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शरद पगारे को 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' पर 2020 के 'व्यास सम्मान' की घोषणा

वरिष्ठ साहित्यकार शरद पगारे को वर्ष 2020 के लिए केके बिड़ला फाउंडेशन की तरफ से व्यास सम्मान की घोषणा की गई है. यह सम्मान उन्हें वर्ष 2010 में आए उनके उपन्यास 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' के लिए दिया गया है.

शरद पगारे और 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' शरद पगारे और 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी'

नई दिल्लीः वरिष्ठ साहित्यकार शरद पगारे को वर्ष 2020 के लिए केके बिड़ला फाउंडेशन की तरफ से व्यास सम्मान की घोषणा की गई है. यह सम्मान उन्हें वर्ष 2010 में आए उनके उपन्यास 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' के लिए दिया गया है. यह निर्णय हिंदी साहित्य के विद्वान प्रो रामजी तिवारी की अध्यक्षता में संचालित एक चयन समिति ने किया.

5 जुलाई, 1931 को मध्यप्रदेश के खंडवा में जन्में शरद पगारे हिंदी साहित्य के जाने-माने लेखकों में से एक हैं. उन्होंने इतिहास में एम.ए. करके के बाद पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की. शरद पगारे इतिहास के विद्वान, शोधकर्ता और प्राध्यापक रहे हैं. इतिहास की जानकारी के साथ-साथ वे किस्सागोई के भी महारथी है.

साहित्य आजतक के लिए युवा लेखिका श्रुति अग्रवाल ने जब इस सम्मान पर पगारे की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो इस वरिष्ठ साहित्यकार ने कहा, "लेखक की कृति को जब ऐसी बड़ी मान्यता मिलती है, तो प्रसन्नता तो होती ही है. वह भी ऐसे लेखक को जिसे पाठकों का तो बहुत प्यार मिला, लेकिन किसी साहित्यिक दल से न जुड़ा होने से उपेक्षित रखा गया. मैं बिरला फाउंडेशन के आभारी हूं कि उन्होंने मेरे साहित्यिक अवदान को 'व्यास सम्मान' द्वारा अभिस्वीकृति दी और कार्य का सही मूल्यांकन किया."

याद रहे कि वाणी प्रकाशन से छपा यह उपन्यास सम्राट अशोक की मां धर्मा पर केंद्रित है. विश्व एवं भारतीय इतिहास के पहले महान सम्राट अशोक मौर्य के महान बनने, उसके व्यक्तित्व का निमार्ण करने, महानता के गुण का श्रेय उसकी मां को भी जाना चाहिए. उसकी मां ने पृष्ठभूमि में रहकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

उपन्यास 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' की कथावस्तु के अनुसार अशोक की मां का नाम धर्मा था. वह चम्पा के एक गरीब दरिद्र ब्राह्मण की अपूर्व, अद्वितीय एवं अनिंद्य सुन्दरी बेटी थी. उसके पिता ने पाटलिपुत्र जाकर उसे सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र युवराज बिन्दुसार को भेंट में दे दिया. सप्त खण्डीय सुगांगेय राजप्रसाद के अन्तःपुर में पहुंचने पर षड्यन्त्रपूर्वक उसे अंगमर्दन करने वाली नाऊन बना दिया गया. पर भाग्य के देवता और उसके रूपलावण्य ने अंततः उसे सम्राज्ञी के पद पर पहुंचाया.

इतिहास में धर्मा के धमार नाइन बनने या फिर सम्राज्ञी के पद पर पहुंचने की यात्रा के बारे कोई जानकारी नहीं मिलती. धर्मा रूप, गुण, कला और सौंदर्य में अप्रतिम थीं. इसीलिए सम्राट बिन्दुसार ने धर्मा को 'सुभद्रांगी' यानी शुभ अंगों वाली कहा था.

धर्मा ने मौर्य साम्राज्य में अपनी स्थिति को समझा और अपने पुत्र के लिए ऐसी कूटनीतिक चालें चलीं, जिससे उनका बेटा महाराज कुमार अशोक अंततः अशोक सम्राट बन पाया. बचपन से ही अपनी मां से प्रियदर्शी पुत्र अशोक को जो शिक्षा मिली उसी के कारण कालान्तर में वह अपनी लोककल्याणकारी नीतियों को लागू कर पाया और 'देवानाम प्रिय', 'प्रियदर्शी' कहा गया.

पगारे ने वृंदावन लाल वर्मा की ऐतिहासिक उपन्यास परम्परा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है. प्रो पगारे शासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं. आपने शिल्पकर्ण विश्वविद्यालय, बैंकाक में अतिथि प्राचार्य के रूप में भी कार्य किया है.

पगारे को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भारतभूषण सम्मान के अतिरिक्त कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. उनके छः कहानी संग्रह, दो नाटक और शोध प्रंबंध प्रकाशित हुए हैं. हिंदी भाषा में प्रकाशित उनकी अनेक रचनाओं का अंग्रेजी, ओड़िया, मराठी, मलयालम, कन्नड़ और तेलुगु में अनुवाद हो चुका है.

व्यास सम्मान की शुरुआत 1991 में केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा की गई थी. यह सम्मान किसी भारतीय लेखक को पिछले दस वर्ष के भीतर प्रकाशित उसकी किसी उत्कृष्ट कृति को मिलता है. इसके तहत चार लाख रुपए की पुरस्कार राशि के साथ एक प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिन्ह भेंट किया जाता है.

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