प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि केदारनाथ सिंह की आज पुण्यतिथि है. उनकी कविताओं का कोई सानी नहीं है. हिंदी और कविता को जीने वाले सच्चे कवि केदारनाथ सिंह का योगदान अविस्मरणीय है. वह अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक के कवि थे. अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल जैसे रचना संकलनों के कवि केदारनाथ सिंह को साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ और व्यास सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है.
'ताल्सताय और साइकिल' केदारनाथ सिंह की कविताओं का एक ऐसा संग्रह है, जिसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है. 139 पृष्ठों वाले इस यह संकलन की कविताएं देशज-नागर-वैश्विक इतिहास और भूगोल-विमर्श के बीच एक पुल बनाती हैं. केदारनाथ सिंह का काव्य-समय एक न होकर अनेक है और सांस्कृतिक बहुलता को अर्थ देता है.
यह संकलन उनकी पहले की, पर लम्बे समय से बनी पहचान को छंद और छंद के बाहर नया विस्तार देता है. केदारनाथ सिंह की हर कविता एक नया प्रस्थान है जो काव्यात्मक-अकाव्यात्मक, सहज-जटिल को एक साथ साधने की विलक्षण कला का साक्ष्य है. आज केदारनाथ सिंह की पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके कविता संकलन 'ताल्सताय और साइकिल' से कुछ कविताएं.
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1.
स्वच्छता अभियान
हमें उतार देने चाहिए अपने भीतर के सारे कपड़े बाहर के सारे कपड़ों के विरुद्ध नहाना चाहिए मुक्त धूप के गहरे जल में छपाछप् जैसे नहाते हैं पक्षी हमें घोड़े से सीखना चाहिए चलने का ढंग और रंग कौन-सा कब चुना जाय यह कीड़ों-मकोड़ों से जहाँ सब हरा-हरा हो वहाँ आँखों के बजाय कुत्तों की तरह घ्राणशक्ति पर भरोसा करना चाहिए
इतनी गर्द भर गई है दुनिया में कि हमें खरीद लाना चाहिए एक झाडू आत्मा के गलियारों के लिए और चलाना चाहिए दीर्घ एक स्वच्छता-अभियान अपने सामने की नाली से उत्तरी ध्रुवांत तक
2. बारिश में स्त्री
-कि अचानक आ गई बारिश छाता नहीं था उसके पास मेरे पास होने का सवाल ही नहीं था सो भींगते रहे हम भींगते हुए वह एक किताब की तरह खुली थी जिसके अक्षर पूरी तरह धूल-पुंछ गए थे और खुशखत बारिश मानो नए सिरे से उसके वक्ष पर कन्धों पर ठुड्डी पर बालों पर लिखे जा रही थी कोई तरल इबारत जिसे पढ़ रही थीं मेरी आँखें और सुन रहे थे मेरे कान पानी के इतिहास का वह एक दुर्लभ क्षण था जब मेरी आँखों के आगे एक नई वर्णमाला का जन्म हो रहा था एक स्त्री-शरीर से शरीर की अपनी वह एक चम्पई स्याही थी जिसमें छप छप छप छप छपते जा रहे थे अक्षर और अपनी त्वचा से छनकर वह उन्नत शरीर अपनी सारी समृद्धि में धीरे-धीरे बदलता जा रहा था पानी के अपने एक महावाक्य में एक तृप्त मेंढक बारिश के बीच टर्राना भूलकर अवाक् देखे जा रहा था इस समूचे दृश्य को
3. पतझड़
पतझड़ !
पर वह नहीं जो इतना प्रिय था रूमानी कवियों को मेरी मिट्टी का ठेठ भोजपुरिया पतझड़ यानी भूसे की चमक और कपास की बेचैनी गाना बैलों के खुरों में होनेवाला घाव यानी एक मौसम जब हवा में उड़ते हुए छोटे-छोटे तिनके जवान होना शुरू होते हैं और गर्क हो जाती हैं सारी पहचानें मिट्टी की अपनी एक नंगी और भूरी पहचान के रंग में
पहचानो अगर अब भी पहचान सकते हो पहचानो उस निहंग और निचाट पेड़ को जो तुम्हारे सामने है तुम देखोगे-उसके खड़े होने और पत्तों के हिलने में जो लय है वह यहाँ लोगों के चलने और बोलने की लय है
नहीं-उदास नहीं होते ये लोग इस मौसम में सिर्फ कभी-कभी अचानक उठते हैं
जैसे कुछ याद आ गया हो और चले जाते हैं किसी आम या महुए के पास फिर कुछ देर वहाँ रुकते हैं और लौट आते हैं घर जैसे उनका हालचाल पूछकर
पतझड़-हाँ एक विरल पतझड़ फ्रेंच में जिसका अनुवाद हो नहीं सकता पर शायद पश्तो में जिसका तर्जुमा सदियों से मौजूद है
4. स्मारक?
कल बारह बजे दिन में ठीक उसी समय जब दुपहरिया के फूल खिलने-खिलने को थे वह मर गया
कहते हैं-उसे तेज़ प्यास लगी और इससे पहले कि वह अपने लोटे तक पहुँचे उसने एक ज़ोर की साँस ली और लुढ़क गया नीचे
और अब जबकि वह नहीं है हिन्दी का यह कवि नतमस्तक खड़ा है उसकी शोकसभा में जिसमें कोई शरीक नहीं
और पूछना चाहता है समूचे राष्ट्र से कि इस कविता से बाहर क्या कोई जगह नहीं जहाँ रखी जा सके वह एक भी ईंट घुरहुवा के नाम पर उस कभी न बननेवाले स्मारक की नींव में ?