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देशज यथार्थ और सामाजिक समरसता की कवयित्री अनामिका

समकालीन कविता परिदृश्य में अनामिका का बीते चार दशकों से हस्‍तक्षेप रहा है. हाल के वर्षों में स्त्री विमर्श की भी वे एक प्रमुख हस्ताक्षर रही हैं. जिस संग्रह 'टोकरी में दिगन्त‍: थेरी गाथा 2014' पर उन्हें यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया है, वह बुद्धकाल की थेरियों के बहाने स्त्री प्रजाति की पीड़ा और मुक्ति का आख्यान है.

कवयित्री अनामिका अपनी कृति-चित्र 'टोकरी में दिगन्त‍: थेरी गाथा 2014' के साथ कवयित्री अनामिका अपनी कृति-चित्र 'टोकरी में दिगन्त‍: थेरी गाथा 2014' के साथ

हिंदी कविता में पहली बार एक कवयित्री को अकादेमी पुरस्‍कार देकर न केवल अकादेमी ने एक इतिहास रचा है बल्‍कि कवि समाज में इस पर चर्चा और संवाद प्रतिसंवाद के अवसर भी पैदा किए हैं. इसमें कोई संदेह नही कि अनामिका अपनी समवयस समकालीन कवयित्रियों में कविता, गद्य, कथा साहित्य एवं स्‍त्री विमर्श के मामले में अद्वितीय हैं तथापि सोशल मीडिया पर इसे लेकर कवयित्रियों के मध्‍य जहां उत्‍साह दिखा वहीं दूसरी तरफ कुछ पुरुष लेखक ईर्ष्‍यादग्‍ध होकर प्रतिटिप्‍पणियों पर भी उतर आए. लेकिन समग्रत: साहित्‍य समाज ने इसका हार्दिक स्‍वागत किया है. अनामिका के अनेक संग्रह प्रकाशित हुए हैं. कवि पिता एवं शिक्षाविद् डॉ श्‍यामनंदन किशोर और मॉं डॉ आशा किशोर की संतति के रूप में उनकी साहित्‍यिक सुरुचि और सर्जनात्‍मकता की विरासत को उन्‍होंने जिस तरह आगे बढ़ाया है, वह काबिलेगौर है.

समकालीन कविता परिदृश्य में अनामिका का बीते चार दशकों से हस्‍तक्षेप रहा है. हाल के वर्षों में स्त्री  विमर्श की भी वे एक प्रमुख हस्ताक्षर रही हैं. जिस संग्रह 'टोकरी में दिगन्त‍: थेरी गाथा 2014'  पर उन्हें यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया है, वह बुद्धकाल की थेरियों के बहाने स्त्री प्रजाति की पीड़ा और मुक्ति का आख्यान है. अकादमी पुरस्कार के इतिहास में कविता में पहली बार किसी स्त्री को पुरस्कृत किये जाने को भी लक्षित किया गया  . किन्तु् जहां तक पुरस्कार के मामले में स्त्री होने का सवाल है, ऐसा कोई लैंगिक मानदंड अकादेमी ने नहीं बनाया है. इसलिए यह पुरस्कार बिना इन बातों से प्रभावित हुए दिया जाता है कि व्यक्ति किस जाति, वर्ण, धर्म या लिंग का है. मुजफ्फरपुर, बिहार में 1961 में जन्मी अनामिका ने 1975 में चौदह वर्ष की आयु में 'शीतल स्पर्श एक धूप को' नामक संग्रह से हिंदी कविता के परिसर में प्रवेश किया था, जिसे कि उनके काव्याभ्यास का समय ही मानना चाहिए. उसके बाद दूसरा संग्रह 'गलत पते की चिट्टी' सन् 1979 में आया, तब तक उनकी समवयस कवयित्रियों के एक भी संग्रह न आए थे. ये दोनों संग्रह इस बात के गवाह हैं कि अपनी समवयस कवयित्रियों में अनामिका का प्रवेश कविता में काफी पहले हुआ हालांकि 'बीजाक्षर' 1993 से उनके कवि व्यक्तित्व को एक बड़ी पहचान मिली.
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कविता में जीवन-संसार
अनामिका की कविताओं का संसार जीवन-जगत की हलचलों से बना है. उसमें गतियां हैं, ध्वनियां हैं, आवाजें हैं. आधी दुनिया के मसले उनकी कविताओं में सहज ही प्रवेश करने लगे थे. उनकी 'प्रथम स्राव' कविता आधी दुनिया के अजूबे पर प्रकाश डालती है तथा पहली बार जैसे कुछ अलग सी महसूस कराती है. प्रांरभ से ही अनामिका की कविताओं में एक देशज तत्व विराजमान रहा है. जहां दूल्हा-दुल्हन, कोहबर, तेल, सिंदूर, काजल, नींद, भूख, प्यास, ठहाके और शिकवे, चिट्ठी लिखती हुई औरत, सेफ्टी पिन, दादी, चुटपुटिया बटन जैसे विषयों पर कविताएं हैं, जो आम तौर पर अन्य कवयित्रियों के यहां नहीं मिलते. एक बोलता बतियाता हुआ स्त्रियों की दुनिया का समव्यथी संसार उनकी कविताओं में प्रकट होता है. जैसे बोल-बतकहियों की एक रील सी खुलती चलती है. यह उनके वाचिक में भी दीखता है. वे ऐसे उपमान उपमेय और उत्प्रेक्षाओं की दुनिया आनन-फानन में रच देती हैं कि लोगों को वह दूर की कौड़ी लगे किन्तु यही उनकी कविताओं की विशेषता है.

स्त्री कविता के लक्षण स्त्री कवियों के यहां न हों ऐसा नहीं हो सकता. स्त्री कविता का यह वैशिष्ट्य भी है कि वह दूर से ही किसी स्त्री की कविता के रूप में झलकती है. इन कविताओं को पढ़ते हुए मालूम होता है कि स्त्री होने का एक ताना-बाना अनामिका की कविताओं को एक खास प्रभामंडल देता है, जहां स्त्री की पीड़ा भी जैसे मद्धिम मद्धिम आंच में महसूस होती है तो उसकी आत्मा के निर्मल एकांत की खुशबू भी आती है. वे खुद कहती हैं, ''नैहर आई बेटी से मां का जैसा अविरल, अभंग, सतत प्रवहमान, सहस हृदय संवाद होता है- कुछ वैसा ही संवाद कविता जन-जन से चाहती है. घर के किसी कोने में अनादृत पड़े वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध अभिभावक की तरह कविता चाहती है लोगों के सूक्ष्म भाव तरंगों, सुख दुख, उत्थान-पतन से जुड़ना, पर लोग उसे अभेद्य, अबूझ और अप्रासंगिक समझ कर किनारा किए रखते हैं और उसका संवाद हमेशा अधूरा रह जाता है. (भूमिका, अनुष्टुप, पृष्ठा 7)

यह वह समय था जब विश्व के स्त्री चिंतकों व स्त्री वादियों के विचारों की आहट यहां बखूबी पहुंच रही थी. इसका फायदा स्त्री-लेखन को मिला. यद्यपि अमृता भारती में दार्शनिकता का आवेग ज्यादा प्रभावी दिखता था किन्तु तेजी ग्रोवर, गगन गिल, कात्यायनी व अनामिका के यहां स्त्रीवाद की आहट महूसस की जाने लगी थी. ये सारी कवयित्रियॉं अस्सी के बाद अपनी पहचान बनाने लगी थीं. नवें दशक में अनेक कवयित्रियों के संग्रह सामने आए तथा कविताओं में अधिकारचेता स्त्री अपनी आवाज उठाने लगी थी. अनामिका ने केवल स्त्री की बात ही नहीं की बल्कि ऐसे विषय भी कविता में लिए जो सामान्यत: पुरुष कवियों के क्षेत्र के थे. जैसे 'निस्संतान दम्पति का आपसी संलाप' ऐसी कविता है जो पढ़ते ही आंख भिगो देती है. आज भी निस्संतान दम्पति की पीड़ा को भला कौन समझ सकता है एक कवि के सिवा. यह वह समय था जब पूजाघर ही दादी का कोप भवन होता था, अपना कोना बूँद भर. 'अयाचित' कविता स्त्री के छीजते अस्तित्व का बयान हो जैसे. यही वह दौर था जब वे लिख रही थीं- ''मैं एक दरवाजा थी/ मुझे जितना पीटा गया/ मैं उतना खुलती गयी.'' स्त्री का संसार चूल्हे-चौके तक ही था. इसलिए वह अनामिका की कविता में भी वैसी ही झलक देता था-
वह रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़,
भूचाल बेलते हैं घर.
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समंदर.
रोज सुबह सूरज में
एक नया उचकुन लगाकर
एक नई धाह फेंक कर
वह रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी.
.....
सारा शहर चुप है
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन.
बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी
और वह अपने ही वजूद की आंच के आगे
औचक हड़बड़ी में खुद को ही सानती
खुद को ही गूँधती हुई बार-बार
खुश है कि रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी. (अनुष्टुप, पृष्ठ 40)
यहां स्त्री अपने हालात से पहली बार रू-ब-रू हुई थी और अपनी बात सामने रख रही थी. ऐसी तमाम कविताओं के आधार पर हम अनामिका की कविता का पूरा समाजशास्त्र समझ सकते हैं.
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कविता में बोलचाल की भाषा
अनामिका के कवि कर्म का जहां तक सवाल है, उन्हें सब कुछ सहज ही उपलब्ध‍ नहीं हुआ. एक पहचान-योग्य कवयित्री बनने के लिए एक लंबी यात्रा तय करनी पड़ी है. लिखना-छपना भले ही उन्होंने शुरू किया 14 बरस की उम्र से और 1975 में पहला संग्रह आ गया हो; पर 'बीजाक्षर' व 'अनुष्टुप' के बावजूद उनके कवि व्यक्तित्व का पहला मोड़ 'खुरदुरी हथेलियां' (2005) है, दूसरा 'दूब-धान' (2008) और तीसरा 'टोकरी में दिगंत: थेरी गाथा 2014' है. ये उनकी कविता के तीन बड़े पड़ाव हैं. यह भी कह दूं कि उनकी कविताएं छोटी प्रकृति की नही हैं. वे बोलचाल में हैं, संवादों में हैं, आख्यानमूलक हैं इसलिए वे सामान्यत: लंबी भी हैं. अनामिका कविता में 'ब्रेविटी' यानी मितकथन का मानक तोड़ती हैं. यह उनकी कविता का सहज स्वभाव भी है. उनमें कह देने का एक आवेग नजर आता है. कुछ छूट न जाय यह सतर्कता भी. दूसरे, उनकी कविता ऐसे कोई सेंसर्स नहीं मानती कि हाय यह क्या लिख दिया! लोग क्या कहेंगे! 'ब्लाउज' कविता में उनका कहना कितना वात्सल्य‍ भरा है: ''मेरा ब्लाउज मेरे बच्चे का गुल्लक है. कहीं से भी घूमता टहलता हुआ आता है और बड़े निश्चिंत भाव से पोस्ट कर जाता है/ चकमक पत्थर, सीपी, सिगरेट की पन्नियां, खिलौनों के नट बोल्ट, सारे अखोर बखोर.'' वे 'त्यक्तलज्जा सुखी भवेत्' का मानक अपनाती हैं. पर ऐसा करते हुए भी वे आज की उन कवयित्रियों जैसी नहीं हैं जो सतही चर्चा पाने के लिए गुह्य अंगों या वस्त्रों के प्रतीकों को काव्याधार बनाती फिरें.  

'अनुष्टुप' उनके कवि व्यक्‍तित्‍व को एक धार देता है तो 'खुरदुरी हथेलियां' और दूब-धान उसे निखार और 'टोकरी में दिगंत' परिपक्‍वता. यह 'अपनी केवल धार' जैसा निखार नहीं है. यहां लोहा भी अपना है और धार भी अपनी है. अनामिका अपने काव्योपकरणों के लिए कहीं अन्यत्र नहीं जातीं. खुद की यायावरी और देखे भोगे अनुभवों को शब्द देती हैं. बोल-बतकहियों में वे दादी नानी की प्रजाति के बोल-वैशिष्ट्य से लैस लगती हैं. आत्मा के तलघर में उतर कर बतियाती हुई. वे अपने वाचिक में भी दूर की कौड़ी लाती हैं कि सुनने वाला औचक यही सोचता रह जाता है कि क्या खूब कहा है. उनकी कविताएं न आसानी से संवेद्य हैं न सरलता से वेध्य- वे इस समाज का जीवंत नैरेटिव हैं. ऐसा नैरेटिव जो इतिवृत्तात्मक महाकाव्यात्मक संरचना को तोड़ कर बनता है. जैसे कोई सुगठित छंदों को तोड़ कर संवादों में बदल कर कहे. जीवन के खटराग से निकली सारी ध्वनियां अंतर्ध्वनियां ऐषणाएं, तृष्णाएं, पी़ड़ाएं यहां एकाकार नजर आती हैं. विदेशी कविताओं के अपार पठन-पाठन के बावजूद उन्होंने कविता रचने का स्थापत्य बाहर से नहीं लिया कि लगे कि यह बात किसी अनूदित कविता की संरचना में कही जा रही है. भारतीय काव्यभूमि और भावभूमि उनके यहां सदैव सहचरी की तरह गले मिलती हैं. एक दूसरे को संवलित करती हुई. रचती हुई. अपने संग्रह को 'अनुष्टुप' नाम देना भी कविता के भारतीय संस्कारों का स्तवन है.

'टोकरी में दिगंत: थेरी गाथा 2014' को  अकादेमी पुरस्कार दिए जाने के प्रसंग में उनके स्त्री होने को अहम माना जा रहा है, तो शायद इसलिए कि हाल के दशकों में साहित्य में स्त्रियों की न केवल आमद बढ़ी है बल्कि वे सदियों से स्त्री की सत्ता को लेकर रुढ़िग्रस्त हिंदी समाज से सवाल उठाने में मुखर और प्रखर हुई़ हैं. लैंगिक असमानताओं को लेकर एक लंबी लड़ाई लड़ते हुए वे पारिवारिकता की सीमाओं में रहते हुए मानवीय मोर्च पर एक बड़ी लकीर खींच रही हैं. अपने लेखन, कविताओं, आख्यानों और विमर्शों में अनामिका ने सदैव उस स्त्री का पक्ष लिया है, जो समाज में सताई जा रही है किन्तु जिसने इस भवसागर में नौका खेते हुए नेह-छोह की पतवारें नहीं छोड़ीं. कविवर केदारनाथ सिंह ने जैसा कहा था, उम्मीद नहीं छोड़ती कविताएं, अनामिका की कविताएं पौरुषेय ताकतों से सवाल करती हुई भी उम्मीद नहीं छोड़तीं.
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स्त्री विमर्श: लीक से अलग
अनामिका का स्त्री विमर्श पुरुष प्रजाति को केवल कटघरे में रखने वाला नहीं रहा बल्कि, सख्य और सौहार्द्र का मरकज़ भी रहा है. दुनिया भर के स्त्री विमर्शों पर अधिकार के साथ अपनी बात रखने वाली अनामिका ने इसकी कटु और एकपक्षीय छाया अपनी कविताओं पर नहीं पड़ने दी तथा परिवार, समाज के बीच स्त्री होने के दंश से उपजी व्यथा और स्त्री होने की गरिमा को उत्सवता के साथ जीने वाले समाज में गॉंव-घर व छोटे शहर की स्त्रियों का एक ऐसा जीता- जागता, बोलता-बतियाता हुआ संसार सामने रखा है कि वे अपने पूरे रचाव में एक भारतीय कवयित्री की मुकम्मल इकाई प्रतीत होती हैं. परंपरा और आधुनिकता की पायदान पर कदम टिकाए यह कवयित्री अपने कथ्य और अंदाजेबयां के लिए किसी वायवीय कौशल और कविता के पाश्चात्य ढॉंचे का सहारा न लेकर अपनी सांस्कृतिक और भौगोलिक जड़ों को टटोलती है. इसीलिए उनके रचना संसार में रेणु की तरह उनका अंचल बोलता है, देश और काल बोलता है, स्त्रियों का समवेत स्वर बोलता है.

उनके समूचे काव्य जगत में स्त्रियां, मौसियां, वृद्धाएं धरती का नमक हैं, पत्ता पत्ता बूटा बूटा, खुरदुरी हथेलियां, आम्रपाली, सेफ्टीपिन, चकलाघर की एक दुपहरिया, चुटपुटिया बटन, कमरधनियां, तिरहुतिया दुलार, अमरफल, टैगोर को मेरा प्रेमपत्र, प्लेटफार्म पर ग्रामवधुएं, कान्तासम्मि़त, दरवाजा, चौदह बरस की दो सेक्स वर्कर्स, लंबी छुट्टी पर है ईश्वर- जैसी कुछ चुनिंदा कविताओं को देखें तो इनमें वह वस्तुस्पर्शिता और परदुख-कातरता है जो 'निज के आलाप और गिरह' में इन दिनों कविता से परे छिटकती जा रही है.

अनामिका ने अंग्रेजी में उच्चतर तालीम हासिल की, ईलियटोत्तर कविता और युद्धोत्तर अमरीकी स्त्री कवियों के प्रेम और मृत्यु पर चिंतन पर शोध किया, अंग्रेजी के अध्यापन से जुड़ीं, किन्तु लेखन के लिए हिंदी का ही दामन थामा और 'बीजाक्षर' से लेकर, अनुष्टुप, खुरदुरी हथेलियां, दूब-धान, टोकरी में दिगन्त तथा 'पानी को सब याद था' तक के कविता संसार में मिथकीय, जातीय और लोक-स्मृतियों के बीज छितेरे. अनामिका ने स्त्री विमर्श के कोलाहल में अपना स्वर विलीन न कर उसकी अलहदा बुनियाद रखी तथा पुरुष प्रजाति के जंग खाये सामंती विचारों की खुरचन झाड़ती रहीं तथा पुरुष में प्रेम के अनसूखे जलस्रोतों के प्रति आस्थावान रहीं. कविता के साथ साथ स्त्री विमर्श एवं कथासंसार में भी उनकी गति समान रही तथा 'दस द्वारे का पींजरा', 'तिनका तिनके पास'  और हाल ही आए 'आईनासाज' ने उन्हें एक समर्थ उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित किया. पंडिता रमाबाई और ढेलाबाई की महागाथा (दस द्वारे का पींजरा) हो या मुजफ्फरपुर की सेक्सवर्कर बेटी की शोषणकथा (तिनका तिनके पास) या 'आईनासाज़' में मध्ययुगीन खुसरो से वर्तमान युग के स्त्री जीवन को मिलाने वाली कथा -अनामिका ने कविताई के साथ किस्सागोई में भी अपना लोहा मनवाया है.

'टोकरी में दिगन्त' को पुरस्कार मिलना उनके लिए क्या अर्थ रखता है? वे कहती हैं, ''मेरी कविता एक समवेत पुकार है. इनमें जैसे सब लोग एक साथ बोल रहे हैं. कई स्त्रियों का गांव बसा है. मिथकों, स्मृतियों व जातीय स्मृतियों का सहकार रचा बसा है. यहां मुजफ्फरपुर के गांव कस्बों व छोटे शहरों की लड़कियां और स्त्रियां हैं जो हृदय-संवाद करना चाहती हैं. वे कभी कभी चुप्पी का सहारा भी लेती हैं, जहां उन्हें उपयुक्त शब्द नहीं मिलते, कभी मौन के महासागर में भी उतर जाती हैं और मौन के महासागर के किनारे खड़ी सूर्योदय देख रही होती हैं. वे चुप्पी का सौंदर्यशास्त्र गढ़ती हैं तो चपल बतकहियों का भी. वे कहती हैं कि स्वभाव से संकोची स्त्रियां पहले के समय में अपने मन की बात जोगियों से करती थीं. उनके सम्मुख अपना हृदय-पट खोल देती थीं. आज भी स्त्रियां चाहती हैं कि पुरुष उनसे सखा-सरीखा व्यवहार करे, उसे 'शरीर' में 'रिड्यूस' कर न देखे. वह उसके मन:संसार में उतर कर बातें करे जैसे मीराबाई कृष्ण की प्रतिमा को सखा मान कर बात करती हैं जिससे उनको कितना बल मिलता रहा होगा. ऐसे गढंत, ऐतिहासिक या मिथकीय चरित्र स्त्रियों को बल देते हैं.''

अनामिका पुरुष को विलोम नहीं, स्त्री का पूरक मानती हैं. वे कहती हैं, ''स्त्री की समस्या यही है कि वह हृदय की बात किससे करे. आम्रपाली जैसे चरित्र यही संदेश देते हैं. वह और अन्य स्त्रियां बुद्ध से मन की बात कह सुख पाती हैं जिससे उनका हृदय-छंद मिलता है. बुद्ध उनके साथ न्याय करते हैं.'' तभी आम्रपाली वैभव के प्रस्तावों को ठुकरा कर बुद्ध की शरण में आई थी. वे कहती हैं, ''इस संसार में स्त्री से कोई जरा भी हमदर्दी से बात कर ले तो वह अपना हृदय उड़ेल देती है. इसलिए मेरी कविता सिर्फ मेरी कविता नहीं, यह कोरस है, समवेत पुकार है, वृंदगान है सहकारिता का, स्पर्धा का पाठ नहीं. वे ऐसा पुरुष समाज चाहती हैं जो साथ चलने वाला हो, मैत्री में विश्वास रखता हो, ऐसे समाज की कल्पना करती हैं, जहां सबकी बात सुनी जा सके. एक बातचीत में वे कहती हैं, ''ये पुरुष हमने ही तो पैदा किए हैं. मैं तो बस उनके कोट की धूल झाड़ती हूँ, हृदय पर पड़ी काई हटाती हूँ, उस व्यक्ति को नहीं, उसकी चेतना पर पड़ी धूल बुहारती हूँ और यही तो एक कवि का दायित्व है. मैं चाहती हूँ कि हमारे समय की ध्रुवस्वामिनी को चंद्रगुप्तों का समाज मिले, रामगुप्तों का नहीं.''

'टोकरी में दिगंत--थेरी गाथा 2014' की एक कविता 'शांता थेरी बोली' का एक वाक्य जैसे उनकी कविता का ध्येय वाक्य बन गया है: ''चाहती हूँ विस्फोट -एक प्रज्ञावान, प्रतिबद्ध, अहिंसक किन्तु  अटल और सामूहिक विस्फोट.''  थेरी गाथा की थेरियां स्त्री चेतना का आदिम स्फुलिंग हैं -अंत:पुर से बाहर आती स्त्री की सामूहिक इकाइयॉं. वे हिंदी कविता में अलग से दिखाई देने वाले कथ्य, संवेदन और भाषिक मुहावरे की जननी हैं. इसीलिए वे स्त्री मुक्ति के उन अभियानों का समर्थन नहीं करतीं जिनमें उसकी देह की मुक्ति और उस पर घात लगाए वर्चस्ववादी पुरुष और बाजार की निगाह है. उन्हें कामगार की खुरदुरी हथेलियां दुनिया की सबसे पानीदार और नमकीन लगती हैं, जो तपते हुए माथे के लिए पट्टियां बन जाती हैं. यही वे सरोकार हैं जो उन्हें निचले तबके के प्रति संवेदी और समव्यथी बना देते हैं. उनकी कविता में खुरदुरी सतहें हैं, चाकचिक्य वाली आधुनिकता नहीं. तथापि, वाचिक सरसता में डूबी हुई उनकी कविताएं अपनी ही गढ़ी दुनिया के अवसाद का शोक गीत गाती हुई नि:शेष नहीं हो जातीं बल्कि जीवन व समाज के खटराग की ध्वनियों को सहेजती बरतती हैं. उनकी कविताएं उन पुरुषों से भी प्रीति जताती हैं, दुनिया ने जिन्हें कभी प्रेम न दिया, न मान. कभी उन्होंने कहा था, 'चाहती हूँ शब्दों  की पुलिया बनाना- दुनिया के सारे ध्रुवांतों के बीच यह पुलिया बनेगी तो दूरियां पटेंगी -न्याय और करुणा, प्रेम और अहिंसा का मर्म जगाने में इन शब्दों की मदद चाहती हूँ.'
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मेरे भीतर स्‍त्रियों का एक पूरा गॉंव है
एक बातचीत में अनामिका कहती हैं कि "एक हल्का-सा संतोष इस बात का है कि मेरे भीतर मैं ही नहीं रहती, स्त्रियों का एक पूरा गांव रहता है, एक पूरा कस्बा रहता है, एक पूरी विस्थापन बस्ती रहती है स्त्रियों की. जिन स्त्रियों से मिल चुकी हूँ पिता जी के पुस्तकालय में जो थेरी गाथाएं मिलीं, सड़क की स्त्रियों में जो मुझे किरदार मिले, वर्किंग हास्टल में जो स्त्रियां मिलीं, वे सभी स्त्रियां मेरे भीतर एक स्थायी मुहल्ला बना कर रहती हैं. मैं जब लिखने बैठती हूँ तो वही बोलती हैं मैं नहीं बोलती. मैं तो खाली एक पात्र की तरह होती हूँ-- एक ठनठने कुएं की तरह होती हूँ. मैं एक अंधा कुआं हूँ जिसके भीतर बहुत सी परछाइयां रहती हैं और जिससे बहुत सारी अनुगूंजें उठती हैं. जब मैं बोलती हूँ तो मेरे पीछे वे स्त्रियां बोलती हैं. मुझे लगता है ये परंपरा से आई और वर्तमान समय में संघर्ष कर रही स्त्रियां बुद्ध से बात कर रही हैं.''  
वे कहती हैं, ''जिस संग्रह को पुरस्कार के लिए चुना गया है, वह दरअसल एक काल्पनिक संवादों का सिलसिला है जो ये स्त्रियां अपने मनचीते पुरुष से करती हैं; और कौन है वह मनचीता पुरुष? बुद्ध जैसा प्रज्ञावान धीरोदात्त नायक, जो एक दोस्त-समाज बनाएगा. एक ऐसा दोस्त समाज, जिसमें ऊँच-नीच नहीं होगी, जहां मनुष्यता की भाषा बोली जाएगी. हम सबके भीतर एक नये बुद्ध रहते हैं. बुद्ध का एक परिवर्धित संस्करण रहता है, जो यशोधरा को छोड़कर नहीं जाएगा. मगर उतना ही मैत्री भाव से, उसी तरह संचालित होगा जैसा हम सब स्त्रियां चाहती हैं. हमें एक ऐसा समाज चाहिए जहां पुरुष अति पुरुष न हो, 'माचोमैन' न हो. स्त्रियां भी अतिस्त्रियां न हों. यह जो सम्यक होने का भाव है, संतुलन का भाव है, संवाद का भाव है, वही हमारे जनतंत्र का आधार होना चाहिए. पारस्परिकता ही हमारी दृष्टि का आधार है. मेरी ही नहीं, बहनापे की पूरी दृष्टि का. तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन. यही कहने की कोशिश की है मैंने. हम अतिरेकों में जीकर बहुत झेल चुके. अब अतिरेक नहीं चाहिए.'' अनामिका के स्त्री चरित्रों में नासिरा शर्मा की 'शाल्मली' की छाया दीख पड़ती है जो पुरुष से विग्रह नहीं, संवाद चाहती है, परस्परता चाहती है.

यही वजह है कि राजकमल प्रकाशन ने जब राजधानी के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के रोज़ गार्डेन में अनामिका को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने के उपलक्ष्य में 'बात-मुलाकात' का आयोजन किया और 'टोकरी में दिगन्त' के पेपरबैक संस्करण का विमोचन वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी और कथाकार मृदुला गर्ग से कराया तो वहां मृणाल पांडे, नासिरा शर्मा, गीतांजलि श्री, पारमिता शत्पथी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, वंदना राग, अल्पना मिश्र, गीता श्री, सुजाता, अनुपम सिंह, भगवान दास मोरवाल, अशोक कुमार पांडेय, रविकांत, ओम निश्चल, रवींद्र त्रिपाठी, जितेंद्र श्रीवास्तव, गौतम चौबे, सुधा उपाध्याय, मनीषा तनेजा, पूर्वा भारद्वाज, अनिल यादव समेत तमाम साहित्यकार उपस्थित हुए. अनामिका ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमारा हिन्दी समाज अभी भी एक संयुक्त परिवार की तरह है, जो कहीं भी मिलकर अपने सुख दुख साझा कर लेता है, सबके सुख दुख में खड़ा हो जाता है. कभी आपस में तू तू मैं मैं भी हो जाती है, पर इतनी नहीं कि कोई पराया लगने लगे. उन्होंने कहा, सब कुछ हमारा साझा है, स्मृतियाँ, स्वप्न और संकल्प भी. हम सब मिलकर एक पाठ रच रहे हैं. यही है हमारा साहित्य. यह हमारा साझा सपना है, साझा संकल्प है जिसे हम सब मिल कर रच रहे हैं.

अशोक वाजपेयी का कहना था कि अनामिका की कविताओं ने हमें ऐसी बहुत सी चीजों को जानने चीन्हने का मौका दिया जो हमारे लिए अनचिन्हार थीं. उन्होंने आज के प्रतिकूल समय में, अपने लेखन से थेरी गाथा से लेकर अमीर खुसरो तक अनेक चीजों की स्मृति का पुनर्वास कराया है, जो बिसरती जा रही थीं, यह अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है. तो कथाकार मृदुला गर्ग ने कहा, आज जब हमारी दुनिया भयावह हो चुकी है, तब हमें जरूरत है कि एक नई दुनिया ईजाद करें. पिछली को भूल कर नहीं, बल्कि उस से ही काम की चीजें लेकर. अनामिका अपने गद्य और पद्य में यह काम बखूबी करती हैं. कवियित्री सुमन केशरी का कहना था कि अनामिका एक ओर तो अपने एकदम आसपास से कविता के विषय का चयन करती हैं तो दूसरी ओर इतिहास से संवाद करती हुई उन चरित्रों-पात्रों को हमारे समय के अनुकूल ढाल देती हैं. उनकी कविताएँ स्त्रियों की अपनी व्यथा गाथाएँ हैं, स्वप्न व आश्वासन हैं, उम्मीद की लाली लिए सुबह की किरणें हैं.

इसे अनामिका की स्वीकार्यता ही कहेंगे कि आलोचक अपूर्वानंद ने कहा कि आज जब अपनापन, परस्परता, लगाव जैसे मूल्य धीरे-धीरे ढह रहे हैं, और मिलने्जुलने के मौके दुर्लभ होते जा रहे हैं जिन्हे संजो लेने की जरूरत है, अनामिका का लेखन ऐसे मूल्यों की वकालत करता है. मृत्यंजय का कहना था कि अनामिका की कविताओं ने मुझ जैसे जन्मना पुरुष कवियों को न सिर्फ अपने भीतर और बेहतर तरीके से झांकना सिखाया है, न सिर्फ अपनी पावर पोजिशन को लगातार प्रश्नांकित करने का रास्ता सुझाया, बल्कि हमें एक नयी-टटकी जीवन-दीप्त भाषा भी दी है. उन्होंने हमें बताया हम अपने इर्द-गिर्द रची-बसी आधी आबादी की दुनिया के भावबोध, भाषा, तर्क विन्यास और जीवन तक को कितना कम जानते हैं. पितृसत्ता हमारा चित्त-सम्मोहन कैसे कर लेती है, वे बहुत आत्मीय, बेधक और दृढ़ स्वर में इसे बार-बार रेखांकित करती हैं. राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने 'टोकरी में दिगंत: थेरीगाथा 2014' को 2020 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए चुने जाने को पूरे हिंदी समाज के लिए गर्व की बात बताया.

कहना न होगा कि अनामिका की थेरियां समकालीन स्त्री मुक्ति गाथाओं से आंख मिलाती हैं. थेरी गाथाओं के इस वृत्तांत में आधुनिक समाज सुधारक आते हैं, राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, कार्वे, रानाडे, ज्योतिबा फुले, पंडित रमाबाई, सावित्री बाई आते हैं और माथा छूकर सहलाते हैं. यहां स्त्रीमुक्ति और स्त्री दशा में सुधार की सदियों की यात्रा जैसे अपनी गाथा प्रस्तुत कर रही हो. हिंदी में यदि 'आत्मजयी', 'वाजश्रवा के बहाने', 'संशय की एक रात', 'प्रवाद पर्व' या 'अंधायुग' अपने समय का ज्वलंत ग्रंथ बन सके, तो इसलिए कि उनमें मिथक को समकालीनता की रोशनी में देखने की कोशिश की गयी. स्त्री कविताएं तो अरसे से लिखी जा रही थीं, लेकिन 'टोकरी में दिगंत' में थेरियों के अतीत में जाकर स्त्री मन को टटोलने की यह प्रबंधात्मक कोशिश यातनाओं के अँधेरे में गुम स्त्री के वुजूद को टटोलना है, उनकी कसमसाती हुई, लालटेन की तरह जलती चेतना को पढ़ना है और यह काम अनामिका ने बखूबी किया है.

अनामिका समकालीन कविता में नवें दशक की उपज हैं. उनकी कविता में जो बात स्पष्ट दिखती है वह है उनका भाषाई खुलापन जो अपने प्रयोगों में तद्भव, देशज, गँवई व बोलचाल के अनेक शब्द इस्तेमाल करता है. हुलुर मुलुर, अगरधत्त, उजबुजाती जैसी आंचलिकता उनके भाषाई व्‍यवहार का हिस्सा है. उनका बोल वैशिष्ट्य अन्यों से अलग है तथा उनसे गुजरते हुए लगता है हम आंचलिक भाषा में मँजे किसी कवि के सम्मुख हैं और भारत के अंत:करण की झॉंकी से गुजर रहे हैं.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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