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जयंती विशेषः रचनाकर्मी नरेंद्र मोहन की याद में कविताः मैंने निंदर से बातें की हैं

कवि नरेंद्र मोहन से प्रकाश मनु के बड़े अद्भुत संबंध थे. उनकी जयंती पर मनु ने 'मैंने निंदर से बातें की हैं' कविता लिखी है. यह कविता भी है, और कविता के रूप में लिखा गया एक मार्मिक संस्मरण भी

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रचनाकार चिंतक नरेंद्र मोहन और प्रकाश मनु [इनसेट में] रचनाकार चिंतक नरेंद्र मोहन और प्रकाश मनु [इनसेट में]

सुप्रसिद्ध कवि, नाटककार, आलोचक, प्रोफेसर और चिंतक नरेंद्र मोहन 30 जुलाई 1935 को लाहौर में पैदा हुए. एक आलोचक और चिंतक से इतर भारतीय उपमहाद्वीप में शब्द-साहित्य की विभिन्न विधाओं में उनकी उपस्थिति 6 दशक से भी अधिक समय तक महसूसी गई. कविता, नाटक और कथेतर रचनाओं के क्षेत्र में उनकी बहुमुखी प्रतिभा की अभिव्यक्ति विशिष्ट और मार्मिक ढंग से लगातार होती रही. उन्होंने विचार कविता और लंबी कविता पर सर्जनात्मक और आलोचनात्मक काम तो किया ही, उसके लिए बाद की पीढ़ी का मार्गदर्शन भी किया. 
इस बीच उनकी सर्जनात्मकता यात्रा ने 'कहे कबीर सुनो भाई साधो', 'सींगधारी', 'अभंग गाथा' 'क़लंदर', 'नो मेंस लैंड', 'मंच अंधेरे में' और 'मि. जिन्ना' जैसे दस नाटक; 'एक अग्निकांड जगहें बदलता', 'सामना होने पर', 'इस हादसे में', 'हथेली पर अंगारे की तरह', 'एक सुलगती खामोशी', नीले घोड़े का सवार', 'रंग आकाश में शब्द' और 'एक खिड़की खुली है अभी' जैसे ग्यारह कविता संग्रह; पांच लंबी कविताएं; 'साथ-साथ मेरा साया', 'साये से अलग' जैसी डायरी'; 'कविता की वैचारिक भूमिका', विभाजन की त्रासदीः भारतीय कथा दृष्टि', 'शास्त्रीय आलोचना से विदाई' जैसी ग्यारह आलोचना पुस्तकें; 'कमबख्त निंदर', 'क्या हाल सुनावां' जैसी आत्मकथा और 'मंटो जिंदा है' जैसी जीवनी और अनेकानेक पुस्तकों का संपादन कर साहित्यिक जगत में अनूठा मानदंड गढ़ा. 
पिछले बरस कोरोना के कारण बिछुड़ गए इस प्रोफेसर, चिंतक और विचारक को याद करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु ने एक भावनात्मक कविता पिछले दिनों लिखी और उनकी जयंती पर विशेष तौर से प्रकाशनार्थ भेजी. नरेंद्र मोहन से मनु के बड़े अद्भुत संबंध थे. बड़े मन से लिखी इस भावनात्मक कविता के बारे में मनु कहते हैं कि निंदर से जो मेरे संबंध रहे, वह सब कैसे कहूं, पसोपेश में था. फिर आखिर कविता का रास्ता निकल आया. शायद इसी तरह से मैं वह सब कह सकता था, जो अरसे से मेरे मन में उमड़-घुमड़ रहा था. यह कविता भी है, और कविता के रूप में लिखा गया एक मार्मिक संस्मरण भी, जिसमें मेरी भावना ही नहीं मेरा मन और आत्म जैसे बह रहा है.

कविताः मैंने निंदर से बातें की हैं
                                       - प्रकाश मनु

मैंने निंदर को देखा है
मैंने निंदर से बातें की हैं

मैंने उसे देखा है 
कभी लाहौर कभी अंबाला की गलियों में 
अकेले घूमते हुए उदास
मैंने उसे देखा है
चायघर के कोने की बेंच पर
अकेले चाय और आँसू पीते हुए
बुदबुदाते खुद से

मैंने देखा है उसे दोस्तों के बीच कभी वाचाल
कभी एकदम चुप्पी के खोल में दुबके
कहीं कुछ तलाशते हुए
जो एकाएक फिसल गया है जिंदगी से

मैंने उसके चेहरे पर अचानक घिर आए
दुख और उदासियों के काले बादल देखे हैं
जो कहीं बरसना चाहते थे
तो शब्दों की दुनिया में चले आए

मैंने निंदर को देखा है
तक्सीम की तकलीफ भरी यादों को गुहराते हुए
मंटो के टोबा टेकसिंह में फिर-फिर तलाशते हुए
इतिहास का वह दर्द भरा नाटक
जिसने पूरे देश को कँपा दिया
मैंने देखा है उसे चुपके से आँसू पोंछते
मैंने उसकी उदासियों से बातें की हैं

उसने रोते-रोते अपने बचपन के दोस्त आरिफ
और हिसाब सिखाने वाले मास्टर 
यूसुफ मियाँ के बारे में बताया
तो मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया

मैं समझ गया
वे कौन सी अफाट बेचैनियाँ थीं जो उसे कविता की ओर 
खींच रही थीं
और कई-कई दिनों तक वह सहज नहीं हो पाता था

बहुत कुछ था जो कि उसे करना था
क्योंकि दुनियादारी के तकाजे थे
मगर सब कुछ से पहले
और बाद में भी
उसका खुद से मिलना जरूरी था
क्योंकि जब-जब वह खुद से मिलता था धधाकर
जनमती थी एक नई कविता
जिसकी आँच को सहार पाना मुश्किल था

अपना खुद का आकाश लिए उसकी अपनी
बिल्कुल अपनी कविता
जो कविता भी थी और नाटक भी
क्योंकि उसमें जिंदगी टूटकर आती थी
और खूब थपेड़े देती थी

शायद इसीलिए कविता लगातार
लंबी कविता होती गई
और लंबी कविता जिंदगी का महा आख्यान

कविता निंदर के लिए क्या थी-
कहना मुश्किल था
मगर मैंने निंदर को कविता के लिए बैचैनियों से भरकर
रात-रात भर शब्दों का पीछा करते देखा है

मैंने देखा है निंदर की कविताओं का फैलता हुआ आयतन
जिसमें से कभी कहै कबीर सुनो भई साधो जैसा 
नाटक निकल पड़ता है
तो कभी लंबी कविताओं का पूरा एक शास्त्रविधान
कभी आत्मकथा संस्मरण और आलोचना की डगर पर
बहुत कुछ जो औरों के लिए अजाना था

मगर सब कुछ के बावजूद
कविता है कि कभी खत्म नहीं होती
कि वह हर साँस हर बड़बड़ाहट हर बुदबुदाहट में है उसकी

हाँ, मैंने देखी है उसकी खदबदाहट  
और भीतर का वह कबाड़ भरा अँधेरा कारखाना भी
जहाँ हर वक्त चलती है खुट-खुट-खुट
जैसे हमारी सृष्टि का कोई आदिपुरुष 
अपनी सर्वोत्तम रचना में जुटा हो

और फिर शब्दों के उस कबाड़ में से 
एकाएक निकलकर आती है
एक दमकती हुई पुरजोर कविता
जिसमें समय की आँधियों की गूँजें और आर्तनाद है
बेसब्र चुनौतियाँ भी
अन्याय के खिलाफ खौलता हुआ गुस्सा
और किसी कमजोर के कंधे पर रखा हुआ 
आश्वस्ति भरा हाथ

मन और इरादों की गरमाहट से भरा वह हाथ 
जो कुछ नहीं कहता
पर भीतर की चुप्पियाँ कह देता हैं
कि हाँ, मेरे दोस्त, मेरे प्यारे भाई, 
मेरी हर कविता तो तुम्हारे ही लिए है
मेरे हर शब्द की पुकार तुम्हारे, सिर्फ तुम्हारे लिए
लड़ाई का जयघोष!

और अगले पल फिर वह चुपचाप 
अंबाला की उदास सड़कों पर टहलने निकल पड़ता है
जहाँ उसने हवा से बातें करते हुए
कसमें खाई थीं कविता के साथ पूरी उम्र गुजारने की

उसकी मीठी जुबान से प्यार बरसता था
और यह प्यार उसने सबको बाँटा
शब्दों की दुनिया के किसी नौसिखिए से लेकर उन सबको भी
जो कबीर की तरह लिए लुकाठी हाथ निकले थे...
जिन्होंने अपना सब कुछ जलाया था 
एक खूबसूरत दुनिया की नींव बनने के लिए

सबके लिए बरसता था उसकी मीठी जुबान का प्यार
पर सबसे ज्यादा कविता के लिए
जिससे उसे इश्क था बेपनाह
और जिसके साथ उसने ताउम्र 
जिंदगी गुजारने का फैसला किया था

मैं जब-जब उसे पढ़ता था
मैं जब-जब उससे मिलता था
मैं जब-जब उससे बातें करता था
फोन पर सुनाई देती थी जब भी उसकी शहद घुली 
दोस्ताना आवाज
मैं उसका हाथ पकड़े 
लाहौर और अंबाला की उदास सड़कों पर 
भटकने निकल पड़ता था

वहाँ उसके कच्चे किशोर कदमों की शिनाख्त के साथ ही
मुझे मिल जाता था करवटें लेता एक सपना
और एक जुनून भी, जो उम्र भर उसके साथ रहा
शब्दहीन बेचैनियों की शक्ल में

कल रात जब लिखने बैठा उस पर 
चंद सतरें कुछ आड़ी-तिरछी सी
मेरे कदम फिर अंबाला की सड़कों पर निकल गए

वहाँ एक कालेज के सामने चायघर में वह बैठा था
हाथ में एक किताब लिए
किताब खुली थी
पर आँखें उसकी चायघर की दीवारों के पार
किसी अंतहीन आकाश को टटोल रही थीं

मुझे देखकर वह उठा
मिलाया हाथ...
और जब चलने लगा तो उसने मेरी आँखों में देखा
बड़े विश्वास से

अभी तो बहुत कुछ लिखना है दोस्त
अभी बहुत कुछ है अधूरा
जिसे पूरा करना ही चाहता हूँ जाने से पहले-
उसने कहा।

हाँ, होगा, वह जरूर होगा पूरा निंदर
मैंने उसके कंधे पर रखा हाथ यकीन से
उसने अपने हाथों में मेरा हाथ लिया
और हम विदा हुए...

रात सोने से पहले मैं फिर से सोच रहा था
निंदर से अपनी ताजा मुलाकात के बारे में
कि तभी भाई नरेंद्र मोहन का फोन
मनु जी कैसे हैं,
शब्दों में जैसे झर रही हो मिठास

अच्छा हूँ, अभी-अभी निंदर से मिलकर लौटा हूँ
कहा मैंने तो हँसे- खूब हँसे नरेंद्र मोहन
इतनी जोर की हँसी कि उसका प्रकंप
मेरे मोबाइल को भी थरथरा रहा था

हँसते रहे वे
हँसता रहा मैं भी देर तक
हँसी का एक समुद्र था वह
जिसमें खो गए थे वे, मैं भी
खो गईं दिशाएँ तलक...

बच रहा था बस निंदर
उसी तरह लाहौर, दिल्ली और अंबाले की सड़कों पर घूमता हुआ
उदास

उसे पूरी करनी थीं अभी कई अधूरी पड़ी कविताएँ
और मंटो के टोबा टेकसिंह पर कोई ऐसा 
दर्द भरा आख्यान
जिसे चाहकर भी अब तक वह लिख नहीं पाया था
लेकिन जाने से पहले उसे जरूर पूरा कर जाना चाहता था।
***
संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09810602327, ईमेल – prakashmanu333@gmail.com

 

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