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स्मरण: राज-सुनीता बुद्धिराजा, जाना संगीत साहित्य कला की सहचर का

कोरोना से बीमार कवयित्री, संगीत विदुषी और यादगार संस्मरणों की लेखिका सुनीता बुद्धिराजा जीवन से जंग हार गयीं. दुर्योग यह कि उनकी मां डॉ राज बुद्धिराजा, जो खुद एक अच्छी लेखिका थीं, का भी कोरोना से ही निधन हुआ. एक स्मरण

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सुनीता बुद्धिराजाः जिन्होंने शब्दों में पकड़ा सुरों को
सुनीता बुद्धिराजाः जिन्होंने शब्दों में पकड़ा सुरों को

संगीत विदुषी, कवयित्री सुनीता बुद्धिराजा के निधन की खबर जब 22 अप्रैल को आई तो मेरे जेहन में 18 नवंबर, 2014 की एक यादगार शाम गूंज उठी जब संगीत के सात पुरोधाओं के साहचर्य, संवाद और सान्निध्य से संयोजित बुद्धिराजा की पुस्तक 'सात सुरों के बीच' पर अदब सीरीज के अंतर्गत वाणी प्रकाशन, आक्सफोर्ड बुक स्टोर एवं इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल द्वारा आयोजित परिचर्चा के बहाने पंडित जसराज और अशोक वाजपेयी हमारे सम्मुख थे. एक सुरीली शाम पंडित जसराज व अशोक वाजपेयी के साथ संपन्न हो रही थी. अशोक वाजपेयी देर तक पंडित जसराज के गायन पर अबाध बोलते रहे. लग ही नहीं रहा था कि एक कवि बोल रहा है. संगीत, गीत, गायन और स्वातंत्री के रस में पगे अशोक वाजपेयी के भीतर से जैसे सम्मोहन में पगी शब्दावली बोल रही थी. अंत में पंडित जसराज से बोलने का कहा गया. पंडित जी ने अपनी आत्मीय शैली ने बातें करते हुए मन मोह लिया. वे संगीत की दुनिया के अपने बहुतेरे संस्मरण सुनाते रहे. यह भी कि कैसे सुनीता ने अपना अब तक का अमूल्य समय लगाकर इस पुस्तक का ताना बना सहेजा है. सुनीता जी उस दिन कितना प्रसन्न थीं, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. यह उनकी एक बड़ी पुस्तक का आग़ाज़ था, जिसके आगे अभी कितने ही मील के पत्थर जड़े जाने थे, किन्तु 66 साल की अवस्था में उनके जीवन की यह पारी समाप्त हो गयी. उनका जाना साहित्य, संगीत, कला की समन्वित समझ रखने वाली शख्सियत का जाना है.

कोरोना के महागाल में एक-एक कर लेखक, बुद्धिजीवी और आम नागरिक समाते जा रहे हैं. शायद हम पहली लहर को ही इतिश्री मानकर चुप बैठ गए थे इसलिए इस दूसरी सर्वग्रासी लहर का सामना करने में अस्पताल, सरकार और नागरिकों के पसीने छूट रहे हैं. इसी क्रम में पिछले कुछ दिनों से कोरोना से बीमार कवयित्री, संगीत विदुषी और यादगार संस्मरणों की लेखिका सुनीता बुद्धिराजा जीवन से जंग हार गयीं. दुर्योग यह कि उनकी मां डॉ राज बुद्धिराजा, जो खुद एक अच्छी लेखिका थीं, का भी कोरोना से ही निधन हुआ. राज बुद्धिराजा विख्यात शिक्षाविद एवं बहुभाषाविद साहित्यकार थीं. उनका जन्म 16 मार्च, 1937 में लाहौर में हुआ था. आपने समीक्षा, कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्तांत, जीवनी और स्तंभ आदि अनेक विधाओं में लेखन किया और आपकी भी लगभग 55 पुस्तकें प्रकाशित हुईं. आपने भारत-जापान के सांस्कृतिक संबंध के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया था, जिसके चलते जापान नरेश द्वारा सर्वोच्च सम्मान से नवाजी भी गई थीं. आप भारत-जापान सांस्कृतिक परिषद् की अध्यक्ष भी रहीं. 'कन्यादान', 'रेत का टीला', 'दिल्ली अतीत के झरोखे से', 'जापान की श्रेष्ठ कहानियां', 'जापानी हिन्दी कोश' और 'जापान-भारत के लोरीगीत' जैसी पुस्तकों से राज ने भारत के सांस्कृतिक साहित्यिक विकास में अपने हिस्से का योगदान दिया था. जाहिर है, सुनीता बुद्धिराजा ने मां की गोद से ही लोरी सुनी थी और सुर, गीत-संगीत की समझ पाई थी. वह न केवल एक अच्छी कवयित्री थीं, जिनके भीतर एक संवेदनशील स्त्री का भाव-संसार लहराता मिलता था, बल्कि धीरे-धीरे उन्होंने अपनी लेखनी को संगीतकारों के जीवन और उनके संस्मरणों और यात्रा वृत्तांतों की ओर मोड़ दिया था, जिसका परिणाम उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें थीं-  'सात सुरों के बीच' एवं 'रसराज पंडित जसराज'. शास्त्रीय गायक पंडित जसराज पर आधारित इस पुस्तक पर उन्हें 2018 में 'शब्द सम्मान' से नवाजा भी गया था.

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क्या संयोग है कि जब स्त्री-विमर्श के क्षेत्र में इतने उत्तेजित स्वरों का बोलबाला न था, वे अपने शुरुआती लेखन के दौर में ही 'आधी धूप' जैसी काव्य रचना के साथ उपस्थित हुई थीं. इसके बाद 'अनुत्तर' और 'प्रश्न पांचाली' दो काव्यकृतियां और प्रकाशित हुईं. कहना न होगा कि 'आधी धूप' की रचनाएं संवेदना के जिस धरातल की कोख से उपजी लगती हैं वे पढ़ते ही किसी को भावुक बना देने की क्षमता रखती हैं. 'प्रश्न पांचाली' में द्रोपदी प्रसंग को उन्होंने एक नाटकीय अन्विति में ढाल कर प्रस्तुत किया है. शायद यही वजह है कि रंगकर्मी दिनेश ठाकुर ने काव्य नाटक के रूप में इसके लंदन सहित अनेक शहरों में मंचन किए.

नई दिल्ली में 17 नवंबर, 1954 को जन्मी सुनीता बुद्धिराजा एक जानी-मानी एंकर भी रहीं, जो प्राय: संगीत कार्यक्रमों का संचालन करती रहीं. संगीतज्ञों और गायकों से इस दौरान मिले साहचर्य का परिणाम रहा कि उन्होंने 'सात सुरों के बीच' पुस्तक में उस्ताद बिस्मिल्ला खां, पंडित किशन महाराज, पंडित जसराज, मंगलपल्ली डॉ. बालमुरलीकृष्ण, पंडित शिवकुमार शर्मा, पंडित बिरजू महाराज एवं पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के जीवन के बेहतरीन संस्मरणों को एक रमणीयार्थ प्रतिपादक गद्य गुच्छों में सहेजा. यहां तक कि जो लोग संगीत की बारीकियां नहीं समझते वे भी इन संस्मरणों को पढ़ लें तो उनके मुरीद हो जाएं. हर संगीतकार, गायक कलाकार तो होता है पर बातूनी भी हो, यह जरूरी नहीं, बातचीत करने वाले को उस सीमा तक जाकर उसे खोलना होता है. सुनीता की यही सिफत रही है कि उन्होंने संगीतज्ञों के जीवन में गहरे धंस कर ऐसे अनेक प्रसंग उद्घाटित किए हैं जो अन्यत्र कहीं उल्लिखित न मिलेंगे. वे अरसे तक एमएमटीसी में जनसंपर्क विभाग में उच्‍च पद पर आसीन रहीं तथा संप्रति वे किंडलवुड कम्युनिकेशन्स की संस्थापिका व मुख्य-कार्यकारी अधिकारी थीं. उनके लेखन को प्रारंभ में धर्मवीर भारती, रमानाथ अवस्‍थी, गिरिजा कुमार माथुर एवं सुरेंद्र तिवारी जैसे सुधी लेखकों, कवियों ने बढ़ावा दिया तथा कविता के क्षेत्र में पांव जमाने में बहुत मदद की.

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सुनीता बुद्धिराजा शुद्ध कवयित्री भी होतीं तो आज उनके पास प्रभूत कविता संसार होता किन्तु दिल्ली में रात-रात भर होने वाले संगीत समारोहों में उनकी मां उन्हें और उनके छोटे भाई को खींच कर ले जातीं जिसका असर यह हुआ कि वे सुरों के सौंदर्य को पहचानने लगीं. रेडियो, टेलीविजन तथा अनेक मंचों पर वे अपने सुमधुर संचालन में जब कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करतीं तो शब्दों का एक अतींद्रिय संसार खुल जाता. वे केवल संगीतज्ञों या कवियों का बायोडाटा दुहराने वाली संचालिका न थीं बल्कि उनके गुणसूत्रों को एक बेहतरीन कोमल अंदाजेबयां से बयान करने वाली कवयित्री थीं जिनके शब्दों की मीठी चासनी में घुल कर शब्द पुनर्नवा हो उठते.

मां राज बुद्धिराजा और पंडित जसराज के साथ सुनीता बुद्धिराजाः संगीत और साहित्य के युगों का नुकसान
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सुनीता बुद्धिराजा का संगीतकारों से एक अरसे से गहरा सान्निध्य रहा है. कहीं भी कन्सर्ट हो, कहीं भी संगीत सभाएं, वे दीवानगी की हद तक जाकर संगीत व संगीतकारों से लगाव रखती थीं और यह गुण उन्होंने अपनी मां लेखिका राज बुद्धिराजा से पाया था. मैं सुनीता बुद्धिराजा को उनकी पहली किताब 'आधी धूप'' से जानता हूं. प्रभात प्रकाशन से छपी यह किताब उनके अंत:करण का आईना है. कवि सुरेंद्र तिवारी की संगत में रही और धर्मवीर भारती की लाड़ली सुनीता के भीतर कविताओं का ऐसा भावुक और भावक बना देने वाला संसार छिपा है, यह पहले पता न था. आकाशवाणी में कवि गोष्ठियों या किसी शख्सियत से बातचीत के बहाने उनका आवेगमयी संचालन भी सुना है और उससे यह पता चलता था कि सुनीता केवल पेशेवर इंटरव्यूअर या संचालिका नहीं हैं, साहित्य, संगीत व कलाएं उनके पोर-पोर में रची बसी हैं. वे कहती थीं, ''मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानती हूं कि इतने महान और बड़े कलाकारों के साथ एक ही जीवन-काल में परिचय और उनके साथ मधुर संबंध बनाने का अवसर मुझे मिला है. उनके स्वरों का स्पर्श मुझ जैसी व्यक्ति को अपने ही ऊपर गर्व करने का लालच देता है. ऐसे में, जब वर्षों के जुड़ाव में उन सभी महान कलाकारों के साथ किया गया सुर-संवाद, मैं काग़ज़ पर उतारने बैठी तो वह कैसा रूप लेगा, मुझे पता न था. उसका कारण था कि यह बातचीत, यह संवाद कभी इस भाव से नहीं किया गया था कि इसे पुस्तक रूप देना है, बस मैं तो कुछ क्षणों को संजोना चाहती थी, मन की सुंगध में उतारना चाहती थी.'' याद आती है 'आधी धूप' की उनकी एक कविता: 'एक था मन'. अपने पूरे पाठ में उदास कर देने वाली कविता है वह. एक स्त्री के मन की चौहद्दियों और उसकी तमाम तहों के भीतर उतरती हुई एक संवेदनशील कविता. जहां ऐसा संवेदनशील मन हो, वहीं कलाएं विश्रांति का अनुभव करती हैं. यह कविता इस तरह है-

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एक था मन
***
एक था मन
कभी-कभी खुश और उदास था मन
और कभी दूर या पास था मन
मेरी तुम्हारी बात था मन
नये-नये गीतों का
स्मृतियों का, फूलों का
हाशिये पर लिखी अनगिनत भूलों का
साक्षी था मन
रामजी का सिया का वनवास था मन
एक था मन

कभी-कभी जुगनू की कौंध था मन
हाथों की मेंहदी की महक था मन
नन्हीं-सी चिड़िया की चहक था मन
कहा-अनकहा-सा
सुना-अनसुना-सा
पीले और लाल
चंपई पराग-सा
नीम की कोंपल-सा
गुलमुहरी आग-सा
नया था मन
अधबोला कोई संवाद था मन
एक था मन

सूरज था मन
चाँद था मन
बरसाती नदी की बाढ़ था मन
नीरव था, भैरवी की तान था मन
दुलहन के माथे की टिकुली था मन
फूली हुई सरसों का
पायल की रुनझुन का
सूत का, कपास का
हिसाब था मन
जाने किस सवाल का जवाब था मन
एक था मन

बूढ़ा था मन
जवान था मन
पहलौठे बच्चे की सँभाल था मन
अक्षत था मन, रोली था मन
देव था, याचक की झोली था मन
अधूरे किसी स्वप्न का
बिन बरसे मेघ का
चुकी हुई देह का प्रवास था मन
अकसर किसी सच का अहसास था मन
एक था मन.              -आधी धूप

अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा था, ''कॉलेज के ज़माने में हर कोई कविता लिखता है, मैं भी लिखती थी तब, यूं ही लिखने के लिए. अब कॉलेज छोड़ने के सत्रह साल बाद भी जब कविता लिख रही हूं, तो सोचती हूं कि वह लिखना भी 'यूँ ही' नहीं था, तब भी वह विवशता थी- अपने को किसी के सामने न खोल पाने की. किसी प्रतियोगिता में माथुर साहब (गिरिजा कुमार माथुर) से मुलाकात हुई. रमानाथ जी से मुलाकात हुई. पंडित सुरेंद्र तिवारी से मुलाकात हुई. मैं तो कविताओं के सरोवर में तैरने लगी. फिर मेरी पांचों अंगुली घी में सिर कड़ाही में. मैंने भारती जी की कविताओं को महसूस किया, सबसे ज्यादा 'कनुप्रिया' को. अज्ञेय की 'असाध्य वीणा' और दुष्यंत कुमार की 'पेड़ों के साये में धूप लगती है' से मुझे प्यार हो गया. बस मैं उड़ती गयी, अपने आप को बांटने की कोशिश में कविताएं बनती रहीं.''

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सुनीता बुद्धिराजा को जीवन में सफलताएं ही मिली हों, ऐसा नहीं हैं. ऐसा होता तो वे 'एक था मन' या फिर 'परछाईं और मेरे पांव' जैसी प्रश्न फेंकती कविताएं न लिखतीं. भौतिक धरातल पर वे एक सुखी स्त्री थीं किन्तु मन के धरातल पर कहीं न कहीं कुछ खरोंचें भी थीं जिनकी शिनाख्त उनकी कविताओं के साथ उनकी 'पुस्तक टीस का सफर' में की जा सकती है. उनकी इस मनोवेदना को इस कविता में महसूस किया जा सकता है-

मैंने अपनी परछाईं नहीं देखी
तभी तो
यह भी नहीं देख पायी
कि तुम्हारे पैरों के पास
कितनी परछाइयां और हैं

मैंने तो सिर्फ़ इतना किया
कि खुद को भी
मेज़ की चार टांगों में से एक समझ लिया
उस वक्त नहीं सोचा था
टांग और भी फ़िट हो सकती है
ग़लती जरूर हुई
मैंने खुद को मेज की सतह नहीं माना
और तुम मेरे दोस्त भी नहीं हो

अब तुमसे कैसे कहूं
मुझे अपनी परछाईं देखनी है?   -आधी धूप, परछाईं और मेरे पांव

यों तो मैंने उनकी पुस्‍तक 'सात सुरों के बीच' व 'रसराज पंडित जसराज' दोनों पर लिखा है. तथापि उनके जीवन की सबसे श्रेष्ठ कृति 'रसराज पंडित जसराज' ही कही जाएगी. लेखन को लेकर उनकी कई योजनाएं थीं जो आकार ले रही थीं. एक बार पूछने पर कि क्या कुछ नया लिख रही हैं, उन्होंने बताया था कि कुछ संगीतकारों पर उनका काम चल रहा है. इसके अलावा जुगलबंदी सीरीज पर भी वे कार्यरत थीं. हो सकता है इनमें से कुछ पूरी हो गयी हों.

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उन्होंने अपने को कवयित्री, संगीतविद और संस्मरणकार के रूप में साधा था. वे केवल संचालिका भर होतीं तो कार्यक्रम के समापन के साथ बुलबुले की तरह तिरोहित हो जातीं किन्तु उनके भीतर के रचनाकार ने इस संगत को अदृश्य के मधुसंचयी भाव से ग्रहण किया है. एक कवि ने कहा है: 'संचय से सौरभ का यश घटता है. मधुवन की परंपरा को मत तोड़ो.' सुनीताजी ने इस सुगंध को संजोया ही नहीं, बांटा भी है. 'सात सुरों के बीच' और 'रसराज पंडित जसराज' इसी सांगीतिक सुगंध के कोने हैं जहां शब्द केवल निमित्त मात्र हैं, वे अर्घ्य सरीखे हैं- सुरों के देवताओं को प्रसन्न करने के निमित्त 'धूप दीप नैवेद्य' सरीखे. सुनीता के कवि मन ने जिस समर्पण, साधना और कलात्मंकता से कलाकारों के ये वृत्तांत सहेजे हैं वे एक साथ जीवन चरित, ललित वार्ताओं, रम्य रचनाओं, संस्मरण और रिपोर्ताज़ का-सा सुख देते हैं. यह कम उल्लेख्य नहीं कि इसके आकल्पन में भी वही चारुता है जो इसके शब्द-संयोजन में. कुछ शामों, यात्राओं, संवादों और आलाप से रची यह गंगोत्री सचमुच अंत:करण को निमज्जित कर देती है. अब तक के जिए सर्जनात्मक जीवन और संगीत सहकार को आगामी पीढ़ी के लिए एक धरोहर के रूप में सहेजने वाली सुनीता बुद्धिराजा को विस्मृत नहीं किया जा सकता.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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