसे कवियों की कविताओं के अनुवाद किए.

प्रशस्त रचना-फलक

उनके काव्य की शुरुआत 1956 में 'चक्रव्यूह' से हुई जो उनका पहला संग्रह था. परिवारजनों की मृत्यु ने कुंवर जी को इतना विचलित किया कि उसके प्रभाव चक्रव्यूह की दार्शनिक अभ्युक्तियों में लक्षित किए जा सकते हैं. पहला लघु प्रबंधकाव्य 'आत्मजयी' भी अवसान और मृत्यु के आलोक में लिखा गया है, जो नचिकेता के औपनिषदिक चरित्र पर आधारित है. हिंदी साहित्य में इसे क्लासिक काव्य का दर्जा हासिल है. 'अपने सामने में' राजनीतिक-सामाजिक कथ्य‍ प्रभावी है तो 'कोई दूसरा नहीं' अपने नैतिक आग्रहों एवं उदात्त कवि-विवेक से बहुप्रशंसित एवं बहु पुरस्कृत संग्रह होने के कारण हिंदी में मील का पत्थर माना गया. 2008 में उनका दूसरा प्रबंध काव्य 'वाजश्रवा' के बहाने आया. 'आत्मजयी' के केंद्र में नचिकेता हैं तो 'वाजश्रवा के बहाने' के केंद्र में वाजश्रवा. दोनों काव्य एक अर्थ में एक-दूसरे के प्रतिपूरक हैं. एक में पिता का हठ है तो दूसरे में पिता का पश्चाताप. वाजश्रवा के बहाने में सुलह और समझौते की संजीवनी प्रवाहित है तो अनेक स्थलों पर जीवन और काव्य विवेक के सुभाषित बिखरे हैं. 2015 में उन्होंने 'कुमारजीव' नामक तीसरे प्रबंध काव्य का प्रकाशन किया, जो भारत व चीन के बौद्ध अनुवादक, चिंतक कुमारजीव पर केंद्रित है. 2017 में उनकी कहानियों का दूसरा संग्रह 'बेचैन पत्तों  का कोरस' आया तथा सिनेमा समीक्षा की पुस्तक 'लेखक का सिनेमा' व अनूदित विश्व कविताओं का संग्रह 'न सीमाएं न दूरियां'. वे अपने समय की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं, युगचेतना, नया प्रतीक एवं छायानट के संपादन से जुड़े रहे तथा समय-समय पर सिनेमा, कला एवं संगीत पर लिखते रहे, जो पत्र-पत्रिकाओं, संचयनों में प्रकाशित होते रहे हैं. उनकी रचनाओं के अनुवाद लगभग 35 भाषाओं में हुए हैं, जिनमें अंग्रेजी, इतालवी, पोलिश, एस्टोनियाई, रूसी, स्पैनिश, कन्नड़, डोगरी, असमिया, पंजाबी, ओड़िया व मराठी में अनूदित पुस्तकें शामिल हैं. उनके पुत्र अपूर्व नारायण ने उनकी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद 'नो अदर वर्ल्ड' नाम से किया जो 2008 में प्रकाशित हुआ, और जिसका वैश्विक संस्करण 2010 में ब्रिटेन से आया. उनका बहुत सा लेखन अभी अप्रकाशित है, जिसमें उनकी कविताएं, निबंध, डायरी व साक्षात्कार शामिल है तथा उन पर लिखे आलोचनात्मतक लेखन के कुछ खंड प्रकाश्य हैं. इस अनुष्‍ठान में उनके पुत्र अपूर्व नारायण संलग्‍न हैं. हाल ही उनकी कहानियों का एक खूबसूरत अंग्रेजी अनुवाद भी सामने आया है.

कुंवर नारायण कम लेकिन स्तरीय लेखन के अभ्यासी थे. पुस्तकों का अंबार लगाना उनका लक्ष्य न था. यही कारण है कि उनकी तमाम डायरियां उनके रचनात्मक नोट्स से भरी हैं पर उन सबका वे रचनात्मक निवेश नहीं कर सके. पर जितना कुछ प्रकाशित है वह उनकी लेखकीय क्षमता को प्रमाणित करने के लिए कम नहीं. उनकी रुचि पढ़ने में ज्यादा थी. देश-दुनिया के साहित्य को खोज कर मंगाना और पढ़ना उनके नियमित एजेंडे में रहा है. यों तो लखनऊ का उनका घर विष्‍णुकुटी बहुत ही प्रशस्त रहा है, जहां अनेक दुर्लभ पत्रिकाएं तब उनके पुस्तकालय में देखी जा सकती थीं. लखनऊ में उनके सान्‍निध्‍य में रहे विनोद भारद्वाज ने अपने संस्‍मरणों में इस पुस्‍तकालय के गौरव को याद किया है. अनेक साहित्यिकों, कलाकारों, संगीतज्ञों, फिल्मकारों का वह अड्डा ही हुआ करता था. स्वाध्याय, मनन, चिंतन, विमर्श का वह अनन्य केंद्र था. आधुनिकता की हवाएं यदि भारत में आ रही हैं तो लखनऊ में उनकी आहट न पहुंचे यह हो नहीं सकता था. मैं उन्हें लखनऊ से जानता था. लखनऊ तब एक से एक दिग्गज साहित्यकारों का केंद्र था. यशपाल, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, शिवानी, कृष्ण नारायण कक्कड़, गिरिधर गोपाल, ठाकुरप्रसाद सिंह सभी जमे जमाए लेखन उन दिनों वहां थे. एक से एक प्रतिष्‍ठित पत्रकार, राजनीतिक चिंतक विचारकों का वह केंद्र था. हजरतगंज का काफी हाउस इनकी सोहबतों का गवाह है.

कविता में आधुनिकी

मैंने उन्हें पहले पहल 'अपने सामने' नामक काव्य कृति से जाना, जो 1979 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी. उन दिनों मैं लखनऊ के सूचना विभाग की पत्रिका 'उत्तर प्रदेश' के संपादन कार्य से संबद्ध था और हमारे संपादक कवि राजेश शर्मा उनके प्रशंसक. ठाकुर प्रसाद सिंह अक्सर उनकी चर्चाएं करते थे. इसलिए 'अपने सामने' की उन दिनों स्वाभाविक ही चर्चा थी. हालांकि उससे पहले चक्रव्यूह, आत्मजयी व कहानी संग्रह  'आकारों के आसपास' का प्रकाशन हो चुका था. 'चक्रव्यूह' उनकी जटिल मनोग्रंथियों को खोलने वाला संग्रह था- जीवन जगत के दार्शनिक प्रत्ययों को अपने में सहेजे हुए. उससे उनके भीतर के बीहड़ कवि व्यक्तित्व का पता चलता था. उसके बाद 'आत्म‍जयी' ने उन्हें और बीहड़ बना दिया. उपनिषद में उतर कर यह एक नए काव्य मूल्य का संधान था- हालांकि उस दौर या उससे पहले के दौर के अनेक काव्य ऐसे उपजीव्य कथा सूत्रों से ही रचे गए थे- किन्तु आधुनिकता की विचारणा कुंवर जी के काव्य में स्‍पष्ट देखी जा सकती थी. जिसने 'चक्रव्यूह' और 'आत्मजयी' पढ़ी हो और 'आकारों के आसपास' की कहानियों से गुजरा हो वह उन्हें हलके में नहीं ले सकता था. इस तरह कुंवर नारायण की छवि पहले से ही एक संजीदा कवि की बन चुकी थी.
 
एक व्यवसायी परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे कतई कारोबारी स्वभाव के न थे. उनके भीतर के कवि ने उन्हें  भीतर से तराश कर नैतिक मूल्यों का हामी बना दिया था. कहते हैं पहले वे विवाह भी नहीं करना चाहते थे. इसी तरह भारती जी भी वैवाहिक प्रसंग में बहुत चयनधर्मी थीं. वे भी जिस तिस से विवाह के लिए राजी न थीं. उन्हें व्यवसाय क्षेत्र के लोग नहीं जंचते थे. भारती जी बताती हैं कि जब उन्होंने 'आत्मजयी' पढ़ी तो मन ही मन ठान लिया कि विवाह करना है तो केवल कुंवर नारायण से. भारती जी का यह एक वैदुष्यपूर्ण आकर्षण था कुंवर जी के प्रति. लिहाजा कोलकाता में रह रही भारती से उनका पत्राचार चलता रहा और जब सन 66 के मार्च में उनकी शादी हुई तो बहुत ही सादे ढंग से. किसी को विवाह में नहीं बुलाया गया. बस धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, श्रीलाल शुक्ल, अज्ञेय जी आदि कुछ लोग शामिल हुए थे. दान दहेज के नाम पर केवल दो सूटकेस के साथ भारती जी  उनके घर आई थीं. लोग बस इस बात से खुश थे कि वे शादी के लिए तैयार तो हुईं. कुंवर जी के पिता विष्णु नारायण चार भाई थे. बाबा राम रघुवीर लाल थे. संयुक्त परिवार था. पर सभी उदार चित्‍तवृत्‍ति के थे. किसी की शादी में दान दहेज नहीं. पर्दाप्रथा नहीं, शिक्षित परिवार था. यानी व्यवसायी परिवार होते हुए भी नैतिक जीवन मूल्यों के प्रति इस परिवार में पहले से ही उदारता रही है, जिसका प्रभाव कुंवर नारायण पर सहज ही पड़ा. उनका जीवन गांधी की सहिष्‍णु नैतिकता से भी मेल खाता था. चिंतन-मनन में भी गांधी के विचारों की झलक देखी जा सकती है.

कविता में दार्शनिक प्रतिबिम्‍ब

यह जो कुंवर जी की कविताओं में एक गंभीरता दार्शनिकता, नैतिकता की झलक है- कहीं कहीं उदासियों के प्रतिबिम्ब भी झांकते हैं उनके पीछे इस परिवार में हुई मृत्यु वजह है. मां की मृत्यु और 5-6 साल बड़ी बहन रानी की मृत्यु ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया. वह नाटकों में भी भाग लेती थी. ध्रुवस्वामिनी और अन्य नाटकों के मंचन में अभिनय के लिए उन्हें गोल्ड मेडल-सिल्वर मेडल आदि मिले थे. ऐसी बहन का जाना उन्होंने बर्दाश्त‍ तो कर लिया, पर एक अकेलापन उन्हें घेरे रहता था. वे अंतर्मुखी होते गए. ऐसे हालात में ही 'चक्रव्यूह' की कविताओं व 'आत्मजयी' के प्रबंध काव्य की नींव पड़ी. इस हालत से उबारने में आचार्य नरेंद्रदेव ने भी उनकी मदद की जब वे उन्हें अपने साथ ले गए. इससे वे व्यापक पठन-पाठन की तरफ लौटे- जीवन की मुख्य धारा मे लौटे और इससे उबरने में उनकी रचनात्मकता ने उन्हें ताकत दी. 1955 में वे विदेश गए जहां वे पाब्लो- नेरुदा व नाजिम हिकमत जैसे कवियों से मिले. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थि‍तियों को निकट से देखा.

विष्णुकुटी का जो इतिहास भूगोल जानते हैं वे यह जानते हैं कि वह उनकी रिहाइश भर न थी. वह एक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र था जहां तमाम कलात्मक रुचियों इकाइयों को प्रश्रय मिलता था. उन दिनों जो भी लेखक कलाकार बाहर से आते सब कुंवर जी की इस विष्णु्कुटी पर पधारते. संगीत सभाएं चलतीं. एक बार उनके इलाके में बाढ़ आई जिसकी रोचक चर्चा श्रीलाल शुक्ल ने एक संस्‍मरण में की है. जिन दिनों धूमिल वहां अस्पताल में भर्ती थे, साहित्यकारों के साथ उनके इलाज में आर्थिक सहायता के लिए वे मंत्रियों से भी मिले थे. कहते हैं धूमिल को 'आत्म‍जयी' की पंक्तियां मुंह जबानी याद थीं. शाम-ए-अवध में लेखकों के मिलने के अपने ठीहे थे. काफी हाउस इसी बैठकी से देर रात गए गुलजार रहता था. एक तरफ से कृष्ण नारायण कक्ककड़ आते तो दूसरी तरफ से सुरेंद्र तिवारी, सुरेश अवस्थी. प्रगतिशील लेखक संघ के लोग भी आते- यशपाल, सज्जाद जहीर, रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी भी. लखनऊ की इन्हीं यादों पर मनोहर श्याम जोशी ने 'लखनऊ -मेरा लखनऊ' जैसी संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी.

कुंवर नारायण के अपने पारिवारिक व्यवसाय स्पी़ड मोटर्स के शो रूम में उनके बैठने और काम करने की कहानी भी आम हो चुकी है. वे अंग्रेजी में एमए थे. लिहाजा उन्हें लेखा के काम में लगाया गया कि हिसाब-किताब वह देखेंगे. पर बाद में देखने पर पता चला कि रजिस्टर के हाशिए में कविताओं के नोट्स लिखे हैं. तब पिताजी को  बुलवाया गया, कृपलानी जी को बुलाया गया. तब तय हुआ कि इनकी तो लिखने-पढ़ने में रूचि है, पर खाता बही वाला लेखन नहीं, कविता में रुचि है तो कृपलानी जी उन्हें दिल्ली ले आए और अपनी पत्रिका विजिल से जोड़ा. उनकी उदारता की एक मिसाल यह भी है कि एक बार किसी बात पर उनके वर्कशाप में वर्कर्स की हड़ताल हुई. मामला गंभीर था. फैसला नहीं हो पा रहा था. तभी वर्कर्स ने यह मांग रखी कि कुंवर भैया जो कहेंगे हम लोग मान जाएंगे. ऐसा ही हुआ. कुंवर जी को उन मजदूरों की मांगें जायज़ लगीं और उनकी सभी मांगें मान लीं. तभी से उनके बारे में यह भी शोहरत हुई कि वे कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर नहीं बल्कि डैमेजिंग पार्टनर हैं. एक लेखक व्‍यवसाय में फंस कर कैसा महसूस करता है, यह बात उन्‍होंने 'कागज कलम और स्‍याही' शीर्षक कविता में दर्ज की है, जो उनके संग्रह 'कोई दूसरा नहीं' में संग्रहीत है. उनके स्‍वभाव में नरमी शायद उनके भीतर मां व बहन के स्वभाव से आई थी. बाद में उनके जीवन व चिंतन पर बौद्ध प्रभाव भी पड़ा. उनकी कविताओं में यह बात दिखती है.

ऊपर से देखने पर लगता है कि कुंवर जी का जीवन निरापद था. उन्हें कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा होगा; पर ऐसा नहीं है. शरीर का कष्ट भी रहा. दोस्तों व निकट संबंधियों सभी के साथ कुछ न कुछ दुख झेले. फैजाबाद से लखनऊ आए तो वहां बड़ी चाची थीं. कुंवर जी जिस व्यावसायिक परिवार से आते हैं उनमें सभी भाई भतीजे--बिजनेस वाले, सो एक तरह से परिवार में वे नॉन प्रोडक्टिजव- मान लिए गए और अंत तक कोई बंधी बंधाई नौकरी नहीं की. हां कुछ सार्वजनिक पदों पर जरूर रहे. भारती जी बताती हैं कि जब इंगेजमेंट हुई तो लोग उनके पिता जी से बोले किसके साथ शादी कर रहे हैं, जिसकी दो सौ भी आमदनी नहीं और ऊपर से दिन भर काफी हाउस रहते हैं. भारती जी बोलीं कि कोई बात नहीं और बताया कि मैं गयी तो कल्पना, हैदराबाद में सात सौ की नौकरी मिली. मैं यहां का हिसाब-किताब सम्हालती थी. मैं आफिस जाने लगी व कामकाज देखने लगी. परिवार ने कोई दबाव नहीं डाला. आजादी दी. हम गए एक डेढ़ घंटा रहे. हस्ताक्षर किए, चले आए. शादी हो गयी तो भाई ने पूछा कि शादी के बाद अकेले रहेंगे कि साथ में. बाद में कहा कि तुम मकान खोज लो. तो लखनऊ में किराये के मकान को खोजते फिरे. छोटे चाचा ने इस काम में सहयोग किया. पर अलग रहते हुए भी परिवार से अपनापा बना रहा. भारती जी परिवार की हर गतिविधि में शामिल हुआ करती थीं.

पठन-पाठन और आत्‍मीयताएं

कुंवर जी के निर्माण में यों तो मूलत: लोहियावाद व आचार्य नरेंद्रदेव का प्रभाव रहा है. बुद्धिज्म ने भी उन्हें दूर तक प्रभावित किया है. पर उनके व्यापक पठन-पाठन ने भी उन्हें रचा और संवारा. वे केवल उपन्यास या कविता नहीं, आलोचना, विचार, दर्शन, इतिहास, समाजदर्शन, मनोविज्ञान, सिनेमा आदि सभी तरह की पुस्तकें पढ़ते थे. महीने में पांच-छह पिक्चर देखना उनके शौक का हिस्सा था. मेफेयर टाकीज़ लखनऊ इस बात का गवाह है. पढ़ने की ललक इतनी कि राम अडवानी की बुक शॉप में उनकी एक सीट बुक रहती थी. घर में मन लगता नहीं था सो हिंदी फिल्में, पापुलर फिल्में देखने का सिलसिला भी चलता था. राम अडवानी, बालकृष्ण बुक डिपो, क्वालिटी रेस्टॉरेंट उनके सुपरिचित अड्डे थे. उन दिनों के उनके घनिष्ठ मित्रों में मशहूर फोटोग्राफर जयकिशन अग्रवाल, कृष्ण नारायण कक्कड़, नरेश सक्सेना, रवींद्र वर्मा व श्रीलाल शुक्ल आदि हुआ करते थे. नरेश जी व श्रीलाल जी ने उन पर बहुत आत्मीय संस्मरण भी लिखे हैं. उनका अयोध्या में विमला देवी फाउंडेशन से भी गहरा नाता रहा है. अयोध्या राज परिवार के यतीन्द्र मिश्र कुंवर नारायण से अनन्य अनुराग रखते रहे तथा उन पर अनेक लेख लिखे तथा कई पुस्तकें संपादित की हैं. कुंवर जी, श्रीलाल शुक्ल, इतालवी लेखिका अनुवादिका मरिओला ओफ्फ्रेदी व रूपर्ट स्नेल के साथ अयोध्या भी गए थे.  

कुंवर नारायण एक अप्रतिम कवि, कथाकार थे तथा सिनेमा व कला की दुनिया के निकट थे. उन्होंने कोई आत्मकथा या खुद के बारे में संस्मरण नहीं लिखा. पूछने पर वे कवि येवतुंश्को का यह कथन उद्धृत करते थे, ''कवि की कविता ही उसकी आत्मकथा है, शेष सब कुछ केवल फुटनोट.'' लखनऊ का पारिवारिक व्यवसाय छोड़ कर साहित्य और कला की मुक्त दुनिया में आए तो फिर कारोबार की तरफ रुख नहीं किया. बचपन अयोध्या व फैजाबाद में बीता सो वहां की याद उन्हें दिल्ली में भी आती रही. वहां सब कुछ कितना आत्मीय था. पर दिल्‍ली की विकसित ज़िन्दगी के माहौल में बिना खरीदे कुछ नहीं मिलता, साफ पानी और हवा तक नहीं और आदमीयत तो सबसे मंहगी हो गयी है; वे कहा करते थे. अंग्रेजी में एमए होते हुए भी वे हिंदी के प्रेमी बने रहे. हिंदी में कविताएं लिखीं, हिंदी में सोचते और रचते थे. वे कहते थे, ''हिंदी हमारे घर की भाषा है. आपसी संबंधों, मेल-मिलाप, मुहब्बत और आचार विचार की भाषा है. कविता और कलाओं की भाषा है. जबकि अंग्रेजी हमारे लिए तिजारत और व्यवहार की भाषा है. दुनिया से बातचीत की व्यावहारिक भाषा है. उद्योग-धंधों की भाषा है. आर्थिक और राजनीतिक समझौतों की भाषा है. आंकड़ों की भाषा है.'' अनेक कारणों से हिंदी व अंग्रेजी दोनों की जरूरत समझते हुए भी वे मानते थे कि ''हमें हिंदी साहित्य की समृद्धि की चिंता करनी चाहिए. वह दुनिया की किसी भी भाषा से होड़ ले सकने में पूर्णत: सक्षम है. उसकी वंशावली अत्यंत समृद्ध है. उसमें विश्व साहित्य हो सकने का दमखम है.'' (दिशाओं का खुला आकाश, पृष्ठ 175)

लखनऊ, दिल्ली में उनसे कितनी ही मुलाकातें हुई हैं. 'अन्वय' और 'अन्विति' के संपादन के सिलसिले में और इससे इतर भी. कितने ही मौकों पर उन्हें बोलते सुना है. अनेक सभाओं में उन्हें शाइस्तगी से लोगों को सुनते देखा है. छोटे-बड़े लेखकों कवियों से उनकी आत्मीय मुलाकातें थीं. युवाओं के लेखन में उनकी दिलचस्पी रहती थी. वे उनसे सतत संवाद व संपर्क में रहते थे. उनसे मिलने पर यह आभास नहीं होता था कि वे कितने बड़े लेखक हैं. आज वे नहीं हैं तो हिंदी साहित्य के इतने बड़े क्षितिज में जैसे सन्नाटा-सा व्याप्त है. साहित्य में उनकी प्रतिभा के समतुल्य लेखक आज कोई नहीं है.
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#डॉ ओम निश्चल आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध सहित कई पुस्तकें प्रकाशित है. कई संपादित कृतियां व आलोचनात्मक कृतियां भी प्रकाशित हो चुकी हैं. ढेरों साहित्य सम्मान से नवाजे जा चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059. मेल dromnishchal@gmail.com

 

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