गए चार दशकों से मंचों पर जिस एक गीतकार का बोलबाला रहा है, वे बुद्धिनाथ मिश्र हैं. 71 वर्ष के हो चले बुद्धिनाथ मिश्र जितने सुगठित गीत लिखते आए हैं उतने ही सुरीले गीतकार भी हैं. वे हों, मंच हो, सुनने की अभिलाषा हो तो उनके गीत जादू का काम करते हैं. जिस तरह अपने दौर में नीरज, रमानाथ अवस्थी, भारत भूषण आदि को सुनने का एक सहज चाव लोगों के मन में रहा है, वह चाव बुद्धिनाथ के गीतों के प्रति भी देखा जाता है. उनके 71वें जन्मदिन पर उन्हें और उनके योगदान को स्मरण कर रहे हैं हिंदी के सुधी कवि, समालोचक एवं भाषा चिंतक डॉ ओम निश्चल.
एक बार और जाल फेंक ओ मछेरे
जाने किस मछली में बंधने की चाह हो.
कुंकुम-सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है
बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है
यों ही ना तोड़ अभी बीन रे सँपेरे
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो!....
आज से कोई 35 साल पहले के लखनऊ के एक कवि सम्मेलन की याद है. वे मंच पर कोई आधी रात के समय अपना यही सुपरिचित गीत पढ़ रहे थे. श्रोतागण मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे. उसके बाद उन्होंने और एक गीत सुनाया:
''नदिया के पार जब दिया टिमटिमाए
अपनी कसम मुझे तुम्हारी याद आए.''
रात की नीरवता में गीत की टेर दूर तक एक सम्मोहन जगा रही थी. वे हिंदी के लाड़ले गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र थे. तब से उनके गीतों के प्रति अनुरक्ति बनी तो आज तक अक्षुण्ण है. वे अन्य कवियों की तरह संग्रहों की ढेरी लगाने वाले कवि नहीं हैं. पहला संग्रह 'जाल फेंक ओ मछेरे'- इसी जाने पहचाने गीत के नाम पर आया था, जिसे बिहार के लोकप्रिय सांसद और लेखक शंकरदयाल सिंह की संस्था पारिजात प्रकाशन ने 1983 में प्रकाशित किया था. तब से अब तक वे इस गीत को सैकड़ों कवि सम्मेलनों और निजी पारिवारिक गोष्ठियों व दोस्तों की सोहबत में कितनी ही बार पढ़ चुके हैं. लोग इस गीत के दीवाने हो चुके हैं. इस गीत की शोहरत ही रही कि जानी मानी लेखिका शिवानी ने झूला कहानी संग्रह की अपनी अंतिम कहानी का अंत उनकी इन्हीं पंक्तियों से किया था. इस संग्रह के बाद उनके तीन और संग्रह 'जाड़े में पहाड़', 'शिखरिणी' एवं 'ऋतुराज एक पल का' शीर्षक से प्रकाशित हुए तथा एक और संग्रह प्रकाशन के लिए लगभग तैयार हो चुका है.
बुद्धिनाथ का जन्म मिथिला के समस्तीपुर, बिहार के एक गांव देवधा में आज के ही दिन यानी 1 मई 1949 को हुआ था. इस तरह वे उम्र के 71वें बसंत में आ पहुंचे हैं. बसंत इसलिए कि बुद्धिनाथ मूलत: रोमैंटिक मिजाज और सांस्कृतिक भावभूमि के कवि रहे हैं. आज भी उनके गीतों में यथार्थ की बहुत बारीक आमद दिखती है, हालांकि इन गीतों में वे समग्र भारतीयता की एक छवि उकेरते से लगते हैं. बुद्धिनाथ की तालीम में संस्कृत की बुनियादी शिक्षा शामिल है. बाद में उन्होंने अंग्रेजी व हिंदी में एमए तथा पीएचडी की उपाधि हासिल की. हिंदी के साथ-साथ वे मैथिली में भी कविताएं लिखते हैं तथा देश विदेश में गहरी उत्सुकता से सुने और सराहे जाते हैं. अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उन्होंने आज दैनिक में साहित्य और समाचार संपादक के रूप में की तथा बाद में विभिन्न सरकारी उपक्रमों में हिंदी अधिकारी रहे और अंतत: ओएनजीसी से मुख्य प्रबंधक-राजभाषा पद से सेवानिवृत्त हुए. राजभाषा कार्यान्वयन एवं हिंदी के प्रचार-प्रसार से जुड़ कर उन्होंने हिंदी को किसी मृतप्राय और अनुवाद की भाषा के रूप में विकसित करने की बजाय उसे व्यावहारिक धरातल पर उतारने की कोशिश की. जहां भी रहे उस उपक्रम व संस्थान को साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा.
नवगीत की पटकथा और बुद्धिनाथ मिश्र...
बुद्धिनाथ यों तो लोकप्रिय गीतकार हैं किन्तु वाराणसी में जिन दिनों यानी 1980 के आसपास शंभुनाथ सिंह गीत से आगे नवगीत की पटकथा लिख रहे थे और ठाकुरप्रसाद सिंह के सहयोग से शंभुनाथ सिंह के संपादन में नवगीत दशक के प्रकाशन की भूमिका बन रही थी, बुद्धिनाथ मिश्र नवगीत के कवि के रूप में भी प्रतिष्ठित हो चुके थे. शंभुनाथ सिंह ने उनकी लोकप्रियता और नवगीत में निरंतर सक्रियता को देखते हुए 1984 में प्रकाशित नवगीत दशक-3 में राजेंद्र गौतम, डॉ सुरेश, विजय किशोर मानव, जहीर कुरेशी, दिनेश सिंह एवं विनोद निगम के साथ एक नवगीतकार के रूप में शामिल किया. तब 'नवगीत दशक-3' के अपने वक्तव्य में बुद्धिनाथ जी ने कहा था, ''गीतधर्मिता केवल भारतीय लोक जीवन की ही नहीं, मानव मात्र की एक सहजात प्रवृत्ति है. मातृरुपा प्रकृति अपनी संतानों में जिन पोषण रसों का संचार करती है, उनमें एक गीतधर्मिता भी है. यही कारण है कि हम आज नवगीत के छोटे छोटे गमलों में महाकाव्य का अर्थबीज बोने लगे हैं. उन्होंने नवगीत को पल्लव की नवता से जोड़ कर देखते हुए कहा था, पत्ते को पल्लव तभी कहा जाता है जब उसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श की नवीनता होती है. बुद्धिनाथ का कवि ग्राम और नगर के मध्य पला बढ़ा, बचपन गांव के रम्य प्राकृतिक परिवेश में बीता, तो जीविका की जद्दोजेहद शहर और महानगर ले आई. इसलिए गांव व नगर के बीच का द्वंद्व उनके भीतर हमेशा ही पलता रहा है. यही वजह है कि जहां उनके खजाने में गांव के बेहतरीन गीत हैं, वहीं नगरीय अकेलेपन संत्रास और जद्दोजेहद को व्यक्त करने वाले गीत भी. जैसा कि मैं कह चुका हूं उनके भीतर भारतीय आबोहवा में व्याप्त एक समग्र सांस्कृतिक बोध भी सक्रिय रहा है. इस बात की तसदीक उन्होंने अपने इस वक्तव्य में भी की है . वे कहते हैं, ''मैं गांव और नगर के ताने और बाने से नवगीतों को बुना करता हूं तथा नगर और गांव दोनों की स्थिति उत्तरोत्तर अधिक कष्टप्रद होते जाने के बावजूद आस्था और सांस्कृतिक चेतना को मैं छोड़ नहीं पाता, क्योंकि उनका संबल छोड़ देने पर दम घुटने लगता है.''
बुद्धिनाथ मिश्र के गीतों की भावभूमि जैसी शस्य श्यामला है वैसी भावभूमि कम गीतकारों की है. इसीलिए उनके यहां आर्द्रा, बादल, सावन, बसंत, बारिश, सुबह, सांझ, धान और पान के गीत मिलेंगे. प्रेम की ऐसी मौलिक उपपत्तियां उनके यहां हैं तो दाम्पत्य के जुड़ाव भरे गीत भी. नदियों को लेकर उनके गीतों में एक से एक बेहतरीन बिम्ब मिलते हैं. एक नवारुण भोर उनके गीतों से झांकती है. पहाड़ी हवा उन्हें दुलराती है, पर्वत पर खिला बुरॉंस उन्हें उल्लसित करता है. ग्रामदेवता पर लिख कर वे जैसे अपने गांव की परिक्रमा पूरी कर लेते हैं. यह गंवई मन ही है उनके भीतर जो कोलकता, काशी और अब देहरादून रहते हुए भी मलिन और महानगरीयता से आक्रांत नहीं हुआ बल्कि समय-समय पर गीतों की भागीरथी में नहाते हुए नीम तले, यह धरती, बादल आकर देखे, एक पाती नर्मदा के नाम, दिन फागुन के, जामुन की कोंपले, चैती, सावन बरसे, ऋतुराज एक पल का, चांद उगे चले आना, फूल झरे जोगिन के द्वार जैसे गीत लिखता रहा. मिथिला के जनपदीय अंचल से जुड़े बुद्धिनाथ के भीतर एक लोकगीतकार भी सांस लेता है जो उनके गीतों की धुनों को लोकोन्मुख बनाने में मदद करता है. चांद जरा धीरे से उगना, धनी हो गयी लवंगिया की डार लचक चली फागुन में, दिन फागुन के बौराने लगे, नाच गुजरिया नाच कि आयी कजरारी बरसात री, फिर दोपहर लगी अलसाने नीम तले जैसे गीत इसी लोक-लचक के साथ लिखे गए हैं.
प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह के साथ बुद्धिनाथ मिश्र
कुछ न कह सका ठहरा जल बहते जल से...अपने आपने कितना मार्मिक बन पड़ा है. एक आदमी सफलता की सीढ़ियां चढता हुआ उस बिन्दु पर पहुंच जाता है, जिसके सामने अपनी ही जगह पर ठहरा व्यक्ति भला क्या कह सकता है. ऊंच-नीच का यह भाव आज भी अमीर और गरीब वर्ग के मध्य दिखता है, तो मन कलप उठता है. यही सरोकार कवि को ऊपर उठाते हैं क्योंकि वही है जो आम आदमी के पक्ष में आवाज उठाता है. यही नहीं, वे उन पेड़ों के पक्ष में भी आवाज उठाते हैं जिन पर आरियां चलने वाली हैं:
''जंगल से आया है समाचार
कट जाएंगे सारे देवदार.''
हम गीत की परंपरा पर गौर करें तो एक स्वर्णयुग गीतों का रहा है जिसमें नई कविता धारा के साथ गीतकारों का योगदान रहा है पर आज बाब्ड हेयर गीतों के नाम पर नवता का जो उपस्थापन किया जा रहा है, उसके विपरीत शंभुनाथ सिंह, रमानाथ अवस्थी, वीरेन्द्र मिश्र, किशन सरोज, भारत भूषण, कैलाश गौतम व उमाकांत मालवीय के गीत पूर्ण संवेदना का वहन करने वाले गीत रहे हैं. नए गीतों में नवीनता के उन्मेष की पहली बड़ी लकीर भले ही उमाकांत मालवीय, रमेश रंजक और नईम जैसे कवियों ने खींची हो और जिसे यश मालवीय ने अभी तक अपने रचना संकल्पों से जोड़े रखा हो, बुद्धिनाथ मिश्र ने कृत्रिम यथार्थबोध को कभी अपने गीतों में जगह नहीं दी. बल्कि आज भी संवेदना को अहमियत देते हुए वे जब भी किसी नए गीत के साथ सामने आते हैं, संवेदना के तंत्र को हौले से छू लेते हैं. रूप, रस, गंध और ऐंद्रिय संवेदन से भरे उनके गीत सुनने के बाद कविता और कवियों के प्रति प्रीति और रसवत्ता जगाती है.
आज बुद्धिनाथ मिश्र जीवन की उत्तरशती में हैं तथापि उनके गीतों की उम्र आज भी जैसे बहुत कम लगती है, वह उतनी ही संजीदा और संस्कृतिचेता लगती है जितनी युवा. आज भी गीत रचना के शिखर पर पहुंच जाने के बाद भी उनसे युवा जीवन के उस गीत की मांग होती है, जिसे उन्होंने सदैव अपनी संवेदना के भाल पर अक्षत और रोली की तरह सजाया है. अभिधा की कसौटी पर इस गीत को कसते हुए इसके औचित्यसम्मत न होने की बात कही जाती है पर बुद्धिनाथ की इस कविता में न मछली का अर्थ मछली है; न जाल का जाल; न बिंधने का अर्थ कालकवलित होने के लिए प्रस्तुत करना है. इससे उलट संघर्ष, जिजीविषा और लक्ष्य संधान के लिए हिम्मत न हारने की प्रेरणा देने वाला यह गीत आज भी लोकप्रियता की ऊंची पायदान पर है जो बुद्धिनाथ जी का 'सिग्नेचर लिरिक' बन चुका है. न इस गीत का सम्मोहन खत्म होने वाला है, न इस गीतकार की पहचान. बुद्धिनाथ मिश्र गीतों के ऐसे ही सुधी सहचर हैं.
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