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यादें डॉ मदन गोपाल: शिक्षा-लोक के अविस्मरणीय लोकदेवता!

वे चौदह की उम्र में चौरासी जैसा सोचना सिखाते और कहते, चौरासी में चौदह बनकर जीने का आनंद तभी है. भारतीय रिनेसां को जैसा वे बताते, मैंने कभी किसी इतिहासविद से वैसा नहीं सुना.

लोकदेवता शिक्षक डॉ मदन गोपाल लोकदेवता शिक्षक डॉ मदन गोपाल

भारत-पाकिस्तान सीमा के जिला मुख्यालय श्रीगंगानगर का भोपालवाला आर्य स्कूल! विशाल भवन और प्रभामंडल ऐसा कि उसके सामने अनपढ़ गांव का इकलौता आठवीं कक्षा पास करके आया नाक सुड़कता और बालों में बिना कंघी किया एक बालक खड़ा भी नहीं रह पा रहा था. वह नवीं कक्षा में प्रवेश लेने आया था.
शहर के बेहद ख़ूबसूरत और एक ख़ास दर्प वाले बच्चे बड़ी संख्या में इस भवन के सामने खड़े हैं. उसने प्रवेश के लिए पूछा तो वे हंसे! एडिमिशन लेने आया है? एक लड़के ने गाली देकर बात की. दूसरे ने ऐसे देखा, मानो वह इस संसार में कोई नया जीव है.
सब लड़के ऐसे हंस रहे थे, मानो वह कोई लोहा कूटने वाला है और किसी हीरे तराशने वालों के बीच चला आया है.
वह बोला: हां, एडमिशन लूंगा!
सब बहुत ज़ोर से हंसे. उनका उपहास बहुत ही भयभीत कर देने वाला था. उनकी हंसी, व्यंग्य और घृणास्पद दृष्टि उसे भीतर तक हिला चुकी थी.
वह कांपते पांवों से फिर बोला: हां, एडमिशन लूंगा!
इसी बीच एक लड़का बोला: अरै गुर्जी! (अरे गुरुजी!) और वे ऐसे नदारद हुए मानो जादू से लुप्त. गांव से आए लड़के ने अपनी बाईं तरफ देखा, एक लंबा अमिताभ बच्चन जैसा एक व्यक्ति बहुत ही सम्मोहक अंदाज़ में चला आ रहा है. आंखों में सजग-सावधान कर देने वाली एक दमक और चेहरे पर ऐसा प्रभाव कि सामने वाला देखते ही सम्मान से ध्वस्त हो जाए.
वे जैसे ही पास आए, भाग्य में शाश्वस्त रेगिस्तान और नख़लिस्तान लेकर आए बालक ने उन्हें कहा: नमस्ते. वे एक अद्भुत स्मित और सुकून भरे अंदाज़ में मुस्कुराए.
वे बोले: 'किस गांव से आए हो?'
'25 एमएल.' उस लड़के के इलाके में गांवों के ऐसे ही नाम हैं. यह एक अंगरेज़ जीडी रुडकिन ने रखे थे. उस इलाके में सतलुज से गंगनहर आई तो उसकी माइनरों के आउटलेट के आधार पर गांवों के ऐसे ही नाम रखे गए. ए माइनर के चक एक ए, दो ए, तीन ए. बीबी माइनर के एक बीबी, दो बीबी, तीन बीबी. मुख्य फीडर के एक एमएल, दो एमएल, तीन एमएल.
'सुलेमानकी हैड से?'
'हां, जी.'
'अच्छा. जयलाल जी रहते हैं वहां. वही चक?'
'हां, जी.'
वह यह नहीं बता पाया कि वह उनका ही बेटा है. उनके मन में आया कि वह बता दे. लेकिन नहीं इतना साहस नहीं जुटा. लेकिन उन्होंने कहा, 'पढ़ना है?'
वह बोला: 'हां जी. अच्छा तो आकर फार्म भर देना. अभी निकले नहीं हैं. प्रवेश परीक्षा होगी. पास हुए तो एडमिशन हो जाएगा.' उन्होंने उसे बताया. फिर उन्होंने किसी से कहा, 'इस बच्चे को फार्म दिलवा दो.'
यह पहली बहुत सामान्य मुलाकात थी. उसकी आदत थी कि वह अपने मन में किसी से कितना भी प्रेम करे या अच्छा महसूस करे, बताने में बहुत ही संकोच करता था. उस दिन उस स्कूल परिसर में उसके पांव सहसा कांप रहे थे. लेकिन आंखों में एक विचित्र किस्म की खुशी थी. एक उपेक्षा भाव के प्रति विद्रोह के रूप में उसके भीतर उठा आत्मबल उसे उंगली पकड़ कर आगे बढ़ा गया था.
लेकिन एक कारण था कि इन शिक्षक के स्वभाव ने बालक को प्रभावित किया. वह जब लौट रहा था तो उन्होंने बुलवाया और पूछा, 'खाना खाया? जाओगे कैसे?'
वह उस छोटी उम्र में गांव से घोड़े पर आया था और घोड़ा भी भूखा था और वह भी! तो जिस अंदाज़ में इस शिक्षक ने इन दोनों को खाना खिलवाया, वह आज तक अविस्मरणीय तो है ही.
बालक के जीवन का एक अनूठा पहलू था कि वह उम्र के बड़े फ़ासलों से अपनी विकलता को भरा करता था. वह जिन दिनों बालक था, बड़ी उम्र के लोगों के साथ उसका स्नेहालाप और ज्ञानानुभव चलता-रहता. वह जब उम्र के दूसरे सिरे पर पहुंचने लगा तब भी उसके साथ यही हुआ. उम्र के फ़ासलों के बीच से पुलक और उल्लास को बटोरकर उम्र के घावों पर मरहम की तरह इस्तेमाल करना उसे अब भी सकून देता है. वह अलस पुलक के स्रोत हृदयों के प्रति हमेशा से ही प्राणांत कृतज्ञता भाव से भरा रहता है.
एक दिन वह भी आया जब उस स्कूल में उसका एडमिशन हो गया. उसके बारे में कुछ लोगों ने भविष्यवाणी की थी कि वह कभी नहीं पढ़ पाएगा. उसके हथेलियों की रेखाएं साफ़ बता रही हैं कि उसके जीवन में सिर्फ़ खेत के खूड हैं. खूड जो कि हल चलने के बाद उखड़ी मिट्टी वाली एक रेखा बनती चलती है.
लेकिन 'भविष्यवाणियों पर कभी कोई विश्वास मत करो' उसने अपने पिता से सुना था और इस स्कूल परिसर में गुरुजी ने एक दिन उसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, 'अपशकुन कुछ नहीं होते. इनसे कभी भयभीत मत होओ. झूठ और मक्कारी बहुत है. लेकिन भागो नहीं. ज़हर आए तो उसे भी पी लो. मृत्यु से मत डरो. इस संसार में सिर्फ़ बुराई से डरो. विज्ञान पढ़ो. गणित और इतिहास पढ़ो. किसी से डरने की ज़रूरत नहीं.'
अब वे शब्द किसी धर्मग्रंथ के वाक्य लगते हैं, लेकिन नवीं, दसवीं और ग्यारहवीं कक्षा में उनसे जो कुछ जब कभी सीखने को मिला, वह अमर्त्य था. अनश्वर और असाधारण था.
वह मां नहीं थे, पिता नहीं थे, और दोस्त भी नहीं थे. लेकिन वह जो भी थे, अगर वह नहीं होते तो मैं नहीं होता. यह मैं अक्सर सोचता हूं. मेरे ख़याल जैसे भी हैं, वैसे नहीं होते.
उन्होंने एक दिन बताया, पुस्तक क्या होती है? पुस्तकालय क्या होता है? और फिर भोपालवाला आर्य स्कूल के उस पुस्तकालय में नवीं, दसवीं और ग्यारहवीं कक्षाओं के दौरान क्या-क्या नहीं पढ़ लिया और क्या कुछ नहीं गढ़ लिया. काज़ी नज़रल इस्लाम, माइकेल मधुसूदन दत्त, मुंशी प्रेमचंद, चतुरसेन शास्त्री, दोस्तोएवस्की, गोर्की, दिनकर, गुप्त, मुक्तिबोध जाने कौन कौन! उन दिनों पुस्तकालय से एक छात्र को एक सप्ताह में दो पुस्तकें मिलती थीं. उसके पास उसके कई दोस्तों के कार्ड होते थे और वह हर रोज़ एक किताब पढ़ डालता था.
वह आया तो इंजीनियर बनने था. लेकिन किताबों ने वह राह ही बदल दी. साहित्य और संवेदनाओं का एक अलग सोता फूट गया. वे चौदह की उम्र में चौरासी जैसा सोचना सिखाते और कहते, चौरासी में चौदह बनकर जीने का आनंद तभी है.
भारतीय रिनेसां को जैसा वे बताते, मैंने कभी किसी इतिहासविद से वैसा नहीं सुना. वे ट्रिग्नोमेट्री के बारे में जो समझाते, वह गणित के प्रोफेसरों से नहीं सुन पाया. वे विवेकशीलता के बारे में जैसा बताते या समझाते कि रेशनलिज्म क्या होता है, वह अमिट ही हो गया. वह आर्यसमाज के प्रगतिशील विचारों के प्रशंसक थे, क्योंकि वह एक आर्य स्कूल था.
कभी यह विश्वास नहीं होता कि गांधी इस देश में हुए हों; लेकिन उनके कामकाज और जीवनशैली देखकर विश्वास बनता है. वे बिना बाजू की शर्ट में ही अधिकतर दिखते. सर्दी में कोट भी कभी-कभार पहनते थे. कभी उन्हें क्रोध में नहीं देखा. लेकिन उनकी आंखों की एक निग़ाह डंडे से अधिक प्रभावी और असरकारक थी.
हम अनपढ़, अनगढ़ और अवांछित ग्रामीणों के भीतर इतनी नफ़ासत नहीं होती कि अपने प्रेम को भी आभिजात्य और सम्मोहक अंदाज़ में किसी के सामने प्रस्तुत कर सकें; ख़ासकर ऐसे समय जब हिंसक, कामुक और वासनाओं से भरे लोग साधुता के लिए प्रख्यात रहते हैं. ऐसे में उन्होंने सचाई, प्रेम और रोशनी के बारे में सजग रखा.
शिक्षा के वह सच्चे देवदूत थे. भले वे हिन्दी के कालांश में आए या फ़िज़िक्स के, या फिर कैमेस्ट्री के या ट्रिग्नोमेट्री ....उन्होंने इतना प्रेम से पढ़ाया कि दसवीं में गणित पढ़ाने वाले क्रूरतम शिक्षक को झेल जाना या कैमिस्ट्री पढ़ाने वाले बददिमाग़ शिक्षक की मूर्खताओं को बर्दाश्त कर लेना बहुत आसान था.
हालांकि ग्यारहवीं में थरेजा सर, मोहनलाल गुप्ता सर और विट्‌ठलसिंह अपने अंदाज़ के लिए आज भी आदर के पात्र की तरह विराजे हुए हैं. एक सुलतान सिंह गोदारा थे, जो बहुत दिलचस्प शिक्षक थे. उन जैसी आत्मीयता कम लोगों में रही. कभी भी गुस्सा न करने वाले पृथ्वीराज सहारण को कभी नहीं भूल सकते. मेघराज सहारण हिन्दी पढ़ाते थे और इतने सुंदर अक्षर लिखते थे कि वे आज भी मेरी रूह पर मंढ़े हुए हैं. क्या ही सुदर्शन व्यक्तित्व था उनका. हम बच्चों में चर्चा थी कि वे कभी बॉम्बे में हीरो बनने गए थे. थे भी तो हीरो! राजाराम जी की गतिशीलता, ऊर्जा और अपार प्रेम तो आज तक भी अनवरत है. एक बार शिक्षकों ने हड़ताल की तो हमें एमडी कॉलेज के शिक्षक पढ़ाने आए थे. रणधीरसिंह पूनिया तभी से अविश्वसनीय तरीके से अच्छे लगते थे.
वह एक बार फ़िज़िक्स की क्लास में आए तो उन्होंने पृष्ठतनाव का पाठ पढ़ाया. सरफेस टेंशन. उनका अंदाज़ बहुत निराला था. बालक आगे जाकर जब पत्रकारिता करने लगा और एक दिन गणेशजी ने दूध पिया और पूरे देश में यह खबर चली तो उसे उस दिन पृष्ठतनाव वाला यही पाठ याद आया और उसने गणेशजी के दूध पीने के पीछे के वैज्ञानिक सच को पूरी ख़बर के साथ एक नॉलेज स्टोरी के रूप में लिखा तो सब स्तब्ध रह गए. शाबाशी उस पत्रकार को ज़रूर मिली, लेकिन उसके स्रोत तो यही शिक्षक थे. वे दरअसल बीएससी थे. एमए राजनीति विज्ञान, इतिहास और संभवत: गणित में किया था. वे गोल्ड मेडलिस्ट थे.
उस स्कूल से जो मिला, उसकी कोई तुलना नहीं. वह अदभुत ज्ञान का एक असाधारण उद्यान था. और जिनके बारे में यह लिखा जा रहा है, वे उसके बागबान भी थे और नभस्पर्शी देवदारु भी.
उन्होंने जाने कितने ही विद्यार्थियों की फीस भरी. कितने ही छात्रों को पुस्तकें दिलवाईं. हर साल 100 से अधिक बच्चों को राजस्थान या भारत के शिक्षा के आकाश में किसी उपग्रह की तरह प्रक्षेपित करने वाले वह अदभुत शिक्षक थे. यह काम वे 1952 से अब तक कर रहे थे.
वे सच्चे फ़कीर थे. एक बार केंद्रीय मंत्री भजनलाल गंगानगर उस स्कूल में आए तो उन्होंने कुछ दिन बाद ही उन्हें हरियाणा के सर्विस कमीशन के चेयरमैन का पद ऑफर किया, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया.
मैं अपने समय को याद करता हूं तो मेरे मन में शिक्षकों की कई बार बड़ी डरावनी तस्वीर बनती है, लेकिन उन्हें याद करके लगता है कि अंधेरे कोनों को आलोकित करने वाले भी यहीं हमारे आसपास हैं. और पूरी निश्छलता और पूरी आत्मीयता से हैं.
मेरे जीवन में बहुत कम लोग ऐसे रहे हैं, जो आधी रात को याद आएं तो उनसे आधी रात को ही मिलने का मन करे. मैं शहर छोड़ने के बाद उनसे कम मिल पाया, लेकिन ऐसा शायद ही हो, जब उनकी याद नहीं आई या किसी न किसी बात पर यह न सोचा हो कि वे क्या कहते.
वे एक जीवंत देव प्रतिमा की तरह थे. उनसे बहुत बार बातें हुईं. वे जयपुर आए तो उनसे कई बार मिला. शहर गया तो सबसे पहले उनसे मिलने का मन हुआ. सामने दिखें तो उनकी छवि सहसा नतमस्तक कर दे.
मैं कई बार सोचता हूं, कितनी दुष्टताओं से भरे हुए मन थे हम लोगों के और उन्होंने अपने एक-एक शब्द से कैसे दुष्टताओं को दयालुताओं के अर्थ दिए. कैसे अशिष्ट गालियों को उन्होंने कौतुहल भरे सुंदर सम्मोहक शब्दों की तरफ मोड़ा.
हाथों में पत्थर लेकर किसी के सिर फोड़ देने की मन की हिंसा को उन्होंने कितनी बार यह तरीके बताए कि मन ख़राब हो तो पत्थर मत फेंको, अपने हृदय को किसी को आगे किस तरह रीता करो. और क्या देखते हैं कि आप जब ऐसी शख्सियत से कुछ दूर होने लगते हैं, कहीं और से वही प्रतिध्वनि बहुत प्रेम में लिपटकर आती है. स्नेह से भीगी, अकुलाहट उलीचती और मन को सूक्ष्म चेतना से स्पंदित करती. विशुद्ध और अकलुष!
जीवन को सम्मोहित कर देने और भाग्य को बदल देने वाले ऐसे कितने शिक्षक होते हैं? ऐसे कि आप के मन में आत्महत्या करने का ख़याल आए तो वे आपको जिजीविषा से भर दें, हत्या का कुविचार आए तो वे आपको जीवन दर्शन समझाएं और बताएं कि हिंसा कितने चेहरों के साथ प्रकट होती है और प्रेम कितना बेचेहरा होकर आपके पास लौटता है.
मैं खेत का खूड़ हो जाने के लिए अभिशप्त था. कितनी ही बार पढ़ाई से भाग जाने का मन हुआ. कितनी ही बार तरह-तरह के बुरे ख़याल मन में आए; लेकिन सजग आंखों वाला वह प्रदीप्त चेहरा वाला व्यक्तित्व जब सामने खड़ा होता है तो उसकी सादगी, उसके ज्ञान की आत्मीयता और दर्पहीन सम्मोहन उनके सामने किसी अभिनेता को भी फीका कर देता है. उन्होंने कितनी बार यह समझाया कि शिक्षा क्यों ज़रूरी है? शिक्षा डिग्री नहीं, वह सच में है क्या?
जाने सितंबर का महीना इतना सितमगर क्यों है? मेरे लिए बहुत सी बुरी ख़बरें इसी महीने आती हैं. आज गुरुजी के जाने का समाचार भी मिला. जाने कैसे सुबह-सुबह उनका ही सौम्य सा चित्र दिखा. यह ख़याल ही नहीं था कि वे ऐसे अचानक चले जाएंगे.
कुछ ही दिन पहले तो उन्हें याद किया था. मेरे दोस्त और बड़े भाई जैसे पी सूदन उनकी ख़ैरख़बर भेजते रहते थे. सर का एक किस्सा वे एक दिन सुना रहे थे. वे उन्हें एक दिन बोले, 'कार लेकर आ जाओ.' वे घर गए तो बताया: 'सीतो गुन्नो जाना है.' वहां गए तो पता चला, सर के बड़े भाई नहीं रहे. उन्होंने पी सूदन से कहा, 'अच्छा तुम ऊपर कमरे में बैठो.' वे इंतजार करते रहे. आधे घंटे बाद वे उनके पास ऊपर आए और मुस्कुराते हुए बोले: 'सुपुर्दे ख़ाक कर दिया!'
सूदन बता रहे थे, वे मुस्कुरा तो रहे थे लेकिन चेहरे से साफ लग रहा है कि मन रो उठा है! और आज गुरुजी को भी सुपुर्दे ख़ाक़ कर दिया गया. वहीं, गंगानगर के रामनगर के घर में, जहां वे रहते थे. अब वे सदा के लिए इसी घर में सोएंगे. रामनगर जहां, मैं भी जयपुर आने से पहले रहा. मेरा घर वहीं तो था. उनके पास ही. जब मन करता था, साइकिल उठाई और गुरुजी के पास! रामनगर, जिसे आम बोलचाल में पुरानीआबादी कहा जाता है.
वे 93 साल के थे. जीवन से अदभुत प्रेम करने और आजीवन अविवाहित रहने वाले और मानव मन की समस्त कोमलताओं के साथ अपने ही आंगन में आज उसी मिट्‌टी में सदा के लिए वहीं रह जाने वाले मेरे प्रिय शिक्षक, मेरे हृदय के नायक और मेरे भाग्य को बदलने वाले मेरे उस लोकदेवता शिक्षक को मेरे अकूत प्रणाम, जिनका नाम डॉ. मदन गोपाल था!
 

 

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