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सेक्स ऐंड द सिटी: तहजीब का तहखाना

हम कहते तो हैं कि सेक्स बुरा है, लेकिन दिन-रात उसी सेक्स की तलाश में रहते हैं. हम मुंह से कही बातों को ही सच मान लेते, अगर इंटरनेट नैतिकता के नकाब में छिपे चेहरों का पर्दाफाश नहीं करता.

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सेक्स ऐंड द सिटी
सेक्स ऐंड द सिटी

इस देश के हिंदी प्रदेश के शहर लखनऊ का एक दृश्य. शहर को अपनी सांस्कृतिक विरासत और तहजीब पर बड़ा गर्व है. शहर के पुरुष दिन के उजाले में प्रतिष्ठा और सम्मान का मैडल सीने पर लटकाए काम पर जाते हैं, स्त्रियां अपनी बेटियों को वर्जिनिटी का महत्व समझती हैं. लड़का घर पर आज्ञाकारी बेटा है और लड़की अच्छी हिंदुस्तानी बेटी. पति पत्नीव्रता हैं और पत्नियां समर्पित. वे यही सोचना चाहते हैं कि उनका बेटा सेक्स के बारे में सोचता नहीं और बेटी वर्जिनिटी को अपना सबसे बड़ा गहना समझ्ती है. यह ऊपर से नजर आने वाला दृश्य है. लेकिन असली खेल शुरू होता है अकेलेपन में या सूरज डूबने के बाद. पापा अपने कंप्यूटर पर, बेटा और बेटी लैपटॉप पर अपनी अंदरूनी ख्वाहिशों का आकाश खोज रहे हैं और गूगल पर टाइप कर रहे हैं ये तीन शब्द-एस-ई-एक्स-सेक्स.

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ऐसा ही एक और कला-संस्कृति का प्रेमी शहर कोलकाता. मम्मियों से लेकर बेटियां तक  सब मॉडर्न हैं. लड़की पूरे कपड़ों में घर से बाहर निकलती है और कॉलेज में स्पेगिटी में घूमती है. बेटा इंटरनेट हिस्ट्री में पोर्न साइट्स के लिंक देख लेता है. पापा को हिस्ट्री डिलीट करनी नहीं आती. बेटी बड़े शहर में नौकरी करती, अकेली रहती है. मां फोन पर समझती हैं कि परिवार की इज्‍जत का ख्याल रखना. अच्छी बेटी 'हां-हां' बोलकर फोन रख देती है और अपने फ्लैट का दरवाजा खोलती है. सामने बॉयफ्रेंड है. अब वे सिर्फ गूगल पर सेक्स सर्च नहीं करते, बल्कि खुद सेक्स करते हैं.सेक्‍स एंड द सिटी

सब एक-दूसरे से सच छिपाते हैं और एकांत पाते ही अपने अधूरे अरमान पूरे करते हैं. लोग सच छिपा रहे हैं, लेकिन इससे क्या? इंटरनेट बड़ा बेईमान है. सारे राज खोल देता है.

गूगल सच बता रहा है. 2011 में गूगल पर सेक्स शब्द की तलाश करने वाले टॉप 10 शहरों में से 7 शहर हिंदुस्तान के हैं और इनमें भी सबसे आगे हैं लखनऊ और कोलकाता, जो क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं. इसके बाद नंबर आता है पुणे, नई दिल्ली, बंगलुरू, चेन्नै और मुंबई का.

जहां जितनी बंदिशें हैं, नैतिकता के जितने ऊंचे लबादे और मुंह में प्रवचन, दिल में उतनी ही गहरी सेक्स की तलाश. ऊपर से बंदिशें और मन में ख्वाहिशें. हजारों ख्वाहिशों पर दम निकल रहा है, लेकिन कहने का साहस नहीं है. आखिर माजरा क्या है? यह अंतर्विरोध क्यों? कहते कुछ और हैं और करते कुछ और. सबके सामने कुछ और एकांत में कुछ और.

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जवाब खोजने की कोशिश कर रहे भारतीय सेक्स मनोविज्ञान पर महत्वपूर्ण किताबें लिखने वाले मनोविश्लेषक डॉ. सुधीर कक्कड़ कहते हैं, ''हम भारतीय संभवतः दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रह रहे दुनिया के सबसे अलोकतांत्रिक और दोहरे चरित्र के लोग हैं.

इस समाज में एक ओर कामसूत्र और खजुराहो है तो दूसरी ओर मनुस्मृति भी, जो कहती है कि रजस्वला कन्या का मुंह देखने वाले पिता और भाई नरक के भागी होते हैं. मतलब? मतलब लड़की के जवान होने, उसकी देह के अरमानों के गुलजार होने से पहले ही उसे रक्षक और भक्षक के हवाले कर दो.''

लखनऊ के सभी पार्क सुबह होते ही प्रेमी जोड़ों से गुलजार हो जाते हैं. लखनऊ के ड्रगिस्ट ऐंड केमिस्ट एसोसिएशन के प्रवक्ता विकास रस्तोगी बताते हैं कि बीते पांच सालों में कंडोम की बिक्री में 15 गुने का इजाफा हुआ है. जहां वर्ष 2007 तक कंडोम का सालाना कारोबार 2-3 करोड़ रु. का था, वहीं अब यह बढ़कर 50 करोड़ रु. तक पहुंच गया है. यही ट्रेंड दूसरे गर्भनिरोधकों और यौन शक्तिवर्द्धक दवाओं की बिक्री में भी दिख रहा है.

लखनऊ में सेक्स क्लीनिक चलाने वाले डॉ. पी.के. जैन कहते हैं, ''आज से पांच साल पहले 40 से 60 की उम्र के लोग मेरे पास अपनी यौन समस्याएं लेकर आते थे, लेकिन पिछले एक-दो सालों में 20 से 40 के बीच के युवाओं की तादाद बहुत बढ़ गई है. यह समस्या इंटरनेट पर अश्लील साहित्य देखने के बाद अप्राकृतिक यौन सुख लेने से जुड़ी है.''

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लखनऊ के चिकित्सा विश्वविद्यालय में महिला रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. एस.पी. जायसवाल बताती हैं कि बीते तीन सालों में गर्भनिरोधक दवाओं के मनमर्जी प्रयोग के चलते बीमार होने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. चौंकाने वाली बात यह है कि शादी से पहले बड़ी संख्या में युवतियां बगैर डॉक्टरी परामर्श के गर्भनिरोधक दवाएं खाने के चलते होने वाले अत्यधिक रक्तस्त्राव की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच रही हैं.

लखनऊ विवि में मनोविज्ञान विभाग में लेक्चरर डॉ. अर्चना शुक्ल  कहती हैं, ''पिछले पांच सालों में इस शहर के लोगों की जीवन शैली में काफी बदलाव आया है. छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद नौकरीपेशा लोगों के पास अचानक काफी धन आ गया और उन लोगों ने आधुनिकता का चोला पहनने की कोशिश की. इस नवधनाढ्य वर्ग ने अपने बच्चों की जरूरतों को झ्ट से पूरा कर दिया और खुद भी पार्टियों और क्लबों की संस्कृति में रमने लगे. बच्चों को छूट मिल गई.sex and the city

इसका नतीजा इंटरनेट पर सेक्स और पोर्न साइट की तलाश के रूप में सामने आ रहा है.'' अपने दबे अरमानों को पूरा करने की तलाश में लखनऊ के युवा नाइट क्लब की शरण लेते हैं. भले अभी यह लखनऊ की संस्कृति में पूरी तरह से रच-बस न पाया हो, लेकिन उन्मुक्तता की तलाश में बेचैन नई पीढ़ी को तो इसने बड़े पैमाने पर अपनी ओर खींचा ही है.

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यहां के एकमात्र नाइट डांस क्लब जीरो डिग्री के मालिक मो. यूसुफ बताते हैं कि तीन साल पहले जब मैंने यह क्लब खोला था तो औसतन सौ सवा सौ लोग ही आते थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 300 के पार पहुंच गई है.

ग्लोबलाइजेशन की नई दुनिया में पुरानी सामंती और आधुनिक तह.जीब के बीच जंग छिड़ी है. नई जिंदगी की अपनी चुनौतियां हैं. करियर का दबाव है और कुछ बनने की चाहत. शादी की उम्र 16 साल से खिसककर 30-35 तक पहुंच गई है. चुनौतियां नई हैं, लेकिन समाज की सोच और अपेक्षा वही पुरातनपंथी.

लखनऊ के इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीण कहते हैं, ''मेरी नजर में बाल विवाह अपराध है, लेकिन इसका एक उजला पक्ष भी था. इससे मनुष्य के चरित्र पर कुछ अंकुश लग जाता था. देर से विवाह होने पर कौमार्य सुरक्षित नहीं रहता.'' लेकिन क्या यह कौमार्य इतनी मूल्यवान चीज है, जिसके बारे में ग्रंथ कहते हैं कि जीवन देकर उसकी रक्षा करो. डॉ. कक्कड़ कहते हैं कि हिंदुस्तानी नैतिकता में कौमार्य सिर्फ स्त्री का होता है.

इलाहाबाद में केमिस्ट्री की लेक्चरर और एक्टिव फेमिनिस्ट डॉ. पद्मा सिंह पूछती हैं, ''आखिर कौमार्य है क्या? और क्यों उसे इस तरह बचाना जरूरी है? 30 साल तक अपने करियर के लिए शादी न करने वाले युवाओं से वर्जिन रहने की उम्मीद भी करना कितना बड़ा अन्याय है?'' जिस उम्र में हॉर्मोन अपने उफान पर होते हैं, कामनाएं सिर उठाती हैं, वह उम्र शादी की तो नहीं है. आज बड़ी संख्या में लड़कियां आधुनिक और आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं.

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अकेले रह रही हैं. ऐसे बच्चों के माता-पिता क्या सोचते हैं? वे यही मानते हैं कि उनके बच्चे यौन संबंधों में लिप्त नहीं होंगे. वे ऐसा सोचते हैं क्योंकि वे यही सोचना चाहते हैं. शायद वे अपने ही भोले विश्वासों की दुनिया में जी रहे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक लखनऊ में नौकरी व पढ़ाई के लिए आए युवकों की तादाद पांच लाख से ज्यादा है. लखनऊ के नेशनल इंटर कॉलेज की 21 वर्षीय एक छात्रा, जो बेहद पारंपरिक और रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती है, अपना नाम न बताने की शर्त पर कहती है कि उसका बॉयफ्रेंड है और सेक्सुअल रिलेशन भी. ''ये बात मेरी करीबी सहेलियों को भी पता नहीं. मैं जानती हूं कि समाज और परिवार में इसे बुरा माना जाता है, लेकिन मुझे तो इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता.'' चिनहट के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा एक छात्र ग्रामीण परिवेश से आता है. उसने अपने गांव में कभी लड़के-लड़कियों को इतनी आजादी और उन्मुक्तता से बांहों में बांहें डाले घूमते नहीं देखा. मन में कामना और कुंठा एक साथ जन्म लेती है और उसका अंत होता है इंटरनेट पर पोर्न साइट्स की तलाश में.

मुंबई के जाने-माने सायको-एनालिस्ट डॉ. दयाल मीरचंदानी कहते हैं, ''यह सामान्य मानवीय मनोविज्ञान है कि जिस इच्छा को दबाया जाता है, वही सबसे ज्यादा सिर उठाती है. हमारी दिक्कत दोहरी है. इस समाज में न सिर्फ शादी से पहले सेक्स को बुरा और निंदनीय समझ जाता है, बल्कि स्वस्थ दैहिक संबंधों का कोई स्पेस भी नहीं है. सेक्स को लेकर पति-पत्नी के बीच भी खुला संवाद नहीं होता. ऐसे में इच्छाएं दूसरे दरवाजे ढूंढती हैं. पोर्न साइट, अश्लील एमएमएस वगैरह इसी का नतीजा हैं.''

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नाम उजागर न किए जाने की शर्त पर कितने युवक-युवतियां विवाह पूर्व दैहिक संबंधों की बात स्वीकारते हैं. कई पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, नौकरीपेशा और अपनी पहचान रखने वाली 30 पार युवतियां और युवक बाकायदा फ्री सेक्स की वकालत करते हैं. उनका विश्वास है कि जीवन के अन्य अनुभवों की तरह सेक्स भी एक अनुभव है. यह जीवन का जरूरी और अंतरंग हिस्सा है. इसमें नैतिक और अनैतिक का सवाल कहां से आता है? दिल्ली की एक मशहूर पत्रकार अनन्या (नाम परिवर्तित) पूछती हैं कि हम नैतिकता और सेक्सुअल पवित्रता का इतना दावा तो करते हैं, फिर स्कूल जाने वाली छोटी उम्र की लड़कियों में एबॉर्शन के मामले इतने क्यों होते हैं?

कंडोम और गर्भनिरोधकों का बाजार इतना गर्म क्यों है? इसका मतलब कि कहीं कुछ झूठ जरूर है. हो कुछ और रहा है और हम बोल कुछ और रहे हैं. डॉ. कक्कड़ कहते हैं कि हमारा समाज आज भी विक्टोरियन नैतिकता के दिखावे से बाहर नहीं आ पाया है. यूरोप में इसके खिलाफ काफी संघर्ष हुआ, लेकिन हमारे यहां नहीं. आज जो खुलापन दिखता भी है, वह ग्लोबलाइजेशन और बाजार की देन है. इसका वैचारिक और मानसिक रूपांतरण से कोई ताल्लुक नहीं है.

हिंदी के लेखक उदय प्रकाश कहते हैं, ''हमारे समाज में होता सबकुछ है, लेकिन परदे के पीछे. हममें उसे स्वीकार करने का नैतिक साहस नहीं है. पश्चिम का समाज हमारी तुलना में ज्यादा ईमानदार है. वे हमारी तरह सेक्स के मामले में नैतिकता का बोझ नहीं ढोते.''

लखनऊ चिकित्सा विवि के मनोरोग विभाग के प्रो. हरजीत सिंह कालरा के मुताबिक, ''लखनऊ इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. अब यह छोटा शहर तो रहा नहीं, लेकिन पूरी तरह से मेट्रो भी नहीं बन पाया है. यह शहर सपने तो मेट्रो संस्कृति के देखता है, लेकिन पांव अभी भी परंपराओं में जकड़े हैं.'' प्रो. कालरा बताते हैं कि सेक्स क्लीनिक में 5 साल पहले जहां 40 वर्ष से अधिक आयु के लोग ज्यादा आते थे, वहीं अब 20 से 40 आयु वर्ग के लोगों की तादाद काफी है. इनकी संख्या बीते पांच साल में तीन गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है. इन युवाओं में सबसे ज्यादा समस्या शारीरिक संबंधों को लेकर होती है.

प्रो. कालरा के मुताबिक उनकी क्लीनिक में आने वाले 70 फीसदी युवा कॉलेज के छात्र होते हैं, जो शारीरिक संबंध बना चुके होते हैं. आज गूगल ने जिस सचाई को उधेड़कर रख दिया है, वह सच हमारे झूठ और मक्कारी की कहानी सुना रहा है. जैसाकि स्टीफेन ज्विग ने कभी 19वीं सदी की शुरुआत के वियना के समाज के बारे में कहा था कि हम जो छिपाते थे, दरअसल भीतर से वही थे. सेक्स को बुरा समझ्ते और सेक्स की फिराक में रहते.

गूगल हमें आईना दिखा रहा है. हम सेक्स को बुरा समझ रहे हैं और दिन-रात सेक्स की फिराक में हैं. पत्नीव्रता पुरुष दफ्तर और सड़क पर लड़कियों को देखकर मचल रहे हैं, समर्पित स्त्रियां बेवफाई के मौके ढूंढ रही हैं, आज्ञाकारी बेटियां बॉयफ्रेंड के साथ घूम रही हैं और बहनों के बॉयफ्रेंड पर निगाह रखने वाले भाई दूसरों की बहनों के साथ मुहब्बत के बगीचों की सैर कर रहे हैं. सब सेक्स ढूंढ रहे हैं और सब झूठ बोल रहे हैं.

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