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जन्मदिन विशेषः राजेश जोशी के संकलन जिद से उनकी 'अनुपस्थित-उपस्थित' व अन्य कविताएं

राजेश जोशी आज की कविता के उन थोड़े से महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं, जिनसे समकालीन कविता की पहचान बनी है. आज उनके जन्मदिन पर उनके काव्य संकलन 'जिद' से चुनी हुई कविताएं.

राजेश जोशी के काव्य-संकलन 'जिद' का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन] राजेश जोशी के काव्य-संकलन 'जिद' का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

राजेश जोशी आज की कविता के उन थोड़े से महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं, जिनसे समकालीन कविता की पहचान बनी है. यह बात केदारनाथ सिंह ने कही थी. कहते हैं कि राजेश जोशी की कविताओं को पढ़ना एक पीढ़ी और उसके समय से दस-पन्द्रह साल पीछे की कविता और उससे जुड़ी बहसों के बारे में सोचना, और इतने ही साल आगे की कविता और उसकी मुश्किलों की ओर ताकना है.

18 जुलाई, 1946 को मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ में जन्मे जोशी 'एक दिन बोलेंगे पेड़', 'मिट्टी का चेहरा', 'नेपथ्य में हंसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' जैसे काव्य संग्रहों के अलावा मायकोवस्की की कविताओं का अनुवाद 'पतलून पहना आदमी' और भृतहरि की कविताओं का अनुवाद 'धरती का कल्पतरु' के लिए खासे चर्चित रहे हैं. साल 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित राजेश जोशी मानवीय मूल्यों और अधिकारों के कवि हैं.

राजकमल से प्रकाशित अपने काव्य संकलन 'जिद' की भूमिका में उन्होंने लिखा आग, पहिया और नाव की ही तरह भाषा भी मनुष्य का एक अद्वितीय अविष्कार है! इस अर्थ में और भी अद्वितीय कि यह उसकी देह और आत्मा से जुडी है! भाषा के प्रति हमारा व्यवहार वस्तुतः जनतंत्र और पूरी मनुष्यता के प्रति हमारे व्यवहार को ही प्रकट करता है! हम एक ऐसे समय से रूबरू हैं जब वर्चस्वशाली शक्तियों की भाषा में उद्दंडता और आक्रामकता अपने चरम पर पहुँच रही है!

"बाज़ार की भाषा ने हमारे आपसी व्यवहार की भाषा को कुचल दिया है! विज्ञापन की भाषा ने कविता से बिम्बों की भाषा को छिनकर फूहड़ और अश्लीलता की हदों तक पहुंचा दिया है! इस समय के अंतर्विरोधों और विडम्बनाओं को व्यक्त करने और प्रतिरोध के नए उपकरण तलाश करने की बेचैनी हमारी पूरी कविता की मुख्य चिंता है! उसमें कई बार निराशा भी हाथ लगती है और उदासी भी लेकिन साधारण जन के पास जो सबसे बड़ी ताकत है और जिसे कोई बड़ी से बड़ी वर्चस्वशाली शक्ति और बड़ी से बड़ी असफलता भी उससे छीन नहीं सकती, वह है उसकी जिद!

"मेरी इन कविताओं में यह शब्द कई बार दिखाई देगा! शायद यह जिद ही है जो इस बाजारू समय में भी कवि को धुंध और विभ्रमों के बीच लगातार अपनी जमीन से विस्थापित किए जा रहे मनुष्य की निरंतर चलती लड़ाई के पक्ष में रचने की ताकत दे रही है! सबसे कमजोर रोशनी भी सघन अँधेरे का दंभ तोड़ देती है! इसी उम्मीद से ये कविताएँ यहाँ है!"

साहित्य आजतक पर राजेश जोशी के जन्मदिन पर पढ़िए उनके प्रतिनिधि संकलन 'जिद' से चुनी हुई उम्दा रचनाएं

1.
अनुपस्थित-उपस्थित

मैं अक्सर अपनी चाबियाँ खो देता हूँ

छाता मैं कहीं छोड़ आता हूँ
और तर-ब-तर होकर घर लौटता हूँ
अपना चश्मा तो मैं कई बार खो चुका हूँ
पता नहीं किसके हाथ लगी होंगी वे चीजें
किसी न किसी को कभी न कभी तो मिलती ही होंगी
वे तमाम चीजें जिन्हें हम कहीं न कहीं भूल आए

छूटी हुई हर एक चीज़ तो किसी के काम नहीं आती कभी भी
लेकिन कोई न कोई चीज़ तो किसी न किसी के
कभी न कभी काम आती ही होगी।
जो उसका उपयोग करता होगा
जिसके हाथ लगी होंगी मेरी छूटी हुई चीजें
वह मुझे नहीं जानता होगा ।
हर बार मेरा छाता लगाते हुए
वह उस आदमी के बारे में सोचते हुए
मन-ही-मन शुक्रिया अदा करता होगा जिसे वह नहीं जानता

इस तरह एक अनाम अपरिचित की तरह उसकी स्मृति में
कहीं न कहीं मैं रह रहा हूँ जाने कितने दिनों से
जो मुझे नहीं जानता

जिसे मैं नहीं जानता
पता नहीं मैं कहाँ-कहाँ रह रहा हूँ
मैं एक अनुपस्थित-उपस्थित !

एक दिन रास्ते में मुझे एक सिक्का पड़ा मिला
मैंने उसे उठाया और आस-पास देखकर चुपचाप जेब में रख लिया
मन नहीं माना, लगा अगर किसी जरूरतमन्द का रहा होगा
तो मन-ही-मन वह कुढ़ता होगा
कुछ देर जेब में पड़े सिक्के को उँगलियों के बीच घुमाता रहा
फिर जेब से निकालकर एक भिखारी के कासे में डाल दिया
भिखारी ने मुझे दुआएँ दीं

उससे तो नहीं कह सका मैं
कि सिक्का मेरा नहीं है
लेकिन मन-ही-मन मैंने कहा
कि ओ भिखारी की दुआओ
जाओ उस शख़्स के पास चली जाओ
जिसका यह सिक्का है।

2.
सड़क पर चलते हुए

धूप से नहीं धोए हैं मैंने अपने बाल

साल-दर-साल मैंने काटी हैं रातें
डामर गाड़ी में बची आँच की रोशनी में
खाते हुए रोटी और प्याज!

मैं नगरों और महानगरों की शानदार सड़कों पर चलते हुए
अक्सर शर्मिन्दा हो जाता है।

न जाने किन-किन इलाक़ों के अकाल से धकियायी गई
स्त्रियों और पुरुषों ने ही बनाई हैं इस मुल्क की
ज्यादातर शानदार सड़कें
काँसे की थाली और माँदर बजा-बजाकर नाचते गाते
थककर चूर उन लोगों की लय से
बनी है मेरी धमनियों में बहते
रक्त की लय

अपने जूते का दाम चुकाते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ
क्या कभी चुकाया है मैंने
उन स्त्रियों और पुरुषों का कोई मेहनताना?
लू के थपेड़े सहते और धूल में खेलते
उनके बच्चों का कोई कर्ज

मैं किस हक़ से गर्दन उठाए चलता हूँ।
इन सड़कों पर ?

सड़क बनवाने का श्रेय लेती है जब कोई सरकार
मेरे हलक़ में अटक जाता है कौर
मेरे मुँह से निकलती है गाली - कामचोर
तुम क्या जानते हो सड़क बनाने के बारे में
डामर बिछाते बार-बार चिपक जाते हैं बूट
बार-बार खींचकर निकालना पड़ता है जब पाँव
तब कितनी खिंचती हैं पाँव की नसें
क्या जानते हो तुम?

क्या सड़कों से गुजरते हुए तुमने एक बार भी सोचा है
उन लोगों के बारे में

क्या पूछा है उनसे कभी कि कितने महीनों से
नहीं लौटे हैं वे अपने गाँव ?

3.
यह समय

यह प्रतिमाओं को सिराये जाने का समय है।

प्रतिमाएँ सिरायी जा रही हैं

भीतर-बाहर सिर्फ सन्नाटा है

काले जल में बस...
प्रतिमा का मुकुट
धीरे-धीरे डूब रहा है!

4.
अँधेरे के बारे में कुछ वाक्य

अंधेरे में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वह किताब पढना
नामुमकिन बना देता था

पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या किताब से डरता था
उसके मन में शायद यह संशय होगा कि किताब के भीतर
कोई रोशनी कहीं न कहीं छिपी हो सकती है
हालांकि सारी किताबों के बारे में ऐसा सोचना
एक क़िस्म का बेहूदा सरलीकरण था
ऐसी किताबों की संख्या भी दुनिया में कम नहीं,
जो अँधेरा पैदा करती थी
और उसे रोशनी कहती थीं

रोशनी के पास कई विकल्प थे
जरूरत पड़ने पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था
जरूरत के हिसाब से कभी भी उसको
कम या ज्यादा किया जा सकता था।
ज़रूरत के मुताबिक पैरों को खींचकर
या एक छोटा-सा बटन दबाकर
उसे अँधेरे में भी बदला जा सकता था
एक रोशनी कभी-कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास
एक रोशनी कहीं भीतर से, कहीं बहुत भीतर से
आती थी और दिमाग को एकाएक रौशन कर जाती थी

एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था
कहता था, उसे रेशा रेशा उधेड़कर देखो
रोशनी किस जगह से काली है

अधिक रोशनी का भी चकाचौंध करता अँधेरा था

अँधेरे से सिर्फ अँधेरा पैदा होता है यह सोचना ग़लत था
लेकिन अँधेरे के अनेक चेहरे थे
पावर हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर
कई दिनों तक अन्धकार में डूबा रहा
देश का एक बड़ा हिस्सा
लेकिन इससे भी बड़ा अँधेरा था
जो सत्ता की राजनीतिक जिद से पैदा होता था
या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देनेवाले
गुलाम दिमागों से !

एक
बौद्धिक अन्धकार मौक़ा लगते ही सारे देश को
हिंसक उन्माद में झोंक देता था

अँधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे
और उसे अपनी नियति मान लेते थे
कुछ जिद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में
जो कहते थे कि अँधेरे समय में अँधेरे के बारे में गाना ही
रोशनी के बारे में गाना है

वे अँधेरे समय में अँधेरे के गीत गाते थे

अँधेरे के लिए यही सबसे बड़ा ख़तरा था।
****

पुस्तक: ज़िद
लेखकः राजेश जोशी
विधा: कविता
प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन
मूल्य: 360/- हार्डबैक
पृष्ठ संख्या: 120

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